RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 35 केंचुआ

Official RBSE Solutions for Class 11 Biology: Chapter 35 केंचुआ

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Chapter-wise Solutions for Biology: Chapter 35 केंचुआ

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RBSE Class 11 Biology Chapter 35 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. केंचुए के प्रथम खंड को कहते हैं
(अ) पुरोमुख
(ब) परिमुख
(स) पाइजिडियम
(द) पर्याणिका
Answer: (ब) परिमुख
In simple words: केंचुए का पहला भाग, जो उसके मुँह के चारों ओर होता है, उसे परिमुख कहते हैं। यह भोजन को पकड़ने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: केंचुए के शरीर के हर खंड का अपना खास नाम और काम होता है, इसलिए उन्हें याद रखना जरूरी है।

 

Question 2. मादा जननांग छांटिये
(अ) शुक्राशय
(ब) शुक्रग्राहिको
Answer: (ब) शुक्रग्राहिको
In simple words: शुक्रग्राहिको केंचुए का मादा जननांग है जो मैथुन के दौरान शुक्राणुओं को लेता और रखता है। यह प्रजनन में एक मुख्य भूमिका निभाता है।

🎯 Exam Tip: केंचुए के प्रजनन अंगों को पहचानना महत्वपूर्ण है, खासकर मादा और नर अंगों में अंतर समझना।

 

Question 3. निम्नलिखित में से कौन-सा एक केंचुए का अंग है?
(अ) वृक्कक
(ब) शूक
(स) म्यूकस ग्रन्थियाँ
(द) जनन अंग
Answer: (द) जनन अंग
In simple words: जनन अंग केंचुए के प्रजनन तंत्र का हिस्सा हैं। ये केंचुए को बच्चे पैदा करने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: विकल्पों को ध्यान से पढ़ें और पहचानें कि कौन सा विकल्प केंचुए के शरीर की सही संरचना या कार्य को बताता है।

 

Question 4. केंचुए में श्वसन वर्णक का निर्माण कहाँ होता है।
(अ) बाह्य त्वचा में
(ब) हृदय में
(स) रुधिर ग्रन्थियों में
(द) लसिका ग्रन्थियों में
Answer: (स) रुधिर ग्रन्थियों में
In simple words: केंचुए में श्वसन वर्णक, जो हीमोग्लोबिन जैसा होता है, रुधिर ग्रन्थियों में बनता है। यह वर्णक ऑक्सीजन ले जाने का काम करता है।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि केंचुए में श्वसन वर्णक रुधिर ग्रन्थियों में बनता है, यह मनुष्यों से अलग होता है जहाँ यह लाल रक्त कोशिकाओं में होता है।

 

Question 5. केंचुए में निषेचन होता है
(अ) कोकून में
(ब) शुक्राशय में
(स) अण्डवाहिनी में
(द) नम मिट्टी में
Answer: (अ) कोकून में
In simple words: केंचुए में अंडे और शुक्राणु मिलकर कोकून नाम की एक खास थैली के अंदर निषेचित होते हैं। यह कोकून फिर जमीन में छोड़ दिया जाता है।

🎯 Exam Tip: कोकून केंचुए के प्रजनन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो निषेचन और भ्रूण के विकास के लिए सुरक्षित जगह प्रदान करता है।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 35 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. केंचुए का वैज्ञानिक नाम क्या है ?
Answer: केंचुए का वैज्ञानिक नाम फेरेटिमा पोस्थूमा (Pheretima posthuma) है। यह नाम इसे वैज्ञानिक रूप से पहचानने में मदद करता है।
In simple words: केंचुए का साइंस वाला नाम 'फेरेटिमा पोस्थूमा' है।

🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक नाम हमेशा इटैलिक्स में लिखे जाते हैं, जिसमें पहला शब्द बड़े अक्षर से और दूसरा छोटे अक्षर से शुरू होता है।

 

Question 3. केंचुए के किन खण्डों में वृषण पाये जाते हैं ?
Answer: केंचुए के शरीर में वृषण 10वें और 11वें खंडों में पाए जाते हैं। ये वृषण केंचुए के प्रजनन तंत्र के नर जननांग हैं।
In simple words: केंचुए के 10वें और 11वें हिस्से में वृषण होते हैं।

🎯 Exam Tip: केंचुए के शरीर के खंडों की संख्या याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक खंड में अलग-अलग अंग होते हैं।

 

Question 4. केंचुए में पेषणी का मुख्य कार्य क्या है ?
Answer: केंचुए में पेषणी (गिजार्ड) का मुख्य काम भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में पीसना है। यह खाने को बारीक करके पचाने में मदद करती है।
In simple words: केंचुए में पेषणी भोजन को अच्छे से पीसती है।

🎯 Exam Tip: पेषणी का कार्य पाचन प्रक्रिया में भोजन को यांत्रिक रूप से तोड़ना है, जो एंजाइमों के लिए इसे आसान बनाता है।

 

Question 5. परिपक्व केंचुए की लम्बाई कितनी होती है ?
Answer: एक बड़े केंचुए की लंबाई आमतौर पर 15 से 20 सेंटीमीटर होती है। इनकी लंबाई प्रजाति और पर्यावरण के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है।
In simple words: बड़े केंचुए 15 से 20 सेंटीमीटर लंबे होते हैं।

🎯 Exam Tip: सामान्य आकार और पहचान विशेषताओं को याद रखना जीव विज्ञान के प्रश्नों में सहायक होता है।

 

Question 6. केंचुए की कौनसी रक्त वाहिनी वास्तव में हृदय का कार्य करती है?
Answer: केंचुए में पृष्ठ रुधिर वाहिनी (Dorsal vessel) खून को पंप करने का काम करती है, ठीक जैसे हमारा दिल करता है। यह खून को पूरे शरीर में पहुंचाती है।
In simple words: केंचुए की पृष्ठ रुधिर वाहिनी दिल का काम करती है।

🎯 Exam Tip: केंचुए के बंद परिसंचरण तंत्र में रक्त वाहिनियों के कार्य और उनके नामों को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 7. केंचुए की आंत्र में अवशोषण हेतु एकल विशिष्ट संरचना का नाम बताइये।
Answer: केंचुए की आंत में भोजन सोखने के लिए एक खास मोड़दार संरचना होती है जिसे आंत्रवलन (Typhlosole) कहते हैं। यह आंत की सतह को बढ़ा देती है ताकि ज्यादा पोषक तत्व सोखे जा सकें।
In simple words: केंचुए की आंत में भोजन सोखने के लिए आंत्रवलन (टिफ्लोसोल) होता है।

🎯 Exam Tip: आंत्रवलन का मुख्य कार्य अवशोषण सतह क्षेत्र को बढ़ाना है, यह मानव छोटी आंत में विली (villi) के समान है।

 

Question 8. केंचुए में कैल्सियमधर ग्रन्थियाँ कहाँ पाई जाती हैं ?
Answer: केंचुए के आमाशय (पेट) में कैल्सियमधर ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। ये ग्रन्थियाँ मिट्टी में मौजूद कैल्शियम को संतुलित करने में मदद करती हैं।
In simple words: कैल्सियमधर ग्रन्थियाँ केंचुए के आमाशय में होती हैं।

🎯 Exam Tip: कैल्सियमधर ग्रन्थियाँ केंचुए के आहारनाल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो मिट्टी में अम्ल को निष्क्रिय करने में भूमिका निभाती हैं।

 

