RBSE Solutions Class 11 Biology Chapter 30 अकशेरुकी जन्तुओं का वर्गीकरण

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Detailed Chapter 30 अकशेरुकी जन्तुओं का वर्गीकरण RBSE Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 30 अकशेरुकी जन्तुओं का वर्गीकरण RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Biology Chapter 30 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

प्रश्न 1. प्रोटोजोआ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया?
(क) हीकल
(ख) गोल्डफस
(ग) लेमार्क
(घ) ल्यूवेनहॉक

 

प्रश्न 2. बाथ स्पंज है
(क) यूस्पांजिया
(ख) स्पांजिला
(ग) काइटन
(घ) डेन्टेलियम

 

प्रश्न 4. ऐनेलिडा एवं मौलस्का के बीच की योजक कड़ी है
(क) पेरीपेटस
(ख) नियोपिलाइना
(ग) लिमुलस
(घ) लाइमेक्स।

 

प्रश्न 5. निम्न में से सबसे बड़ा अकशेरुकी जन्तु है
(क) दैत्य स्किवड
(ख) कटलमीन
(ग) फाईसेलिया
(घ) बेलेनोप्टेरा
Answer: (क) दैत्य स्किवड
In simple words: सबसे बड़े अकशेरुकी जीवों में दैत्य स्किवड शामिल हैं, जो महासागरों में बहुत बड़े आकार तक पहुँच सकते हैं।

🎯 Exam Tip: अकशेरुकी जन्तुओं के उदाहरण और उनके विशिष्ट लक्षणों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके आकार और वासस्थान।

 

प्रश्न 6. 'अरस्तू की लालटेन' किसमें मिलती है
(क) तारामछली
(ख) ब्रिटिल स्टार
(ग) सी-अर्चिन
(घ) सी-एनीमोन
Answer: (ग) सी-अर्चिन
In simple words: 'अरस्तू की लालटेन' समुद्री अर्चिन के अंदर पाई जाने वाली एक खास तरह की बनावट है, जिसका उपयोग वे खाने के लिए करते हैं।

🎯 Exam Tip: जीवों के विशिष्ट अंगों और उनके कार्यों से संबंधित प्रश्नों पर ध्यान दें, क्योंकि ये अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।

 

प्रश्न 7. मौलस्का में कवच किससे बनता है?
(क) पाद
(ख) मेन्टल
(ग) टिनिडिया
(घ) प्लेकोइडा
Answer: (ख) मेन्टल
In simple words: मोलस्का का कठोर कवच मेन्टल नामक एक परत से बनता है, जो उनके शरीर को सुरक्षा देती है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न संघों के जीवों में शारीरिक संरचनाओं और उनके निर्माण के बारे में जानकारी रखना आवश्यक है।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 30 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. प्रोटोजोआ संघ का वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है?
Answer: प्रोटोजोआ संघ का वर्गीकरण जन्तुओं में गमनांग या चलन अंग के आधार पर किया गया है। यह जीवों को उनके चलने के तरीके से पहचानने में मदद करता है।
In simple words: प्रोटोजोआ जीवों को उनके चलने के अंगों के हिसाब से बांटा गया है।

🎯 Exam Tip: प्रोटोजोआ के वर्गीकरण के मुख्य आधार को स्पष्ट रूप से लिखें और उदाहरणों के साथ समझाएँ।

 

प्रश्न 2. एन्टअमीबा हिस्टोलाइटिका से कौनसा रोग होता है?
Answer: एन्टअमीबा हिस्टोलाइटिका से अमीबॉयसिस नामक रोग होता है। यह एक गंभीर बीमारी है जो पेट और आँतों को प्रभावित करती है।
In simple words: एन्टअमीबा हिस्टोलाइटिका से अमीबॉयसिस बीमारी होती है।

🎯 Exam Tip: रोगों के नाम और उनके कारक जीवों को सही वर्तनी के साथ याद रखें।

 

प्रश्न 3. संघ प्लेटीहैल्मिन्थीज के स्वतंत्र जीवी जन्तु का नाम बताइये।
Answer: संघ प्लेटीहैल्मिन्थीज के स्वतंत्र जीवी जन्तु का नाम प्लेनेरिया है। प्लेनेरिया अपनी अद्भुत पुनरुत्पादन क्षमता के लिए भी जाना जाता है।
In simple words: प्लेटीहैल्मिन्थीज संघ का स्वतंत्र जीवी जन्तु प्लेनेरिया है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न संघों के स्वतंत्र जीवी और परजीवी जीवों के उदाहरण याद रखें।

 

प्रश्न 4. अकशेरुकी प्राणियों को सबसे बड़ा संघ कौनसा है?
Answer: अकशेरुकी प्राणियों का सबसे बड़ा संघ आर्थोपोडा है। इस संघ में कीट, मकड़ी और केकड़े जैसे अनेक जीव शामिल हैं।
In simple words: अकशेरुकी जीवों का सबसे बड़ा समूह आर्थोपोडा संघ है।

🎯 Exam Tip: जन्तु जगत के सबसे बड़े संघ का नाम और उसके सामान्य उदाहरणों को याद रखें।

 

प्रश्न 5. 'नली के भीतर नली' जैसी संरचना किन जन्तुओं में पाई जाती है?
Answer: 'नली के भीतर नली' जैसी संरचना ऐनेलिडा के जन्तुओं में पाई जाती है। यह शरीर योजना जटिल जीवों में पाई जाती है।
In simple words: ऐनेलिडा संघ के जीवों में 'नली के भीतर नली' जैसी शारीरिक बनावट होती है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न जन्तु संघों की शारीरिक संरचनाओं और उनके विशिष्ट लक्षणों पर ध्यान दें।

 

प्रश्न 6. ऐनेलिडा संघ के जन्तुओं में किस प्रकार की देहगुहा पाई जाती है?
Answer: ऐनेलिडा संघ के जन्तुओं में वास्तविक देहगुहा (सीलोम) पाई जाती है। यह देहगुहा मेसोडर्म से ढकी होती है और आंतरिक अंगों को जगह देती है।
In simple words: ऐनेलिडा में सच्ची देहगुहा होती है।

🎯 Exam Tip: देहगुहा के प्रकार (जैसे वास्तविक, कूट या अनुपस्थित) और वे किस संघ में पाए जाते हैं, इसे स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 7. किसी एक जीवित जीवाश्म जन्तु का नाम लिखिये।
Answer: निओपिलिना एक जीवित जीवाश्म है। यह लाखों वर्षों से बहुत कम बदलाव के साथ जीवित है।
In simple words: निओपिलिना एक जीवित जीवाश्म है।

🎯 Exam Tip: जीवित जीवाश्म उन जीवों को कहते हैं जो बहुत पुराने हैं और उनमें समय के साथ बहुत कम बदलाव आया है।

 

प्रश्न 8. ऐनेलिडा एवं आर्थोपोडा की संयोजक कड़ी कौनसा जन्तु है?
Answer: ऐनेलिडा एवं आर्थोपोडा की संयोजक कड़ी पेरीपेट्स (Peripatus) है। यह दोनों संघों के कुछ खास लक्षण दिखाता है।
In simple words: पेरीपेट्स ऐनेलिडा और आर्थोपोडा को जोड़ने वाला जीव है।

🎯 Exam Tip: संयोजक कड़ियों के उदाहरण और वे किन दो समूहों को जोड़ते हैं, यह याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 9. श्वसन वर्णक हिमोसाइनिन कौनसे संघ के जन्तुओं में पाया जाता है?
Answer: श्वसन वर्णक हिमोसाइनिन मोलस्का संघ के जन्तुओं में पाया जाता है। इसमें तांबा होता है, जिसके कारण रक्त नीला या हरा दिखाई देता है।
In simple words: मोलस्का संघ के जीवों में हिमोसाइनिन नामक नीला श्वसन वर्णक होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न श्वसन वर्णक (जैसे हीमोग्लोबिन, हिमोसाइनिन) और वे किस संघ में पाए जाते हैं, यह जानें।

 

प्रश्न 10. संघ सीलैन्ट्रेटा के जन्तुओं में पुनरुद्भवन की क्षमता कौनसी कोशिकाओं के कारण होती है?
Answer: संघ सीलैन्ट्रेटा के जन्तुओं में पुनरुद्भवन की क्षमता अन्तराली कोशिकाओं (Interstitial Cells) के कारण होती है। ये कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हिस्सों को फिर से बनाने में मदद करती हैं।
In simple words: सीलैन्ट्रेटा में पुनरुद्भवन की शक्ति अन्तराली कोशिकाओं के कारण होती है।

