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Detailed Chapter 23 पादप वर्गिकी RBSE Solutions for Class 11 Biology
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Class 11 Biology Chapter 23 पादप वर्गिकी RBSE Solutions PDF
RBSE Class 11 Biology Chapter 23 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
RBSE Class 11 Biology Chapter 23 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1. पादप वर्गीकरण की आधारभूत इकाई है -
(अ) आंतरजातीय वर्ग
(ब) जाति
(स) वंश
(द) कुल
Answer: (ब) जाति
In simple words: पौधों को अलग-अलग समूहों में बांटने के लिए सबसे छोटा और सबसे मुख्य समूह 'जाति' कहलाता है।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण की पदानुक्रम को याद रखें, जिसमें जाति सबसे निचली इकाई होती है।
प्रश्न 2. टैक्सोनॉमी का 'जनक' किसे माना जाता है –
(अ) तख्ताजन
(ब) लिनियस
(स) बैन्थम
(द) हुकर
Answer: (ब) लिनियस
In simple words: टैक्सोनॉमी के नियम बनाने और इसे शुरू करने का श्रेय कैरोलस लिनियस को दिया जाता है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों के जनकों के नाम और उनके योगदान को याद रखना महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 4. पौधों का प्राकृतिक वर्गीकरण दिया है –
(अ) हचिन्सन ने
(ब) एंग्लर एवं प्राण्टल ने
(स) बैन्थम एवं हुकर ने
(द) जॉन रे ने
Answer: (स) बैन्थम एवं हुकर ने
In simple words: पौधों को उनके प्राकृतिक गुणों के आधार पर बांटने का तरीका बैन्थम और हुकर ने दिया था।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण की विभिन्न पद्धतियों और उन्हें देने वाले वैज्ञानिकों के नाम याद रखें।
प्रश्न 5. निम्न में से कौनसा वानस्पतिक नाम सही छपा है -
(अ) Pisum Sativum
(a) Pisum sativum
(स) Pisum sativum
(द) pisum Sativum
Answer: (स) Pisum sativum
In simple words: सही वैज्ञानिक नाम में वंश का पहला अक्षर बड़ा और जाति का पहला अक्षर छोटा होता है, और नाम तिरछे लिखे जाते हैं।
🎯 Exam Tip: वानस्पतिक नामकरण के नियमों का ध्यान रखें, खासकर बड़े और छोटे अक्षरों के प्रयोग और इटैलिक लिखने के तरीके पर।
RBSE Class 11 Biology Chapter 23 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. जातिवृत्त किसे कहते हैं?
Answer: किसी भी प्रजाति की उत्पत्ति से लेकर अब तक के उसके विकास के सफर को जातिवृत्त (Phylogeny) कहा जाता है। इसमें प्रजाति के सभी बदलाव शामिल होते हैं.
In simple words: किसी भी प्रजाति के बनने से लेकर अभी तक के उसके पूरे विकास को जातिवृत्त कहते हैं।
🎯 Exam Tip: 'जातिवृत्त' और 'विकास' के बीच संबंध को समझें और इसे सरल शब्दों में परिभाषित करें।
प्रश्न 2. लिनियस द्वारा कौनसी पुस्तक में द्विपद नाम पद्धति का सर्वप्रथम उपयोग किया गया?
Answer: द्विपद नाम पद्धति का सर्वप्रथम उपयोग कैरोलस लिनियस ने अपनी पुस्तक 'स्पीशीज प्लैन्टैरम' (Species Plantarum) में किया था, जैसा कि दस्तावेज़ में आगे बताया गया है। हालांकि, 'अन्तर्राष्ट्रीय वानस्पतिक नामकरण संहिता' (International Code of Botanical Nomenclature) वह नियम-संग्रह है जिसके तहत पौधों के नामकरण के नियम निर्धारित किए गए हैं.
In simple words: लिनियस ने अपनी किताब 'स्पीशीज प्लैन्टैरम' में द्विपद नाम पद्धति का सबसे पहले इस्तेमाल किया था, जो पौधों को नाम देने का एक खास तरीका है।
🎯 Exam Tip: लिनियस के योगदान और वानस्पतिक नामकरण के अंतर्राष्ट्रीय नियमों को याद रखें, जिसमें उनकी प्रमुख पुस्तक का नाम शामिल है।
प्रश्न 4. वर्गिकी या वर्गीकरण विज्ञान की परिभाषा दीजिये?
Answer: वर्गिकी (Taxonomy) वनस्पति विज्ञान की एक शाखा है। इस शाखा के अंतर्गत पौधों की पहचान करना, उनका नामकरण करना और उन्हें अलग-अलग समूहों में बांटना सीखा जाता है।
In simple words: वर्गिकी विज्ञान में पौधों की पहचान की जाती है, उन्हें नाम दिए जाते हैं और उन्हें वर्गीकृत किया जाता है।
🎯 Exam Tip: वर्गिकी की परिभाषा में 'पहचान', 'नामकरण' और 'वर्गीकरण' जैसे मुख्य शब्दों को शामिल करें।
प्रश्न 5. द्विनामकरण में पादप के वानस्पतिक नाम में कौन से दो शब्द लिए जाते हैं?
Answer: द्विनामकरण पद्धति में पौधों के वानस्पतिक नाम में दो शब्द होते हैं: पहला शब्द वंश (Genus) और दूसरा शब्द जाति (Species) होता है।
In simple words: पौधों के वैज्ञानिक नाम में पहला शब्द वंश और दूसरा शब्द जाति होता है।
🎯 Exam Tip: द्विनामकरण में वंश और जाति के क्रम और उनके लेखन के नियमों को याद रखें (जैसे वंश का पहला अक्षर बड़ा)।
प्रश्न 6. अधिकांश वानस्पतिक नामों को किस भाषा में लिया गया
Answer: ज़्यादातर वानस्पतिक नामों को लैटिन भाषा में लिया गया है। लैटिन भाषा का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि यह एक स्थिर और मृत भाषा है, जिससे नाम बदलने की संभावना कम होती है।
In simple words: ज़्यादातर वैज्ञानिक पौधों के नाम लैटिन भाषा में होते हैं।
🎯 Exam Tip: लैटिन भाषा के उपयोग का कारण (स्थिरता) समझें, यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है।
प्रश्न 7. केसिया फिस्टुला (Cassia fistula) में कौन सा शब्द वंश को निरुपित करता है?