Question 10. केंचुए में पायी जाने वाली यकृत समान कोशिकाओं का क्या नाम है?
Answer: केंचुए में पाई जाने वाली यकृत जैसी कोशिकाओं को रेणुपीत कोशिकाएँ (chloragogen cells) कहते हैं। ये कोशिकाएँ पोषण और उत्सर्जन जैसे महत्वपूर्ण कार्य करती हैं।
In simple words: केंचुए की यकृत जैसी कोशिकाएँ रेणुपीत कोशिकाएँ कहलाती हैं।

🎯 Exam Tip: क्लोरागोगन कोशिकाएं केंचुए में वसा पिंडों के समान होती हैं, जो ऊर्जा भंडारण और डिटॉक्सिफिकेशन में मदद करती हैं।

 

Question 11. केंचुए की उत्सर्जन इकाई का नाम क्या है ?
Answer: केंचुए की उत्सर्जन इकाई को वृक्कक (Nephridia) कहते हैं। ये शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती हैं, जैसे हमारी किडनी करती है।
In simple words: केंचुआ वृक्कक (नेफ्रिडिया) से गंदगी बाहर निकालता है।

🎯 Exam Tip: वृक्कक केंचुए के शरीर में जल और लवणों का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

Question 12. केंचुए की त्वचा का चमकदार भूरा रंग किस वर्णक के कारण होता है?
Answer: केंचुए की त्वचा का चमकीला भूरा रंग पोरफाइरीन नाम के एक वर्णक (रंग देने वाले पदार्थ) के कारण होता है। यह वर्णक केंचुए को सूरज की हानिकारक किरणों से भी बचाता है।
In simple words: केंचुए का चमकीला भूरा रंग पोरफाइरीन की वजह से होता है।

🎯 Exam Tip: वर्णक केवल रंग ही नहीं देते, बल्कि अक्सर जीव के लिए सुरक्षात्मक कार्य भी करते हैं, जैसे यहाँ पराबैंगनी विकिरण से बचाव।

 

Question 13. केंचुए की पेषणी में सर्वाधिक विकसित पेशी स्तर का नाम बताइये।
Answer: केंचुए की पेषणी (गिजार्ड) में सबसे मजबूत पेशी की परत वर्तुल पेशी स्तर (Circular muscle layer) होती है। यह परत भोजन को पीसने में सबसे ज्यादा मदद करती है।
In simple words: केंचुए की पेषणी में सबसे मजबूत पेशी परत वर्तुल पेशी स्तर है।

🎯 Exam Tip: वर्तुल पेशियां पेषणी को संकुचित करती हैं, जो भोजन को तोड़ने के लिए आवश्यक पीसने की क्रिया पैदा करती हैं।

 

Question 14. केंचुए में श्वसन संरचना का नाम क्या है ?
Answer: केंचुए में कोई खास श्वसन अंग नहीं होता; वे अपनी गीली त्वचा से सांस लेते हैं। उनकी त्वचा से ऑक्सीजन अंदर जाती है और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर आती है। त्वचा हमेशा नम रहने से गैसों का आदान-प्रदान आसानी से होता रहता है, जिससे केंचुआ वायवीय श्वसन कर पाता है।
In simple words: केंचुआ अपनी गीली चमड़ी से सांस लेता है क्योंकि उसके पास फेफड़े जैसा कोई खास अंग नहीं होता।

🎯 Exam Tip: त्वचा को नम रखना केंचुए के त्वचीय श्वसन के लिए बहुत जरूरी है, यह सुनिश्चित करता है कि ऑक्सीजन आसानी से अवशोषित हो सके।

 

Question 15. केंचुए के बहिर्मुखी वृक्कक का नाम बताइए।
Answer: केंचुए के बहिर्मुखी वृक्कक (Exonephric nephridia) को त्वचीय वृक्कक (Integumentary nephridia) भी कहते हैं। ये सीधे त्वचा पर खुलते हैं और शरीर से अपशिष्ट बाहर निकालते हैं।
In simple words: केंचुए का बहिर्मुखी वृक्कक त्वचीय वृक्कक कहलाता है।

🎯 Exam Tip: केंचुए में कई प्रकार के वृक्कक होते हैं, और उनके खुलने के स्थान के आधार पर उनके नाम बदलते हैं।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 35 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. मेटामेरिक विखण्डन से क्या आशय है ?
Answer: इस प्रश्न का उत्तर स्रोत में उपलब्ध नहीं है। मेटामेरिक विखंडन शरीर का खंडों में व्यवस्थित विभाजन है, जहाँ प्रत्येक खंड में दोहराव वाले अंग होते हैं, जैसे केंचुए में।
In simple words: यह सवाल स्रोत सामग्री में नहीं है। मेटामेरिक विखंडन का मतलब है शरीर का कई एक जैसे हिस्सों में बंटा होना।

🎯 Exam Tip: मेटामेरिक विखंडन जीवों में दोहराव वाले शारीरिक खंडों को दर्शाता है, जैसे केंचुए में, जो उन्हें गति और लचीलापन देता है।

 

Question 2. क्या होगा यदि केंचुआ 14वें खण्ड के जनन छिद्रों को मोम द्वारा बन्द कर दें ?
Answer: यदि केंचुआ अपने 14वें खंड के जनन छिद्रों को मोम से बंद कर दे, तो मादा जनन छिद्रों से अंडे बाहर नहीं निकल पाएंगे। इस वजह से न तो निषेचन हो पाएगा और न ही कोई नया केंचुआ बन पाएगा।
In simple words: अगर केंचुआ अपने जनन छिद्र बंद कर दे, तो अंडे नहीं निकलेंगे और नए बच्चे नहीं बन पाएंगे।

🎯 Exam Tip: प्रजनन तंत्र के अंगों का सही काम करना जीवों के अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है।

 

Question 3. केंचुए की देह भित्ति में कौन-कौन सी कोशिकाएँ पाई जाती हैं ?
Answer: केंचुए की देहभित्ति में कई तरह की कोशिकाएँ होती हैं जो शरीर को ढकने और सुरक्षा देने का काम करती हैं:

  • ग्रन्थिल कोशिकाएँ (Gland cells): ये दो तरह की होती हैं – श्लेष्मा कोशिकाएँ (Mucous cells) जो बलगम बनाती हैं, और एल्ब्यूमिन कोशिकाएँ (Albumen cells) जो पोषण देती हैं।
  • अवलम्बन कोशिकाएँ (Supporting cells): ये शरीर को सहारा देती हैं।
  • आधारीय कोशिकाएँ (Basal cells): ये नई कोशिकाएँ बनाती हैं।
  • संवेदी कोशिकाएँ (Sensory cells): ये बाहर के माहौल को महसूस करने में मदद करती हैं।

यह कोशिकाओं का मिश्रण केंचुए की त्वचा को नम और संवेदनशील बनाए रखता है।
In simple words: केंचुए की चमड़ी में ग्रन्थिल, अवलम्बन, आधारीय और संवेदी कोशिकाएँ होती हैं।

🎯 Exam Tip: देहभित्ति की कोशिकाओं के प्रकार और उनके कार्यों को समझना केंचुए की संरचना और कार्यिकी के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. केंचुए को किसान का मित्र क्यों कहा जाता है ?
Answer: केंचुए को किसान का दोस्त कहते हैं क्योंकि वे जमीन को नरम और छिद्रयुक्त बनाते हैं। इससे पौधों की जड़ों तक हवा आसानी से पहुंच पाती है। नतीजतन, जमीन की उपजाऊ शक्ति बढ़ जाती है।
In simple words: केंचुआ जमीन को नरम और उपजाऊ बनाता है, इसलिए किसान का दोस्त कहलाता है।