🎯 Exam Tip: पुनरुद्भवन में शामिल कोशिकाओं के प्रकार और उनके कार्य को समझें।

 

प्रश्न 11. मीसोग्लिया स्तर कौनसे संघ के जन्तुओं में पाया जाता है?
Answer: मीसोग्लिया स्तर सीलेन्ट्रेटा संघ के जन्तुओं में पाया जाता है। यह एक अकोशिकीय या जिलेटिनस परत होती है जो एक्टोडर्म और एंडोडर्म के बीच पाई जाती है।
In simple words: सीलेन्ट्रेटा संघ में मीसोग्लिया नामक परत होती है।

🎯 Exam Tip: जन्तुओं की शारीरिक संरचना में विभिन्न स्तरों (जैसे एक्टोडर्म, एंडोडर्म, मीसोग्लिया) को पहचानें।

 

प्रश्न 12. आर्थोपोडा संघ के कौनसे उपसंघ के सभी जन्तु जीवाश्म अवस्था में पाए जाते हैं?
Answer: आर्थोपोडा संघ के ट्राइलोबाइटा उपसंघ के सभी जन्तु जीवाश्म अवस्था में पाये जाते हैं। इस उपसंघ के जीव अब विलुप्त हो चुके हैं।
In simple words: आर्थोपोडा के ट्राइलोबाइटा उपसंघ के सारे जीव अब जीवाश्म ही हैं।

🎯 Exam Tip: जीवाश्म और विलुप्त हो चुके जन्तु समूहों के बारे में ज्ञान रखें।

 

प्रश्न 13. मनुष्य में 'हाथी पांव' का रोग किस कृमि द्वारा होता हैं?

 

प्रश्न 15. मौलस्का संघ के जन्तुओं में श्वसन कौनसे अंग द्वारा होता है?
Answer: मौलस्का संघ के जन्तुओं में श्वसन क्लोम या फुफ्फुस द्वारा होता है। जलीय मोलस्का में क्लोम (गिल) और स्थलीय मोलस्का में फुफ्फुस (फेफड़े) होते हैं।
In simple words: मोलस्का जीव गिल या फेफड़ों से सांस लेते हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न जीवों में श्वसन अंगों के नाम और उनके अनुकूलन को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 30 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. संघ प्रोटोजोआ को गमन के आधार पर कितने वर्गों में विभाजित किया गया है?
Answer: संघ प्रोटोजोआ को गमन के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया गया है:

  • फ्लैजीलेटा/मैस्टीगोफेरा
  • सॉरकोडिना या राइजोपोडा
  • सिलियेटा
  • स्पोरोजोआ

यह वर्गीकरण उनके गति करने के तरीके पर आधारित है।
In simple words: प्रोटोजोआ को चलने के तरीके के आधार पर चार हिस्सों में बांटा गया है।

🎯 Exam Tip: प्रोटोजोआ के चार वर्गों के नाम और प्रत्येक वर्ग में पाए जाने वाले विशिष्ट गमनांगों को याद रखें।

 

प्रश्न 2. कूटगुहीय संघ के चार विशेष लक्षण लिखिये।
Answer: कूटगुहीय संघ (निमैहेल्मिन्थीज) के चार विशेष लक्षण इस प्रकार हैं:

  • इनका शरीर गोल और धागे के समान होता है, इन्हें गोलकृमि भी कहते हैं। इनमें सिर स्पष्ट नहीं होता।
  • शरीर पर एक मोटी क्यूटिकल (बाहरी परत) का आवरण पाया जाता है।
  • अधिचर्म बहुकेन्द्रकीय होता है, और भीतर की ओर विशेष प्रकार की अनुदैर्ध्य पेशी कोशिकाओं के चार चतुर्थांशों में बंटा पेशी स्तर होता है।
  • इनका शरीर खण्डहीन, त्रिस्तरीय और द्विपार्श्व सममित होता है।

ये जीव विभिन्न वासस्थानों में पाए जाते हैं।
In simple words: कूटगुहीय संघ के जीवों का शरीर गोल, धागे जैसा, खण्डहीन, त्रिस्तरीय और द्विपार्श्व सममित होता है, और उन पर क्यूटिकल की परत होती है।

🎯 Exam Tip: कूटगुहीय जीवों के शारीरिक लक्षणों पर विशेष ध्यान दें, खासकर उनकी देहगुहा, क्यूटिकल और सममिति के बारे में।

 

प्रश्न 3. किन्हीं दो अन्तः परजीवी के नाम एवं उनके द्वारा जनित रोग का नाम लिखिये जो मनुष्य में पाये जाते हैं?

 

प्रश्न 4. जीवित जीवाश्म किसे कहते हैं? उदाहरण दीजिये।
Answer: ऐसे जीवित जीव जो जीवाश्मों के समान दिखते हैं और उनमें जीवाश्मों के लक्षण पाए जाते हैं, उन्हें जीवित जीवाश्म कहते हैं। ये जीव लाखों वर्षों से बहुत कम बदलाव के साथ जीवित हैं। जीवित जीवाश्म के उदाहरण हैं:

  • निओपिलिना (Neopilina) मोलस्का का सदस्य
  • लिमुलस या किंग क्रेब (Limulus or King Crab) आर्थोपोडा का सदस्य

In simple words: जीवित जीवाश्म वे जीव हैं जो बहुत पुराने जीवाश्मों जैसे दिखते हैं और आज भी जिंदा हैं, जैसे निओपिलिना और किंग क्रेब।

🎯 Exam Tip: जीवित जीवाश्म की परिभाषा को स्पष्ट रूप से समझें और उनके सही उदाहरणों को याद रखें।

 

प्रश्न 5. संघ सीलैन्ट्रेटा में दंश कोशिकाओं का विशेष कार्य लिखिये।
Answer: संघ सीलैन्ट्रेटा में पाई जाने वाली दंश कोशिकाओं (निमेटोसिस्ट) के विशेष कार्य निम्न हैं:

  • दंश कोशिकाएं शिकारियों से आत्मरक्षा करने में मदद करती हैं।
  • ये कोशिकाएं भोजन को पकड़ने में भी उपयोगी होती हैं।

इन कोशिकाओं में विषैले पदार्थ होते हैं जो शिकार को अचेत कर देते हैं।
In simple words: सीलैन्ट्रेटा की दंश कोशिकाएं खुद की रक्षा करने और खाना पकड़ने के काम आती हैं।

🎯 Exam Tip: दंश कोशिकाओं की संरचना, उनके विष और उनके दोहरे कार्य (रक्षा और शिकार) को याद रखें।

 

प्रश्न 6. उन चार संघों का नाम लिखिये जिनमें परिवर्धन के दौरान लार्वा अवस्था पाई जाती है।
Answer: चार संघ निम्न हैं जिनमें परिवर्धन के दौरान लार्वा अवस्था पाई जाती है:

  • संघ-ऐनेलिडा
  • संघ-आर्थोपोडा
  • संघ-मौलस्का
  • संघ-इकाइनोडर्मेटा

इन संघों में लार्वा अवस्था अक्सर उनके जीवन चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।
In simple words: ऐनेलिडा, आर्थोपोडा, मोलस्का और इकाइनोडर्मेटा में लार्वा अवस्था होती है।

🎯 Exam Tip: उन संघों को याद रखें जिनमें लार्वा अवस्था पाई जाती है, क्योंकि यह उनके जीवन चक्र का एक महत्वपूर्ण चरण है।

 

प्रश्न 7. संघ हेमीकॉर्डेटा के विशेष लक्षण लिखिये।
Answer: संघ हेमीकॉर्डेटा के विशेष लक्षण इस प्रकार हैं:

  • इनका शरीर तीन भागों में बंटा होता है: श्रृंड (Proboscis), कॉलर (Collar) और धड़ (Trunk)।
  • इनमें नोटोकोर्ड केवल अग्र सिरे पर ही पाई जाती है। नोटोकोर्ड के बारे में अभी शंका व्यक्त की जाती है। अतः इसे मुखीय डाइवर्टिकुला (Buccal diverticula) कहते हैं और इसे नॉनकॉर्डेटा के अन्तर्गत रखा जाता है।
  • इस संघ के सदस्यों में कंकाल ऊतक (Skeletal tissue) अनुपस्थित होता है।
  • इनमें एन्ट्रोसील (Entrocoel) प्रकार की सीलोम पाई जाती है, जो तीन भागों में विभक्त होती है-प्रोटसील, मीसोसील और मेटासील।
  • इनमें अनेक गिल दरारें (gill slits) पाई जाती हैं।
  • इनका तंत्रिका तंत्र अधिचर्म में पाया जाता है।
  • इनमें सीधी या 'U' के आकार की आहारनाल पाई जाती है।
  • देह भित्ति (body wall) एक स्तरीय एपीडर्मिस से बनी होती है तथा डर्मिस (dermis) अनुपस्थित होती है।
  • परिसंचरण तंत्र खुले प्रकार का होता है।
  • इनके प्रोबोसिस में एक ग्लोमेरुलस पाया जाता है जो उत्सर्जन का कार्य करता है।
  • लिंग पृथक् होते हैं और इनमें परिवर्धन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रकार का होता है।
  • इनके जीवन चक्र में टोरनेरिया लार्वा पाया जाता है।