Answer: वानस्पतिक नाम केसिया फिस्टुला (Cassia fistula) में 'केसिया' शब्द वंश (Genus) को दिखाता है। जबकि 'फिस्टुला' शब्द जाति (Species) को दर्शाता है।
In simple words: 'केसिया' शब्द वंश को बताता है।
🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक नामों में वंश और जाति के शब्दों को पहचानना सीखें।
प्रश्न 8. जाति की संकल्पना के जनक कौन थे?
Answer: जाति की संकल्पना के जनक 'केरोलस लिनियस' (Carolus Linnaeus) थे। उन्होंने सबसे पहले जाति की स्पष्ट परिभाषा दी थी।
In simple words: केरोलस लिनियस को जाति की अवधारणा का जनक माना जाता है।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण विज्ञान में महत्वपूर्ण अवधारणाओं और उनके संस्थापकों के नाम याद रखें।
प्रश्न 9. भारतीय विश्वविद्यालयों एवं अधिकांश पादप संग्रहालयों में पादप पहचाने व वर्गीकरण की कौनसी पद्धति का अनुसरण किया जाता है?
Answer: भारतीय विश्वविद्यालयों और ज़्यादातर पादप संग्रहालयों में पौधों की पहचान और वर्गीकरण के लिए 'बेन्थम एवं हुकर वर्गीकरण पद्धति' का पालन किया जाता है। यह पद्धति उनके प्राकृतिक संबंधों पर आधारित है।
In simple words: भारत में पौधों के वर्गीकरण के लिए बेन्थम एवं हुकर पद्धति का उपयोग किया जाता है।
🎯 Exam Tip: प्रमुख वर्गीकरण पद्धतियों के नाम और उनके उपयोग के क्षेत्रों को याद रखें।
प्रश्न 2. प्राकृतिक तथा जातिवृत्तीय वर्गीकरण पद्धतियों को समझायें ?
Answer:
**प्राकृतिक पद्धति (Natural system):** यह पद्धति पौधों के प्राकृतिक गुणों और समानताओं पर आधारित है। इसमें पौधों के स्वभाव, उनकी बनावट, जड़, तना, पत्ती और फूल को खास महत्व दिया जाता है। डी. जूसियू, डी. कैन्डौली, जान लिण्डले, तथा बेन्थम व हूकर के वर्गीकरण इस पद्धति के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। जॉर्ज बेन्थम और जोसेफ डाल्टन हूकर ने इंग्लैण्ड के रॉयल बोटेनिकल गार्डन, क्यू में पौधों का अध्ययन किया। उन्होंने लेटिन भाषा में 'जेनेरा प्लैन्टेरम' नाम की पुस्तक के तीन खंडों में पौधों का विस्तृत वर्णन किया। यह वर्गीकरण सबसे अच्छा माना जाता है और इसे विश्वभर के वनस्पति संग्रहालयों में उपयोग किया जाता है। भारत के देहरादून, कलकत्ता और लखनऊ के हर्बेरिया भी इसी पद्धति पर आधारित हैं।
**जातिवृत्तीय पद्धति (Phylogenetic system):** यह पद्धति पौधों के विकास और जनन गुणों पर आधारित है। इसे चाल्से डार्विन के 'प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों का उद्भव' सिद्धांत से विकसित किया गया है। किसी भी जाति के उत्पत्ति के समय से लेकर वर्तमान तक के पूरे विकास को उसका जातिवृत्त कहते हैं। इस वर्गीकरण में पौधों के कुलों को उनके फूलों के विकास के अनुसार जटिलता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित किया गया है। सबसे पहले नग्न फूलों वाले पुराने कुलों को और फिर अधिक विकसित कुलों को रखा गया है। एंग्लर व प्रन्टल, हचिन्सन और क्रॉनक्विस्ट के वर्गीकरण इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
In simple words: प्राकृतिक पद्धति पौधों को उनके सामान्य गुणों पर आधारित करती है, जबकि जातिवृत्तीय पद्धति पौधों के विकासवादी इतिहास और उनके पूर्वजों से संबंधों के आधार पर उन्हें वर्गीकृत करती है।
🎯 Exam Tip: दोनों पद्धतियों के मुख्य सिद्धांत, उनके प्रमुख समर्थकों और उनके महत्व को स्पष्ट रूप से समझाएं।
प्रश्न 4. वर्गीकरण की कृत्रिम पद्धति क्या है?
Answer:
**कृत्रिम पद्धति (Artificial system):** यह वर्गीकरण केवल एक या कुछ बाहरी लक्षणों पर आधारित होता है। यह शुरुआती दौर में उपयोग की जाने वाली और थोड़ी कम जानकारी वाली पद्धति थी। थिओफ्रस्टस और केरोलस लिनियस के वर्गीकरण इसके मुख्य उदाहरण हैं। थिओफ्रस्टस को 'वनस्पति विज्ञान का जनक' कहा जाता है। उन्होंने पौधों को उनके स्वभाव के अनुसार चार समूहों - शाक (herb), उपेक्षुप (undershrub), क्षुप (shrub) और वृक्षों (trees) में बांटा था। यह वर्गीकरण उनकी पुस्तक 'हिस्टोरिया प्लैन्टैरम' में दिया गया है। लिनियस को 'वर्गिकी का जनक' कहा जाता है। उन्होंने पौधों को उनके फूलों में पुंकेसर और अण्डप की संख्या, तथा फूलों के एकलिंगी या द्विलिंगी होने के आधार पर 24 वर्गों में बांटा था। इसे 'लैंगिक पद्धति' भी कहते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक 'स्पीशीज प्लैन्टैरम' में 7,300 जातियों का वर्णन किया। थिओफ्रस्टस और लिनियस के अलावा, एण्ड्रिया सीजलपिनो, जॉन रे और केमोरेरियस के वर्गीकरण भी कृत्रिम पद्धतियों के उदाहरण हैं।
In simple words: कृत्रिम पद्धति पौधों को केवल कुछ आसान बाहरी लक्षणों जैसे रंग, आकार या फूलों की संख्या के आधार पर वर्गीकृत करती है।
🎯 Exam Tip: कृत्रिम पद्धति की सीमाएं और मुख्य उदाहरणों (लिनियस, थिओफ्रस्टस) को याद रखें।
प्रश्न 5. बेन्थम और हुकर की पद्धति के प्रमुख टेक्सा (संवर्ग स्तर तक) के लाक्षणिक गुणों को स्पष्ट कीजिये?