🎯 Exam Tip: केंचुए मृदा के स्वास्थ्य और उर्वरता में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, यह पारिस्थितिकी तंत्र में उनके महत्व को दर्शाता है।

 

Question 5. केंचुए में भोजन के अन्तर्ग्रहण की प्रक्रिया समझाइये।
Answer: केंचुआ एक रात्रिचर प्राणी है और पोषण के लिए सड़ी-गली पत्तियों, मिट्टी तथा छोटे कीड़े-मकोड़ों को खाता है। यह अपने मुख और पुरोमुख (prostomium) का उपयोग करके भोजन को अंदर लेता है। भोजन को निगलने की प्रक्रिया ग्रसनी की पम्पिंग क्रिया से होती है।
In simple words: केंचुआ रात में सड़ी पत्तियां और कीड़े खाता है। वह अपने मुंह से भोजन को अंदर खींचता है।

🎯 Exam Tip: केंचुए के आहारनाल के शुरुआती भाग, जैसे मुख और ग्रसनी, भोजन के अंतर्ग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

Question 6. क्या होगा यदि केंचुए की चूना स्रावी ग्रन्थियाँ (calcareous glands) काम करना बंद कर दें?
Answer: यदि केंचुए की चूना स्रावी ग्रन्थियाँ काम करना बंद कर दें, तो पाचन ठीक से नहीं होगा। ये ग्रन्थियाँ एक खास पदार्थ छोड़ती हैं जो मिट्टी में मौजूद ह्युमिक अम्ल को बेअसर करके पाचन के माहौल को क्षारीय बनाता है। यदि ये ग्रन्थियाँ काम नहीं करेंगी, तो पाचन अम्लीय माहौल में होगा, जो सही नहीं है।
In simple words: अगर केंचुए की चूना ग्रन्थियाँ काम करना बंद कर दें, तो पाचन रुक जाएगा क्योंकि पेट का अम्ल बेअसर नहीं हो पाएगा।

🎯 Exam Tip: चूना स्रावी ग्रन्थियाँ केंचुए के पाचन तंत्र में मिट्टी के अम्लीय पदार्थों को बेअसर करने में मदद करती हैं, जिससे पाचन आसान होता है।

 

Question 7. पट्टीय वे अध्यावरणी वृक्कक में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: केंचुए में दो मुख्य प्रकार के वृक्कक होते हैं - पट्टीय वृक्कक (Septal Nephridia) और अध्यावरणी वृक्कक (Integumentary Nephridia)। इन दोनों में नीचे दिए गए अंतर होते हैं:

पट्टीय वृक्कक (Septal Nephridia)अध्यावरणी वृक्कक (Integumentary Nephridia)
1. ये वृक्कक केंचुए के 15वें खण्ड के बाद स्थित होते हैं।जबकि ये वृक्कक केंचुए के पहले 6 खण्डों को छोड़कर, शेष सभी खण्डों में स्थित होते हैं।
2. प्रत्येक खण्ड में इनकी संख्या 80 से 20 होती है।जबकि इनकी संख्या प्रत्येक खण्ड में 200 से 250 होती है।
3. इनकी संख्या क्लाइटेलम ज्यादा नहीं होती है एवं इस क्षेत्र को वृक्कक वन कहते हैं।जबकि इनकी संख्या क्लाईटेलम में 200-2500 तक होती है, यह क्षेत्र वृक्कक वन कहलाता है।
4. ये सबसे बड़े वृक्कक होते हैं।ये सबसे छोटे वृक्कक होते हैं।
5. ये आंत्रमुखी वृक्कक (Entonephric) होते हैं।जबकि ये बहिर्वक्कीय (Exonephric) होते हैं।
6. इनमें नेफ्रोस्टोम व ग्रीवा उपस्थित होती है।जबकि इनमें नेफ्रोस्टोम व ग्रीवा अनुपस्थित होती है।

ये दोनों प्रकार के वृक्कक केंचुए के शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करते हैं, लेकिन उनकी जगह और संरचना अलग होती है।
In simple words: पट्टीय वृक्कक 15वें खंड के बाद होते हैं और बड़े होते हैं, जबकि अध्यावरणी वृक्कक अधिकतर खंडों में होते हैं और छोटे होते हैं।

🎯 Exam Tip: वृक्कक के प्रकार और उनके वितरण को याद रखें, क्योंकि यह केंचुए के उत्सर्जन तंत्र की कुंजी है।

 

Question 8. शुक्रग्राहिका का नामांकित चित्र बनाकर उसके कार्य लिखिए।
Answer: शुक्रग्राहिका (Spermathecae) केंचुए के प्रजनन तंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका कार्य मैथुन के दौरान शुक्राणुओं को लेना और उन्हें सुरक्षित रखना है। शुक्रग्राहिका के नामांकित चित्र के लिए कृपया पाठ्यपुस्तक देखें। इसकी तुम्बिका (Ampulla) शुक्राणुओं के लिए पोषक तत्वों का स्राव करती है।
In simple words: शुक्रग्राहिका मैथुन के समय शुक्राणु लेती है और उन्हें रखती है।

🎯 Exam Tip: शुक्रग्राहिका का स्थान और कार्य, विशेष रूप से शुक्राणु भंडारण और पोषण प्रदान करना, प्रजनन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. केंचुए में कोकून निर्माण की प्रक्रिया को समझाइए।
Answer: मैथुन के बाद, केंचुए के क्लाइटेलम (पर्याणिका) में मौजूद ग्रंथियों से एक तरल पदार्थ निकलता है। यह तरल पदार्थ सूखकर क्लाइटेलम के चारों ओर एक बैंड जैसी संरचना बना देता है, जिसे कोकून कहते हैं। इस कोकून के अंदर एल्ब्यूमिन (एक पोषक द्रव) भर जाता है। इसके बाद, मादा जनन छिद्रों से अंडे इस कोकून में आ जाते हैं। केंचुआ फिर पीछे खिसकता है, जिससे कोकून आगे बढ़ता है। जब यह शुक्रग्राहिकाओं (शुक्राणु को रखने वाली जगह) तक पहुंचता है, तो शुक्राणु भी कोकून में आ जाते हैं। जैसे ही केंचुआ और पीछे हटता है, कोकून उसके शरीर से अलग हो जाता है और उसके दोनों सिरे बंद हो जाते हैं, जिससे एक पीले रंग का गोल कोकून बन जाता है। इस प्रक्रिया में लगभग 6 घंटे लगते हैं, और एक कोकून से एक ही नया केंचुआ विकसित होता है।
In simple words: केंचुआ मैथुन के बाद अपनी चमड़ी से एक थैली (कोकून) बनाता है। इसमें अंडे और शुक्राणु मिलकर नए केंचुए को जन्म देते हैं।

🎯 Exam Tip: कोकून का निर्माण और निषेचन की प्रक्रिया केंचुए के जीवन चक्र में महत्वपूर्ण चरण हैं, जो प्रजाति के अस्तित्व को सुनिश्चित करते हैं।

 

