RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 36 तिलचट्टा

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Detailed Chapter 36 तिलचट्टा RBSE Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 36 तिलचट्टा RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Biology Chapter 36 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 36 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. कॉकरोच है
(अ) शाकाहारी
(ब) मांसाहारी
(स) सर्वाहारी
(द) फलाहारी
Answer: (स) सर्वाहारी
In simple words: कॉकरोच एक ऐसा जीव है जो पौधों और जानवरों दोनों को खाता है, इसलिए यह सर्वाहारी कहलाता है।

🎯 Exam Tip: खाद्य आदतों के आधार पर जीवों को शाकाहारी (केवल पौधे खाते हैं), मांसाहारी (केवल मांस खाते हैं) और सर्वाहारी (पौधे और मांस दोनों खाते हैं) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

 

Question 2. कॉकरोच का सिर कितने भ्रूणीय खण्डों से मिलकर बना होता है।
(अ) 5
(ब) 6
(स) 10
(द) 9
Answer: (ब) 6
In simple words: कॉकरोच का सिर छह छोटे टुकड़ों से मिलकर बनता है, जो मिलकर एक पूरा सिर बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कॉकरोच का सिर भ्रूणीय अवस्था में कई खण्डों के जुड़ने से बनता है, जो बाद में मिलकर एक कठोर कैप्सूल का रूप ले लेता है।

 

Question 4. कॉकरोच का बाह्य कंकाल बना होता है।
(अ) काईटिन का
(ब) उपास्थियों का
(स) अस्थियों का
(द) किरैटिन का।
Answer: (अ) काईटिन का
In simple words: कॉकरोच का बाहरी ढाँचा एक खास मजबूत चीज़ से बना होता है जिसे काईटिन कहते हैं, जो उसे सुरक्षा देती है।

🎯 Exam Tip: काईटिन एक प्रकार का पॉलीसेकेराइड है जो आर्थ्रोपोड (जैसे कीड़े) के बाह्य कंकाल को शक्ति और सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे वे शिकारियों और पर्यावरण से बचे रहते हैं।

 

Question 5. कॉकरोच की अंगिकाओं में पाये जाने वाले जान्स्टन अंग (Johnston organ) होते हैं।
(अ) स्वाद संवेदी
(ब) गंध संवेदी
(स) ध्वनि संवेदी
(द) गति संवेदी
Answer: (द) गति संवेदी
In simple words: कॉकरोच के जान्स्टन अंग उनकी गतिविधियों को महसूस करने में मदद करते हैं, जिससे उन्हें दिशा और संतुलन का पता चलता है।

🎯 Exam Tip: जॉनस्टन अंग एंटेना (श्रृंगिका) के पेडीसिल (दूसरा खंड) में स्थित होते हैं और हवा के कंपन, गुरुत्वाकर्षण, और शरीर के घूमने जैसी गति को महसूस करने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।

 

Question 6. कॉकरोच में जिव्हा के समान कार्य करने वाला मुखांग है
(अ) लैबियम
(ब) हाइपोफैरिंक्स
(स) मेडिबिल
(द) मैक्सिला
Answer: (ब) हाइपोफैरिंक्स
In simple words: कॉकरोच के मुँह में हाइपोफैरिंक्स नामक एक अंग होता है जो हमारी जीभ की तरह काम करता है, भोजन को हिलाने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: हाइपोफैरिंक्स, जिसे लारिका भी कहते हैं, भोजन को मुखगुहा में धकेलने और लार के साथ मिलाने में मदद करता है, ठीक वैसे ही जैसे जीभ भोजन के साथ करती है।

 

Question 7. गुदा शूक (Anal Styles) पाये जाते हैं
(अ) केवल नर कॉकरोच में
(ब) केवल मादा कॉकरोच में
(स) दोनों में
(द) लिम्फोसील
Answer: (अ) केवल नर कॉकरोच में
In simple words: नर कॉकरोच में ही गुदा शूक नामक छोटे कांटेदार अंग होते हैं, जो मादा कॉकरोच में नहीं होते।

🎯 Exam Tip: गुदा शूक नर कॉकरोच की पहचान का एक महत्वपूर्ण यौन द्विरूपता (sexual dimorphism) लक्षण है, जो उन्हें मादाओं से अलग करता है।

 

Question 9. कॉकरोच की पेषणी में कितने क्यूटीकुलर दांत पाये जाते हैं
(अ) 4
(ब) 6
(स) 8
(द) 10
Answer: (ब) 6
In simple words: कॉकरोच की पेषणी में छह छोटे, कठोर दांत होते हैं जो भोजन को पीसने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: पेषणी (गिजार्ड) कॉकरोच के पाचन तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भोजन को बारीक टुकड़ों में तोड़ने के लिए मजबूत काईटिनी दांतों का उपयोग करता है।

 

Question 10. कॉकरोच में पश्चांत्र की उत्पत्ति होती है
(अ) एक्टोडर्म से
(ब) एण्डोडर्म से
(स) मीजोडार्म से
(द) उपरोक्त तीनों से
Answer: (अ) एक्टोडर्म से
In simple words: कॉकरोच का पश्चांत्र (पीछे का गट) शरीर की बाहरी परत, एक्टोडर्म से बनता है, जैसे त्वचा बनती है।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच जैसे आर्थ्रोपोड्स में, अग्रान्त्र (foregut) और पश्चान्त्र (hindgut) दोनों एक्टोडर्मल उत्पत्ति के होते हैं, जबकि मध्यान्त्र (midgut) एंडोडर्मल होता है।

 

Question 11. कॉकरोच में कितने जोड़ी श्वास रंध्र (Spiracles) पाये जाते हैं।
(अ) 12 जोड़ी
(ब) 14 जोड़ी
(स) 10 जोड़ी
(द) 20 जोड़ी
Answer: (स) 10 जोड़ी
In simple words: कॉकरोच के शरीर पर 10 जोड़ी छोटे छेद होते हैं, जिन्हें श्वास रंध्र कहते हैं, जिनसे वह साँस लेता है।

🎯 Exam Tip: इन श्वास रंध्रों में से 2 जोड़ी वक्ष पर और 8 जोड़ी उदर पर स्थित होते हैं, जो सीधे श्वसन नलिकाओं (trachea) से जुड़े होते हैं।

 

Question 12. कॉकरोच के रक्त को कहते हैं
(अ) लिम्फ
(ब) हीमोलिम्फ
(स) हीमोग्लोबिन
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
Answer: (ब) हीमोलिम्फ
In simple words: कॉकरोच के शरीर में जो खून जैसा तरल होता है उसे हीमोलिम्फ कहते हैं, जो हमारे खून से अलग होता है।

🎯 Exam Tip: हीमोलिम्फ रक्त और लिम्फ दोनों के कार्यों को करता है, लेकिन इसमें श्वसन वर्णक (जैसे हीमोग्लोबिन) नहीं होता, इसलिए यह ऑक्सीजन का परिवहन नहीं करता।

 

Question 13. कॉकरोच के परिधीय तंत्रिका तंत्र में कितनी जोड़ी तंत्रिकाएँ पाई जाती है।
(अ) 10 जोड़ी
(ब) 7 जोड़ी
(स) 8 जोड़ी
(द) 9 जोड़ी
Answer: (स) 8 जोड़ी
In simple words: कॉकरोच के शरीर के चारों ओर आठ जोड़ी तंत्रिकाएं फैली होती हैं, जो उसे आसपास की चीजों को महसूस करने में मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच का तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क (अधिग्रसिका गुच्छिका) और एक लंबी अधर तंत्रिका रज्जू से मिलकर बना होता है, जिसमें विभिन्न खंडों में गुच्छिकाएं होती हैं।

 

Question 15. कॉकरोच में उत्सर्जी अंग (Excretory organ) है
(अ) मैल्पीघी नलिकाएं
(ब) वसाकाय कोशिकाएं
(स) यूरिकोस ग्रंथियां
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (द) उपरोक्त सभी
In simple words: कॉकरोच में शरीर से बेकार चीजों को बाहर निकालने के लिए मैल्पीघी नलिकाएं, वसाकाय कोशिकाएं और यूरिकोस ग्रंथियां, ये सभी मिलकर काम करती हैं।

🎯 Exam Tip: मैल्पीघी नलिकाएं मुख्य उत्सर्जी अंग हैं जो यूरिक अम्ल को रक्त से फिल्टर करती हैं, जबकि वसाकाय कोशिकाएं और यूरिकोस ग्रंथियां भी नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट के भंडारण और उत्सर्जन में सहायक होती हैं।

 

Question 16. कॉकरोच में त्वक पतन (Ecdysis) को नियंत्रित करने वाला इकडायोसोन हार्मोन कहां से स्त्रावित होता है
(अ) कोरपोरा ऐलाटा से
(ब) तंत्रिका स्त्रावी कोशिकाओं
(स) प्रोथौरेसिक ग्रंथियों से
(द) मस्तिष्क से
Answer: (स) प्रोथौरेसिक ग्रंथियों से
In simple words: कॉकरोच में पुराने कवच को बदलने की प्रक्रिया (त्वक पतन) को प्रोथौरेसिक ग्रंथियों से निकलने वाला इकडायोसोन हार्मोन नियंत्रित करता है।

🎯 Exam Tip: प्रोथौरेसिक ग्रंथियां प्रोथौरेसिकोोट्रोपिक हार्मोन (PTTH) द्वारा उत्तेजित होती हैं, जो मस्तिष्क से निकलता है, और फिर इकडायोसोन को स्रावित करती हैं जो मोल्टिंग को ट्रिगर करता है।

 

Question 17. कॉकरोच में संयुक्त नैत्र की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक ईकाई है
(अ) नैत्राशंक
(ब) कॉर्निया
(स) रैटिना
(द) उपरोक्त सभी
Answer: (अ) नैत्राशंक
In simple words: कॉकरोच की संयुक्त आँख बहुत सारे छोटे-छोटे हिस्सों से बनी होती है, जिनमें से प्रत्येक हिस्से को नैत्राशंक कहते हैं और यही देखने का काम करता है।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक संयुक्त नेत्र में हजारों नैत्राशंक (ओमेटिडिया) होते हैं, और ये सभी मिलकर मोज़ेक दृष्टि प्रदान करते हैं, जिसमें प्रत्येक नैत्राशंक वस्तु के एक छोटे हिस्से की छवि बनाता है।

 

Question 18. निम्न में से कौनसी कॉकरोच के मादा जनन तंत्र की ग्रन्थि है
(अ) फैलिक ग्रंथि
(ब) छत्रक ग्रंथि
(स) कोलेटेरियल ग्रंथि
Answer: (स) कोलेटेरियल ग्रंथि
In simple words: मादा कॉकरोच में कोलेटेरियल ग्रंथि नाम की एक खास ग्रंथि होती है जो अंडे को सुरक्षित रखने वाले कवच को बनाने में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: कोलेटेरियल ग्रंथियां प्रोटीनयुक्त पदार्थ स्रावित करती हैं जो अंडे के चारों ओर एक मजबूत ऊथीका (ootheca) या अंडे का कैप्सूल बनाते हैं, जो अंडे को सूखने और शिकारियों से बचाता है।

 

Question 20. कॉकरोच के नवजात शिशु (तरुण कॉकरोच) को कहते है
(अ) निम्फ
(ब) मैगट
(स) पेरिब्लास्टुला
(द) इमैगो
Answer: (अ) निम्फ
In simple words: कॉकरोच के छोटे बच्चे को, जो अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ है, निम्फ कहते हैं।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच में अपूर्ण कायांतरण होता है, जिसमें अंडे से सीधे निम्फ निकलता है जो वयस्क के समान दिखता है लेकिन पंखहीन और यौनिक रूप से अपरिपक्व होता है।

36 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 2. कॉकरोच में भ्रूणीय अवस्था एवं वयस्क अवस्था में कितने खण्ड पाये जाते हैं?
Answer: कॉकरोच में भ्रूणीय अवस्था में 20 खंड होते हैं और वयस्क अवस्था में 19 खंड पाए जाते हैं। यह खंडों की संख्या में परिवर्तन विकास के दौरान होता है।
In simple words: कॉकरोच के बच्चे के शरीर में 20 टुकड़े होते हैं, जबकि बड़े कॉकरोच में 19 टुकड़े होते हैं।

🎯 Exam Tip: भ्रूणीय और वयस्क अवस्था में खंडों की संख्या में अंतर को याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कॉकरोच के विकास और शरीर की संरचना को समझने में मदद करता है।

 