Answer: बेन्थम और हुकर ने बीज वाले पौधों को तीन मुख्य समूहों में बांटा है: द्विबीजपत्री (Dicotyledonae), जिम्नोस्पर्मी (Gymnospermae) या नग्नबीजी, और एकबीजपत्री (Monocotyledonae)।
**संवर्ग (Class) I: द्विबीजपत्री (Dicotyledonae):** इस समूह के पौधों में भ्रूण में दो बीज पत्र होते हैं। इनमें संवहन पूल खुले होते हैं और एक वलय (Ring) में व्यवस्थित होते हैं। पत्तियों में जाल जैसा शिराविन्यास (Reticulate Venation) होता है, और फूल में आमतौर पर पांच (Pentamerous) या चार (Tetramerous) भाग होते हैं।
**संवर्ग (Class) III: एकबीजपत्री (Monocotyledonae):** इस समूह के पौधों की पत्तियां सरल होती हैं और उनमें शिराएं समानांतर (Parallel venation) होती हैं। भ्रूण में सिर्फ एक बीज पत्र होता है। संवहन पूल बंद होते हैं और मृदूतक में बिखरे रहते हैं। फूल आमतौर पर तीन भागों वाले (Trimerous) होते हैं। इनकी जड़ें अपस्थानिक (Adventitious) होती हैं।
In simple words: बेन्थम और हुकर ने बीज वाले पौधों को द्विबीजपत्री, जिम्नोस्पर्मी और एकबीजपत्री में बांटा था, जिनके अपने खास-खास गुण होते हैं।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक संवर्ग के मुख्य गुणों, जैसे बीजपत्रों की संख्या, शिराविन्यास और फूलों के भागों को स्पष्ट रूप से बताएं।
प्रश्न 6. सिस्टेमेटिक्स (Systematics) को परिभाषित कीजिये?
Answer: सिस्टेमेटिक्स (Systematics) वर्गीकरण विज्ञान का दूसरा नाम है। इसमें पौधों की पहचान, नामकरण और वर्गीकरण के साथ-साथ उनके बीच के संबंधों और विविधताओं का भी अध्ययन किया जाता है।
In simple words: सिस्टेमेटिक्स में पौधों को पहचानते हैं, नाम देते हैं, वर्गीकृत करते हैं और उनके रिश्तों को समझते हैं।
🎯 Exam Tip: सिस्टेमेटिक्स की परिभाषा में 'पहचान', 'नामकरण', 'वर्गीकरण' और 'आपसी संबंध' जैसे मुख्य शब्दों को शामिल करें।
प्रश्न 7. प्राचीन ग्रंथ "वृक्षायुर्वेद" में आधुनिक क्रसीफेरी कुल की व्याख्या किस प्रकार की गई है?
Answer: प्राचीन ग्रंथ "वृक्षायुर्वेद" में क्रसीफेरी कुल (Cruciferae family) को 'स्वास्तिक गणमय' कहा गया है। यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि इस कुल के फूलों में चार दल (पंखुड़ियाँ) इस तरह व्यवस्थित होते हैं कि वे स्वास्तिक जैसी आकृति बनाते हैं।
In simple words: पुराने ग्रंथ "वृक्षायुर्वेद" में क्रसीफेरी कुल को 'स्वास्तिक गणमय' कहा गया है क्योंकि इसके फूलों की बनावट स्वास्तिक जैसी होती है।
🎯 Exam Tip: प्राचीन संदर्भों और उनके पीछे के कारणों को याद रखना सहायक होता है।
प्रश्न 8. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक पादप का वानस्पतिक नाम कौनसी भाषा में लिया जाता है और क्यो ?
Answer: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी पौधों के वैज्ञानिक नाम लैटिन भाषा में रखे जाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि लैटिन एक पुरानी और स्थिर भाषा है। इसके शब्द बदलते नहीं हैं, जिससे पौधों के नामकरण में भ्रम और बदलाव से बचा जा सकता है। इसलिए, वैज्ञानिक नाम लैटिन में दिए जाते हैं और उसी के अनुसार लिखे व बोले जाते हैं।
In simple words: पौधों के वैज्ञानिक नाम लैटिन भाषा में होते हैं क्योंकि यह एक स्थिर भाषा है जिससे नाम में कोई बदलाव नहीं आता।
🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक नामकरण में लैटिन भाषा के उपयोग का कारण (भाषा की स्थिरता) याद रखना महत्वपूर्ण है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 23 निबंधात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. बैन्थम और हुकर की वर्गीकरण पद्धति की वर्ग स्तर तक रूपरेखा, प्रमुख लक्षणों सहित समझाइये। इस वर्गीकरण के गुण एवं दोष को स्पष्ट कीजिये ?