Question 10. शुक्रग्राहिकाओं का जनन से क्या सम्बन्ध है ?
Answer: शुक्रग्राहिका (Spermathecae) केंचुए के मादा प्रजनन तंत्र का एक हिस्सा है। इसका मुख्य काम मैथुन के दौरान शुक्राणुओं को लेना और उन्हें अपने पास जमा करके रखना है। जब कोकून बनता है, तो शुक्रग्राहिका उसमें जमा किए गए शुक्राणुओं को छोड़ देती है। इस कोकून में पहले से ही अंडे मौजूद होते हैं, और यहीं पर शुक्राणु अंडों का निषेचन करते हैं। निषेचन के बाद, युग्मनज (zygote) बनता है जिससे एक नया केंचुआ विकसित होता है। इस तरह, शुक्रग्राहिका केंचुए के प्रजनन में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
In simple words: शुक्रग्राहिका केंचुए के प्रजनन में खास है। यह शुक्राणुओं को जमा करती है और उन्हें अंडे के साथ कोकून में छोड़ती है, जिससे नए केंचुए बनते हैं।

🎯 Exam Tip: शुक्रग्राहिका का कार्य केंचुए के आंतरिक निषेचन और कोकून विकास को समझने में महत्वपूर्ण है।

 

Question 11. केंचुआ उभयलिंगी होता है, किन्तु इसमें स्वनिषेचन नहीं होता है, क्यों ?
Answer: केंचुआ उभयलिंगी होता है, जिसका मतलब है कि एक ही केंचुए में नर और मादा दोनों जननांग होते हैं। लेकिन इसमें स्वनिषेचन (खुद के अंडों का खुद के शुक्राणुओं से निषेचन) नहीं होता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि केंचुए में 'पूर्ंपूर्वता' (protandry) पाई जाती है। इसका मतलब है कि नर जननांग (वृषण) मादा जननांग (अंडाशय) से पहले परिपक्व हो जाते हैं। इस वजह से, जब शुक्राणु तैयार होते हैं, तब अंडे तैयार नहीं होते और खुद का निषेचन नहीं हो पाता।
In simple words: केंचुआ उभयलिंगी होने पर भी खुद को निषेचित नहीं करता, क्योंकि उसके नर अंग मादा अंगों से पहले तैयार होते हैं।

🎯 Exam Tip: 'पूर्ंपूर्वता' एक विकासवादी अनुकूलन है जो स्वनिषेचन को रोकता है और आनुवंशिक विविधता को बढ़ाता है।

 

Question 12. केंचुए की प्रगुही द्रव में उपस्थित कोशिकाओं को विवरण कार्य सहित कीजिए।
Answer: केंचुए के शरीर के अंदर मौजूद प्रगुही द्रव (सीलोमिक द्रव) में चार तरह की कोशिकाएँ पाई जाती हैं, जिनके खास काम होते हैं:

  • भक्षाणु (Phagocytes) या अमीबोसाइट्स (Amoebocytes): ये संख्या में सबसे ज्यादा होती हैं और अमीबा की तरह दिखती हैं। इनमें नकली पैर (कूटपाद) बनाने की क्षमता होती है। ये शरीर में घुसने वाले हानिकारक बैक्टीरिया को खाकर केंचुए की रक्षा करती हैं, ठीक जैसे हमारे शरीर की सफेद रक्त कोशिकाएँ करती हैं।
  • म्यूकोसाइट्स (Mucocytes): इन कोशिकाओं का एक सिरा चौड़ा और दूसरा पतला होता है। इनका काम अभी पूरी तरह से पता नहीं है।
  • वृत्ताकार कणिकाएँ (Circular cells): ये गोल होती हैं और संख्या में बहुत कम होती हैं। इनके बीच में एक साफ केंद्रक होता है। इनका कार्य भी अभी पूरी तरह से नहीं पता है।
  • रेणुपीत कणिकाएँ (Chloragogen cells): ये छोटी और तारे जैसी दिखती हैं। ये पीली कोशिकाएँ भक्षाणुओं जितनी ही संख्या में होती हैं। ये कोशिकाएँ आयोडीन से पीली हो जाती हैं। ये अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने में मदद करती हैं। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि ये प्रोटीन, ग्लाइकोजन के इस्तेमाल और यूरिया बनाने से जुड़ी हैं। इन्हें रीढ़ वाले जीवों के यकृत (लीवर) से मिलता-जुलता माना जाता है।

ये सभी कोशिकाएँ मिलकर केंचुए के शरीर की सुरक्षा और अंदरूनी सफाई में मदद करती हैं।
In simple words: केंचुए के शरीर के अंदर के पानी में चार तरह की कोशिकाएँ होती हैं: भक्षाणु (जो कीटाणु खाते हैं), म्यूकोसाइट्स, वृत्ताकार कणिकाएँ और रेणुपीत कणिकाएँ (जो गंदगी निकालने में मदद करती हैं)।

🎯 Exam Tip: प्रगुही द्रव की कोशिकाओं को समझना केंचुए की प्रतिरक्षा और उत्सर्जक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 13. केंचुए में गमन की प्रक्रिया को समझाइये।
Answer: केंचुए का चलना एक खास तरीके से होता है जिसे ग्रे और लिसमेन ने समझा था। केंचुआ चलने के लिए अपनी सीटी (छोटे बाल जैसे संरचनाएं), मांसपेशियों और शरीर के अंदर के पानी के दबाव का इस्तेमाल करता है। जब उसकी देहभित्ति की गोल मांसपेशियां सिकुड़ती हैं, तो शरीर लंबा और पतला हो जाता है। जब अनुदैर्ध्य मांसपेशियां सिकुड़ती हैं, तो शरीर छोटा और मोटा हो जाता है। ये मांसपेशियां एक साथ सिकुड़ती और फैलती हैं, जिससे शरीर में आगे से पीछे तक लहरें बनती हैं। यह लहरदार गति केंचुए को आगे बढ़ने में मदद करती है। केंचुआ बिल बनाते समय भी इसी तरह की मांसपेशी संकुचन का उपयोग करता है, लेकिन इस समय तरंगें उल्टी दिशा में चलती हैं, जिससे वह मिट्टी में आसानी से घुस पाता है और मिट्टी को खोदकर खाता भी है।
In simple words: केंचुआ अपनी मांसपेशियों और सीटी की मदद से चलता है। उसकी चमड़ी की मांसपेशियां सिकुड़ती और फैलती हैं, जिससे शरीर में लहरें बनती हैं और वह आगे बढ़ता है। वह बिल बनाने के लिए भी इसी गति का उपयोग करता है।

🎯 Exam Tip: गमन में मांसपेशियां (वर्तुल और अनुदैर्ध्य) और सीटी की भूमिका को स्पष्ट करें, साथ ही देहगुहीय द्रव के स्थैतिक दबाव का उल्लेख करें।

 

Question 14. केंचुए में त्वचीय श्वसन क्यों पाया जाता है ?
Answer: केंचुए में सांस लेने के लिए कोई खास अंग नहीं होता। वे अपनी नम त्वचा से सीधे हवा लेते और छोड़ते हैं। ऑक्सीजन उसकी त्वचा के नीचे मौजूद तरल पदार्थ में घुल जाती है और फिर रक्त कोशिकाओं तक पहुंचती है। त्वचा हमेशा नम रहने से गैसों का आदान-प्रदान आसानी से होता रहता है, जिससे केंचुआ वायवीय श्वसन कर पाता है।
In simple words: केंचुआ अपनी गीली चमड़ी से सांस लेता है क्योंकि उसके पास फेफड़े जैसा कोई खास अंग नहीं होता।

🎯 Exam Tip: त्वचा को नम रखना केंचुए के त्वचीय श्वसन के लिए बहुत जरूरी है, यह सुनिश्चित करता है कि ऑक्सीजन आसानी से अवशोषित हो सके।