Question 3. कॉकरोच में जॉनस्टन अंग (Johnston Organ) कहां पाये जाते हैं? इनका क्या कार्य होता है?
Answer: कॉकरोच में जॉनस्टन अंग श्रृंगिका (antenna) के मध्य भाग पर पाया जाता है। इसका मुख्य कार्य स्पर्श और गंध का ज्ञान कराना है। यह अंग कॉकरोच को पर्यावरण के बारे में जानकारी इकट्ठा करने में मदद करता है।
In simple words: जॉनस्टन अंग कॉकरोच की एंटीना के बीच में होते हैं और उन्हें छूने व सूंघने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: जॉनस्टन अंग एंटेना के पेडीसिल (दूसरे खंड) में स्थित होते हैं और यह केवल स्पर्श और गंध के लिए ही नहीं, बल्कि ध्वनि कंपन और दिशा का पता लगाने में भी सहायक होते हैं।

 

Question 4. कॉकरोच में मुखांग (Mouth parts) किस प्रकार के होते हैं?
Answer: कॉकरोच में मुखांग कुतरने तथा चबाने (biting of chewing type) वाले होते हैं। ये भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने और पीसने में मदद करते हैं। यह मुखांग उसे विभिन्न प्रकार के भोजन को खाने की क्षमता देते हैं।
In simple words: कॉकरोच के मुँह के अंग काटने और चबाने वाले होते हैं, जिससे वह खाना छोटे टुकड़ों में तोड़ पाता है।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच के मुखांगों में लेब्रम, मैंडिबल, मैक्सिला, लेबियम और हाइपोफेरिंक्स शामिल होते हैं, जिनमें से मैंडिबल और मैक्सिला विशेष रूप से चबाने और भोजन को संभालने का कार्य करते हैं।

 

Question 5. कॉकरोच में पाये जाने वाले गुदा लुम (Anal Cerci) का कार्य लिखिये।
Answer: कॉकरोच में पाए जाने वाले गुदा लुम (Anal Cerci) का कार्य ध्वनि उद्दीपन को ग्रहण करना है। इन्हें कॉकरोच के कान (Ear) भी कहते हैं क्योंकि ये हवा में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों को भी महसूस कर सकते हैं। यह उन्हें शिकारियों का पता लगाने में सहायता करता है।
In simple words: गुदा लुम कॉकरोच को आवाज सुनने में मदद करते हैं, जैसे कि उसके कान हों, जिससे वह खतरे को पहचान पाता है।

🎯 Exam Tip: गुदा लुम संवेदनशील रोमों से ढके होते हैं जो हवा के कंपन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, जिससे कॉकरोच को तुरंत प्रतिक्रिया करने और भागने में मदद मिलती है।

 

Question 6. कॉकरोच में कितनी जोड़ी टांगे पाई जाती है। प्रत्येक टांग कितने खण्डों की बनी होती है?
Answer: कॉकरोच में तीन जोड़ी टांगें पाई जाती हैं, यानी कुल 6 टांगें होती हैं। प्रत्येक टांग 5 खंडों से बनी होती है। ये खंड कॉक्सा, ट्रोकेंटर, फीमर, टिबिया और टार्सस कहलाते हैं।
In simple words: कॉकरोच में तीन जोड़ी टांगें होती हैं और हर टांग 5 छोटे हिस्सों से बनी होती है।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच की टांगें तेजी से दौड़ने और विभिन्न सतहों पर चढ़ने के लिए अनुकूलित होती हैं, और खंडों की यह संरचना उन्हें लचीलापन और शक्ति प्रदान करती है।

 

Question 7. कॉकरोच की देहगुहा को वास्तविक देहगुहा (True coelom) क्यों नहीं कहते हैं।
Answer: कॉकरोच की देहगुहा को वास्तविक देहगुहा (true coelom) इसलिए नहीं कहते हैं क्योंकि इसके चारों ओर पेरीटोनियम (peritoneum) का आवरण नहीं होता है। इसके बजाय, इसकी देहगुहा को हीमोसील (haemocoel) कहा जाता है जो रक्त से भरी होती है।
In simple words: कॉकरोच की देहगुहा को असली देहगुहा नहीं कहते क्योंकि उसके अंदर एक खास परत नहीं होती, बल्कि खून भरा होता है।

🎯 Exam Tip: वास्तविक देहगुहा की प्रमुख पहचान यह है कि यह मीजोडर्म से अस्तरित होती है और शरीर के अन्य अंगों को घेरती है, जो कॉकरोच में अनुपस्थित होता है।

 

Question 9. कॉकरोच में श्वासरंध्र को घेरने वाली काइटिन की लचीली प्लैट को क्या कहते हैं?
Answer: कॉकरोच में श्वासरंध्र को घेरने वाली काइटिन की लचीली प्लैट को पेरिट्रीम कहते हैं। यह प्लेट श्वासरंध्र के छिद्र को सुरक्षा प्रदान करती है और इसे खुला या बंद करने में मदद करती है।
In simple words: कॉकरोच के श्वास लेने वाले छेद के चारों ओर एक लचीली परत होती है जिसे पेरिट्रीम कहते हैं।

🎯 Exam Tip: पेरिट्रीम श्वासरंध्रों की सुरक्षा करता है और जल हानि को नियंत्रित करने में भी सहायता करता है, जिससे कॉकरोच शुष्क वातावरण में जीवित रह पाता है।

 

Question 10. कॉकरोच के हृदय में कितने कक्ष पाये जाते हैं?
Answer: कॉकरोच के हृदय में 13 कक्ष पाये जाते हैं। ये सभी कक्ष एक लंबी नलिकाकार संरचना बनाते हैं और शरीर के पृष्ठ भाग में स्थित होते हैं।
In simple words: कॉकरोच के दिल में 13 छोटे हिस्से होते हैं, जो एक लाइन में जुड़े होते हैं।

🎯 Exam Tip: ये कक्ष कीप-आकार के होते हैं और इनमें ऑस्टिया नामक छिद्र होते हैं जिनके माध्यम से हीमोलिम्फ हृदय में प्रवेश करता है।

 

Question 11. कॉकरोच की अधर तंत्रिका रज्जू (Ventral nerve cord) में कितने गुच्छक (Ganglia) पाये जाते हैं।
Answer: कॉकरोच की अधर तंत्रिका रज्जू में 9 गुच्छक पाए जाते हैं। इनमें से 3 वक्षीय क्षेत्र में और 6 उदर क्षेत्र में होते हैं, जो शरीर के विभिन्न हिस्सों को नियंत्रित करते हैं।
In simple words: कॉकरोच के नीचे वाली नस में 9 गांठें होती हैं, जो उसके शरीर के अलग-अलग हिस्सों को कंट्रोल करती हैं।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच का तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क (अधिग्रसिका गुच्छिका) और इन अधर गुच्छकों से मिलकर बना होता है, जिससे यह सिर कटे होने पर भी कुछ समय तक जीवित रह सकता है।

 

Question 12. कॉकरोच के मुख्य उत्सर्जी अंग का नाम बताइये
Answer: कॉकरोच के मुख्य उत्सर्जी अंग का नाम मैल्पीघी नलिकाएँ है। ये नलिकाएँ हीमोलिम्फ से अपशिष्ट पदार्थों को छानकर बाहर निकालने का कार्य करती हैं।
In simple words: कॉकरोच का मुख्य अंग जो बेकार चीजें शरीर से बाहर निकालता है, वह मैल्पीघी नलिकाएँ हैं।

🎯 Exam Tip: मैल्पीघी नलिकाएं मध्यान्त्र (midgut) और पश्चान्त्र (hindgut) के जंक्शन पर पाई जाती हैं और यूरिक अम्ल के उत्सर्जन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

 

Question 13. कॉकरोच के संयुक्त नेत्र में लगभग कितने कॉर्नियल फैसेट्स (नैत्राशंक) पाये जाते हैं।
Answer: कॉकरोच के संयुक्त नेत्र में लगभग 2000 कॉर्नियल फैसेट (नैत्राशंक) पाए जाते हैं। प्रत्येक फैसेट एक इकाई के रूप में काम करता है और वस्तु के एक छोटे हिस्से की छवि बनाता है।
In simple words: कॉकरोच की आँख में लगभग 2000 छोटे-छोटे लेंस जैसे हिस्से होते हैं, जिन्हें नैत्राशंक कहते हैं।

🎯 Exam Tip: ये नैत्राशंक मिलकर एक मोज़ेक दृष्टि (mosaic vision) प्रदान करते हैं, जिसमें कई छोटे-छोटे चित्र मिलकर एक पूर्ण छवि बनाते हैं।

 

Question 14. कॉकरोच में पाई जाने वाली फैलिक ग्रंथियों का कार्य लिखिये।
Answer: कॉकरोच में पाई जाने वाली फैलिक ग्रंथियां शुक्राणुधर (spermatophore) की बाहरी भित्ति के निर्माण का कार्य करती हैं। यह शुक्राणुधर शुक्राणुओं को सुरक्षा प्रदान करने वाला एक कैप्सूल होता है।
In simple words: फैलिक ग्रंथियां कॉकरोच में शुक्राणुओं को रखने वाले कवच का बाहरी हिस्सा बनाती हैं।

🎯 Exam Tip: शुक्राणुधर का निर्माण प्रजनन के दौरान महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह शुक्राणुओं को मादा तक सुरक्षित रूप से पहुँचाने में मदद करता है।

 

Question 15. कॉकरोच में मैथुन व निषेचन का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
Answer: कॉकरोच में मैथुन क्रिया रात के समय होती है और लगभग एक घंटे तक चलती है। नर कॉकरोच मादा को फेरोमोन द्वारा आकर्षित करते हैं। मैथुन के दौरान, नर फैलोमियर्स का उपयोग करके मादा जनन छिद्र को खोलता है और शुक्राणुधर को जनन कक्ष में डालता है। शुक्राणुधर स्पर्मथीका से चिपक जाता है, जिससे शुक्राणु शुक्रग्राही में प्रवेश कर जाते हैं। खाली शुक्राणुधर को बाद में बाहर निकाल दिया जाता है। निषेचन क्रिया के बाद, दोनों अंडाशय से लगभग 16 अंडे जनन कक्ष में आते हैं, जो 8-8 की दो पंक्तियों में व्यवस्थित होते हैं। यहां शुक्राणुओं द्वारा आंतरिक निषेचन होता है, जिससे अंडे निषेचित होते हैं।
In simple words: कॉकरोच रात में संबंध बनाते हैं, जिसमें नर शुक्राणुओं को मादा के शरीर में डालता है। फिर अंडे मादा के अंदर निषेचित होते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रक्रिया में फेरोमोन और शुक्राणुधर की भूमिका को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये सफल प्रजनन के लिए आवश्यक हैं।

RBSE Class 11 Biology Chapter 36 सचित्र प्रश्न

 

Question 1. कॉकरोच के सिर का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: कॉकरोच का सिर शरीर के बाकी हिस्सों के साथ 90° का कोण बनाता है और मुख नीचे की ओर झुका होता है, जिसे हाइपोग्नेथस अवस्था कहते हैं। इसका सिर त्रिभुजाकार या नाशपाती के आकार का होता है। सिर पर एक जोड़ी संयुक्त नेत्र, एंटेना और सरल नेत्र पाए जाते हैं। यह वर्टेक्स, फ्रांस, क्लाइपियस, अनुकपाल और जीनी जैसे कई अस्पष्ट क्षेत्रों में बंटा होता है। मुख के चारों ओर मैंडीबुलेट मुखांगों की उपस्थिति के कारण मुख छिद्र से पहले मुखपूर्वी गुहा बन जाती है। सिर पर एक जोड़ी वृक्काकार संयुक्त नेत्र होते हैं। प्रत्येक संयुक्त नेत्र में 2000 क्रियात्मक और संरचनात्मक इकाइयाँ होती हैं जिन्हें ओमेटिडिया कहते हैं। एक जोड़ी श्रृंगिकाएँ भी पाई जाती हैं, जो संयुक्त नेत्रों के पास एक गड्ढे से उद्गमित होती हैं जिसे श्रृंगिका सॉकेट (antenna socket) कहते हैं। श्रृंगिकाएँ स्पर्शग्राही और गंधग्राही होती हैं।
In simple words: कॉकरोच का सिर नीचे झुका हुआ होता है और त्रिभुज के आकार का होता है। इसमें बड़ी आंखें, एंटीना और छोटे-छोटे हिस्से होते हैं जो उसे देखने, सूंघने और छूने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: सिर के विभिन्न हिस्सों (वर्टेक्स, क्लाइपियस, जीनी) और संयुक्त नेत्रों (ओमेटिडिया) तथा श्रृंगिका के कार्यों का वर्णन करना महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करें कि आप सिर के झुकाव को हाइपोग्नेथस प्रकार के रूप में उल्लेख करें।
Image Placeholder: Diagram of Cockroach Head (Anterior View)