Answer: बेन्थम और हुकर की वर्गीकरण पद्धति में बीज वाले पौधों को उनके शारीरिक गुणों, पत्तों की व्यवस्था, शिराओं के पैटर्न, फूलों के क्रम, बाहरी और आंतरिक पंखुड़ियों, और जननांगों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। भ्रूण में दो बीजपत्र, पत्तियों में जाल जैसा शिराविन्यास, फूल में पांच या चार भाग, और खुले संवहन पूल इस पद्धति के मुख्य लक्षण हैं। इस पद्धति में पौधों को तीन उपसंवर्गों (Subclasses) में बांटा गया है:
**1. पोलीपेटेली (Subclass Polypetaleae):** इस उपसंवर्ग में फूलों की पंखुड़ियाँ अलग-अलग चक्रों में होती हैं, और इनमें चार या पांच पंखुड़ियाँ एक-दूसरे से जुड़ी नहीं होतीं।
**2. गमोपेटेली (Subclass Gamopetaleae):** इस उपसंवर्ग में फूलों की पंखुड़ियाँ दो चक्रों में होती हैं, जिनमें बाहरी और भीतरी पंखुड़ियाँ अलग-अलग होती हैं। पंखुड़ियाँ आंशिक या पूरी तरह से जुड़ी हो सकती हैं। पुंकेसर अक्सर पंखुड़ियों से जुड़े होते हैं।
**3. मोनोक्लेमाइडी (Subclass Monochlamydeae or Incompletae):** इस उपसंवर्ग में फूल में बाहरी और भीतरी पंखुड़ियों में कोई अंतर नहीं होता, यानी अविभेदित परिदलपुंज (perianth) मौजूद होता है और फूल अधूरा होता है। यह चक्र आमतौर पर बाहरी दल के जैसा (Sepaloid) होता है।
**संवर्ग (Class) II: जिम्नोस्पर्मी (Gymnospermae):** इस वर्ग के पौधों को द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री के बीच रखा गया है। इनमें नर और मादा शंकुओं के रूप में जनन संरचनाएं होती हैं। इनके बीजांड (ovule) या बीज खुले होते हैं, यानी अंडाशय या फल में बंद नहीं होते। इस वर्ग में तीन कुल - सायकेडेसी, कोनीफेरी और नीटेसी शामिल हैं।
**संवर्ग (Class) III: एकबीजपत्री (Monocotyledonae):** इस वर्ग के पौधों की पत्तियां सरल होती हैं और समानांतर शिराविन्यास होता है। भ्रूण में एक बीजपत्र होता है, और संवहन पूल खुले नहीं होते बल्कि मृदूतक में बिखरे रहते हैं। फूल आमतौर पर तीन भागों वाले होते हैं। एकबीजपत्री पौधों को परिदलों की प्रकृति और अंडाशय की स्थिति के आधार पर सात श्रेणियों में बांटा गया है।
यह पद्धति एक तालिका के रूप में भी समझाई जा सकती है, जिसमें उपसंवर्गों और उनकी श्रेणियों को दर्शाया गया है:
**उपसंवर्ग (Subclass)**
- **पॉलीपेटेली (Polypetaleae)**
- **श्रेणी**
- थेलेमीफ्लोरी
- (i) रेनेल्स
- (ii) पेराइटेलीज
- (iii) पॉलीगेलिनी
- (iv) केरिओफिलिनी
- (v) गुटीफेरेलीज
- (vi) माल्वेलीज
- डिस्कीफ्लोरी
- (i) जिरेनियेल्स
- (ii) ओलेकेलीज
- (iii) सैलेस्ट्रेलीज
- (iv) सैपिण्डेलीज
- (v) अम्बेलीज
- कैल्सीफ्लोरी
- (i) रोजेलीज
- (ii) मिरटेलीज
- (iii) पैसीफ्लोरेलीज
- (iv) फिकोइडेलीज
- थेलेमीफ्लोरी
- **श्रेणी**
- **गैमोपेटेली (Gamopetaleae)**
- **श्रेणी**
- इन्फेरी
- (i) रूबिएलीज
- (ii) एस्टरेलीज
- (iii) कैम्पेनेलीज
- हिटरोंमेरी
- (i) ऐरीकैलीज
- (ii) प्राइम्यूलेलीज
- (iii) ऐबीनेलीज
- बाइकार्पिलेटी
- (i) जैन्शिएनेलीज
- (ii) पोलीमोनिएलीज
- (iii) परसोनेलीज
- (iv) लैमिऐलीज
- इन्फेरी
- **श्रेणी**
- **मोनोक्लैमाइडी (Monochlamydeae)**
- **श्रेणी**
- (i) माइक्रोस्पर्मी
- (ii) ऐपीगाइनी
- (iii) कोरोनेरी
- (iv) कैलीसिनी
- (v) न्यूडीफ्लोरी
- (vi) एपोकार्पी
- (vii) ग्लूमेसी
- (i) कर्वएम्ब्रीई
- (ii) मल्टीओव्यूलेट एक्वेटिसी
- (iii) मल्टीओव्यूलेट टेरिस्ट्रिस
- (iv) माइक्रोएम्ब्री
- (v) डेफ्नेलीज
- (vi) ऐकलेमाइडी
- (vii) ऑर्डिनेस एनोमेली
- **श्रेणी**
**गुण (Merits):**
यह पद्धति व्यावहारिक रूप से बहुत उपयोगी है। यह सुविधाजनक है, इसलिए विभिन्न पादप संग्रहालयों (Herbaria) में पौधों की व्यवस्था के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके मुख्य गुण इस प्रकार हैं:
1. यह वर्गीकरण प्रायोगिक रूप से ज़्यादा सुविधाजनक है। हमारे देश और इंग्लैण्ड के विश्वविद्यालयों, वनस्पति उद्यानों और संग्रहालयों में इसी वर्गीकरण का उपयोग होता है।
2. इसे आधुनिक वर्गीकरण पद्धतियों का आधार माना जा सकता है।
3. यह वर्गीकरण पूरी तरह से जातिवृत्तीय नहीं है, फिर भी इसमें कुछ ऐसे गुण हैं जिससे इसे आंशिक रूप से जातिवृत्तीय कहा जा सकता है, जैसे:
• वर्गीकरण की शुरुआत में 'रेनेल्स गण' को रखा गया है, जो एक प्राचीन गण है।
• एकबीजपत्री पौधों को द्विबीजपत्री के बाद रखा गया है, जिससे यह पता चलता है कि एकबीजपत्री पौधों की उत्पत्ति द्विबीजपत्री से हुई है।
**दोष (Demerits):**
हालांकि बेन्थम और हुकर का वर्गीकरण प्रायोगिक रूप से बहुत अच्छा है, फिर भी इसमें कुछ कमियां हैं:
1. यह पूरी तरह से जातिवृत्तीय पद्धति नहीं है।
2. इस वर्गीकरण में पौधों को उनके कुछ बाहरी लक्षणों के आधार पर बांटा गया है, जिसके कारण समान गुणों वाले कुल भी दूर-दूर रखे गए हैं।
3. वर्गीकरण में द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री के बीच जिम्नोस्पर्म (नग्नबीजी) को रखना सही नहीं है।
4. 'मोनोक्लेमाइडी' का पूरा समूह एक कृत्रिम समूह है।
5. एकबीजपत्री समूह में कुलों की व्यवस्था भी प्राकृतिक नहीं लगती।
In simple words: बेन्थम और हुकर ने पौधों को उनके शारीरिक गुणों के आधार पर बांटा था, जिसके कुछ फायदे (जैसे उपयोग में आसानी) और कुछ नुकसान (जैसे विकासवादी संबंधों को ठीक से न दिखाना) थे।
🎯 Exam Tip: बेन्थम और हुकर वर्गीकरण पद्धति की पूरी रूपरेखा, उसके प्रमुख लक्षणों, गुणों और दोषों को बिंदुवार याद करें।
प्रश्न 4. पादप वर्गीकरण पद्धतियों को किस आधार पर कितने प्रकारों में बांटा जाता है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये?