 

Question 15. केंचुए की देह भित्ति के प्रमुख कार्य लिखिए।
Answer: केंचुए की देहभित्ति (शरीर की दीवार) कई महत्वपूर्ण काम करती है:

  • यह पूरे शरीर को बाहर से बचाती है।
  • देहभित्ति में श्लेष्म ग्रंथियों से निकलने वाले चिपचिपे पदार्थ (बलगम) से यह हमेशा नम और चिकनी रहती है। यह पदार्थ बिलों की दीवारों को मजबूत और चिकना बनाने में भी मदद करता है।
  • इसकी नम रहने वाली सतह और रक्त-केशिकाओं के कारण, यह सांस लेने का काम भी करती है।
  • इसमें संवेदी कोशिकाएँ होती हैं जो बाहर के वातावरण को महसूस करने में मदद करती हैं।
  • इसकी मांसपेशियां और शूक (छोटे ब्रिसल्स) इसे चलने में मदद करते हैं।

इस तरह, देहभित्ति केंचुए के जीवन के लिए कई आवश्यक कार्य करती है।
In simple words: केंचुए की चमड़ी उसे बचाती है, गीला रखती है, सांस लेने में मदद करती है, महसूस कराती है और चलने में भी सहायता करती है।

🎯 Exam Tip: देहभित्ति के बहुआयामी कार्यों को स्पष्ट रूप से लिखें, क्योंकि यह केंचुए के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 35 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. केंचुए में पाचन तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिये।
Answer: केंचुए का पाचन तंत्र एक नली जैसा होता है जो उसके शरीर की पूरी लंबाई में फैला होता है। इसमें कई हिस्से होते हैं जो भोजन को पचाने में मदद करते हैं। (चित्र 35.6: केंचुए की आहारनाल, चित्र 35.7: केंचुआ-ग्रसनी भाग से अनुप्रस्थ काट, चित्र 35.8: पेषणी भाग से अनुप्रस्थ काट, चित्र 35.9: केंचुआ-आंत्रवलन भाग से अनुप्रस्थ काट के लिए कृपया पाठ्यपुस्तक देखें।)

  • मुख-गुहिका (Buccal Cavity): यह आहारनाल का सबसे पहला, छोटा और पतला हिस्सा है। यह पहले से तीसरे खंड के बीच होता है और बाहर की ओर पलट सकता है। यह भोजन को चूसने और अंदर लेने में मदद करता है।
  • ग्रसनी (Pharynx): यह मुख-गुहिका के बाद आता है और चौथे खंड में होता है। यह नाशपाती के आकार का और मांसल होता है। इसमें पाचक रस मिलते हैं।
  • ग्रसिका (Oesophagus): यह एक छोटी और पतली नली है जो 5वें से 7वें खंड तक फैली होती है। यह भोजन को ग्रसनी से पेषणी तक पहुंचाती है।
  • पेषणी (Gizzard): यह एक छोटी, मोटी और मजबूत मांसपेशी वाली संरचना है जो 8वें खंड में होती है। इसका मुख्य काम भोजन और मिट्टी को बारीक पीसना है।
  • आमाशय (Stomach): यह 9वें से 14वें खंड तक फैला होता है। इसमें चूनेदार ग्रंथियाँ (calciferous glands) होती हैं जो चूनेदार द्रव छोड़ती हैं, जो मिट्टी के अम्ल को बेअसर करते हैं।
  • आंत्र (Intestine): यह 15वें खंड से शुरू होकर शरीर के अंतिम खंड तक फैली होती है। इसमें आंत्रवलन (typhlosole) नामक एक खास मोड़ होता है, जो भोजन को सोखने की सतह को बढ़ाता है। आंत्र तीन क्षेत्रों में बंटी होती है: आंत्र वलन पूर्व क्षेत्र, आंत्र वलन क्षेत्र, और मलाशय।
  • मलाशय (Rectum): आहारनाल का अंतिम 25 खंडों का क्षेत्र मलाशय कहलाता है, जिसमें आंत्रवलन नहीं होता।
  • गुदा (Anus): यह शरीर के अंतिम खंड में एक छोटे छिद्र के रूप में खुलती है जिससे अपचित भोजन बाहर निकलता है।

केंचुआ मिट्टी और सड़ी-गली चीज़ें खाता है, जिसे वह अपने मुख से अंदर लेता है। ग्रसनी में पाचक रस मिलता है और पेषणी में भोजन पीसता है। आंत्र में पोषक तत्वों का अवशोषण होता है और अपचित भोजन गुदा से बाहर निकलता है।
In simple words: केंचुए का पाचन तंत्र मुंह से गुदा तक एक लंबी नली है। यह मुंह से मिट्टी और खाने को लेता है, पेषणी में उसे पीसता है, आंत में पचाता है और पोषक तत्व सोखता है, फिर गंदगी को गुदा से बाहर निकालता है।

🎯 Exam Tip: पाचन तंत्र के प्रत्येक भाग के नाम और उसके विशिष्ट कार्य को याद रखें, साथ ही चित्र में अंगों के सही स्थान को भी समझें।

 

Question 2. केंचुए में परिसंचरण तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिये।
Answer: केंचुए का परिसंचरण तंत्र बहुत अच्छी तरह से विकसित और बंद प्रकार का होता है। इसका मतलब है कि खून हमेशा रक्त वाहिनियों के अंदर ही बहता है। इस तंत्र में रक्त वाहिनियां और हृदय जैसे अंग शामिल हैं। (चित्र 35.10: केंचुए का रक्त परिसंचरण तंत्र के लिए कृपया पाठ्यपुस्तक देखें।)

  • 1. रुधिर (Blood): केंचुए का रक्त एक तरल पदार्थ प्लाज्मा (plasma) से बना होता है। इसमें अमीबा जैसे, रंगहीन और केंद्रक वाली कणिकाएँ होती हैं, जो रीढ़ वाले जीवों की सफेद रक्त कोशिकाओं जैसी होती हैं। रक्त में हीमोग्लोबिन नाम का श्वसन वर्णक होता है, जिसके कारण यह चमकदार लाल रंग का दिखता है। यह वर्णक ऑक्सीजन (\( O_2 \)), कार्बन डाइऑक्साइड (\( CO_2 \)) और यूरिया को शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाता है।
  • 2. रुधिर ग्रन्थियाँ (Blood Glands): ये ग्रंथियां रक्त बनाती हैं और 4वें, 5वें और 6वें खंडों में पाई जाती हैं। इनका रंग हल्का गुलाबी होता है। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि ये उत्सर्जन का काम भी करती हैं।
  • 3. लसिका ग्रन्थियाँ (Lymph Glands): फेरेटिमा पोस्थुमा में 26वें खंड से लेकर अंतिम खंड तक, प्रत्येक खंड में पृष्ठ वाहिनी के दोनों ओर एक-एक जोड़ी लसिका ग्रंथियां होती हैं। ये ग्रंथियां हानिकारक बैक्टीरिया को मारकर शरीर की रक्षा करती हैं।
  • (i) अनुदैर्ध्य रुधिर वाहिनियाँ (Longitudinal Blood Vessel): ये वाहिनियाँ केंचुए के शरीर की पूरी लंबाई में फैली होती हैं। इनमें पाँच मुख्य वाहिनियाँ पायी जाती हैं:
    • (क) पृष्ठ रक्त वाहिनी (Dorsal Blood Vessel): यह आहारनाल के ऊपर शरीर की पूरी लंबाई में होती है। इसकी दीवार मोटी और संकुचित होती है, इसलिए यह दिल की तरह काम करती है। इसमें खून पीछे से आगे की ओर बहता है। अंतिम खंडों से 14वें खंड तक यह रक्त इकट्ठा करती है और पहले 13 खंडों में रक्त पहुंचाती है। यह देहभित्ति, आंत्र, जननांगों तथा अधोतंत्रिकीय वाहिनी से रक्त इकट्ठा करती है।
    • (ख) अधर रक्त वाहिनी (Ventral Blood Vessel): यह आहारनाल के नीचे, दूसरे से अंतिम खंड तक पायी जाती है। इसकी दीवारें पतली और संकुचित नहीं होतीं, और इसमें कपाट भी नहीं होते। यह पूरे शरीर में रक्त पहुंचाने का काम करती है।