 

Question 2. कॉकरोच में पाये जाने वाले मुखांगों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
Answer: कॉकरोच में मुखांग कुतरने और चबाने (biting and chewing) वाले प्रकार के होते हैं, और इनमें निम्नलिखित भाग शामिल होते हैं:

  • लेब्रम (Labrum): यह ऊपरी होंठ होता है और भोजन को मुखगुहा में रखने में मदद करता है।
  • मैंडिबल (Mandibles): ये मजबूत, दांतों जैसी संरचनाएं होती हैं जो भोजन को काटने और पीसने का काम करती हैं।
  • मैक्सिला (Maxillae): ये मैंडिबल के नीचे स्थित होते हैं और भोजन को पकड़ने, चबाने और मुंह में धकेलने में मदद करते हैं। इनमें पैल्प (palps) होते हैं जो संवेदी होते हैं।
  • लेबियम (Labium): यह निचला होंठ होता है और भोजन को मुखगुहा में बनाए रखने में मदद करता है। इसमें भी संवेदी पैल्प होते हैं।
  • हाइपोफेरिंक्स (Hypopharynx): यह जीभ जैसी संरचना है जो मुखगुहा के केंद्र में स्थित होती है और लार नलिका इसमें खुलती है। यह भोजन को लार के साथ मिलाने और निगलने में मदद करती है।
ये सभी मुखांग भोजन को तोड़ने और पाचन के लिए तैयार करने में मिलकर काम करते हैं।
In simple words: कॉकरोच के मुँह में कई हिस्से होते हैं जैसे ऊपरी होंठ, काटने वाले दांत, पकड़ने वाले अंग, निचला होंठ और जीभ जैसा हिस्सा। ये सब मिलकर खाने को काटने और चबाने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक मुखांग के नाम और उसके मुख्य कार्य को संक्षिप्त रूप से समझाएं। मैंडिबल और मैक्सिला के चबाने के कार्य को उजागर करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. नर व मादा कॉकरोच में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: नर और मादा कॉकरोच में निम्नलिखित अंतर होते हैं:

नर कॉकरोचमादा कॉकरोच
1. शरीर कुछ छोटा एवं अधिक चपटा होता है।1. तुलनात्मक रूप से शरीर बड़ा एवं मोटा होता है।
2. उदर भाग में 9 खंड स्पष्ट होते हैं।2. उदर भाग में केवल 7 खंड स्पष्ट होते हैं।
3. उदर का पश्च भाग नुकीला एवं 7वां स्टरनाइट अविभाजित होता है।3. उदर का पश्च भाग चौड़ा एवं नौकाकार, 7वीं स्टरनाइट दो भागों में विभाजित होती है।
4. 9वें उदर खंड की स्टरनाइट से एक जोड़ी गुद कंटिकाएं (Anal styles) निकली होती हैं।4. गुद कंटिकाएं अनुपस्थित होती हैं।
5. पंख बड़े होते हैं और शरीर के पीछे तक फैले रहते हैं।5. पंख छोटे होते हैं और शरीर के पश्च छोर तक ही फैले रहते हैं।
ये अंतर लैंगिक द्विरूपता को दर्शाते हैं।
In simple words: नर कॉकरोच छोटा, पतला और उसके पंख बड़े होते हैं, साथ ही गुदा कंटिकाएं होती हैं। मादा कॉकरोच बड़ी, मोटी होती है, उसके पंख छोटे होते हैं और गुदा कंटिकाएं नहीं होतीं।

🎯 Exam Tip: नर और मादा कॉकरोच के बीच के शारीरिक अंतरों को याद रखें, विशेष रूप से गुदा कंटिकाओं की उपस्थिति और पंखों की लंबाई, जो उनकी पहचान में महत्वपूर्ण हैं।

 

Question 4. कॉकरोच के पंखों की विशेषताएं लिखिये।
Answer: कॉकरोच में दो जोड़ी पंख होते हैं, जिनकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • पहली जोड़ी के पंख (अग्र पंख): ये मध्य वक्ष से जुड़े होते हैं। ये मोटे, गहरे रंग के और अपारदर्शी होते हैं। इनका मुख्य कार्य उड़ान के दौरान पिछले पंखों को सुरक्षा प्रदान करना है और ये सीधे उड़ान में सहायक नहीं होते। नर के पंख मादा की अपेक्षा अधिक लंबे होते हैं।
  • द्वितीय जोड़ी पंख (पश्च पंख): ये पतले, पारदर्शक (transparent), झिल्लीनुमा और अधिक चौड़े होते हैं। ये पंख ही कम दूरी की उड़ान भरने में मदद करते हैं। ये अग्र पंखों के नीचे मुड़े हुए होते हैं जब कॉकरोच उड़ नहीं रहा होता।
अग्र वक्ष में पंख अनुपस्थित होते हैं।
In simple words: कॉकरोच के दो जोड़ी पंख होते हैं। आगे वाले पंख मोटे और सुरक्षा के लिए होते हैं, जबकि पीछे वाले पंख पतले और उड़ने में काम आते हैं।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच के पंखों की दोनों जोड़ियों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से बताएं - अग्र पंख सुरक्षात्मक होते हैं और पश्च पंख उड़ान के लिए होते हैं।

 

Question 5. कॉकरोच की आहारनाल का नामांकित चित्र बनाइये।
Answer: कॉकरोच की आहारनाल (Digestive System) में अग्रान्त्र (foregut), मध्यान्त्र (midgut) और पश्चान्त्र (hindgut) शामिल होते हैं। अग्रान्त्र में मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रसिका और अन्नपुट (crop) तथा पेषणी (gizzard) होते हैं। मध्यान्त्र में यकृतीय अंधनाल और मैल्पीघी नलिकाएं होती हैं। पश्चान्त्र में क्षुद्रांत्र (ileum), कोलोन (colon) और मलाशय (rectum) होते हैं। यह चित्र इन सभी अंगों की स्थिति को दर्शाता है।
Image Placeholder: Diagram of Cockroach Digestive System with parts labelled like मस्तिष्क, ग्रसनी, लार ग्रन्थि, अन्नपुट, यकृतसीका, मध्यान्त्र, पेषणी, क्षुद्रांत्र, कोलोन, मैल्पीघियन नलियाँ, मलाशय, 10वां टरगम.
चित्र : तिलचट्टा-आहारनाल
In simple words: कॉकरोच का खाना पचाने का रास्ता एक लंबी नली जैसा होता है, जिसमें मुंह से लेकर बाहर निकलने तक कई हिस्से होते हैं, जैसे पेट, आंतें और नसें।

🎯 Exam Tip: चित्र बनाते समय सभी प्रमुख अंगों को सही जगह पर और स्पष्ट रूप से नामांकित करें। अग्रान्त्र, मध्यान्त्र और पश्चान्त्र के मुख्य भागों को दर्शाना आवश्यक है।

 

Question 6. कॉकरोच में श्वसन क्रिया कैसे होती है? संक्षिप्त में वर्णन कीजिए।
Answer: कॉकरोच में श्वसन क्रिया श्वसन रंध्रों (spiracles) और श्वास नलिकाओं (trachea) द्वारा होती है। इसका रक्त ऑक्सीजन का परिवहन नहीं करता है क्योंकि इसमें हीमोग्लोबिन नहीं होता। श्वसन रंध्र शरीर की सतह पर मौजूद छोटे छिद्र होते हैं। श्वास नलिकाएं एक जटिल नेटवर्क बनाती हैं जो पूरे शरीर में फैल जाती हैं और कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाती हैं।श्वसन क्रियाविधि (Mechanism of Respiration):बाह्य श्वसन एक सक्रिय क्रिया है जबकि अन्तःश्वसन निष्क्रिय क्रिया होती है। श्वसन क्रिया उदरीय पेशियों के लयबद्ध संकुचन और फैलाव से नियंत्रित होती है।

  • अन्तःश्वसन (Inhalation): पेशियों के फैलाव से वायु श्वसन रंध्रों से होकर श्वास नलिकाओं और श्वास नलिकाओं (tracheoles) में प्रवेश करती है। इन नलिकाओं में ऊतक द्रव भरा होता है जिसमें ऑक्सीजन घुल जाती है और ऊतक कोशिकाओं तक विसरित होती है।
  • बाह्य श्वसन (Exhalation): पेशियों के संकुचन से वायु बाहर निकलती है। श्वास नलिकाओं के अंतिम सिरों पर द्रव के बाहर विसरित होने से वायु भी नलिकाओं में अंदर की तरफ विसरित हो जाती है।
यह प्रणाली कॉकरोच को सीधे कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद करती है।
In simple words: कॉकरोच अपने शरीर पर बने छोटे छेदों (श्वास रंध्र) से हवा अंदर लेता है। यह हवा नसों जैसे रास्तों (श्वास नलिकाओं) से होकर शरीर की हर कोशिका तक पहुंचती है, जिससे वह साँस ले पाता है।

🎯 Exam Tip: श्वसन रंध्र, श्वास नलिकाएं और श्वसन क्रियाविधि (अन्तःश्वसन और बाह्य श्वसन) के स्पष्टीकरण को शामिल करना सुनिश्चित करें। हीमोग्लोबिन की अनुपस्थिति और ऑक्सीजन के सीधे परिवहन का उल्लेख करें।

 

Question 7. कॉकरोच के रक्त परिसंचरण तंत्र का नामांकित चित्र बनाइये।
Answer: कॉकरोच में खुला परिसंचरण तंत्र होता है, जहाँ रक्त (हीमोलिम्फ) वाहिनियों में सीमित नहीं रहता बल्कि शरीर की गुहाओं में सीधे अंगों के संपर्क में रहता है। इसका हृदय एक लंबी, नलिकाकार संरचना होती है जिसमें कई कक्ष होते हैं। यह हीमोलिम्फ को पूरे शरीर में पंप करता है।
Image Placeholder: Diagram of Cockroach Circulatory System with parts labelled like हृदय के प्रकोष्ठ, ऑस्टिया, एलेरी पेशियाँ, कपाट, उदर, वक्ष, सिर, श्रृंगिका, पेरीकार्डियल पात्र, पेरीविसरल पात्र, पेरीन्यूरल पात्र, ग्रीवा, तंत्रिका रज्जु, स्पंदनशील तुम्बिका.
चित्र : कॉकरोच के परिसंचरण तन्त्र का रेखाचित्र
In simple words: कॉकरोच का खून उसके शरीर में खुले में बहता है, किसी नस में बंद नहीं रहता। उसका दिल एक लंबी नली जैसा होता है जो खून को पूरे शरीर में फैलाता है।

🎯 Exam Tip: चित्र बनाते समय हृदय के कक्षों, ऑस्टिया, और एलेरी पेशियों को स्पष्ट रूप से दिखाएं। पेरीकार्डियल, पेरीविसरल और पेरीन्यूरल साइनस को भी नामांकित करें।

 

Question 8. कॉकरोच के केन्द्रिय तन्त्रिका तंत्र का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
Answer: कॉकरोच का केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र मुख्य रूप से दो प्रमुख रचनाओं से मिलकर बना होता है:

  • तंत्रिका वलय (Nerve ring): यह सिर में ग्रसिका के चारों ओर स्थित होता है। इसमें निम्नलिखित संरचनाएँ पाई जाती हैं:
    • अधिग्रसिका गुच्छिका (Supra Oesophageal Ganglion or Brain): इसे मस्तिष्क भी कहते हैं और यह संवेदी इनपुट प्राप्त करता है।
    • परिग्रसिका संयोजक (Circum-Oesophageal Connectives): ये दो तंत्रिकाएं होती हैं जो अधिग्रसिका गुच्छिका को अधोग्रसिका गुच्छिका से जोड़ती हैं।
    • अधोग्रसिका गुच्छिका (Sub-Oesophageal Ganglion): यह मुखांगों और टांगों को नियंत्रित करता है।
  • अधर तंत्रिका रज्जू (Ventral Nerve Cord): यह ग्रीवा, वक्ष और उदर के 7 खंडों में स्थित रहती है। इसकी उत्पत्ति अधोग्रसिका से होती है और यह दोहरी होती है। इसमें 9 गुच्छक पाए जाते हैं:
    • वक्षीय गुच्छक (Thoracic Ganglia): ये तीन गुच्छक होते हैं, जो वक्ष के हर खंड में एक होते हैं और पंखों व टांगों को नियंत्रित करते हैं। प्रत्येक गुच्छक दो छोटे गुच्छकों के मिलने से बनता है।
    • उदरीय गुच्छक (Abdominal Ganglia): ये 6 गुच्छक होते हैं, जो उदर के पहले 5 खंडों में स्थित होते हैं। छठा उदरीय गुच्छक बड़ा होता है और 7वें उदर खंड में स्थित होता है। ये गुच्छक उदर के विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करते हैं।
यह तंत्रिका तंत्र कॉकरोच के शरीर के विभिन्न हिस्सों के समन्वय और नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: कॉकरोच के दिमाग में एक तंत्रिका वलय और एक नीचे की ओर जाती हुई नस होती है। ये दोनों मिलकर उसके शरीर के हर हिस्से को काम करने का निर्देश देते हैं।

🎯 Exam Tip: तंत्रिका वलय की संरचना (मस्तिष्क, संयोजक, अधोग्रसिका गुच्छिका) और अधर तंत्रिका रज्जू में गुच्छकों की संख्या और स्थान को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 9. कॉकरोच की आहारनाल में उत्सर्जी अंग कैसे कार्य करते हैं?
Answer: कॉकरोच की आहारनाल में उत्सर्जी अंग (मुख्यतः मैल्पीघी नलिकाएँ) और अन्य कोशिकाएँ अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

  • मैल्पीघी नलिकाएँ हीमोलिम्फ (रक्त) से पोटेशियम यूरेट, जल, लवण, अमीनो अम्ल और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे अपशिष्ट पदार्थों को इकट्ठा करती हैं।
  • नलिकाओं के दूरस्थ भाग की कोशिकाएँ पोटेशियम यूरेट को यूरिक अम्ल, जल और पोटेशियम बाइकार्बोनेट में बदलकर नलिकाओं में छोड़ देती हैं।
  • सूक्ष्मांकुरों की गति से तरल पदार्थ दूरस्थ भाग से समीपस्थ भाग की ओर बहता है।
  • समीपस्थ भाग की कोशिकाएँ पोटेशियम बाई कार्बोनेट, लवणों, अमीनों अम्लों और जल जैसे उपयोगी पदार्थों को अवशोषित करके हीमोलिम्फ में वापस भेज देती हैं।
  • उत्सर्जी पदार्थों को आहारनाल में मुक्त कर दिया जाता है, जहाँ से वे मल के साथ शरीर से बाहर निकल जाते हैं।
मैल्पीघी नलिकाएँ सामान्य तापमान पर एक मिनट में पांच से पंद्रह बार तक क्रमाकुंचन (पेरिस्टाल्सिस) गति करती हैं जिससे पदार्थ आगे बढ़ते हैं।
In simple words: कॉकरोच की आहारनाल में मैल्पीघी नलिकाएँ खून से गंदी चीजें निकालकर उसे साफ करती हैं। फिर यह गंदगी खाने के रास्ते से बाहर निकल जाती है।

🎯 Exam Tip: मैल्पीघी नलिकाओं द्वारा यूरिक अम्ल के उत्सर्जन की प्रक्रिया और पुनरावशोषण के महत्व को स्पष्ट करें। क्रमाकुंचन गति और विभिन्न पदार्थों के प्रसंस्करण का उल्लेख करें।

 

Question 10. निम्न पर टिप्पणी लिखिए
(i) अंशदर्श प्रतिबिम्ब (Apposition Image)
(ii) उपढांपन प्रतिबिम्ब (Superposition Image)
Answer:
(i) अंशदर्श प्रतिबिम्ब (Apposition Image): इस प्रकार का प्रतिबिम्ब तीव्र प्रकाश में बनता है। तीव्र प्रकाश में वर्णकी आच्छद पूर्णतया फैल जाते हैं, जिससे नेत्रांशक (ommatidium) एक-दूसरे से पृथक् हो जाते हैं। यह बिल्कुल स्पष्ट लेकिन खंडित प्रतिबिम्ब बनाते हैं, जिसे मोज़ेक दृष्टि भी कहते हैं। यह दिन में सक्रिय रहने वाले कीटों में पाया जाता है, जहाँ प्रकाश की किरणें सीधे नेत्रांशक में प्रवेश करती हैं और वस्तु के प्रत्येक भाग की एक अलग छवि बनती है, जो मिलकर एक पूरी छवि बनाती हैं।
(ii) उपढांपन प्रतिबिम्ब (Superposition Image): यह प्रतिबिम्ब मंद प्रकाश (रात में भी) बनता है। मंद प्रकाश में वर्णक आच्छदों का संकुचन हो जाता है, जिससे नेत्रांशकों का प्रकाशीय पृथक्करण समाप्त हो जाता है। इससे प्रकाश किरणें एक से अधिक नेत्रांशकों में प्रवेश करती हैं और एक अस्पष्ट प्रकाश का प्रतिबिम्ब बनता है। यह रात्रिचर कीटों में पाया जाता है, लेकिन कॉकरोच में केवल अंशदर्श प्रतिबिम्ब ही बनता है।
In simple words: अंशदर्श प्रतिबिम्ब तेज रोशनी में बनता है और साफ दिखता है, जैसे दिन में। उपढांपन प्रतिबिम्ब कम रोशनी में बनता है और धुंधला दिखता है, जैसे रात में।

🎯 Exam Tip: अंशदर्श और उपढांपन प्रतिबिम्ब के बीच के प्रमुख अंतरों को स्पष्ट करें, जैसे प्रकाश की तीव्रता, वर्णक आच्छद की स्थिति और संबंधित कीटों के प्रकार।

 

Question 11. कॉकरोच के नर जननांगों का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: कॉकरोच के नर जननांगों में एक जोड़ी वृषण (testes), शुक्रवाहिकाएं (vas deferens), स्खलन वाहिनी (ejaculatory duct), छत्रकरूपी ग्रंथि (mushroom gland) और फैलिक ग्रंथि (phallic gland) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त नर में गोनेपोफाइसिस (gonapophyses) भी होते हैं जो बाह्य जननांग बनाते हैं।
Image Placeholder: Diagram of Male Cockroach Reproductive Organs with parts labelled like छत्रा रूपी ग्रन्थि, शुक्र वाहिका, फैलिक नलिका, इजैक्यूलेटरी नलिका, गोनेपोफाइसिस, नर जनन छिद्र, फैलिक छिद्र.
चित्र : नर कॉकरोच के जननांग
In simple words: नर कॉकरोच के प्रजनन अंगों में वृषण (जहां शुक्राणु बनते हैं), शुक्राणु ले जाने वाली नलिकाएं, शुक्राणु निकालने वाली नली और कुछ ग्रंथियां शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: चित्र बनाते समय सभी प्रमुख अंगों जैसे वृषण, शुक्रवाहिका, स्खलन वाहिनी, छत्रक ग्रंथि और फैलिक ग्रंथि को सही ढंग से नामांकित करें। नर जनन छिद्र और गोनेपोफाइसिस को भी दर्शाएं।

 

Question 12. कॉकरोच के मादा जननांगों का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer: कॉकरोच के मादा जननांगों में एक जोड़ी अंडाशय (ovaries), अंडवाहिनी (oviducts), योनि (vagina), शुक्रग्राहिका (spermatheca) और कोलेटेरियल ग्रंथियां (collateral glands) होती हैं। इसके अलावा, बाह्य जननांग या गोनेपोफाइसिस भी होते हैं। यह चित्र इन सभी अंगों की स्थिति को दर्शाता है।
Image Placeholder: Diagram of Female Cockroach Reproductive Organs with parts labelled like अण्डाशय, अण्डिकाएँ, शुक्रधानी, बायीं कोलेटीरियल ग्रन्थि, जनन वेश्म, अण्डवाहिनी, योनि, दायीं कोलेटीरियल ग्रन्थि, गोनपोफाइसिस.
चित्र : मादा कॉकरोच के जननांग
In simple words: मादा कॉकरोच के प्रजनन अंगों में अंडाशय (जहां अंडे बनते हैं), अंडे ले जाने वाली नलिकाएं, योनि और कुछ ग्रंथियां शामिल हैं जो अंडे को सुरक्षित रखने में मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: चित्र बनाते समय अंडाशय, अंडवाहिनी, योनि, शुक्रग्राहिका और कोलेटेरियल ग्रंथियों को स्पष्ट रूप से नामांकित करें। जनन वेश्म और गोनेपोफाइसिस को भी दर्शाएं।

 

Question 13. कॉकरोच में ऊथीका (Ootheca) का निर्माण का वर्णन कीजिए।
Answer: कॉकरोच में ऊथीका का निर्माण निषेचित अंडों से होता है। निषेचित अंडे जनन कक्ष में प्रवेश करते हैं। यहां, कोलेटरियल ग्रंथि से स्कलेरोप्रोटीन (scaleroprotein) नामक पदार्थ स्रावित होता है, जिससे ऊथीका का निर्माण होता है। ऊथीका के निर्माण में लगभग 20 घंटे लगते हैं। एक मादा कॉकरोच अपने जीवनकाल में 20-40 ऊथीका बना सकती है। कुछ दिनों के बाद, मादा ऊथीका को अंधेरे, सूखे और गर्म स्थान पर रख देती है। ऊथीका के ऊपर काईटिन का एक कठोर आवरण होता है और इसमें एक माइक्रोपाइल भी होता है, जो गैस विनिमय में मदद करता है। यह कवच अंडों को पर्यावरण के खतरों से बचाता है।
In simple words: कॉकरोच अंडे देने के लिए एक सुरक्षा कवच बनाती है जिसे ऊथीका कहते हैं। यह कवच एक खास प्रोटीन से बनता है और अंडों को सुरक्षित रखता है, जिसे वह सूखी जगह पर रख देती है।

🎯 Exam Tip: ऊथीका निर्माण की प्रक्रिया में कोलेटरियल ग्रंथि की भूमिका, स्कलेरोप्रोटीन का महत्व और ऊथीका के बाहरी आवरण की विशेषताओं को स्पष्ट करें।

 

Question 14. कॉकरोच की छत्रक ग्रन्थि (Mushroom gland) की संरचना व कार्य का वर्णन कीजिए।
Answer: छत्रक ग्रंथि, जिसे यूट्रिक्यूलस (utriculus) भी कहते हैं, नर कॉकरोच के प्रजनन तंत्र का एक सहायक अंग है। यह प्रत्येक शुक्रवाहिका के अंतिम सिरे पर स्थित होती है, जहाँ यह दूसरी शुक्रवाहिका से मिलती है। यह एक बड़ी सफेद रंग की ग्रंथि होती है जिसका आकार छत्रक जैसा होता है। इसमें तीन प्रकार की नलिकाएँ होती हैं:

  • छोटी और गोल नलिकाएँ (शुक्राशय): ये सबसे भीतरी भाग में होती हैं और वृषणों से आए शुक्राणुओं को इकट्ठा करती हैं।
  • अग्र भीतरी भाग की ग्रन्थिल छोटी नलिकाएँ (small tubules या utriculi breviores): इनके स्राव से शुक्राणुओं का पोषण होता है।
  • बाहर की ग्रन्थिल लम्बी नलिकाएँ (utriculi majores): इनके स्राव से शुक्राणुधर (spermatophore) की आंतरिक परत का निर्माण होता है, जो शुक्राणुओं को सुरक्षा प्रदान करता है।
इस ग्रंथि का मुख्य कार्य शुक्राणुओं का भंडारण करना और शुक्राणुधर का निर्माण करना है, जो प्रजनन में महत्वपूर्ण है।
In simple words: कॉकरोच में छत्रक ग्रंथि नर प्रजनन अंग का एक हिस्सा है। यह शुक्राणुओं को जमा करती है और उन्हें एक सुरक्षात्मक कवच में बंद करने में मदद करती है, जिससे वे सुरक्षित रहते हैं।

🎯 Exam Tip: छत्रक ग्रंथि की त्रि-भाग संरचना और प्रत्येक भाग के कार्य को विस्तार से समझाएं, विशेष रूप से शुक्राणुओं के पोषण और शुक्राणुधर के निर्माण में इसकी भूमिका पर जोर दें।