ये लक्षण इन्हें अन्य संघों से अलग करते हैं।
In simple words: हेमीकॉर्डेटा का शरीर तीन हिस्सों में बंटा होता है, इनमें गिल दरारें और एक खास तरह की नोटोकोर्ड होती है, और इनका परिसंचरण तंत्र खुला होता है।

🎯 Exam Tip: हेमीकॉर्डेटा के मुख्य लक्षणों, विशेषकर नोटोकोर्ड की स्थिति और शारीरिक विभाजन को याद रखें।

 

प्रश्न 8. द्विरूपता से क्या तात्पर्य है? उदाहरण द्वारा समझाइये।
Answer: द्विरूपता-सीलेन्ट्रेटा संघ के प्राणी दो रूपों (dimorphic) में पाये जाते हैं, जिन्हें जीवक या जोइड्स (Zooids) कहते हैं। द्विरूपता का अर्थ है कि एक ही प्रजाति के जीव दो अलग-अलग शारीरिक रूपों में मौजूद होते हैं।

  • पॉलिप-इन प्राणियों का शरीर बेलनाकार होता है। ये अलैंगिक अवस्था वाले स्थानबद्ध प्राणी हैं। उदाहरण- हाइड्रा ।
  • मेड्यूसा-इन प्राणियों के शरीर छत्री के समान अथवा घंटी के समान होते हैं। लैंगिक अवस्था वाले व स्वतंत्र जीवी प्राणी हैं। उदाहरण-ऑरीलिया।

यह उनके जीवन चक्र का एक महत्वपूर्ण अनुकूलन है।
In simple words: द्विरूपता मतलब जब एक ही जीव दो अलग-अलग रूपों में पाया जाता है, जैसे सीलेन्ट्रेटा में पॉलिप और मेड्यूसा।

🎯 Exam Tip: द्विरूपता की परिभाषा और पॉलिप व मेड्यूसा रूपों के बीच के अंतर को उदाहरणों सहित स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 9. उन कारणों को लिखिये जिनमें हेमीकॉर्डेटा को अब अकशेरुकी समूह में अलग संघ के रूप में रखा गया है।
Answer: जन्तुओं के आधुनिक वर्गीकरण में इस संघ को कॉर्डेटा के साथ नहीं रखा गया है। अब इसे पृष्ठवंशी संघ और अपृष्ठवंशी संघ के बीच एक स्वतंत्र संघ के रूप में रखा गया है क्योंकि इस वर्ग के जन्तुओं में वास्तविक पृष्ठ रज्जु (नोटोकोर्ड) नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, हेमीकॉर्डेटा संघ का लार्वा (टोरनेरिया) इकाइनोडर्मेटा संघ के बाइपिझेरिया लार्वा से बहुत समानता रखता है। इस प्रकार हेमीकॉर्डेटा को नॉनकॉर्डेटा संघ में रखा गया है क्योंकि इसमें कॉर्डेटा के सभी आवश्यक लक्षण नहीं होते हैं।
In simple words: हेमीकॉर्डेटा को अब एक अलग अकशेरुकी संघ माना जाता है क्योंकि इसमें असली नोटोकोर्ड नहीं होती और इसका लार्वा इकाइनोडर्मेटा से मिलता-जुलता है।

🎯 Exam Tip: हेमीकॉर्डेटा के वर्गीकरण में परिवर्तन के मुख्य कारणों को समझाएं, विशेषकर नोटोकोर्ड और लार्वा की समानताओं पर जोर दें।

 

RBSE Class 11 Biology Chapter 30 निबन्धात्मक प्रश्न

 

प्रश्न 1. मोलस्का संघ के प्रमुख लक्षणों के साथ वर्गों के नाम एवं उदाहरण दीजिये।
Answer: मोलस्का का अर्थ होता है कोमल। संघ मोलस्का में सम्मिलित किए जाने वाले जन्तुओं का शरीर कोमल होता है। शरीर कोमल व खण्डविहीन होता है तथा कैल्शियम कार्बोनेट के कवच से ढका रहता है। इस संघ का नाम जॉन्स्टन (Johnston) ने दिया था। यह अकशेरुक प्राणियों का सबसे बड़ा दूसरा संघ (phylum) है।
मुख्य लक्षण (Main Characteristics)-

  • अधिकांश समुद्री, कुछ अलवणीय जल में, कुछ नम भूमि पर अधिकांश स्वतंत्र रूप से रेंगने वाले, कुछ चट्टानों आदि से चिपके हुए, कुछ तैरने वाले तथा कुछ सुरंगों में रहने वाले होते हैं। ये विभिन्न वासस्थानों में पाए जाते हैं।
  • ये त्रिस्तरीय (triploblostic), द्विपार्श्वीय एवं अखण्डित होते हैं। परन्तु अनेक सदस्यों में ऐंठन (torsion) के कारण कुण्डलित (coiled) एवं असममित होते हैं।
  • गमन हेतु पाद (Foot) पाया जाता है। पाद भिन्न-भिन्न प्रकार से अनुकूलित (Adapted) होते हैं। ये रेंगने, बिल बनाने व तैरने में सहायक हैं। ये पाद जीवों को गति प्रदान करते हैं।
  • मेन्टल व शरीर के बीच मेन्टल गुहा (Mantle cavity) पाई जाती है। आंतरंग (Visceral mass) में सभी अंग स्थित होते हैं।
  • मोलस्का के सदस्यों में खुले प्रकार का परिसंचरण तंत्र (open type of blood vascular system) पाया जाता है। सिफेलेपोडा वर्ग के सदस्यों में बन्द प्रकार का रक्त परिसंचरण तंत्र में पाया जाता है।
  • इनमें रक्त रंगहीन या नीले रंग का होता है। हिमोसायनिन (Haemocynin) नामक श्वसन वर्णक पाया जाता है। हृदय पेशीजन्य (Myogenic) होता है।
  • पाचन तंत्र में पाचन ग्रन्थियां तथा एक यकृत (Liver) होता है। भोजन को चबाने के लिए रैडुला (Radula) नाम का एक विशिष्ट अंग मुख गुहा में पाया जाता है। आहारनाल 'U' आकार की अथवा कुण्डलित होती है।
  • श्वसन गिल्स (Gills) या टीनिडिया (Ctenidia) या पल्मोनरी सेक द्वारा होता है। मेन्टल भी श्वसन में सहायता करता है। स्थलवासी जन्तुओं में फुफ्फुस (Lungs) पाए जाते हैं।
  • उत्सर्जन वृक्क या मेटानेफ्रिडिया (Metanephridia) द्वारा होता है। कुछ सदस्यों में बोजेनस का अंग (Organ of Bojanus) व केबर अंग (Keber's organ) पाए जाते हैं, जो उत्सर्जन का कार्य करते हैं।
  • तंत्रिका तंत्र जोड़ीदार गुच्छ (ganglion) और इन्हें जोड़ने वाली संयोजक तंत्रिकाओं का बना होता है।
  • संवेदी अंग के रूप में नेत्र, स्पर्शक, स्टेटोसिस्ट, ओस्फोरेडिया आदि रचनाएं पाई जाती हैं।
  • अधिकांश सदस्य एकलिंगी (unisexual) होते हैं। निषेचन आंतरिक या बाह्य पाया जाता है।
  • परिवर्धन (Development) प्रत्यक्ष (direct) या अप्रत्यक्ष (indirect) प्रकार का होता है।
  • इनके जीवन चक्र में ग्लोकीडियम (Glochidium) या वेलिजर (Velliger) लार्वा पाया जाता है।