Answer: पौधों के वर्गीकरण की पद्धतियों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है, जो उनके आधारभूत सिद्धांतों पर निर्भर करती हैं। ये पद्धतियाँ हैं:
1. कृत्रिम पद्धति (Artificial system)
2. प्राकृतिक पद्धति (Natural system)
3. जातिवृत्तीय पद्धति (Phylogenetic system)
**1. कृत्रिम पद्धति (Artificial system):** इस पद्धति में पौधों का वर्गीकरण केवल एक या कुछ बाहरी लक्षणों पर आधारित होता था, जैसे पौधों का स्वभाव (शाक, क्षुप, वृक्ष) या फूलों की संख्या। यह पद्धति शुरुआती दौर के कम ज्ञान पर आधारित थी और इसमें सुविधा को प्राथमिकता दी जाती थी। थिओफ्रस्टस और केरोलस लिनियस इसके प्रमुख उदाहरण हैं। लिनियस ने अपनी 'लैंगिक पद्धति' में पुंकेसर और अण्डप की संख्या के आधार पर वर्गीकरण किया था।
**2. प्राकृतिक पद्धति (Natural system):** यह पद्धति पौधों की प्राकृतिक समानताओं और आपसी संबंधों पर आधारित है। इसमें पौधों के सभी गुणों, जैसे संरचना, स्वभाव, जड़, तना, पत्ती, और फूल को महत्व दिया जाता है। बेन्थम और हुकर का वर्गीकरण इस पद्धति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसे भारतीय विश्वविद्यालयों और संग्रहालयों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
**3. जातिवृत्तीय पद्धति (Phylogenetic system):** यह पद्धति पौधों के विकासवादी इतिहास और उनके पूर्वजों से संबंधों पर आधारित है। इसमें पौधों को उनके उत्पत्ति काल से लेकर वर्तमान तक के विकास क्रम के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। चाल्से डार्विन के 'प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों का उद्भव' सिद्धांत ने इस पद्धति के विकास में योगदान दिया। एंग्लर व प्रन्टल, हचिन्सन और क्रॉनक्विस्ट के वर्गीकरण इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
In simple words: पौधों को वर्गीकृत करने के तीन मुख्य तरीके हैं: कृत्रिम (बाहरी गुणों पर आधारित), प्राकृतिक (आपसी संबंधों पर आधारित) और जातिवृत्तीय (विकासवादी इतिहास पर आधारित)।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक वर्गीकरण पद्धति के आधारभूत सिद्धांत, उसके प्रमुख समर्थक और एक-एक उदाहरण को याद रखें।
Rbse Class 11 Biology Chapter 23 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
Rbse Class 11 Biology Chapter 23 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. पादप वर्गीकरण की आधारभूत इकाई है -
(अ) आंतरजातीय वर्ग
(ब) जाति
(स) वंश
(द) कुल
Answer: (ब) जाति
In simple words: पादप वर्गीकरण में, सबसे छोटी और सबसे महत्वपूर्ण इकाई जाति होती है। यह वह समूह है जिसके सदस्य एक-दूसरे के समान होते हैं और आपस में प्रजनन कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण की मूल इकाइयों जैसे जाति, वंश और कुल को उनके पदानुक्रम और महत्व के साथ याद रखें।
Question 2. टैक्सोनॉमी का 'जनक' किसे माना जाता है –
(अ) तख्ताजन
(ब) लिनियस
Answer: (ब) लिनियस
In simple words: कार्ल लिनियस को टैक्सोनॉमी या वर्गीकरण विज्ञान का पिता कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने जीवों को नाम देने और वर्गीकृत करने की आधुनिक प्रणाली विकसित की।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण विज्ञान में महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों और उनके योगदानों को जानें। लिनियस का नाम वर्गीकरण के इतिहास में केंद्रीय है।
Question 3. जीवों का समूह जो अन्तरा प्रजनन (Interbreeding) कर सकते है, वह है -
(अ) जीवों का समूह जो साथ-साथ जीवित रह सकता है।
(ब) जीव जो कि अन्तरा प्रजनन (Interbreeding) कर सकते है।
(स) जीव जो कि अन्तरा प्रजनन (Interbreeding) नहीं कर सकते हैं।
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
Answer: (ब) जीव जो कि अन्तरा प्रजनन (Interbreeding) कर सकते है।
In simple words: प्रजाति उन जीवों का समूह है जो आपस में प्रजनन कर सकते हैं और उपजाऊ संतान पैदा कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: 'जाति' की वैज्ञानिक परिभाषा को याद रखें, खासकर 'अंतःप्रजनन' (interbreeding) की क्षमता से संबंधित बिंदु को।
Question 4. पौधों का प्राकृतिक वर्गीकरण दिया है –
(अ) हचिन्सन ने
(ब) एंग्लर एवं प्राण्टल ने
(स) बैन्थम एवं हुकर ने
(द) जॉन रे ने
Answer: (स) बैन्थम एवं हुकर ने
In simple words: बैन्थम और हुकर ने पौधों का एक प्राकृतिक वर्गीकरण तैयार किया था, जो उनके कई समानताओं पर आधारित था।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक वर्गीकरण प्रणालियों के प्रमुख प्रतिपादकों और उनकी प्रणालियों के मुख्य सिद्धांतों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 5. निम्न में से कौनसा वानस्पतिक नाम सही छपा है -
(अ) Pisum Sativum
(a) Pisum sativum
(स) Pisum sativum
(द) pisum Sativum
Answer: (स) Pisum sativum
In simple words: वैज्ञानिक नाम लिखने के नियमों के अनुसार, वंश का पहला अक्षर बड़ा (कैपिटल) होता है और जाति का पहला अक्षर छोटा (स्मॉल) होता है, और नाम तिरछे अक्षरों में लिखे जाते हैं।
🎯 Exam Tip: वानस्पतिक नामों के सही लेखन नियमों (Binomial Nomenclature rules) को ध्यान से समझें, विशेषकर अक्षर के आकार और इटैलिक उपयोग पर।
Rbse Class 11 Biology Chapter 23 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. जातिवृत्त किसे कहते हैं?