Rbse Class 11 Biology Chapter 36 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. कॉकरोच की बाह्य संरचना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
Answer: कॉकरोच का शरीर पतला और लंबा होता है, जो ऊपर से नीचे की तरफ थोड़ा चपटा होता है। बड़े कॉकरोच की लंबाई लगभग 2 से 4 सेमी और चौड़ाई 1 से 1.5 सेमी होती है। इसका रंग चमकदार भूरा होता है। नर और मादा कॉकरोच अलग-अलग दिखते हैं। नर कॉकरोच थोड़ा छोटा और अधिक चपटा होता है। कॉकरोच एक ऐसा जीव है जिसके शरीर के दोनों हिस्से एक जैसे होते हैं (द्विपार्श्व सममित)। यह समरूपता कॉकरोच को संतुलित गति और छिपने में मदद करती है।
(i) सिर (Head): कॉकरोच का सिर त्रिकोण के आकार का होता है। यह शरीर की मुख्य धुरी से 90 डिग्री के कोण पर जुड़ा होता है। कॉकरोच अपने सिर को चारों ओर घुमा सकता है और आमतौर पर इसका सिर नीचे की ओर झुका रहता है। इसे 'हाइपोग्नेथस' स्थिति कहते हैं। सिर छह छोटे-छोटे खंडों से मिलकर बनता है। सिर पर दो बड़े संयुक्त नेत्र होते हैं, जो किडनी के आकार के दिखते हैं। ये आँखें सिर के ऊपरी हिस्से (वर्टेक्स) के दोनों तरफ होती हैं। हर संयुक्त नेत्र के पास एक छोटा-सा छेद होता है जिसे 'फेनेस्ट्रा' कहते हैं, यह एक साधारण आँख जैसा होता है। सरल आँखें प्रकाश को महसूस कर सकती हैं लेकिन उनसे कोई साफ तस्वीर नहीं बनती। कॉकरोच के सिर पर दो एंटीना होते हैं, और हर एंटीना के तीन हिस्से होते हैं। ये एंटीना कॉकरोच को अपने आसपास की चीजों को छूने और सूंघने में मदद करते हैं।
(a) स्केप (Scape): यह एंटीना का सबसे निचला हिस्सा होता है, जो इसे सिर से जोड़ता है। यह छोटा होता है और सिर्फ एक खंड का बना होता है।
(b) पेडीसिल (Pedicel): यह एंटीना का बीच वाला हिस्सा होता है। इस पर जॉनस्टन अंग पाए जाते हैं, जो हिलने-डुलने (गति) के प्रति संवेदनशील होते हैं।
(c) फ्लेजिलम (Flagellum): यह एंटीना का आखिरी हिस्सा होता है। यह धागे जैसा और कई छोटे-छोटे खंडों से बना होता है। यह छूने और गंध महसूस करने में मदद करता है।
चित्र 36.1 : कॉकरोच की बाह्य संरचना (अ) पृष्ठ दृश्य (ब) अधर दृश्य
चित्र 36.2 : कॉकरोच का सिरकोष (अग्र दृश्य)
(ii) वक्ष (Thorax): कॉकरोच का वक्ष (छाती) तीन हिस्सों से मिलकर बना होता है: (a) प्रोथोरेक्स, (b) मेसोथोरेक्स (मध्य वक्ष), और (c) मेटाथोरेक्स (पश्च वक्ष)। वक्ष के हर हिस्से में एक जोड़ी पैर होते हैं। इसके अलावा, मध्य वक्ष और पश्च वक्ष पर एक-एक जोड़ी पंख भी जुड़े होते हैं। इस प्रकार, वक्ष पर कुल तीन जोड़ी पैर और दो जोड़ी पंख होते हैं।
(iii) उदर (Abdomen): कॉकरोच के पेट (उदर) में 10 खंड होते हैं। नर कॉकरोच के पेट में 9 खंड दिखते हैं, जबकि मादा के पेट में 7 खंड होते हैं। पेट के पिछले सिरे पर गुदा होती है। दसवें खंड के दोनों तरफ एक जोड़ी जुड़ा हुआ गुदा लूम (Anal cerci) होता है। नर कॉकरोच में नौवें खंड के नीचे की तरफ एक जोड़ी बिना खंड वाला गुदा शूक (Anal style) होता है। मादा में एनल स्टाइल नहीं पाए जाते हैं। सातवें खंड के बीच में अंडकोष का रास्ता (ऊथीकल वेश्म) होता है। नर कॉकरोच में पेट के पाँचवें और छठे खंड के बीच की झिल्ली में एक जोड़ी गंध ग्रंथियाँ (Stink glands) होती हैं। ये गंध ग्रंथियाँ खतरा महसूस होने पर एक तेज़ गंध छोड़ती हैं, जिससे शिकारी दूर भाग जाते हैं।
कॉकरोच की आहारनाल (पाचन नली) के तीन मुख्य भाग होते हैं: (अ) अग्रान्त्र (स्टोमोडियम), (ब) मध्यान्त्र (मेसेन्ट्रोन), और (स) पश्चान्त्र (प्रोक्टोडियम)। अग्रान्त्र और पश्चान्त्र शरीर की बाहरी परत (एक्टोडर्म) से बनते हैं और इनमें एक सख्त परत (क्यूटिकल) होती है। जबकि मध्यान्त्र शरीर की अंदरूनी परत (एण्डोडर्म) से बनता है और इसमें क्यूटिकल की परत नहीं होती। क्यूटिकल की अनुपस्थिति के कारण इसी मध्यान्त्र भाग में पचे हुए भोजन को शरीर सोखता है। यह संरचना कॉकरोच के पाचन तंत्र को बहुत कुशल बनाती है।
चित्र 36.6 : तिलचट्टा-आहारनाल
(अ) अग्रान्त्र (Fore gut or stomodoeum): इस भाग में कई हिस्से होते हैं:
1. मुखगुहिका (Buccal cavity): मुँह के अंगों (मुख उपांगों) से घिरी हुई जगह को मुख गुहा कहते हैं। यह मुख गुहा दो भागों में बंटी होती है: आगे का हिस्सा 'सिबेरियम' और पीछे का हिस्सा 'सेलिवेरियम' (लाराशय) कहलाता है। मुखगुहिका पीछे की तरफ ग्रसनी (फेरिंक्स) में खुलती है।
2. ग्रसनी (Pharynx): यह एक सीधी नली जैसी होती है। यह पीछे मुड़कर सिर के निचले छेद के पास अन्नप्रणाली में खुलती है। ग्रसनी की दीवार कई फैलने वाली मांसपेशियों से सिर के अंदरूनी कंकाल (टेन्टोरियम) से जुड़ी होती है।
3. ग्रसिका (Oesophagus): यह पाचन नली का ट्यूब जैसा हिस्सा है जो गर्दन से होते हुए छाती में प्रवेश करता है। छाती में यह एक थैले जैसे हिस्से में खुलता है जिसे 'अन्नपुट' (क्रॉप) कहते हैं। इसकी अंदरूनी दीवार में बहुत सारे मोड़ होते हैं। इस हिस्से में भोजन का कोई पाचन नहीं होता है। भोजन इस नली से अन्नपुट तक पहुँचता है।
4. अन्नपुट (Crop): यह एक बड़ी, खोखली, पतली दीवार वाली थैली जैसी संरचना होती है। यह पेट के बीच के आधे से ज्यादा हिस्से को घेरे रहती है। इसकी पतली दीवार बहुत लचीली होती है और अंदरूनी सतह पर लंबी-लंबी तहें (फोल्ड्स) होती हैं। अन्नपुट में भोजन का पाचन शुरू होता है और इसे इकट्ठा करके रखा जाता है। अन्नपुट एक छोटी 'पेषणी' में खुलता है। अन्नपुट भोजन को कुछ समय के लिए स्टोर करके रखता है, जिससे उसका शुरुआती पाचन हो सके।
5. पेषणी (Gizzard): पेषणी को 'प्रोवेन्ट्रीक्यूलस' भी कहते हैं। यह अन्नपुट (क्रॉप) के ठीक नीचे एक गांठ जैसी संरचना होती है। पेषणी की दीवार बहुत मोटी और सख्त होती है। इसमें गोलाकार मांसपेशियों की परत बहुत अच्छी तरह से बनी होती है। पेषणी का सामने वाला हिस्सा 'आरमेरियम' कहलाता है। इस हिस्से में 6 लंबी-लंबी तहें (फोल्ड्स) होती हैं। इन तहों की क्यूटिकल बहुत मोटी होकर 6 क्यूटिकल दांत बनाती है। ये क्यूटिकल दांत भोजन को पीसने का काम करते हैं। दांतों के बीच में छोटे-छोटे बाल (सीटी) पाए जाते हैं जो एक छलनी (फिल्टर) की तरह काम करते हैं। पेषणी का पीछे वाला हिस्सा कीप के आकार का होता है। इस हिस्से में 'प्रोवेन्ट्रीक्यूलर पैड' पाए जाते हैं। इसकी क्यूटिकल पर पीछे की तरफ मुड़े हुए छोटे-छोटे रोएंदार बाल (क्यूटिकल हेयर्स) होते हैं। यह हिस्सा पिसे हुए भोजन को छानने का काम करता है। पेषणी का पीछे वाला हिस्सा मध्यान्त्र में जाकर एक दोहरी दीवार वाली नली जैसी संरचना बनाता है, जिसे 'स्टोमोडियल वाल्व' कहते हैं।
चित्र 36.7 : तिलचट्टे की पेषणी का अनुप्रस्थ काट
(ब) मध्यान्त्र (Midgut): यह एक जैसी चौड़ाई वाली नली होती है और आहारनाल का बीच का हिस्सा बनाती है। इसका सामने वाला हिस्सा, जहाँ स्टोमोडियल वाल्व खुलता है, 'कार्डिया' कहलाता है। मध्यान्त्र की अंदरूनी परत खंभे जैसी कोशिकाओं से बनी होती है। इस पर कई छोटे-छोटे उभार (रसांकुर) पाए जाते हैं। मध्यान्त्र की परत का सामने वाला हिस्सा ज्यादा ग्रंथिमय होता है और पीछे वाले हिस्से की कोशिकाएँ भोजन सोखने का काम करती हैं। मध्यान्त्र की ग्रंथिमय कोशिकाएँ 'पेरिट्रोफिक झिल्ली' नाम का एक पदार्थ छोड़ती हैं। यह झिल्ली मध्यान्त्र को सख्त खाने के कणों से बचाती है। साथ ही, यह भोजन को सोखने और पाचक एंजाइमों को आर-पार जाने देती है। यह पेरिट्रोफिक झिल्ली पतली, पारदर्शी और काइटिन व प्रोटीन से बनी होती है। मध्यान्त्र में दो खास संरचनाएं पाई जाती हैं:
यकृतीय अंधनाल (Hepatic caeca): ये मध्यान्त्र के सामने वाले हिस्से, यानी कार्डिया से निकलते हैं। ये अग्रान्त्र और मध्यान्त्र के जोड़ पर पाए जाते हैं। इनकी संख्या 6 से 8 होती है और ये पतली, नली जैसी व उंगली के आकार की होती हैं जिनके सिरे बंद होते हैं। इनसे पाचन एंजाइम निकलते हैं।
मैल्पीघी नलिकाएँ (Malpighian tubules): ये मध्यान्त्र के पिछले सिरे पर पीले रंग की पतली नलियों जैसी संरचनाएँ होती हैं। इनकी संख्या 50 से 150 तक होती है। इनके सिरे खुले नहीं होते (स्वतंत्र सिरा बंद होता है)। इनका मुख्य काम शरीर से बेकार पदार्थों को बाहर निकालना है, और ये उन बेकार पदार्थों को मध्यान्त्र में डाल देती हैं। इस प्रकार, ये शरीर में पानी के संतुलन को बनाए रखने (जलीय नियमन) में भी मदद करती हैं। इसमें तहें (फोल्ड्स) पाई जाती हैं। ये तहें एक वाल्व (स्फिंक्टर) की तरह काम करती हैं। क्यूटिकल पर छोटे कांटे (शूक या कंटिकाएँ) होते हैं जो पेरिट्रोफिक झिल्ली को तोड़ने का काम करते हैं।
वृहदान्त्र (Colon): यह मध्यान्त्र और छोटी आँत (क्षुद्रान्त्र) से ज्यादा मोटा और नली जैसा होता है। यह पश्चान्त्र का सबसे लंबा हिस्सा है। इसमें क्यूटिकल से बनी तहें होती हैं, लेकिन कोई कांटे या शूक नहीं होते।
मलाशय (Rectum): यह पाचन नली का आखिरी हिस्सा होता है, जो थैले जैसा होता है। इसके अंदर 6 लंबी-लंबी तहें पाई जाती हैं जिन्हें 'मलाशयी अंकुर' कहते हैं। ये मलाशयी अंकुर मल से पानी सोखते हैं। मलाशय में मल को कुछ समय के लिए इकट्ठा करके रखा जाता है, और फिर दसवें पेट खंड (उदरीय टरगम) के नीचे मौजूद गुदा से बाहर निकाल दिया जाता है। मलाशय जल संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लार ग्रंथियाँ (Salivary glands): कॉकरोच में एक जोड़ी लार ग्रंथियाँ होती हैं। ये अन्नपुट (क्रॉप) के दोनों तरफ और उस पर चिपकी रहती हैं। ये ग्रंथियाँ दो हिस्सों में बंटी होती हैं। पत्तियों जैसे दिखने वाले हिस्से को 'ग्रंथिल भाग' (ग्लैंडुलर पार्ट) कहते हैं और थैले जैसे दिखने वाले हिस्से को 'आशय' (रिजर्वायर) कहते हैं।
चित्र 36.8 : लार ग्रन्थि पुंज
(अ) ग्रंथिल भाग (Glandular Part): ग्रंथिल भाग में तीन पालियाँ होती हैं। इनमें से दो पालियाँ बड़ी और एक छोटी होती है। हर पाली में कई छोटे-छोटे हिस्से (लोब्यूल्स या एसिनाई) होते हैं। इन पालियों में दो तरह की कोशिकाएँ होती हैं:
जाइमोजन कोशिकाएँ
वाहिनिकाधारी कोशिकाएँ
ये दोनों तरह की कोशिकाएँ लार बनाती हैं। लार में 'जाइमेज' एंजाइम और चिपचिपा पदार्थ (श्लेष्मा) होता है। ग्रंथिल पालियों से निकलने वाली छोटी-छोटी नलिकाएँ मिलकर एक बड़ी लार वाहिका बनाती हैं।
(ब) आशय (Reservoirs): यह एक थैले जैसी संरचना होती है जिसे आशय कहते हैं। हर आशय से एक आशय नलिका निकलती है जो लारवाहिका के साथ मिलकर एक साझा लार नलिका (कॉमन सेलिवरी डक्ट) बनाती है।
1. भोजन का अन्तर्ग्रहण (Ingestion): कॉकरोच रात में सक्रिय रहने वाला जीव है और रात में भोजन खाता है। यह एंटीना (श्रृंगिकाओं) की मदद से भोजन ढूंढता है। भोजन को सामने वाले पैरों और लेब्रम व लेबियम की सहायता से पकड़ा जाता है तथा दोनों तरफ के मैक्सिला के लेसिनिया भोजन को मेंडिबल्स के बीच पकड़ कर रखते हैं। मेंडिबल्स की सिकुड़ने और फैलने वाली मांसपेशियाँ भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने का काम करती हैं। लेसिनिया, गेलिया, ग्लॉसा और पेराग्लॉसा यह सुनिश्चित करते हैं कि भोजन काटते समय बाहर न गिरे।
2. भोजन का पाचन (Digestion of food): मुखगुहा में भोजन के साथ लार मिलती है। लार का चिपचिपापन भोजन को गीला करता है। लार मिला हुआ भोजन ग्रसनी और ग्रासिका से होते हुए अन्नपुट (क्रॉप) में पहुँच जाता है। 'क्रमाकुंचन' (लहरदार गति) के कारण भोजन अन्नपुट तक पहुँचता है। लार में 'ऐमाइलेज', 'काइटिनेज' और 'सेल्यूलेज' जैसे एंजाइम होते हैं। ऐमाइलेज स्टार्च को ग्लूकोज में बदल देता है। मध्यान्त्र की ग्रंथिमय कोशिकाओं द्वारा छोड़े गए एंजाइम पेषणी (गिज़ार्ड) से होते हुए अन्नपुट (क्रॉप) तक पहुँचते हैं। मध्यान्त्र से निकलने वाले एंजाइम अन्नपुट में पाचन का काम करते हैं, और वे एंजाइम ये हैं:
कार्बोहाइड्रेट पाचक एंजाइम: इनमें इन्वर्टेज़, माल्टेज़, लैक्टेज़ शामिल हैं।
प्रोटीन पाचक एंजाइम: इनमें ट्रिप्सिन, प्रोटीएज़, और पेप्टिडेज़ शामिल हैं।
वसा पाचक एंजाइम: इनमें लाइपेज़ शामिल है।
कीटों में पेप्सिन नामक एंजाइम नहीं होता क्योंकि उनके पाचन तंत्र का pH ज्यादा होता है, जबकि पेप्सिन कम pH पर काम करता है। भोजन का ज्यादातर पाचन अन्नपुट (क्रॉप) में होता है। अन्नपुट से आधा पचा हुआ भोजन पेषणी (गिज़ार्ड) में पहुँचता है। पेषणी के सामने वाले हिस्से में 6 क्यूटिकल दांत होते हैं जो भोजन को पीसते हैं। पेषणी के पीछे वाले हिस्से में छोटे बाल (सीटी) और रोएंदार संरचनाएँ एक फिल्टर की तरह काम करती हैं। फिल्टर होने के बाद भोजन पेषणी से मध्यान्त्र में चला जाता है। अगर बड़े कण बच जाते हैं, तो उन्हें फिर से पीसने के लिए पेषणी के सामने वाले हिस्से में वापस भेज दिया जाता है। मध्यान्त्र में पहुंचा भोजन स्टोमोडियल कपाट के कारण वापस ऊपर नहीं जा पाता। इस तरह, पेषणी में मुख्य रूप से यांत्रिक पाचन होता है। जैसे ही भोजन मध्यान्त्र में पहुँचता है, उसके चारों ओर 'पेरिट्रोफिक झिल्ली' बन जाती है। मध्यान्त्र का सामने वाला हिस्सा 'हिपेटिक सीका' से एंजाइम छोड़ता है जो भोजन का पाचन करते हैं। इसलिए, बाकी बचा हुआ पाचन मध्यान्त्र के सामने वाले हिस्से में पूरा होता है।
3. अवशोषण (Absorption): पचा हुआ भोजन मध्यान्त्र और हिपेटिक सीका द्वारा सोख लिया जाता है। शरीर जरूरत से ज्यादा वसा, ग्लाइकोजन और प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) को इकट्ठा करके रखता है।
In simple words: कॉकरोच का शरीर तीन मुख्य भागों - सिर, वक्ष और उदर - में बंटा होता है। सिर में आंखें और एंटीना होते हैं। वक्ष में पैर और पंख होते हैं। उदर में पाचन और प्रजनन अंग होते हैं। पूरी संरचना उसे अपने वातावरण में जीवित रहने में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच की बाह्य संरचना का वर्णन करते समय, प्रत्येक भाग (सिर, वक्ष, उदर) और उनसे जुड़ी विशिष्ट संरचनाओं (जैसे एंटीना, पैर, पंख, खंडों की संख्या) का स्पष्ट उल्लेख करें।