इस संघ को श्वसन, अंग, पाद, मेन्टल तथा कवच के आधार पर 6 वर्गों में वर्गीकृत किया गया है-
1. वर्ग- मोनोप्लैकोफोरा (Monoplacophora)-
इस वर्ग के जन्तुओं में आवरण के रूप में कुण्डलित कवच पाया जाता है। उदाहरण- नियोपिलाइना (Neopilina) एनेलिडा व मोलस्का की योजक कड़ी है।
2. वर्ग- ऐम्फीन्यूरा (Amphineura)-
इस वर्ग के जन्तुओं में आवरण के रूप में, कवच उपस्थित होता है। इनमें स्पष्ट सिर का अभाव होता है। उदाहरण- काइटन (Chiton)।
3. वर्ग- स्कैफोपोडी (Scaphopoda)-
इस वर्ग के जन्तुओं में गमन अंग पाद अनुपस्थित होता है। उदाहरण- डैन्टेलियम (Dentalium)- हाथीदांत कवच ।
4. वर्ग- गैस्ट्रोपोडा (Gastropoda)-
इस वर्ग के जन्तुओं में आवरण के रूप में ऐंठन के कारण कुण्डलित कवच एवं गमन हेतु मांसल पाद उपस्थित होता है। उदाहरण- पाइला (Pila)- सेव घोंघा, डोरिस (Doris)- समुद्री नींबू, ऐप्लीसिया (Aplysia)- समुद्री खरगोश।
5. वर्ग-सिफेलेपोडा (Class Cephalopoda)-
इस वर्ग के जन्तुओं में सिर स्पष्ट और आँखों का विकास अच्छा होता है। इनकी भुजाएँ होती हैं, और ये शिकार करने में माहिर होते हैं। उदाहरण- ऑक्टोपस (Octopus)- बेताल मछली, सीपिया (Sepia)- कटल फिश, लोलीगो (Loligo)- दैत्य स्क्विड।
In simple words: मोलस्का संघ के जीवों का शरीर कोमल होता है और कवच से ढका रहता है। इनके मुख्य लक्षणों में पाद, मेन्टल गुहा और खुले परिसंचरण तंत्र शामिल हैं। इन्हें मोनोप्लैकोफोरा, ऐम्फीन्यूरा, स्कैफोपोडा, गैस्ट्रोपोडा और सिफेलेपोडा जैसे वर्गों में बांटा गया है।

🎯 Exam Tip: मोलस्का के मुख्य लक्षणों को विस्तृत रूप से समझाएं और प्रत्येक वर्ग के कम से कम दो उदाहरणों को याद रखें।

 

संघ मोलस्का का आर्थिक महत्व-

 

1. भोजन के रूप में-
Answer: संघ मोलस्का की अनेक प्रजातियाँ जैसे क्लेम (Clams), स्केलॉप (Scallop), मसेल (Mussel) चीन, जापान, मलाया, यूरोप व अमेरिका में भोजन के काम ली जाती हैं। ऐसे समुद्री भोजन (sea-food) को लजीज (delicacy) माना जाता है तथा बहुत पसन्द किया जाता है। भारत में बिहार, पश्चिमी बंगाल व मिजोरम में स्वच्छ जलीय मॉलस्का जीवों जैसे पाइला, वैलामिया, लेमेलिडेन्स, ब्रोटिया (Brotia), पेरीसिया (Perrysia) को भोजन के रूप में खाया जाता है। तटीय क्षेत्रों में समुद्री मॉलस्का जीव खाए जाते हैं। यह उनकी पोषण और स्वादिष्टता के कारण होता है।
In simple words: मोलस्का संघ के कई जीव जैसे क्लेम और मसेल, दुनिया भर में भोजन के रूप में इस्तेमाल होते हैं, खासकर समुद्री इलाकों में।

🎯 Exam Tip: मोलस्का को भोजन के रूप में उपयोग करने वाले जीवों के नाम और उनका महत्व याद रखें।

 

2. मोती उद्योग क्षेत्र में-
Answer: मोलस्का संघ के प्राणियों द्वारा मोती का उत्पादन किया जाता है। इस कारण उद्योग की दृष्टि से इस संघ के प्राणियों का पालन किया जाता है, जिसे मोती पालन कहते हैं। यह उद्योग कई देशों की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। भारतीय जलाशयों में निम्न जातियां पाई जाती हैं जिनके द्वारा मोती उत्पादन किया जाता है-

  • पिन्कटैडा रोडिंग
  • पिन्कटैडा वलगैरिस
  • माइटिलस
  • पिन्कटैडा मारगेरीटीफेरा

भारत में सर्वोत्तम लिंघा मोती (Lingha pear) समुद्री ऑयस्टार से प्राप्त किया जाता है, जो व्यापारिक दृष्टि से मूल्यवान होता है।
In simple words: मोलस्का से मोती बनते हैं, इसलिए उनका पालन मोती उद्योग में किया जाता है, जिससे महंगे मोती मिलते हैं।

🎯 Exam Tip: मोती उत्पादन में शामिल मोलस्का की प्रजातियों के नाम और मोती के आर्थिक महत्व को याद रखें।

 

प्रश्न 2. आर्थोपोडा संघ आर्थिक दृष्टि से लाभकारी एवं हानिकारक किस प्रकार से होता है? समझाइये।
Answer: आर्थो (Artho) का अर्थ है संधियुक्त तथा पोडा (poda) का अर्थ होता है उपांग अर्थात् इस संघ में आने वाले जन्तुओं के उपांग संधियुक्त होते हैं। यह जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है। इस संघ के प्राणी सभी प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं। इस संघ की स्थापना 1845 में वॉन सीबोल्ड (Von Siebold) ने की थी।
मुख्य लक्षण (Main Characteristics)
1. इस संघ के सदस्य सभी प्रकार के आवासों में निवास करते हैं। ये समुद्री जल, स्वच्छ जल, स्थलीय, वायवीय, परजीवी आदि हैं।
2. इस संघ के जन्तु त्रिस्तरीय (triploblastic), द्विपार्श्व सममित (bilateral symmetry) होते हैं।
3. इनमें काइटिनी क्यूटिकल का बाह्य कंकाल पाया जाता है जो समय-समय पर नवीनीकृत किया जाता है।
4. शरीर तीन भागों में विभक्त होता है- सिर (Head), वक्ष (Thorax) व उदर (Abdomen)। कुछ जन्तुओं में सिर व वक्ष के जुड़ने से सिरोवक्ष (Cephalothorex) का निर्माण हो जाता है।
5. इनमें सन्धियुक्त उपांग (jointed legs) पाये जाते हैं। ये विभिन्न कार्यों के सम्पादन हेतु अनुकूलित होते हैं।
6. इनमें वास्तविक देहगुहा पाई जाती है। अधिकांशतः एक तरल से भरी रुधिर गुहा या हीमोसील (Haemocoel) होती है।
7. पेशी तंत्र विकसित मांसपेशियां रेखित (Striped) प्रकार की होती हैं जो शीघ्र संकुचन करने में सक्षम होती हैं।
8. संघ के सदस्यों में मेटामेरिक खण्डीभवन (Metameric segmentation) पाया जाता है।
9. इनमें पूर्ण विकसित आहारनाल पाई जाती है। अर्थात् पाचन के लिए पूर्ण विकसित । इनमें मुखांग (Mouth parts) पाये जाते हैं जो भिन्न-भिन्न प्रकार के पोषण हेतु अनुकूलित होते हैं।
10. इनमें तंत्रिका तंत्र में एक पृष्ठ तंत्रिका वलय और एक दो अधर तंत्रिका रज्जु होता है।
11. इनमें संवेदी अंगों में श्रृंगिकाएं सरल नेत्र या नेत्रक (ocelli) संयुक्त नेत्र (compound eyes), रसायनग्राही और स्पर्शग्राही होते हैं। सन्तुलनपुटी (स्टेटोसिस्ट) उपस्थित होती है।
12. श्वसन के लिए जलीय सदस्यों में जल-क्लोम (gills) स्थलीय में वायु नलिकाएं (tracheae) या बुक-लंग्स (book-lungs) होते हैं। कुछ में श्वसन देहभित्ति से विसरण (diffusion) द्वारा होता है।
13. इस संघ के सदस्य एकलिंगी (unisexual) होते हैं। इसमें लैंगिक द्विरूपता (sexual dimorphism) पाई जाती है।
14. अधिकांशतया आन्तरिक निषेचन (Internal fertilization) किया जाता है।
15. संघ के सदस्य अण्डज (Oviparous) या अण्डजराय (ovoviviparous) होते हैं।
16. इनमें परिवर्धन प्रत्यक्ष (direct) या अप्रत्यक्ष (indirect) होता है। कुछ में अनिषेकजनन (Parthenogenesis) भी पाया जाता है।
संघ आर्थोपोडा को स्टोरर व यूसिंगर ने निम्न आधारों एवं उपसंघों व कई वर्गों में वर्गीकृत किया -

  • शरीर के विभाजन के आधार पर
  • श्रृंगिकाओं (Antenna) के आधार पर
  • जबड़ों के आधार पर।