Answer: किसी भी प्रजाति की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक की उसकी विकास यात्रा या विकासीय प्रवृत्तियों को जातिवृत्त (Phylogeny) कहा जाता है। इसमें किसी जीव समूह के विकासवादी इतिहास का अध्ययन होता है।
In simple words: जातिवृत्त का मतलब है कि कोई जीव समूह कैसे बना और समय के साथ कैसे विकसित हुआ।
🎯 Exam Tip: जातिवृत्त की परिभाषा में 'उत्पत्ति' और 'विकास यात्रा' जैसे प्रमुख शब्दों को शामिल करें।
Question 2. लिनियस द्वारा कौनसी पुस्तक में द्विपद नाम पद्धति का सर्वप्रथम उपयोग किया गया?
Answer: लिनियस द्वारा अपनी पुस्तक 'स्पीशीज प्लैन्टैरम' (Species Plantarum) में द्विपद नाम पद्धति का सर्वप्रथम उपयोग किया गया था। इस पुस्तक में उन्होंने कई पौधों का वैज्ञानिक नामकरण किया।
In simple words: लिनियस ने अपनी किताब 'स्पीशीज प्लैन्टैरम' में पहली बार जीवों के दो शब्दों वाले नाम (द्विपद नाम) लिखने का तरीका इस्तेमाल किया।
🎯 Exam Tip: लिनियस की पुस्तक 'स्पीशीज प्लैन्टैरम' का नाम सही ढंग से लिखें, क्योंकि यह वर्गीकरण के इतिहास में एक मील का पत्थर है।
Question 4. वर्गिकी या वर्गीकरण विज्ञान की परिभाषा दीजिये?
Answer: वर्गिकी वनस्पति विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत पौधों की पहचान, उनका नामकरण और उनका वर्गीकरण किया जाता है। यह विज्ञान जीवों के बीच संबंधों और विविधता को समझने में मदद करता है।
In simple words: वर्गिकी विज्ञान में हम पौधों को पहचानते हैं, उन्हें नाम देते हैं, और उन्हें अलग-अलग समूहों में बांटते हैं।
🎯 Exam Tip: परिभाषा में 'पहचान', 'नामकरण' और 'वर्गीकरण' इन तीन मुख्य चरणों को स्पष्ट रूप से बताएं।
Question 5. द्विनामकरण में पादप के वानस्पतिक नाम में कौन से दो शब्द लिए जाते हैं?
Answer: द्विनामकरण में पादप के वानस्पतिक नाम में दो शब्द लिए जाते हैं: वंश (Genus) और जाति (Species)। पहला शब्द वंश को और दूसरा शब्द जाति को बताता है।
In simple words: पौधों के वैज्ञानिक नाम में दो हिस्से होते हैं: पहला उनके वंश का नाम और दूसरा उनकी जाति का नाम।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि पहला शब्द 'वंश' (Genus) होता है और दूसरा 'जाति' (Species) होता है।
Question 6. अधिकांश वानस्पतिक नामों को किस भाषा में लिया गया?
Answer: अधिकांश वानस्पतिक नामों को लैटिन भाषा में लिया गया है। लैटिन एक मृत भाषा है, इसलिए इसमें कोई बदलाव नहीं होता, जिससे नामों में स्थिरता बनी रहती है।
In simple words: ज्यादातर पौधों के वैज्ञानिक नाम लैटिन भाषा में लिखे जाते हैं।
🎯 Exam Tip: लैटिन भाषा के चुनाव के पीछे का कारण (स्थिरता) का उल्लेख करना अच्छे अंक दिलाएगा।
Question 7. केसिया फिस्टुला (Cassia fistula) में कौन सा शब्द वंश को निरुपित करता है?
Answer: केसिया फिस्टुला (Cassia fistula) में 'केसिया' (Cassia) शब्द वंश को दर्शाता है। वैज्ञानिक नाम में पहला शब्द हमेशा वंश होता है।
In simple words: 'केसिया फिस्टुला' नाम में 'केसिया' वंश का नाम है।
🎯 Exam Tip: द्विपद नामकरण में वंश नाम और जाति नाम को पहचानने के नियमों का अभ्यास करें।
Question 8. जाति की संकल्पना के जनक कौन थे?
Answer: जाति की संकल्पना के जनक कैरोलस लिनियस (Carolus Linnaeus) थे। उन्होंने जीवों को वर्गीकृत करने के लिए जाति को एक मूलभूत इकाई के रूप में परिभाषित किया।
In simple words: कैरोलस लिनियस ने जाति की अवधारणा की शुरुआत की।
🎯 Exam Tip: जाति की संकल्पना के जनक के रूप में कैरोलस लिनियस का नाम याद रखें।
Question 9. भारतीय विश्वविद्यालयों एवं अधिकांश पादप संग्रहालयों में पादप पहचाने व वर्गीकरण की कौनसी पद्धति का अनुसरण किया जाता है?