 

Question 3. कॉकरोच में श्वसनांग कौन से होते हैं। श्वसन तंत्र का चित्र बनाकर वर्णन कीजिए।
Answer: कॉकरोच में साँस लेने के लिए खास बनावटें होती हैं, जिन्हें श्वास नलियाँ या ट्रैकिया कहते हैं। इसके खून में हीमोग्लोबिन नहीं होता, इसलिए यह ऑक्सीजन को सीधे कोशिकाओं तक नहीं पहुँचाता। इसके बजाय, इसका श्वसन तंत्र खुद अपनी नलिकाओं से ऑक्सीजन को ऊतकों तक पहुँचाता है। यह सीधा तरीका ऑक्सीजन को तेजी से अंगों तक पहुँचाने में मदद करता है।
श्वसन रन्ध्र (Spiracles): कॉकरोच के शरीर पर 10 जोड़ी साँस लेने वाले छेद (श्वसन रंध्र) होते हैं, जो पेट के नीचे की तरफ होते हैं। इनमें से दो जोड़ी छाती पर और आठ जोड़ी पेट पर होते हैं। हर श्वसन रंध्र पर एक सख्त छल्ला होता है जिसे 'पेरिट्रीम' कहते हैं। श्वसन रंध्रों में छोटे-छोटे बाल (रोम) होते हैं, जिनसे छनकर हवा श्वास नलिकाओं में जाती है। हर श्वसन रंध्र एक फूले हुए कमरे में खुलता है जिसे 'अलिन्द' या 'श्वसन कोष्ठ' कहते हैं। इन श्वसन रंध्रों को वाल्व की मदद से बंद भी किया जा सकता है। हर श्वसन रंध्र एक श्वास नलिका (ट्रैकिया) में खुलता है।
चित्र 36.9 : कॉकरोच में श्वसन तन्त्र
श्वसन क्रियाविधि (Mechanism of Respiration): कॉकरोच में साँस लेना (श्वसन) 'अन्तःश्वसन' (साँस अंदर लेना) और 'बाह्य श्वसन' (साँस बाहर छोड़ना) श्वसन रंध्रों के जरिए होता है। बाहरी श्वसन एक सक्रिय प्रक्रिया है, जबकि अंदरूनी श्वसन एक निष्क्रिय प्रक्रिया है। साँस लेने की प्रक्रिया पेट की मांसपेशियों के नियमित सिकुड़ने और फैलने से नियंत्रित होती है। जब मांसपेशियाँ फैलती हैं तो हवा अंदर आती है, और जब सिकुड़ती हैं तो हवा बाहर निकलती है। अंदरूनी श्वसन के दौरान, हवा श्वसन रंध्रों से होते हुए श्वास नलियों (ट्रैकिया) और श्वास नलिकाओं (ट्रैकियोल्स) में पहुँच जाती है। इन नलिकाओं में एक तरल पदार्थ भरा रहता है। हवा में मौजूद ऑक्सीजन इस तरल में घुल जाती है और फिर कोशिकाओं तक फैल जाती है। श्वास नलिकाओं में जो तरल होता है, वह परासरण दबाव के कारण आगे-पीछे होता रहता है। शरीर में बेकार पदार्थों के जमा होने से दबाव बढ़ जाता है, जिससे नलिकाओं के आखिरी सिरों से तरल बाहर निकलने लगता है। इसकी जगह लेने के लिए बाहरी हवा भी नलिकाओं के अंदर चली जाती है। यह प्रणाली कॉकरोच को कुशलता से साँस लेने में मदद करती है।
चित्र 36.10 : श्वास नलिका की आन्तरिक संरचना
In simple words: कॉकरोच श्वास नलियों (ट्रैकिया) और छोटे छेदों (स्पिरिकल्स) से साँस लेता है। हवा शरीर के अंदर आती है, ऑक्सीजन खून में घुल जाती है, और फिर कोशिकाओं तक पहुँचती है।

🎯 Exam Tip: श्वसन तंत्र का वर्णन करते समय, श्वसन रंध्रों की संख्या और स्थान, ट्रैकिया की संरचना, और गैसों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाएं। चित्र में सभी अंगों को सही ढंग से नामांकित करें।

 