यह परिसंचरण तंत्र केंचुए के शरीर में पोषक तत्वों और गैसों के परिवहन को सुनिश्चित करता है।
In simple words: केंचुए का रक्त तंत्र बंद होता है, जिसमें रक्त वाहिनियाँ और हृदय होते हैं। रक्त शरीर में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और पोषक तत्व पहुंचाता है। पृष्ठ रक्त वाहिनी दिल की तरह खून को पंप करती है।

🎯 Exam Tip: परिसंचरण तंत्र के मुख्य घटक, रक्त वाहिनियों के प्रकार और हृदय जैसी संरचनाओं के कार्यों को स्पष्ट रूप से समझाना सुनिश्चित करें।

 

प्रश्न 3. उत्सर्जन के आधार पर केंचुआ किस प्रकार का जन्तु है ? पटीय वृक्कक की संरचना को आरेख चित्र द्वारा समझाइये।।
Answer: केंचुआ एक यूरियोटेलिक प्राणी है, जिसका मतलब है कि यह अपने उत्सर्जी पदार्थों को यूरिया के रूप में बाहर निकालता है। केंचुए में उत्सर्जन के लिए बहुत छोटी और मुड़ी हुई नली जैसी संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें वृक्कक (Nephridia) कहते हैं। ये शरीर के लगभग सभी खण्डों में पाए जाते हैं, सिवाय पहले तीन खण्डों के। वृक्कक तीन मुख्य प्रकार के होते हैं:

  • पटीय वृक्कक (Septal Nephridia)
  • अध्यावरणी वृक्कक (Integumentary Nephridia)
  • ग्रसनीय नेफ्रीडिया (Pharyngeal Nephridia)

इन तीनों में से पटीय वृक्कक पूरी तरह से विकसित होते हैं, इसलिए इन्हें सामान्य वृक्कक भी कहा जाता है।

1. पटीय वृक्कक (Septal Nephridia):
ये वृक्कक केंचुए के 15वें खण्ड से लेकर आखिरी खण्ड तक, हर पट (सेप्टम) के दोनों तरफ लगे होते हैं। हर खण्ड में इनकी संख्या 40 से 50 तक हो सकती है, जो 20-25 के दो समूहों में होती है। इस तरह, हर पट पर कुल 80 से 100 पटीय वृक्कक होते हैं। हालांकि, 15वें और अंतिम खण्ड में इनकी संख्या 40 से 50 ही होती है। ये वृक्कक सीधे आंत में खुलते हैं, इसलिए इन्हें आंत्रमुखी नेफ्रीडिया (Entero nephric nephridia) भी कहते हैं। इनकी संरचना में एक वृक्कक मुख, ग्रीवा, पक्ष्माभी पथ, आरोही भुजा, ऐंठी पालि और सीधी पालि जैसी संरचनाएं होती हैं।

वृक्कक मुख ग्रीवा सीधी पालि पक्ष्माभी पथ आरोही भुजा ऐंठी पालि अन्तस्थ वाहिनी

2. अध्यावरणी नेफ्रीडिया (Integumentary Nephridia):
ये वृक्कक शरीर की दीवार की अंदरूनी सतह पर, पहले दो खण्डों को छोड़कर बाकी सभी खण्डों में पाए जाते हैं। हर खण्ड में 200 से 250 ऐसे वृक्कक होते हैं, लेकिन क्लाइटेलम वाले हिस्से में इनकी संख्या 10 गुना ज़्यादा, यानी 2000 से 2500 तक हो जाती है। इस हिस्से को वृक्ककों का वन (Forest of Nephridia) भी कहते हैं। हर अध्यावरणी वृक्कक अंग्रेजी अक्षर 'V' जैसा दिखता है और इसमें वृक्कक मुख (Nephrostome) नहीं होता। इन वृक्ककों की आखिरी नलिका त्वचा से बाहर खुलती है, इसलिए इन्हें बहिर्मुखी नेफ्रीडिया (Exo Nephric nephridia) भी कहा जाता है।

 

3. ग्रसनीय नेफ्रीडिया (Pharyngeal Nephridia):
ये वृक्कक केंचुए के ग्रसनी वाले हिस्से में, यानी 4वें, 5वें और 6वें खण्ड में, ग्रसनी और ग्रसिका के दोनों तरफ जोड़ों में गुच्छों के रूप में होते हैं। इसलिए इन्हें ग्रसनी वृक्कक कहते हैं। हर गुच्छे में करीब 100 वृक्कक होते हैं और इनके साथ रक्त ग्रंथियाँ भी पाई जाती हैं। इन वृक्ककों में भी वृक्कक मुख नहीं होता। हर गुच्छे के सभी वृक्ककों की अंदरूनी नलिकाएँ मिलकर एक साझा नली (common duct) में खुलती हैं। इन तीनों खण्डों की साझा नलिकाएँ आगे बढ़कर मुखगुहा और ग्रसनी में खुलती हैं। 6वें खण्ड की नलिकाएँ मुखगुहा में और 4वें व 5वें खण्ड की नलिकाएँ ग्रसनी में खुलती हैं। क्योंकि ये वृक्कक आहारनाल में खुलते हैं, इन्हें भी आंत्रमुखी वृक्कक (enteronephric nephridia) कहते हैं। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि ये उत्सर्जन नहीं करते, बल्कि पाचन एंजाइमों का स्राव करते हैं, इसलिए इन्हें पेप्टोनेफ्रिडिया (Peptonephridia) भी कहा जाता है।

8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 ग्रसिका पेषणी आमाशय आंत्र अध्यावरणीय वृक्कक पट्टीय वृक्कक चित्र 35.13 : केंचुए का वृक्कक तंत्र

उत्सर्जन की कार्यिकी (Physiology of Excretion):
केंचुए का उत्सर्जन तंत्र अमीनो एसिड से अमोनिया को अलग करता है और यूरिया बनाता है। उत्सर्जी पदार्थ आंत में छोड़ दिए जाते हैं। जब पानी और भोजन ज़्यादा होता है, तो केंचुआ अमोनिया के रूप में उत्सर्जन करता है, और जब ये कम होते हैं, तो यूरिया के रूप में उत्सर्जन करता है। केंचुए के उत्सर्जी पदार्थों में लगभग 55% यूरिया और 40% अमोनिया पाई जाती है।
In simple words: केंचुआ यूरियोटेलिक है, जिसका मतलब है कि यह यूरिया को उत्सर्जित करता है। इसके शरीर में तीन तरह की छोटी नलिकाएँ (वृक्कक) होती हैं जो अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने में मदद करती हैं। ये नलिकाएँ शरीर के विभिन्न खण्डों में फैली होती हैं।