Answer: भारतीय विश्वविद्यालयों और अधिकांश पादप संग्रहालयों में पादप पहचान और वर्गीकरण के लिए बैन्थम एवं हुकर वर्गीकरण पद्धति का अनुसरण किया जाता है। यह पद्धति प्राकृतिक वर्गीकरण पर आधारित है।
In simple words: भारत के कॉलेजों और संग्रहालयों में पौधे पहचानने के लिए बैन्थम और हुकर की वर्गीकरण पद्धति का इस्तेमाल होता है।
🎯 Exam Tip: भारतीय संदर्भ में उपयोग की जाने वाली वर्गीकरण पद्धति का नाम और उसके प्रतिपादकों को याद रखें।
Rbse Class 11 Biology Chapter 23 निबंधात्मक प्रश्न
Question 1. बैन्थम और हुकर की वर्गीकरण पद्धति की वर्ग स्तर तक रूपरेखा, प्रमुख लक्षणों सहित समझाइये। इस वर्गीकरण के गुण एवं दोष को स्पष्ट कीजिये ?
Answer: बैन्थम और हुकर की वर्गीकरण पद्धति एक प्राकृतिक वर्गीकरण प्रणाली है जो जॉर्ज बैन्थम और जोसेफ डाल्टन हुकर द्वारा प्रस्तावित की गई थी। इस पद्धति में बीजीय पौधों (Spermatophyta) को मुख्य रूप से तीन वर्गों में विभाजित किया गया है:
- वर्ग I: द्विबीजपत्री (Dicotyledonae)
इनके मुख्य लक्षण हैं कि भ्रूण में दो बीजपत्र होते हैं, पत्तियों में जालिकावत शिराविन्यास (reticulate venation) होता है, पुष्प पंचतयी (pentamerous) या चतुर्तयी (tetramerous) होते हैं, और संवहन पूल वर्षी (open) होते हैं। इस वर्ग को तीन उपसंवर्गों (subclasses) में बांटा गया है:- उपसंवर्ग पोलीपेटेली (Subclass Polypetaleae): इसमें दलपुंज पृथक चक्रों में होते हैं और इनमें चार या पांच दल एक-दूसरे से स्वतंत्र रहते हैं।
- उपसंवर्ग गेमोपेटेली (Subclass Gamopetaleae): इस उपसंवर्ग में परिदल के दो चक्र होते हैं, जिसमें बाह्यदल और दलपुंज पृथक-पृथक होते हैं। दलपुंज के चार या पांच दल एक-दूसरे से आंशिक या पूर्ण रूप से जुड़े होते हैं। पुंकेसर प्रायः दललग्न होते हैं।
- उपसंवर्ग मोनोक्लेमाइडी (Subclass Monochlamydeae or Incompletae): इसमें पुष्प में बाह्यदल और दल में अंतर नहीं होता, अर्थात् अविभेदित परिदलपुंज (perianth) उपस्थित होता है। पुष्प अपूर्ण होता है, और यह चक्र सामान्यतया बाह्यदलाभ (Sepaloid) होता है।
- वर्ग II: जिम्नोस्पर्मी (Gymnospermae)
इसे द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री के बीच में रखा गया है। इनमें जनन संरचनाएं नर और मादा शंकुओं के रूप में होती हैं। इस वर्ग के सदस्यों के बीजाण्ड (ovule) या बीज नग्न होते हैं, अर्थात अंडाशय या फल में बंद नहीं होते हैं। इसमें तीन कुल- सायकेडेसी, कोनीफेरी तथा नीटेसी आते हैं। - वर्ग III: एकबीजपत्री (Monocotyledonae)
एकबीजपत्री पौधों की पत्तियां सरल और समानांतर शिराविन्यास युक्त होती हैं। भ्रूण में बीजपत्रों की संख्या एक होती है, और संवहन पूल अवर्षी होते हैं जो मृदूतक में बिखरे रहते हैं। पुष्प सामान्यतया त्रितयी होते हैं। एकबीजपत्री पौधों को परिदलों की प्रकृति और अंडाशय की अवस्था के आधार पर सात श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
गुण (Merits):
- यह वर्गीकरण प्रयोगिक दृष्टि से बहुत सुविधाजनक है।
- इसे प्रायः विश्व के कई वनस्पति संग्रहालयों (Herbaria) में उपयोग किया जाता है।
- यह आधुनिक वर्गीकरण पद्धतियों का आधार मानी जा सकती है।
- इसमें कुछ जातिवृत्तीय गुण भी हैं, जैसे कि वर्गीकरण के आरंभ में रेनेल्स गण को रखा गया है जो आद्य गण है।
- एकबीजपत्री को द्विबीजपत्री के बाद रखा गया है, जो यह दर्शाता है कि एकबीजपत्री की उत्पत्ति द्विबीजपत्री से हुई है।
दोष (Demerits):
- यह जातिवृत्तीय पद्धति नहीं है।
- वर्गीकरण में पौधों को उनमें पाए जाने वाले कृत्रिम लक्षणों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप समान लक्षणों वाले कुल दूर-दूर रखे गए हैं।
- वर्गीकरण में द्विबीजपत्री तथा एकबीजपत्री के बीच जिम्नोस्पर्म को रखना त्रुटिपूर्ण है।
- संपूर्ण मोनोक्लेमाइडी एक कृत्रिम समूह है।
- इसमें एकबीजपत्री समूह में कुलों की व्यवस्था अप्राकृतिक सी है।
🎯 Exam Tip: बैन्थम और हुकर वर्गीकरण के मुख्य वर्गों और उपवर्गों को उनके विशिष्ट लक्षणों के साथ याद रखें। गुणों और दोषों को संतुलित रूप से प्रस्तुत करें।
पादप नामकरण एवं जाति की संकल्पना
पादप नामकरण (Botanical nomenclature) वह वैज्ञानिक तरीका है जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पौधों को नाम दिया जाता है ताकि पूरी दुनिया में उनका एक ही नाम हो। वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार पौधों के नाम लैटिन या ग्रीक भाषा में दिए जाते हैं। नामकरण के संबंध में द्विपद नामकरण पद्धति (Binomial system of nomenclature) को सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रचलित करने का श्रेय स्वीडन के प्रकृति वैज्ञानिक और वर्गिकी के जनक कैरोलस लिनियस को जाता है।