Question 4. कॉकरोच के हृदय का नामांकित चित्र बनाते हुए हृदय के कार्य प्रणाली का वर्णन कजिए।
Answer: कॉकरोच में खून का संचार साफ नलिकाओं और छोटी केशिकाओं (capillaries) में नहीं होता। इसके बजाय, खून सीधे शरीर के अंदरूनी अंगों के संपर्क में आता है। खून अनियमित आकार की खाली जगहों (ब्लड साइनसिस) में भरा रहता है। ये खाली जगहें अलग-अलग अंगों के चारों ओर पाई जाती हैं। असल में, ये ब्लड साइनसिस कॉकरोच की बदल चुकी शरीर गुहा (सीलोम) ही हैं, क्योंकि इस जीव की शरीर गुहा अब खून से भरी हुई जगह बन गई है। इसे हीमोलिम्फ कहते हैं। हीमोलिम्फ के तरल हिस्से (प्लाज्मा) में सफेद रक्त कोशिकाएँ, जिन्हें हीमोसाइट्स कहते हैं, होती हैं। हीमोसाइट्स दो तरह की होती हैं: (1) फेगोसाइट्स और (2) प्रो-ल्यूकोसाइट्स, जो थोड़ी छोटी होती हैं। क्योंकि हीमोलिम्फ में हीमोग्लोबिन नहीं होता, यह ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के आदान-प्रदान में मदद नहीं करता। लेकिन माना जाता है कि सफेद रक्त कोशिकाएँ शरीर से हानिकारक चीजों को खत्म करती हैं और पोषक तत्वों को अलग-अलग अंगों तक पहुँचाती हैं।
रक्त-पात्र (Blood Sinuses): कॉकरोच का शरीर, जिसे हीमोसील भी कहते हैं, दो पतली झिल्लियों से तीन क्षैतिज (लेटे हुए) हिस्सों में बंटा होता है। इन झिल्लियों को 'विभाजक पट्टियाँ' (डायफ्राम) कहते हैं। सबसे ऊपर वाला हिस्सा, जो थोड़ा पतला होता है और हृदय को घेरे रहता है, 'पेरिकार्डियल साइनस' कहलाता है। बीच वाला हिस्सा, जो सबसे चौड़ा होता है और पाचन नली तथा अंदरूनी अंगों को घेरे रहता है, 'पेरिविसरल साइनस' कहलाता है। सबसे नीचे वाला पतला हिस्सा, जो तंत्रिका रज्जु को घेरे रहता है, 'पेरिन्यूरल साइनस' कहलाता है। पेरिकार्डियल और पेरिविसरल साइनस के बीच की झिल्ली को 'पृष्ठीय डायफ्राम' कहते हैं, और पेरिविसरल व पेरिन्यूरल साइनस के बीच की झिल्ली को 'अधर डायफ्राम' कहते हैं। इन दोनों झिल्लियों पर बहुत सारे छोटे छेद होते हैं, जिनसे खून एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाता है। पेरिकार्डियल साइनस और ऊपरी त्वचा (पृष्ठीय टरगम) के अंदरूनी हिस्से को 13 जोड़ी त्रिकोणीय, पंखे जैसी मांसपेशियाँ आपस में जोड़कर रखती हैं। इन मांसपेशियों को 'एलेरी मांसपेशियाँ' कहते हैं। ये मांसपेशियाँ हृदय के काम करने से जुड़ी होती हैं।
चित्र 36.11 : कॉकरोच के परिसंचरण तन्त्र का रेखाचित्र
हृदय (Heart): कॉकरोच की त्वचा के नीचे, बीच वाली ऊपरी रेखा पर, आगे से पीछे तक एक सफेद लंबी नली फैली होती है, जिसे हृदय कहते हैं। कॉकरोच का हृदय छाती के पहले खंड से लेकर पेट के आखिरी खंड तक फैला होता है। हृदय की दीवार मांसपेशियों से बनी होती है और यह धड़कता (स्पंदनशील) रहता है। यह एक मिनट में लगभग 49 बार धड़कता है। हृदय 13 छोटे-छोटे, खंडों वाले हिस्सों (चेम्बर्स) में बंटा होता है। हर हिस्सा कीप जैसा (फनेल-शेप्ड) होता है। इसके पिछले, चौड़े हिस्से में एक जोड़ी छोटे किनारे वाले छेद होते हैं जिन्हें 'ऑस्टिया' कहते हैं। ऑस्टिया पर एक तरफा खुलने वाले वाल्व होते हैं जो खून को सिर्फ हीमोसील से हृदय में जाने देते हैं। इसी तरह, हर हिस्से और अगले हिस्से के बीच भी वाल्व होते हैं जो खून को हृदय में सिर्फ पीछे से आगे जाने देते हैं। हृदय का पिछला सिरा बंद होता है, जबकि अगला सिरा खुला होता है। यह छाती के अगले हिस्से में एक पतली नली जैसा होता है जिसे 'अग्र महाधमनी' कहते हैं। यह ग्रीवा से होते हुए सिर की खाली जगह में खुलता है।
चित्र 36.12 : कॉकरोच का हृदय
चित्र 36.13 : कॉकरोच के हृद-कपाटों के खुलने-बन्द होने की क्रिया-विधि
कॉकरोच का हृदय न्यूरोजेनिक प्रकार का होता है। परिसंचरण (Circulation): जब पेरिकार्डियल साइनस की एलेरी मांसपेशियाँ सिकुड़ती हैं, तो खून पेरिन्यूरल साइनस से पेरिविसरल साइनस में आता है। यहाँ से यह खून पेरिकार्डियल साइनस में चला जाता है, और आखिर में ऑस्टिया के रास्ते हृदय में पहुँच जाता है। अब हृदय की दीवार की मांसपेशियों में खुद ही सिकुड़न होती है, और खून अग्र महाधमनी से सिर की खाली जगह में पहुँचता है। यहाँ से खून पेरिविसरल साइनस में चला जाता है, और इस तरह शरीर के अलग-अलग अंग खून के संपर्क में आते हैं। इस प्रकार कॉकरोच में एक खुला परिसंचरण तंत्र होता है।
स्पंदनशील एम्पुला (Pulsatile ampulla): सिर पर मौजूद हर एंटीना के आधार पर एक छोटा, धड़कने वाला थैला (पल्सेटाइल एम्पुला या वेसिकल) होता है। इसकी धड़कन से खून एंटीना में लगातार जाता रहता है।
चित्र 36.14 : कॉकरोच की देह का अनुप्रस्थ काट एवं इसमें रक्त परिसंचरण का रेखाचित्र
In simple words: कॉकरोच का खून एक खुली प्रणाली में बहता है, जिसमें खून सीधे अंगों के संपर्क में आता है। इसका हृदय 13 हिस्सों से बना होता है और इसमें ऑक्सीजन ले जाने वाला हीमोग्लोबिन नहीं होता।

🎯 Exam Tip: कॉकरोच के परिसंचरण तंत्र का वर्णन करते समय, हीमोसील, रक्त-पात्रों (साइनस), हृदय के कक्षों और एलेरी मांसपेशियों के कार्यों को विस्तार से बताएं। चित्र में सभी भागों को सही ढंग से नामांकित करें।

 

Question 5. कॉकरोच में संयुक्त नेत्र का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: कॉकरोच के शरीर पर अलग-अलग तरह के बदलावों (उद्दीपन) को महसूस करने के लिए कई तरह के संवेदी अंग (रिसेप्टर्स) होते हैं। इनकी सबसे छोटी संवेदी इकाई को 'संवेदिका' कहते हैं। आमतौर पर दो तरह के संवेदी अंग पाए जाते हैं: ये संवेदी अंग कॉकरोच को अंधेरे में भी अपने आसपास की दुनिया को समझने में मदद करते हैं।
(1) संवेदिका (Sensillae): ये कॉकरोच की त्वचा के नीचे (हाइपोडर्मिस) में पाए जाते हैं और पूरे शरीर में फैले होते हैं। ये कई प्रकार के होते हैं:
स्पर्शग्राही: छूने का अनुभव कराते हैं।
स्वादग्राही: स्वाद का अनुभव कराते हैं।
रसायनग्राही: रसायनों को महसूस करते हैं।
श्रवणग्राही: आवाज़ (ध्वनि) को सुनते हैं।
प्रॉप्रिओसेप्टर: शरीर की स्थिति और गति को महसूस करते हैं।
(2) नेत्र (Eyes): कॉकरोच में दो तरह की आँखें होती हैं: सरल आँखें और संयुक्त आँखें।
सरल नेत्र (Simple eye): कॉकरोच में सरल आँखें सिर के हिस्से पर एक बचे हुए अंग के रूप में पाई जाती हैं। ये आँखें पूरी तरह से विकसित नहीं होतीं और काम नहीं करतीं। ये 'फेनेस्ट्रा' के रूप में मौजूद होती हैं। ये आँखें सिर्फ प्रकाश को महसूस कर सकती हैं।
संयुक्त नेत्र (Compound Eye): सिर के दोनों तरफ एक-एक, बड़े और काले, किडनी के आकार के संयुक्त नेत्र होते हैं। ये कॉकरोच के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और प्रकाश को देखने (फोटो-रिसेप्शन) का काम करते हैं। हर आँख की सतह थोड़ी उभरी हुई होती है।
चित्र 36.19 : कॉकरोच : संयुक्त नेत्र
हर फ़ैसेट (छोटे-छोटे हिस्से) के ठीक नीचे भ्रूण की बाहरी परत (एक्टोडर्म) से बनी कई छोटी-छोटी संरचनाओं की एक लाइन होती है। ये संरचनाएँ अपने फ़ैसेट के साथ मिलकर देखने की एक इकाई बनाती हैं। इस इकाई को 'नेत्रांशक' या 'ओमेटिडियम' कहते हैं। इस तरह, कॉकरोच की हर संयुक्त आँख में देखने की 2000 इकाइयाँ या ओमेटिडियम होते हैं।
(1) अंशदर्श अर्थात् एपोजीशन दृष्टि (Apposition or Mosaic Vision): इस तरह की तस्वीर (प्रतिबिंब) बनने की प्रक्रिया में, हर नेत्रांशक/ओमेटिडियम के रंगीन कवच (पिगमेंट शीथ) उसे पूरी तरह से घेरे रहते हैं। इसका मतलब है कि हर नेत्रांशक दूसरे नेत्रांशक से अलग होता है। इसमें आने वाली प्रकाश की किरणें सीधी जाती हैं। जब कोई चीज़ कॉकरोच की संयुक्त आँख के सामने आती है, तो उससे निकलने वाली रोशनी आँख के कॉर्निया से होकर कई नेत्रांशकों में घुसती है। प्रकाश की किरणें नेत्रांशकों में अलग-अलग कोणों से आती हैं। अगर कोई तिरछी किरण किसी नेत्रांशक में घुसती है, तो वह उसके रंगीन कवर से टकराकर खत्म हो जाती है। लेकिन अगर कोई सीधी किरण नेत्रांशक में घुसती है, तो वह उसके फोकस वाले हिस्से से होते हुए सीधे संवेदी हिस्से में चली जाती है। इस नेत्रांशक में केवल चीज़ के एक छोटे हिस्से की तस्वीर बनती है, जिससे यह सीधी किरण बाहर निकलती है। इस तरह, पूरी चीज़ के अलग-अलग छोटे हिस्सों की अलग-अलग तस्वीरें आँख के अलग-अलग नेत्रांशकों (ओमेटिडियम) में बनती हैं। इन अलग-अलग छोटी तस्वीरों को मिलाकर पूरी चीज़ की एक संयुक्त तस्वीर बनती है। इस तरह की तस्वीर को 'अंशदर्श प्रतिबिंब' (एपोजीशन या मोजेक विजन) कहते हैं। अंशदर्श प्रतिबिंब 'उपढापन प्रतिबिंब' से ज्यादा साफ होता है। अंशदर्श प्रतिबिंब बनाने के लिए तेज रोशनी ज़रूरी होती है, इसलिए यह प्रतिबिंब उन कीटों में ज्यादा बनता है जो आमतौर पर दिन में बाहर निकलते हैं।
चित्र : अंशदर्श व सुपरपोजिशन प्रतिबिंब बनने की क्रिया-विधि
In simple words: कॉकरोच में दो तरह की आँखें होती हैं: सरल और संयुक्त। संयुक्त आँखें कई छोटी इकाइयों से बनी होती हैं, जो उसे तेज रोशनी में साफ, लेकिन कई टुकड़ों में तस्वीर देखने में मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: संयुक्त नेत्र के वर्णन में ओमेटिडिया की संरचना, कार्य और विभिन्न प्रकार की दृष्टियों (जैसे अंशदर्श दृष्टि) को विस्तार से समझाएं। चित्र में सभी भागों को सही ढंग से नामांकित करें।

 