In simple words: आर्थोपोडा जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है, जिसके जीवों में संधियुक्त उपांग होते हैं। ये त्रिस्तरीय और द्विपार्श्व सममित होते हैं और इनमें काइटिन का बाह्य कंकाल होता है। इनका शरीर सिर, वक्ष और उदर में बंटा होता है, और इनमें जटिल संवेदी अंग व विभिन्न श्वसन प्रणालियाँ पाई जाती हैं।

🎯 Exam Tip: आर्थोपोडा संघ के वर्गीकरण के मुख्य आधारों को समझें और विभिन्न उपसंघों व वर्गों के उदाहरणों को याद रखें।

वर्ग का नामउदाहरण
(1) कैल्केरिया या कैल्सीस्पोंजी-साइकॉन, ल्यूसिला
(2) हैक्सॉक्टिनेलिडा या हायलोस्पोंजी-यूप्लैक्टैला, ग्लास रोप स्पंज
(3) डिमोस्पांजिया या चौखटास्पंज-यूस्पांजिया, क्लायेना
वर्ग      
मीरोस्टोमेटाएरेक्निडापिक्नोगोनिडाइन्सेक्टाचीलोपोडापॉरोपोडासिम्फाइला
उदा. लिम्यूलसउदा. बिच्छू, मकड़ीउदा. निम्फानउदा. कॉकरोच, मक्खी, मच्छर, टिड्डीउदा. सेन्टीपीडउदा. पॉरोपसउदा. स्कूटीजेरेला
क्रस्टेशियाडिप्लोपोडा     
उदा. क्रे फिश, केकड़ा, झींगा (पैलीमोन)उदा. मिलीपीड     

1. उपसंघ- ट्राइलोबाइटा (Sub-phylum- Trilobata)
यह उपसंघ के सभी जन्तु पहले समुद्री तल में पाए जाते थे और अब पूरी तरह से गायब हो चुके हैं।

  • इनमें सिर स्पष्ट नहीं होता है, और उदर भाग 2 से 29 खंडों में बंटा होता है। पश्च सिर पर एक जुड़ी हुई पूंछ प्लेट या पायजीडियम पाया जाता है।
  • इसके शरीर में दो लंबी खांचें होती हैं, जिससे शरीर तीन भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है।
  • 10 से 675 मि.मी. लंबा शरीर एक कठोर, खंडित कवच से ढका रहता है।
  • उदाहरण: ट्राइआर्थस (जीवाश्म), डेलमेनिटिस (Dalmanites), एग्नोस्टस (Agnosteus)।

2. उपसंघ- कैलिसैरेटा (Sub-phylum Chelicerata)

  • इस उपसंघ के सदस्यों का शरीर सिर, वक्ष और उदर भागों में बंटा होता है। सिर और वक्ष भाग आपस में मिलकर शिरोवक्ष या प्रोसोमा बनाते हैं।
  • शिरोवक्ष पर आँखें, एक जोड़ी पंजेदार चेलीसेरी, एक जोड़ी पेडीपेल्स और चार जोड़ी चलने वाले पैर पाए जाते हैं।
  • ऐन्टिनी या श्रृंगिकाओं का अभाव होता है।
  • श्वसन क्लोम, ट्रेकिया या बुक-लंग्स द्वारा होता है।
  • उत्सर्जन मैल्पीघी नलिकाओं या कॉक्सल ग्रंथियों द्वारा होता है।
  • जन्तु एकलिंगी होते हैं। विकास या तो सीधा होता है या लार्वा अवस्था के साथ अप्रत्यक्ष होता है।

इस उपसंघ को श्वसन अंगों के आधार पर तीन वर्गों में बांटा गया है:

1. वर्ग- मीरोस्टोमेटा (Class Merostomata)-
इस वर्ग के जन्तु पानी में रहने वाले होते हैं। श्वसन गिल्स द्वारा होता है। सुविकसित संयुक्त नेत्र पाए जाते हैं।
उदाहरण: लिमुलस (Limulus) या किंग क्रेब (King Crab)। इस वर्ग का केवल एक ही सदस्य जीवित है, बाकी सब लुप्त हो चुके हैं।

2. वर्ग- एरेक्निडा (Class Arachnida)-
ज्यादातर स्थलीय होते हैं, श्वसन बुक-लंग्स या ट्रैकिया द्वारा होता है। कई में जहर ग्रंथियां और जहरीले फैंग्स होते हैं, और जबड़े में डंक पाया जाता है।
उदाहरण: पेलेग्म्निअस (Palannnaeus)- बिच्छु (Scorpion) जो सीधे बच्चे पैदा करते हैं। लाइकोसा

3. उपसंघ- मैडिबुलेटो (Sub-phylum- Mandibulata)-

  1. इनका शरीर तीन हिस्सों में बंटा होता है: सिर, वक्ष और उदर।
  2. सिर के उपांगों में एक या दो जोड़ी अंगिकाएं, एक जोड़ी जबड़े या मेन्डिबल और दो जोड़ी मैक्सिला होती है।
  3. श्वसन ट्रेकिया या क्लोम (गिल्स) द्वारा होता है।
  4. हरे रंग की ग्रंथियां या मैलपीजियन नलिकाओं द्वारा उत्सर्जन होता है।
  5. ये एकलिंगी होते हैं, और जीवनचक्र में लार्वा अवस्था आमतौर पर होती है।

इस उपसंघ को छह वर्गों में बांटा गया है-

  • वर्ग-क्रस्टेशिया (Class- Crustacea)-
    इस वर्ग में ज़्यादातर सदस्य जलीय होते हैं। शरीर एक कठोर, मोटे सुरक्षात्मक काइटिन से बने क्यूटिकल से ढका होता है। इनके उपांग दो शाखाओं वाले होते हैं।

    उदाहरण: साइक्लोपस (cyclops) जिसे "सौ पत्नियों का पति" कहते हैं, यूपेगुरस (Eupagurus) जिसे साधु केकड़ा (Hermit crab) कहते हैं, सेक्यूलीना (Saculina) जो केकड़े का परजीवी है, पैलिमोन (palemon) या झींगा मछली, डेफनिया (Daphnia) जो जलीय पिस्सू है, केन्सर (Cancer) या केकड़ा (Crab), पैलिनुरस (Palinurus) या लोबस्टर।

  • वर्ग- डिप्लोपोडा (Class- Diplopada)-
    इस वर्ग के सदस्य पानी में रहने वाले होते हैं। इनका शरीर लंबा और बेलनाकार होता है। इनमें कोई जहरीले नाखून नहीं होते।

    उदाहरण: जूलस (Julus) जिसे मिलीपीड या सहस्त्रपाद कहते हैं, ग्लोमेरिस, स्पाईरोबोल्स (Spirobolus), प्लेटीडेस्मस (Platydesmus)।

  • वर्ग- चीलोपोडा (Class Chilopoda)-
    इनका शरीर ऊपर से उभरा हुआ और नीचे से चपटा होता है। शरीर दो भागों में बंटा होता है- सिर और धड़।

    उदाहरण: स्कोलोपेन्ड्रा (Scolopendra) जिसे शतपादी (Centipede) कहते हैं, जिओफिलिस (Geophilus), लिथोवियस (Lithobius)।

  • वर्ग- इन्सेक्टा (Class- insecta)-
    इस वर्ग के सदस्य (कीट) सभी तरह के वातावरण में पाए जाते हैं। लार ग्रंथियां मौजूद होती हैं, और इनमें तीन जोड़ी टांगें होती हैं।

  • सभी सदस्य जमीन के अंदर रहते हैं। आँखें नहीं होती हैं। शरीर 6 मिमी लंबा होता है।
    उदाहरण: स्क्यू टीजेरेला (Scutigerella)
  • वर्ग- पाँरोपोडा (Class- Pauropoda)-
    इस वर्ग के सभी सदस्य जमीन पर रहने वाले होते हैं। इनके सदस्य नली जैसे और कीड़े के समान होते हैं। शरीर में 12 खंड पाए जाते हैं।

    उदाहरण: पाँरोपस (pauropus)।

4. उप संघ पेन्टोस्टोमिडा (Pentostomida)-

  • इस उपसंघ के सदस्य स्तनधारियों के ट्रेकिया (श्वासनली) में अंदरूनी परजीवी (Endoparasite) के रूप में पाए जाते हैं।
  • इनका शरीर कीड़े जैसा, कोमल और बिना खंडों वाला होता है।
  • इनमें श्रृंगिकाओं (एंटीना) और चलने वाले अंगों की कमी होती है।
  • उदाहरण: लिन्गुएटुला (Linguaula) जो एक अंदरूनी परजीवी है।