🎯 Exam Tip: वृक्ककों के प्रकार और उनकी कार्यप्रणाली को विस्तार से समझाएँ। नामांकित चित्र बनाना न भूलें, क्योंकि यह उत्तर को पूरा करता है।

 

प्रश्न 4. केंचुए के प्रजनन तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: केंचुआ एक उभयलिंगी प्राणी है, यानी इसमें नर और मादा दोनों जननांग एक ही शरीर में होते हैं। लेकिन इसमें स्वनिषेचन नहीं होता, बल्कि परनिषेचन होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नर जननांग (वृषण) मादा जननांग (अण्डाशय) से पहले परिपक्व हो जाते हैं।

1. नर प्रजनन तंत्र (Male Reproductive System):
केंचुए का नर प्रजनन तंत्र इन मुख्य भागों से बना होता है:

(i) वृषण (Testes)

(ii) वृषणकोष (Testes Sac)

(iii) शुक्राशय (Seminal Vesicle)

(iv) शुक्रवाहिनी कीप (Spermaduct Funnel)

(v) शुक्रवाहिका (Vas Deferens)

(vi) प्रोस्टेट ग्रन्थियाँ (Prostate Glands)

(vii) सहायक ग्रन्थियाँ (Accessory Glands)

(i) वृषण (Testes): केंचुए में दो जोड़ी वृषण होते हैं। ये 10वें और 11वें खण्ड में आहारनाल के नीचे, अधर तंत्रिका रज्जु के दोनों ओर स्थित होते हैं। प्रत्येक वृषण सफेद और पालिदार होता है, जिसमें 4 से 8 उंगली जैसी शाखाएँ होती हैं। इन शाखाओं में जर्मिनल एपिथेलियम होता है, जहाँ शुक्राणुजनन कोशिकाएँ बनती हैं और फिर शुक्राशय में चली जाती हैं।

(ii) वृषणकोष (Testes Sac): केंचुए में दो जोड़ी वृषणकोष होते हैं जो पतली दीवार वाले, चौड़े थैली जैसे होते हैं। 11वें खण्ड का वृषणकोष 11वें खण्ड के शुक्राशय में खुलता है, और 12वें खण्ड का वृषणकोष 12वें खण्ड के शुक्राशय में खुलता है। अपरिपक्व शुक्राणुओं का परिपक्वन और संचय इन्हीं शुक्राशयों में होता है।

(iii) शुक्राशय (Seminal Vesicle): केंचुए में दो जोड़ी शुक्राशय होते हैं- एक 11वें खण्ड में और दूसरी 12वें खण्ड में। ये अपरिपक्व शुक्राणुओं को परिपक्व करके संग्रहीत करते हैं।

(iv) शुक्रवाहिनी कीप (Spermaduct Funnel): केंचुए में दो जोड़ी शुक्रवाहिनी कीप होती हैं, जो 10वें और 11वें खण्ड में वृषणों के ठीक नीचे स्थित होती हैं। हर कीप के किनारों पर कई उभार होते हैं और वे पक्ष्माभिकामय (ciliated) होते हैं। इनका काम परिपक्व शुक्राणुओं को इकट्ठा करना है।

(v) शुक्रवाहिका (Vas Deferens): हर शुक्रवाहिनी कीप से एक पतली नलिका निकलती है, जिसे शुक्रवाहिका कहते हैं। ये नलिकाएँ पीछे की ओर बढ़ती हैं और 18वें खण्ड में एक साथ जुड़कर नर जनन छिद्र द्वारा बाहर खुलती हैं।

(vi) प्रोस्टेट ग्रन्थियाँ (Prostate Glands): केंचुए में एक जोड़ी प्रोस्टेट ग्रंथियाँ होती हैं जो गंदे सफेद रंग की होती हैं। ये अनियमित आकार की, पालिदार संरचनाएँ होती हैं, जो आहारनाल के दाहिनी और बाईं ओर 16वें या 17वें खण्ड से लेकर 20वें या 21वें खण्ड तक फैली होती हैं। हर ग्रंथि के दो भाग होते हैं- ग्रन्थिल भाग और अग्रन्थिल भाग। ग्रन्थिल भाग प्रोस्टेटिक द्रव बनाता है, जो शुक्राणुओं को सक्रिय रखता है।

(vii) सहायक ग्रन्थियाँ (Accessory Glands): दो जोड़ी सहायक ग्रंथियाँ 17वें और 19वें खण्ड में जनन पैपीला के ठीक नीचे होती हैं। ये गोल आकार की होती हैं और जनन पैपीला के शीर्ष पर खुलती हैं। इनका स्राव मैथुन क्रिया में मदद करता है।

9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 शुक्रग्राहिका वृषण वृषण कोष मुखिका कीप शुक्राशय अण्डाशय अण्डवाहिनी कीप अण्डवाहिनी मादा जनन छिद्र शुक्रवाहिनियाँ प्रोस्टेट ग्रन्थि सहायक ग्रन्थियाँ नर जनन छिद्र अधर तंत्रिका रज्जु चित्र 35.16 : केंचुए का प्रजनन तंत्र

2. मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System):
केंचुए का मादा जनन तंत्र इन मुख्य संरचनाओं से मिलकर बना होता है:

(i) अण्डाशय (Ovary)

(ii) अण्डवाहिनी कीप (Oviductal Funnel)

(iii) अण्डवाहिनी (Oviduct)

(iv) शुक्रग्राहिका (Spermatheca)

(i) अण्डाशय (Ovary): केंचुए में एक जोड़ी अण्डाशय 12वें और 13वें खण्ड के बीच की पट से जुड़े होते हैं, और 13वें खण्ड की गुहा में लटके रहते हैं। हर अण्डाशय सफेद होता है और इसमें उंगली जैसी 8 से 12 शाखाएँ होती हैं। हर शाखा में अण्डाणु एक क्रम में लगे होते हैं। सबसे परिपक्व अण्डाणु शाखा के दूर वाले सिरे पर होते हैं और सबसे कम परिपक्व अण्डाणु शाखा के पास वाले सिरे पर होते हैं।

चित्र 35.17 : केंचुए का अण्डाशय

(ii) अण्डवाहिनी कीप (Oviductal Funnel): यह भी एक जोड़ी में होती है और 13वें खण्ड में अण्डाशय के ठीक नीचे स्थित होती है। ये परिपक्व अण्डाणुओं को इकट्ठा करके अण्डवाहिनी में डाल देती हैं। हर कीप अण्डवाहिनी में पीछे की ओर खुलती है।

(iii) अण्डवाहिनी (Oviduct): ये एक जोड़ी होती हैं और 13वें से 14वें खण्ड तक फैली होती हैं। हर अण्डवाहिनी कीप अण्डवाहिनी में खुलती है। दोनों अण्डवाहिनियाँ 13वें-14वें पट को भेदकर 14वें खण्ड में एक साथ मिलकर एक मादा जनन छिद्र के रूप में बाहर खुलती हैं।

(iv) शुक्रग्राहिका (Spermatheca): केंचुए में चार जोड़ी शुक्रग्राहिकाएँ होती हैं। ये ग्रास नली के अधर पाश्र्वों (venterolateral) में, हर 5/6, 6/7, 7/8, और 8/9 खण्ड में एक-एक स्थित होती हैं। हर शुक्रग्राहिका नाशपाती के आकार की होती है, जिसमें एक ग्रन्थिल दीवार होती है। इसे तुम्बिका (Ampulla) कहते हैं। इसका अगला सिरा ग्रीवा (neck) होता है, जिसे शुक्रग्राहिका वाहिनी कहते हैं। ग्रीवा के नीचे एक छोटा अंधनाले (diverticulum) जैसा हिस्सा होता है। शुक्रग्राहिकाओं का मुख्य काम मैथुन के दौरान शुक्राणुओं को ग्रहण करके उन्हें इकट्ठा करना है, जबकि तुम्बिका शुक्राणुओं को पोषक पदार्थ देती है।