Question 6. कॉकरोच के नर व मादा जनन तंत्र का वर्णन कीजिए।
Answer: कॉकरोच एक अलग-अलग लिंग वाला जीव है, यानी नर और मादा अलग होते हैं। हम इनके बाहरी लक्षणों से नर और मादा कॉकरोच को पहचान सकते हैं, जिसे लैंगिक द्विरूपता कहते हैं। कॉकरोच एक ऐसा जीव है जो अपने पर्यावरण के अनुकूल ढलने में माहिर है, यही कारण है कि यह विभिन्न आवासों में पाया जाता है।
1. नर जनन तंत्र (Male Reproductive system)
नर कॉकरोच के मुख्य जननांग (reproductive organs) एक जोड़ी वृषण (testes), शुक्रवाहिकाएँ (vas deferens), स्खलन वाहिनी (ejaculatory duct), छत्रारूपी ग्रंथि (mushroom gland) और फैलिक ग्रंथि (phallic gland) होते हैं। इनके अलावा नर में गोनेपोफाइसिस (gonapophyses) भी होते हैं।
वृषण (Testes): ये नर कॉकरोच के जननांग होते हैं, जो एक जोड़ी में पाए जाते हैं। ये पेट के चौथे से छठे खंडों में स्थित होते हैं। हर वृषण लंबा और पतला बेलनाकार होता है, जिसमें तीन खंड और छोटे-छोटे लोब्यूल्स होते हैं। हर वृषण के पिछले हिस्से से एक शुक्रवाहिका (vas deferens) निकलती है।
शुक्रवाहिकाएँ (Vas deferens): ये पतली और लंबी धागे जैसी होती हैं। दोनों शुक्रवाहिकाएँ पीछे की ओर बढ़ती हैं और पेट के पिछले हिस्से में आपस में मिल जाती हैं। फिर ये एक लंबी और चौड़ी स्खलन वाहिनी (ejaculatory duct) में खुलती हैं।
स्खलन वाहिनी (Ejaculatory duct): यह स्खलन वाहिनी पेट की मध्य रेखा पर पीछे की ओर बढ़ती है और शरीर के सबसे पिछले हिस्से पर एक नर जनन छिद्र (genital aperture) के रूप में बाहर खुलती है।
छत्रारूपी ग्रंथि (Mushroom gland or utriculus): हर शुक्रवाहिका के अंतिम सिरे पर, जहाँ यह दूसरी शुक्रवाहिका से मिलती है, वहाँ एक बड़ी सफेद रंग की सहायक ग्रंथि (accessory gland) जुड़ी होती है, जो छत्रारूपी होती है। इस ग्रंथि को छत्रारूपी ग्रंथि या यूट्रिक्यूल्स कहते हैं। इसमें तीन तरह की नलिकाएँ होती हैं:
(i) सबसे भीतरी भाग में छोटी और गोल नलिकाएँ होती हैं, जिन्हें शुक्राशय कहते हैं। ये शुक्रवाहिकाओं से आए शुक्राणुओं को इकट्ठा करती हैं।
(ii) अग्र भीतरी भाग में ग्रंथिल छोटी नलिकाएँ (small tubules) या यूटीकुली ब्रिविओर्स होती हैं। इनके स्राव से शुक्राणुओं को पोषण मिलता है।
(iii) बाहर की ग्रंथिल लंबी नलिकाएँ या यूट्रीकुली मेजेरस-इनके स्राव से शुक्राणुधर (Spermatophore) की अंदरूनी परत बनती है।
फैलिक ग्रंथि (Phallic gland or conglobate gland): यह एक तुम्बाकार थैली जैसी ग्रंथि होती है, जो छत्रारूपी ग्रंथि और स्खलन वाहिनी के निचले हिस्से पर स्थित होती है। फैलिक ग्रंथि का पिछला हिस्सा पतला होकर फैलिक नलिका (phallic duct) में बदल जाता है। यह फैलिक नलिका शरीर के पिछले सिरे पर एक फैलिक छिद्र के रूप में जनन छिद्र के पास बाहर खुलती है।
गोनेपोफाइसिस (Gonapophyses): ये संरचनाएँ शरीर के पिछले सिरे पर जनन छिद्र के चारों ओर नर कॉकरोच के बाहरी जननांग (external genitalia) बनाती हैं। इन्हें नर गोनेपोफाइसिस के अलावा फैलोमियर्स (Phallomeres) भी कहते हैं। फैलोमियर्स असममित होते हैं और काइटिन से बने होते हैं। इनकी संख्या तीन होती है:
(i) दाहिना फैलोमियर (Right phallomere): यह द्विपिंडकीय (bilobed) होता है। इसका दाहिना पिंड झिल्लीनुमा और चपटा होता है, जो आमने-सामने स्थित होता है। बायाँ पिंड चपटा लेकिन कठोर होता है। इसके पिछले किनारे पर आरी जैसे छोटे-छोटे दाँत होते हैं और इसके आधार पर एक हँसिया जैसा बड़ा हिस्सा होता है।
(ii) बायाँ फैलोमियर (Left Phallomere): इसका आधार भाग चपटा और चौड़ा होता है। इसमें चार उभार जैसे पिंड होते हैं।
(a) टिटिलेटर (Titillator): यह बाईं ओर होता है और इसमें एक हुक लगा होता है।
(b) स्यूडोपेनिस (Pseudopenis): यह एक लंबा पिंड होता है, जिसका अगला सिरा फूला हुआ और हथौड़े जैसा होता है।
(c) एस्पेरेट पिंड (Asperate lobe): यह एक कोमल पिंड होता है, जिसमें एक छोटा हुक लगा होता है। इसके पास फैलिक नलिका खुलती है।
(d) एक्यूटोलोब (Acutolobe): यह दायीं ओर होता है और इसमें एक बड़ा हुक पाया जाता है।
(iii) अधर फैलोमियर (Venteral phallormere): यह एक भूरे रंग की चपटी प्लेट होती है। यह दाहिने फैलोमियर के ठीक नीचे स्थित होता है। नर जनन छिद्र अधर फैलोमियर पर खुलता है।
2. मादा जननांग (Female Reproductive System)
मादा कॉकरोच के जननांगों में एक जोड़ी अण्डाशय (ovaries), अण्डवाहिनी (oviducts), योनि (vagina), शुक्रग्राहिका (spermatheca) और कोलेटरियल ग्रंथियाँ (collateral glands) होती हैं। इनके अलावा मादा में बाहरी जननांग या गोनोपोफाइसिस (gonopophyses) भी होते हैं।
अण्डाशय (Ovaries): मादा कॉकरोच के मुख्य जननांग एक जोड़ी अण्डाशय होते हैं। ये पेट के दूसरे से छठे खंड तक फैले होते हैं। हर अण्डाशय में आठ अण्डिकाएँ (ovarioles) होती हैं। हर अण्डिका के तीन भाग होते हैं: सीमान्त तंतु (marginal filament), जर्मेरियम (germarium) और विटलेरियम (vitellarium)। सभी अण्डिकाएँ सामने से स्वतंत्र होती हैं, लेकिन पीछे की तरफ आपस में जुड़ी रहती हैं।
अण्डवाहिनी (Oviduct): हर अण्डाशय के पिछले सिरे से एक छोटी, चौड़ी अण्डवाहिनी निकलती है। दोनों अण्डवाहिनियाँ मध्य रेखा की ओर मिलकर योनि (vagina) में खुलती हैं।
योनि (Vagina): यह एक चौड़ी नली होती है, जिसकी दीवारें मांसपेशीय और ग्रंथिल होती हैं। यह पीछे की ओर मादा जनन छिद्र द्वारा जनन वेश्म में खुलती है।
शुक्रग्राहिका (Spermatheca): योनि के ऊपरी सतह पर एक द्विपालित शुक्रग्राहिका स्थित होती है। इसका बायाँ पालि दाहिने पालि से बड़ा होता है। यह मैथुन के दौरान नर से मिले शुक्राणुओं को जमा करती है। यह जनन वेश्म (genital chamber) में शुक्रग्राहिका अंकुर (spermathecal papilla) पर एक छिद्र द्वारा खुलती है।
कोलेटरियल ग्रंथियाँ (Collateral glands): जनन वेश्म के ऊपरी सतह पर एक जोड़ी बहुत शाखाओं वाली कोलेटरियल ग्रंथियाँ होती हैं। बाईं कोलेटरियल ग्रंथि अच्छी तरह विकसित और अधिक शाखित होती है, जिससे घुलनशील प्रोटीन निकलता है। दायीं कोलेटरियल ग्रंथि कम विकसित होती है और डाइहाइड्रॉक्सी फिनोल (dihydroxy phenol) का स्राव करती है। दोनों ग्रंथियों की नलिकाएँ आपस में मिलकर एक सामान्य छिद्र (common aperture) द्वारा जनन वेश्म के निचले हिस्से पर खुलती हैं। इनका स्राव अण्डकवच या ऊथीका (ootheca) बनाता है।
गोनोपोफाइसिस (Gonopophysis): मादा कॉकरोच के जनन वेश्म में तीन जोड़ी गोनोपोफाइसिस होते हैं। ये अण्डनिक्षेपक (ovipositor) का काम करते हैं और निषेचित अण्डों को नए बने ऊथीका में जमाते हैं।
(i) स्परमेटोफोर का निर्माण (Formation of spermatophore): कॉकरोच के वृषणों से शुक्राणु बनकर शुक्रवाहिकाओं से होते हुए छत्रारूपी ग्रंथि के शुक्राशयों में जमा होते हैं। प्रत्येक शुक्राशय में शुक्राणु आपस में चिपककर एक गुच्छा या समूह बना लेते हैं, जिसे स्परमेटोफोर कहते हैं।

चित्र 36.26 : कॉकरोच के स्परमेटोफोर की संरचना


(ii) मैथुन तथा निषेचन (Copulation & fertilization): कॉकरोच में मैथुन मार्च से सितंबर तक चलता है और रात में होता है। मादा कॉकरोच कामोत्तेजक फेरोमोन से आकर्षित होकर नर से मैथुन करती है। नर कॉकरोच फैलोमियर्स का उपयोग करके मादा के जनन छिद्र को खोलता है और शुक्राणुधर को जनन कक्ष में डालता है। शुक्राणुधर शुक्रग्राहिका से चिपक जाता है, जिससे शुक्राणु शुक्रग्राहिका में प्रवेश कर जाते हैं। खाली शुक्राणुधर को बाहर निकाल दिया जाता है। मैथुन की प्रक्रिया लगभग एक घंटे में पूरी होती है। मैथुन के बाद, दोनों अण्डाशयों से 16 अंडे जनन कक्ष में आ जाते हैं (8-8 की दो पंक्तियों में व्यवस्थित)। जनन कक्ष में शुक्राणुओं द्वारा आंतरिक निषेचन होता है।
(iii) ऊथीका का निर्माण (Formation of ootheca): निषेचित अंडे जनन कक्ष में प्रवेश करते हैं। यहाँ कोलेटरियल ग्रंथि से स्क्लेरोप्रोटीन (scleroprotein) का स्राव होता है, जिससे ऊथीका का निर्माण होता है। ऊथीका बनने में लगभग 20 घंटे लगते हैं। एक मादा अपने जीवनकाल में 20-40 ऊथीका बनाती है। कुछ दिनों बाद, मादा ऊथीका को अंधेरे, सूखे और गर्म स्थान पर रख देती है। ऊथीका के ऊपर काइटिन का आवरण और माइक्रोपाइल पाया जाता है।
(iv) भ्रूणीय परिवर्धन (Embryonic development): कॉकरोच में भ्रूण का विकास (embryonic development) अंडे के कवच या ऊथीका में लगभग 1-3 महीने में पूरा होता है। सतही विखंडन से पेरिब्लास्टुला बनता है, जो बाद में गैस्टुला अवस्था में बदल जाता है। अंत में, एक तरुण कॉकरोच (न्यम्फ) का निर्माण होता है। इसमें लार्वा अवस्था नहीं होती है। तरुण कॉकरोच (न्यम्फ) नरम और पंखहीन होते हैं, और इस अवस्था में जननांगों का विकास नहीं होता है।
(v) कायान्तरण (Metamorphosis): भ्रूणीय विकास के परिणामस्वरूप पहले न्यम्फ (nymph) बनता है। न्यम्फ को वयस्क बनने में 6 महीने से 2 साल तक लग सकते हैं। इसके कायांतरण में 7-10 बार त्वक पतन या निर्मोचन (molting) होता है। निर्मोचन में बाहरी कंकाल झड़ जाता है और शारीरिक वृद्धि के साथ एक नया कंकाल बनता है। अंतिम निर्मोचन के 4-6 दिनों के बाद जननांग विकसित हो जाते हैं। इसका जीवनकाल 2-4 साल का होता है।
In simple words: कॉकरोच के प्रजनन अंगों में नर और मादा के शरीर में अलग-अलग हिस्से होते हैं जो अंडे बनाने और शुक्राणु इकट्ठा करने में मदद करते हैं। इनका पूरा जीवन चक्र अंडे से शुरू होकर, न्यम्फ और फिर वयस्क कॉकरोच में बदल जाता है।

🎯 Exam Tip: नर और मादा कॉकरोच के प्रजनन अंगों के मुख्य भागों को याद रखें, जैसे वृषण, अण्डाशय, और ग्रंथियाँ। मैथुन, निषेचन और ऊथीका निर्माण की प्रक्रिया के चरणों को क्रम से लिखें।

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