5. उपसंघ- टारडीग्रेडा (Tardigrada)-

  • इस संघ के सदस्यों की लंबाई 1 मि.मी. होती है।
  • जन्तुओं का शरीर खंडहीन और नली जैसा होता है।
  • ये एकलिंगी होते हैं और चार जोड़ी चलने वाले पैर पाए जाते हैं।
  • इस उप संघ के सदस्यों को जल भालू (water bear) भी कहा जाता है।
  • उदाहरण: ऐकाईनिस्कस (Echiniscus) जो एक जल भालू है।

6. उपसंघ- ओनाइकोफोरा (Onychophora)-

  • इस उपसंघ के सदस्य स्थलीय होते हैं, कीड़े के समान और पतले होते हैं।
  • इनका शरीर खंडहीन और कैटरपिलर लार्वा के समान होता है।
  • श्वसन ट्रेकिया (Trachea) और उत्सर्जन नेफ्रीडिया (nephridia) द्वारा होता है।
  • शरीर पर 14 से 44 बिना जोड़ वाले पैर पाए जाते हैं।
  • इनके सदस्यों में सिर स्पष्ट नहीं होता है, लेकिन श्रृंगिकाएं और पेल्प पाए जाते हैं।

संघ आर्थोपोडा का आर्थिक महत्व-

(क) लाभकारी महत्व-
आर्थोपोडा संघ के जन्तु आर्थिक दृष्टि से बहुत फायदेमंद होते हैं। व्यापारिक स्तर पर इस संघ के कीटों का पालन किया जाता है, जैसे:

  • लाख उत्पादन-
    लाख का कीट टेकार्डिया लैका एक छोटा रेंगने वाला कीट है। यह दुश्मनों से बचने और अंडे देने के लिए मोटी पपड़ी के रूप में लाख का सुरक्षात्मक आवरण बनाता है। व्यावसायिक लाख मादा कीट बनाती है। लाख का उपयोग गहनों, पॉलिश, पेंट, वार्निश, फोटोग्राफी के सामान और विस्फोटक सामग्री बनाने में होता है। यह कई उद्योगों के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है।

  • रेशम उत्पादन-
    रेशम बनाने के लिए रेशम कीट के कोया (Cocoon) को गर्म पानी में उबाला जाता है, जिससे कोया के अंदर का जीव मर जाता है। इसके बाद कोया के धागों को निकाला जाता है। एक कोकून से लगभग 300 मीटर लंबा धागा प्राप्त होता है। रेशम इन प्रजातियों से मिलता है:

    1. बॉम्बिक्स मोराई-शहतूत का रेशम कीट।
    2. ऐन्थेरिया पैफिया-टसर रेशम कीट।
    3. एन्थेरिया असामा-मूंगा रेशम कीट।
    4. एकेटस रिसिनी-एरीकेशन कीट।

    रेशम कीट पालन को सैरीकल्चर (Sericulture) कहते हैं। रेशम के धागों से कपड़े, पैराशूट, साड़ियां, शाल और सजावटी फैब्रिक्स तैयार किए जाते हैं। रेशम दुनिया भर में एक मूल्यवान और सुंदर कपड़ा है।

  • झींगा मछली उद्योग-
    भारत के दक्षिणी भाग में झींगा मछली खाने के काम आती है। झींगा की प्रजातियां-पीनस इंडिकस, पीनस मोनोडास, मेटोपीनस, एफिनिस को व्यापारिक स्तर पर पाला जाता है और निर्यात किया जाता है। झींगा एक महत्वपूर्ण समुद्री भोजन स्रोत है जो कई देशों में पसंद किया जाता है।

  • पुष्पों का परागण-
    कई प्रकार के कीट, जैसे तितली और मधुमक्खियां फूलों में परागण करती हैं। यह परागण पौधों के प्रजनन के लिए बहुत जरूरी है।

  • खाने वाले कीट-
    पक्षी और मछलियां कीटों को खाती हैं। मनुष्य इन पक्षियों और मछलियों को खाकर अप्रत्यक्ष रूप से इन कीटों को भोजन के रूप में खाता है। कीट खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

  • हानिकारक कीटों को नष्ट करना-
    आर्थोपोडा संघ के कुछ कीट हानिकारक कीटों को खाकर मानव को फायदा पहुंचाते हैं। जैसे ड्रैगन फ्लाई हानिकारक मच्छरों को खाकर नष्ट करती है। इक्यूमान मक्खी खेती के लिए हानिकारक कीटों के लार्वा और प्यूपा पर अंडे देकर उन्हें नष्ट कर देती है। यह प्राकृतिक कीट नियंत्रण का एक उदाहरण है।

  • औषधि निर्माण-
    फलोला गुबरैला कीट के रक्त से केन्थराइडिन औषधि बनाई जाती है। लाही या कीकीनियल बग लाल रंग के कीटों को पीसकर लाल रंग की लाही बनाई जाती है, जो खांसी के इलाज और दवाओं को रंगने के काम आती है। महिलाएं इसे पैरों पर महावर लगाने के काम में लाती हैं। यह दिखाता है कि कीटों का उपयोग कई तरह से किया जा सकता है।

(ख) हानिकारक महत्व-
आर्थोपोडा संघ के अनेक जन्तु हमारे लिए फायदेमंद हैं, वहीं कुछ जन्तु हानिकारक भी हैं, जैसे:

  • मनुष्य में रोगवाहक दृष्टि से-
    आर्थोपोडा संघ के कीट रोगों का संक्रमण एक जन्तु से दूसरे जन्तु में फैलाते हैं, जिससे शारीरिक रोग होते हैं।

    जैसे:

    • 6. लेक्ट्रलेरियस (खटमल)- ज्वर, टाइफाइड, तपेदिक।
    • 7. पैडीकुलस ह्युमनस कैपीटस (मानव जू)- बेचैनी और खुजली, टाइफस ज्वर।
    • 8. जेनोप्सिला कीओपिस (पिस्सू)- खुजली और बेचैनी।
    • 9. सी.सी. मक्खी - निद्रा रोग उत्पन्न करती है।
  • भोज्य पदार्थों को नष्ट करने वाले-
    जैसे:

    1. साइटोफिलस ओराइजी (चावल का घुन)
    2. ट्रेगोडर्मा ग्रेनेरियम (गेहूं का घुन और खसरा, बीटल)
    3. ट्राइबोलियम कनफ्यूजम (आटे का लाल बीटल)
    4. साइरोट्रोगा सिरिएलेला (एंगोथोइस अनोज शलभ)
    5. प्लोडिया इन्टरपक्टेला (भारतीय भोजन शलज)
  • घरेलू सामग्रीनाशक कीट-
    जैसे:

    1. माइकोटर्मिस ओवेसी दीमक (सफेद चींटी),
    2. मोनोमोरियम इण्डिकम (सफेद चींटी),
    3. लाइपोस्सेलिस ट्रान्सवेलेन्सीस (पुस्तक जू)- पुस्तकों को नष्ट करने वाला कीट,
    4. लेपिस्मा सेकेराइना (रतने मीन-सिल्वर फिश)- पुरानी पुस्तकों और कपड़ों को हानि पहुंचाने वाला कीट।

 

प्रश्न 3. निमेटल्मिन्थीज संघ के लक्षण स्पष्ट करते हुए इसके वर्गों के नाम सहित लिखिये। इसकी आर्थिक महत्ता को समझाइये।
Answer: इस संघ के सदस्य दोनों तरफ से सममित (द्विपाश्र्वीय), तीन परतों वाले (त्रिस्तरीय), और एक नकली शरीर गुहा (आभासी देहगुहा) वाले होते हैं। ये धागे या सूत्र के आकार के होते हैं, इसलिए इन्हें सूत्र कृमि या गोल कृमि कहते हैं। कृमियों के अध्ययन को हैल्मिन्थोलोजी या कृमि विज्ञान कहते हैं। ज्यादातर सदस्य एकलिंगी होते हैं और इनमें लैंगिक द्विरूपता पाई जाती है, जहाँ नर और मादा अलग दिखते हैं। रूडोल्फी (1981) ने इस समूह के जन्तुओं को निर्मेटाइडिया (Nematodidea) के तहत रखा। ग्रोपन (Groppen) ने इसे एस्केल्मिन्थीज (Aschelminthes) नाम दिया। हालांकि, गेगेन बार (Gegenbaur) के अनुसार, हम आज इस संघ को निमेटहेल्मिन्थीज (Nemathelminthes) के नाम से जानते हैं। इस संघ की अब तक 12000 प्रजातियां ज्ञात हैं। ये सभी वातावरणों में पाए जाते हैं और कई तरह के जीवन चक्र प्रदर्शित करते हैं।