तुम्बिका चित्र 35.18 केंचुए की शुक्रग्राहिका
In simple words: केंचुए में नर और मादा दोनों अंग होते हैं, लेकिन वे खुद से प्रजनन नहीं करते। इसमें वृषण, शुक्राशय, अण्डाशय और शुक्रग्राहिका जैसे अंग होते हैं। नर तंत्र शुक्राणु बनाता है और मादा तंत्र अंडे। मैथुन के दौरान शुक्राणुओं का आदान-प्रदान होता है।

🎯 Exam Tip: प्रजनन तंत्र के हर हिस्से का नाम और उसका कार्य याद रखें, साथ ही उनके शरीर में स्थित खण्डों की संख्या भी महत्वपूर्ण है। सभी संबंधित चित्रों को स्पष्ट रूप से नामांकित करें।

 

प्रश्न 5. केंचुए की देहभित्ति की संरचना को आरेख चित्र द्वारा समझाइये।
Answer: केंचुए की देहभित्ति (शरीर की दीवार) पतली और लसलसी होती है। यह शरीर की सुरक्षा करती है और कई महत्वपूर्ण कार्य करती है। इसमें मुख्य रूप से चार परतें होती हैं:

(1) क्यूटिकल (Cuticle):
यह शरीर के ऊपर एक बहुत पतली, लचीली, और पारदर्शी सुरक्षात्मक परत होती है, जिसमें कोई कोशिका नहीं होती। यह अधिचर्म (epidermis) द्वारा बनाई जाती है। क्यूटिकल पर धारियाँ होती हैं और इसमें कोलेजन तन्तुओं की दो परतें होती हैं, जो इसे चमकीला और हल्के पीले रंग का दिखाती हैं। क्यूटिकल में ग्रंथिल कोशिकाओं के छिद्र भी होते हैं।

(2) अधिचर्म (Epidermis):
यह क्यूटिकल के ठीक नीचे स्तंभ जैसी कोशिकाओं की एक एकल परत होती है। इसमें चार प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं:

(अ) अवलम्बन कोशिकाएँ (Supporting cells)- ये स्तंभ जैसी कोशिकाएँ होती हैं जिनके बीच में अंडाकार केंद्रक होता है। इनकी संख्या बहुत ज़्यादा होती है और ये अधिचर्म का ज़्यादातर हिस्सा बनाती हैं।

(ब) ग्रन्थिल कोशिकाएँ (Glandular cells)- ये अवलम्बन कोशिकाओं के बीच में होती हैं और अलग-अलग प्रकार के द्रव बनाती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं: एल्ब्यूमिन कोशिकाएँ बेलनाकार होती हैं और कम संख्या में पाई जाती हैं। ये एल्ब्यूमिन का स्राव करती हैं जो भ्रूण को पोषण देता है।

श्लेष्मा कोशिकाएँ (Mucous cells)

एल्ब्यूमिन कोशिकाएँ (Albumen cells)

(स) आधारीय कोशिकाएँ (Basal cells)- ये छोटी, गोल या शंकाकार (conical) होती हैं। ये अवलम्बन और ग्रंथिल कोशिकाओं के भीतरी सिरों के बीच में पाई जाती हैं। हर कोशिका में एक स्पष्ट केंद्रक होता है। इन्हें प्रतिस्थापन कोशिकाएँ भी कहते हैं।

(द) संवेदी कोशिकाएँ (Sensory cells)- ये पतली और लंबी होती हैं। इनके स्वतंत्र सिरों पर संवेदी रोम होते हैं। ये समूह में व्यवस्थित होती हैं और बाहरी वातावरण से संवेदनाओं को ग्रहण करने का काम करती हैं।

 

(3) पेशी स्तर (Muscle Layer):
अधिचर्म के नीचे पेशी स्तर होता है, जिसमें तीन उप-स्तर होते हैं:

  • बाह्य वर्तुल पेशी स्तर (Outer circular muscle layer)- इस परत में पोरफाइरीन वर्णक कणिकाएँ होती हैं। इसके सिकुड़ने से केंचुए का शरीर लंबा और पतला हो जाता है।
  • मध्य अनुदैर्ध्य पेशी स्तर (Middle longitudinal muscle layer)- इस परत में पेशियाँ समूह में होती हैं। इसके सिकुड़ने से शरीर छोटा और मोटा हो जाता है।
  • अन्तः वर्तुल पेशी स्तर (Inner circular muscle layer)- यह बहुत महीन परत है।

 

(4) पेरिटोनियम (Peritoneum):
अनुलम्ब पेशी स्तर के ठीक नीचे, देहगुहा के चारों ओर की देहगुहीय उपकला का बाहरी स्तर होता है, जिसे पेरिटोनियम कहते हैं। यह चपटी, एकहरी झिल्ली जैसी कोशिकाओं की परत होती है।

क्यूटिकल अधिचर्म अवलम्बन कोशिकाएँ ग्रन्थिल कोशिकाएँ आधारी कोशिका संवेदी कोशिकाएँ वर्तुल पेशी स्तर अनुलम्ब पेशी स्तर अन्तः वर्तुल पेशी स्तर प्रगुही उपकला स्तर चित्र 35.2 : केंचुए की देहभित्ति का अनुप्रस्थ काट

देहभित्ति के कार्य (Functions of Body Wall):

  • यह शरीर के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाती है, जो केंचुए को चोट और सूखने से बचाता है।
  • यह शरीर को एक निश्चित आकार देती है और उसे बनाए रखने में मदद करती है।
  • लसलसी होने के कारण यह श्वसन में सहायता करती है, क्योंकि गैसें नम त्वचा के माध्यम से अंदर-बाहर जा सकती हैं।
  • यह त्वचा पर निकलने वाले द्रव द्वारा जीवाणुओं और अन्य हानिकारक पदार्थों से शरीर की रक्षा करती है।
  • देहभित्ति में संवेदी कोशिकाएँ होती हैं जो केंचुए को बाहरी बदलावों को महसूस करने में मदद करती हैं।
  • देहभित्ति की पेशियाँ और शूक (setae) केंचुए को चलने और बिल बनाने में मदद करते हैं।
  • इसमें मौजूद श्लेष्म ग्रंथियाँ एक चिपचिपा द्रव छोड़ती हैं, जिससे देहभित्ति नम और चिकनी रहती है। यह श्लेष्म बिलों की दीवारों को प्लास्टर करने में भी मदद करता है, जिससे वे चिकने और स्थिर बनते हैं।

In simple words: केंचुए की चमड़ी पतली और चिपचिपी होती है। इसमें क्यूटिकल, अधिचर्म और पेशी जैसी परतें होती हैं। यह शरीर की रक्षा करती है, सांस लेने में मदद करती है और उसे चलने में भी सहायता करती है।

🎯 Exam Tip: देहभित्ति की सभी परतों के नाम और उनकी मुख्य विशेषताओं को याद रखें। प्रत्येक परत के कार्यों को समझना और नामांकित चित्र बनाना बहुत महत्वपूर्ण है।

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