मुख्य लक्षण (Main Characteristics)-

  • इनका शरीर गोल कृमि (round worm) जैसा होता है।
  • शरीर की दीवार स्केलेरोप्रोटीन के एक विशेष क्यूटिकल और एक बहुकेन्द्रिकित या कोशिकीय अधिचर्म (Epidermis) से बनी होती है।
  • आहारनाल पूरी होती है। इसमें मुंह और गुदा दोनों होते हैं। आहारनाल में मुखगुहा, पेशीय ग्रसनी, आंत और मलाशय होते हैं। इनमें हुक, शूकिका (stylets) और दांत भी पाए जाते हैं।
  • संघ के सदस्यों में एक नकली शरीर गुहा (Pseudocoelom) पाई जाती है, जो मीसोडर्म से ढकी नहीं होती है।
  • श्वसन तंत्र और परिसंचरण तंत्र नहीं पाया जाता है।
  • उत्सर्जन तंत्र उत्सर्जी नालों (Excretory canals) या प्रोटोनेफ्रिटिया (Protonephridia) से बना होता है। उत्सर्जी नाल शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को उत्सर्जन छिद्र से बाहर निकालती है। उत्सर्जन शरीर के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है।
  • तंत्रिका तंत्र में एक तंत्रिका वलय पाया जाता है। तंत्रिका वलय से आगे और पीछे तंत्रिकाएं पाई जाती हैं।
  • इसमें सदस्य एकलिंगी (Unisexual) होते हैं। इसमें नर और मादा प्राणी अलग-अलग होते हैं। इसमें लैंगिक द्विरूपता (Sexual dimorphism) पाई जाती है। नर छोटे होते हैं और मादा बड़ी होती हैं।
  • जीवन-चक्र सीधा (direct) या अप्रत्यक्ष (indirect) प्रकार का होता है। जीवन-चक्र जटिल होता है।

इस संघ को संवेदी अंग या फैस्मिड (Phasmidia) के आधार पर दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।
In simple words: निमेटल्मिन्थीज संघ के जीवों का शरीर धागे जैसा होता है, और इनमें एक नकली शरीर गुहा होती है। इनकी खाल मोटी होती है, और इनमें मुंह से गुदा तक एक पूरी पाचन नली होती है। ये अलग-अलग लिंगों के होते हैं। ये फायदेमंद और नुकसानदायक दोनों हो सकते हैं, जैसे कि पेट के कीड़े।

🎯 Exam Tip: निमेटल्मिन्थीज के प्रमुख लक्षणों में धागेनुमा शरीर, आभासी देहगुहा, और लैंगिक द्विरूपता को हाइलाइट करना महत्वपूर्ण है। उदाहरणों के साथ आर्थिक महत्व को स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 4. प्रोटोजोआ संघ को गमन के आधार पर वर्गीकृत करते हुए इस संघ के आर्थिक महत्व को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये।
Answer: प्रोटोजोआ (Gr., protos = first = प्रथम, zoon = animal = जन्तु) वे पहले और सबसे पुराने जन्तु हैं जिनका शारीरिक संगठन केवल जीवद्रव्य (protoplasmic) प्रकार का होता है। ये सबसे सरल, सूक्ष्मदर्शीय और एककोशिकीय (unicellular) होते हैं। इनका एककोशिकीय शरीर, बहुकोशिकीय जन्तुओं की तरह सभी जैविक क्रियाएं करता है, इसलिए डोबेल (Dobell) ने इन्हें अकोशिकीय (acellular or non-cellular) कहना अधिक उचित समझा। विश्व में इनकी 15000 प्रजातियां पाई जाती हैं। डच वैज्ञानिक ल्युवेनहॉक (Leeuwenhock) ने 1964 में सबसे पहले अपने सूक्ष्मदर्शी (microscope) से वर्षा के रुके पानी में प्रोटोजोआ जन्तुओं का अध्ययन किया। ल्युवेनहॉक ने इन्हें 'Wretched little beasties' कहा, और बाद में इन्हें जन्तुक (animalcules) शब्द से संबोधित किया। प्रोटोजोआ छोटे और सरल जीव हैं, जो जीवन के सभी बुनियादी कार्यों को एक ही कोशिका में पूरा करते हैं।

  • ल्यूकाटे (Leukart) ने स्पोरोजोआ (Sporozoa) समूह बनाया था।
  • गोल्डफलस (Glodfus) ने 1817 में सबसे पहले प्रोटोजोआ (Protozoa) शब्द दिया था।
  • इजान (Dujardin) ने 1841 में कवच वाले प्रोटोजोआ के लिए राइजोपोडा (Rhizopoda) शब्द दिया था।
  • पेर्टी (Perty) ने सीलिएटा (Ciliata) नाम दिया था।

मुख्य लक्षण (Important characters)-

  1. इस संघ के सदस्य छोटे, ज़्यादातर सूक्ष्मदर्शीय (Microscopic) होते हैं। इन्हें आमतौर पर सूक्ष्मदर्शी (microscope) की मदद से देखा जाता है।
  2. ये पानी में स्वतंत्र रूप से रहने वाले (free living) या पौधों और जन्तुओं में परजीवी (parasites) होते हैं।
  3. ये जन्तुओं में सबसे सरल (Simplest) और सबसे आदिम (primitive) होते हैं।
  4. इनका शारीरिक संगठन जीवद्रव्यी (protoplasmic) प्रकार का होता है।
  5. इनका आकार अलग-अलग तरह का होता है, जैसे अनियमित (irregular), लंबा (elongated), गोल (spherical) आदि।
  6. ये अकेले (solitary) रहते हैं या ऐसे ढीले समूह (colony) बनाते हैं जिनमें सभी जन्तुक एक जैसे और स्वतंत्र होते हैं।
  7. इनका शरीर असममितीय (asymmetrical), द्विपाश्र्वीय (bilaterally symmetrical) या अरीय सममित (radial symmetrical) होता है।
  8. ज़्यादातर जन्तुओं का शरीर नग्न (naked) होता है, कुछ सदस्यों के ऊपर बाहरी कंकाल (exoskeleton) के रूप में पेलिकल (pellicle), चोल (test) या कवच (Shell) पाया जाता है।
  9. शरीर एक कोशिकीय होता है जिसमें एक या ज़्यादा केंद्रक (nuclei monomorphic) होते हैं जो एक आकारी या द्विआकारी (dimorphic) होते हैं।
  10. पोषण (nutrition) कई तरह का होता है, जैसे प्राणि-समपोषी (holozoic), पादप-समभोजी (holophylic), मृतोपजीवी (Saprozoic) या परजीवी (parasitic)। इनमें कोशिका मुख (cytostome) और कोशिका गुदा (cytopyge) हो सकती है या नहीं भी। पाचन क्रिया खाद्यधानियों (food-vacuoles) के अंदर कोशिका के भीतर (intra cellular) होती है।
  11. गैसीय-विनिमय शरीर की सामान्य सतह से विसरण (diffusion) द्वारा होता है।
  12. उत्सर्जन क्रिया संकुचनशील धानियों (Contractile Vacuoles) द्वारा या सामान्य सतह से होती है। ये अमोनोटेलिक (ammonotelic) होते हैं।
  13. मीठे पानी में पाए जाने वाले जन्तुओं में जल विनियमन (osmoregulation) के लिए संकुचनशील धानियां (contractive vacuoles) पाई जाती हैं, जैसे अमीबा और पैरामिशियम में।
  14. जननक्रिया (reproduction) अलैंगिक (asexual) या लैंगिक (sexual) प्रकार का होता है। अलैंगिक जनन: द्वि-विखण्डन (binary fission) या बहु-विखण्डन (multiple fission) और मुकुलन (budding) द्वारा। लैंगिक जनन: वयस्कों में संयुग्मन (conjugation) या युग्मकों के संयोजन (fusion) द्वारा।
  15. परिकोष्ठन या पुटिभवन (encystment) की ज़्यादा क्षमता पाई जाती है।
  16. इनमें पुनरुदभवन (regeneration) की क्षमता भी पाई जाती है।
  17. जीवन चक्र (life cycle) ज़्यादातर जन्तुओं में सरल होता है। कुछ जन्तुओं में अलैंगिक और लैंगिक पीढ़ियों का एकान्तरण (alternation of generation) होता है।
  18. इनमें प्राकृतिक मृत्यु (natural death) नहीं होती है, क्योंकि सिर्फ एक कोशिकीय जन्तुक में कायिक प्रद्रव्य (solatoplasm) और जननिक प्रद्रव्य (germplasm) में अंतर नहीं होता है। अतः इन्हें अमर (immortal) मानते हैं।

प्रोटोजोआ का वर्गीकरण (Classification of Protozoa)-
प्रोटोजोआ संघ को प्रचलन अंगों (ganelles) और केन्द्रकों (nuclei) के आधार पर चार वर्गों में बांटा गया है:

1. वर्ग- फ्लैजीलेटा/ मैस्टीगोफोरा (Class Flagellata/ mastigophora)-
इस वर्ग के जन्तुओं में चलने के लिए एक या ज़्यादा कशाभिका (Flagella) होती हैं, जो भोजन ग्रहण करने में भी मदद करती हैं।

उदाहरण: लीशमानिया डोनोवनी (Leishmania donavani)- इस परजीवी से मनुष्य में काला-अजार (Kala-azar) रोग होता है। ट्रिपेनोसोमा गैम्बिएन्स (Trypanosoma gambiense)- इससे मनुष्य में अफ्रीकी निद्रा रोग (African sleeping sickness) होता है। ट्राइकोमोनास वैजिनेलिस (Trichomonas vaginalis)- यह औरतों की योनि (vagina) का परजीवी है। इससे श्वेत-पानी रोग (vaginilis = leucorrhoea) हो जाता है। ये सभी रोगजनक मानव स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं।
युग्लीन (euglena)- यह पौधों और जन्तुओं के बीच संयोजक कड़ी (connecting & links) है।
नोक्टीलुका (Noctiluca)- ल्यूसीफेरीन प्रोटीन के कारण चमकती है (Bioluminescence)। यह रात के समय समुद्र की सतह पर प्रकाश उत्पन्न करती है, जिससे समुद्र जलता हुआ दिखाई देता है।

2. वर्ग-सारकोडिना या राइजोपोडा (Class Sarcodina Rhizopoda)-
इस वर्ग के प्राणियों में चलने के लिए कूदपाद (pseudopodia) होते हैं।

उदाहरण: अमीबा (Amoeba), एण्ट अमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba histolytica), पीलोमिक्सा (Pelomixa), पोलिस्टोमेला (Polystomela), ई. कोलाई (E.Coli)।

3. वर्ग-सिलियेटा (Class Ciliata)-
इस वर्ग के जन्तुओं में चलने के लिए पक्ष्माभ (Cilia) पाए जाते हैं। ये पूरे जीवनकाल में मौजूद होते हैं।

उदाहरण: बैलेटीडियम (Balantidium)- यह मेंढक और मनुष्य के मलाशय में पाए जाते हैं। पैरामीशियम (Paramecium) इसे स्लीपर जन्तुक (Sleeper animalcule) कहा जाता है। स्पाइरोस्टोमम (Spirostomum)- यह सबसे बड़ा जीवित सिलिएट है। इसकी लंबाई 4 मिमी होती है। वॉर्टीसेला (Vorticella)- इसे घंटी जन्तुक (bell animalcule) कहते हैं। डिडीनियम (Didenium)- इसे जलीय भालू (water bear) के नाम से जाना जाता है। न्यूमलाईटस (Neunnulaites)- जीवाश्म रूप में सबसे बड़ा प्रोटोजोआ का सदस्य है।

प्रोटोजोआ के आर्थिक महत्व (Economic Importants)-
संघ प्रोटोजोआ के जन्तु अकोशिकीय और सूक्ष्मदर्शीय होते हैं तथा विश्व के हर प्रकार के स्थानों में रहते हैं। इतने छोटे होने के बाद भी इस संघ के सदस्यों के अनेक आर्थिक महत्व हैं, जो दोनों तरह से लाभदायक और हानिकारक हैं।

।. लाभदायक महत्व

  • जल का स्वच्छीकरण (Water purification)-
    प्रोटोजोआ जल को स्वच्छ और पीने योग्य बनाने में मदद करते हैं। कई प्राणीसमभोजी (Holozoic) प्रोटोजोआ ऐसे भी होते हैं जो हानिकारक और जलाशयों में सड़े हुए जीवाणुओं को खाते हैं। इस तरह ये अप्रत्यक्ष रूप से जल को शुद्ध करने में मदद करते हैं। इस तरह ये लगातार जल को साफ करके पीने योग्य बनाते हैं। ये सूक्ष्म जीव जल-पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

  • प्रयोगशालाओं में अध्ययन (Research in lab)-
    संघ प्रोटोजोआ के सदस्य (जन्तु) एककोशिकीय होते हैं और बहुकोशिकीय जन्तुओं की तरह सभी जैविक क्रियाएं करते हैं। अतः प्रयोगशालाओं में इनका अध्ययन किया जाता है। ये आकार में बहुत छोटे होते हैं और इनमें जनन तेजी से होता है। अतः आनुवंशिकता और विभिन्नताओं के अध्ययन में इनका उपयोग किया जाता है। भूगर्भ और जीवाश्म विज्ञान के अध्ययन में भी इनके जीवाश्मों का ज्ञान बहुत ज़रूरी है, क्योंकि आज पृथ्वी पर मौजूद सभी बहुकोशिकीय प्राणियों की उत्पत्ति इन्हीं जन्तुओं से हुई है। प्रोटोजोआ का अध्ययन जीवन के विकास को समझने में महत्वपूर्ण है।

  • स्वास्थ्य रक्षा (Sanitation)-
    कुछ प्रोटोजोआ गंदे पानी या मल-जल (sewage) में रहते हैं, जहां वे मल का विघटन करके उससे पोषण प्राप्त करते हैं और साथ ही मल से जुड़े बैक्टीरिया आदि को भी खाते हैं। जिसके परिणामस्वरूप मल-जल सड़ता नहीं है और भयानक बीमारियों का बचाव होता है। ये पर्यावरण को साफ रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • भवन निर्माण (Construction)-
    समुद्री कंकाल वाले जीवाश्म प्रोटोजोआ (Fossil protozoa) का कंकाल समुद्र के तल या उसके पास धरती पर बड़ी-बड़ी चट्टानों के रूप में मिलता है जिसे लाइम स्टोन (Limestone) कहते हैं। इसे विश्व भर में भवन निर्माण के पत्थरों के रूप में उपयोग किया जाता है। ये चट्टानें लाखों वर्षों में बनती हैं और प्राचीन समुद्री जीवन का रिकॉर्ड रखती हैं।

II. हानिकारक महत्व

परजीवी रोगकारक जन्तु का नामपरपोषी में संक्रमित स्थानरोग का नामपरजीविता का प्रकार
1. एन्टअमीबा जिंजीवालिसमसूड़ेदाँतों की जड़ों व मसूड़ों व ग्लसुओं की पस थैलियाँ तथा पायरिया रोगएक पोषकीय परजीवी
4. ट्राइकोमोनैस होमिनिसबड़ी आँतदस्त व अमीबॉयसिसएक पोषकीय परजीवी
5. जिआर्डिया लैम्बलियाआँत के अगले भाग मेंदस्त, सिरदर्द, पीलियाएक पोषकीय परजीवी
6. लीशमैनियारुधिर, यकृत, प्लीहा, आर.बी.सी., अस्थिमज्जाएवं त्वचा रोग उत्पन्नद्विपोषकीय एवं सेन्ड फ्लाई (Sandfly) वाहक परपोषी
7. ट्रिपैनोसोमरुधिर, सेरीब्रा-स्पाइनल हृदय पेशियों, केन्द्रीय तंत्रिका तंत्रनिद्रारोग, चागास रोगद्विपरपोषी, सी-सी मक्खी या खटमल वाहक परपोषी
8. प्लाज्मोडियम वाईवैक्सलाल रुधिर कणिका व यकृततृतीय मलेरिया तीसरे दिन ज्वर होता हैद्विपरपोषी, मच्छर वाहक परपोषी
9. प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरमलाल रुधिर कणिका व यकृतदुर्दम मलेरिया दूसरे दिन ज्वर आता हैद्विपरपोषी, मच्छर वाहक परपोषी

अतः प्रोटोजोआ संघ के सदस्यों के कई आर्थिक महत्व हैं जो दोनों तरह से लाभदायक और हानिकारक हैं। परन्तु शायद लाभदायक महत्वों की तुलना में हानिकारक महत्व अधिक हैं। यह संतुलन जीवों और पर्यावरण दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: प्रोटोजोआ बहुत छोटे जीव हैं जो पानी साफ करने, शोध में मदद करते हैं और भवन निर्माण में भी उपयोगी हैं। लेकिन ये कई बीमारियां भी फैलाते हैं, जैसे पायरिया और मलेरिया, और भोजन को नुकसान पहुंचाते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रोटोजोआ के लाभकारी और हानिकारक दोनों पहलुओं को स्पष्ट रूप से उदाहरणों के साथ समझाएं, खासकर रोगों के नाम और उनके वाहक।

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