लिनियस ने 1753 में अपनी पुस्तक "स्पीशीज प्लैन्टैरम" में इस पद्धति का उपयोग किया था। इस पद्धति के अनुसार, प्रत्येक पौधे का नाम दो लैटिन शब्दों से बना होता है- पहला शब्द वंशीय नाम (generic name) और दूसरा शब्द जातीय नाम (species name)।
वंशीय नाम उन सभी पौधों के लिए होता है जो एक-दूसरे से सामान्य समानता और संबंध रखते हैं। वंशीय नाम का पहला अक्षर अंग्रेजी के बड़े (Capital) अक्षर से और जातीय नाम को छोटे (small) अक्षर से लिखा जाता है। जैसे Solanum melongena में 'Solanum' वंशीय नाम है और 'melongena' जातीय नाम है। नामकरण के लिए कुछ विशेष अंतर्राष्ट्रीय नियम हैं जिन्हें वानस्पतिक नामकरण की अंतर्राष्ट्रीय संहिता (International code of Botanical nomenclature = ICBN) के नाम से जाना जाता है। ये नियम इस प्रकार से हैं:
- प्रत्येक पौधे के दो नाम-वंशीय और जातीय नाम होने चाहिए। वंश के नाम का पहला अक्षर बड़ा और जातीय का छोटा लिखना चाहिए।
- दोनों शब्दों को इटैलिक (Italics) में या तिरछे लिखना चाहिए। यदि तिरछे नहीं लिखे जाएं या हाथ से लिखे गए हों तो उन्हें रेखांकित करना चाहिए।
- नाम लैटिन भाषा या लैटिनीकृत (Latinised) होने चाहिए।
- नाम बहुत लंबा और कठिन उच्चारण वाला नहीं होना चाहिए।
- लिखने में सबसे पहले वंशीय नाम और फिर जातीय नाम लिखना चाहिए।
- टोटोनिम (Tautonym), अर्थात वंशीय नाम को ही दोबारा जातीय नाम के रूप में प्रयोग नहीं करना चाहिए, जैसे- ब्रेसिका-ब्रेसिका (Brassica – brassica) इत्यादि।
- जातीय नाम अन्य संबंधित पौधों के नामों से भिन्न होना चाहिए।
- जाति का नाम वंश के नाम से छोटा होना चाहिए।
- वानस्पतिक नाम में जातीय नाम के पश्चात उस लेखक या अन्वेषक का नाम (जिसने सर्वप्रथम उस जाति का वर्णन व नाम दिया तथा जो नए पौधे का नाम ICBN से स्वीकृत करवा लेता है, वही उसका लेखक या अन्वेषक माना जाता है) पूर्ण या संक्षिप्त रूप से लिखा जाना चाहिए। जैसे Brassica campertris Linn. यहां 'Linn' का तात्पर्य है कि इसका लेखक Linnaeus है। जो वैज्ञानिक किसी पौधे का नाम देना चाहते हैं, उन्हें संहिता के नियमों का कड़ाई से पालन करने के पश्चात दिए गए नाम को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिकाओं के द्वारा प्रचारित करना पड़ता है।
- संहिता में वर्गीकरण की प्रत्येक इकाई के अंत में ICBN के नियमों के अनुसार अंतिमाक्षर (suffix) का शब्द निश्चित होता है।
जाति की संकल्पना:
कैरोलस लिनियस को सबसे पहले जाति की अवधारणा को वैज्ञानिक प्रमाणिकता प्रदान करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने "मूल आकारिकीय विविधताओं के आधार पर विभिन्न पादप जातियों का गठन किया था।" डार्लिंगटन (Darlington) के अनुसार, प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली पादप व्यष्टि या आबादी (Population) के स्थायी रूप से पृथक और आनुवंशिक आधार पर स्थिर लक्षण प्रदर्शित करने वाले समूह जो अंतःप्रजनन (interbreeding) प्रदर्शित करते हैं, प्रजाति (species) कहलाते हैं।
ड्यूरिट्ज (Durictz) के अनुसार, जातियां छोटी से छोटी प्राकृतिक जनसंख्याएं हैं जो "जीवरूपों (biotypes) के स्पष्ट अलगाव" के कारण एक दूसरे से स्थायी रूप से अलग हो गई हैं। क्लाऊसन एवं सहयोगियों के अनुसार, समान लक्षणी प्राकृतिक रूप से संगठित पौधों का वह समूह जिसके सदस्य जीनों का आदान-प्रदान बिना किसी हानिकारक प्रभाव के करते हैं, प्रजाति कहलाती है। इन परिभाषाओं से कुछ मुख्य बातें सामने आती हैं:
- एक पादप जाति के सदस्य महत्वपूर्ण आकारिकी, शारीरिक और अन्य लक्षणों में लगभग पूर्णतया समान होते हैं।
- एक जाति के सदस्यों के बीच अंतःप्रजनन (Interbreeding) या लैंगिक प्रजनन होता है, जिससे नई पीढ़ियों का उद्भव होता है और वंशवृद्धि होती है।
- एक जाति के सदस्यों के बीच आनुवंशिक अवरोध (Genetical barrier) नहीं होता।
- एक जाति के सदस्य, सामान्यतया दूसरी जाति के पौधों से लैंगिक जनन प्रदर्शित नहीं करते, अर्थात् इनमें आनुवंशिकी पदार्थों का विनिमय (Exchange of genetic material) नहीं होता।
इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि "बाह्य एवं आंतरिक लक्षणों में समान पौधों का वह समूह जिसके सदस्य जननक्षम एवं मुक्त रूप से अंतःप्रजनन करते हैं, प्रजाति (species) कहलाता है।"
वंश की संकल्पना:
Genus एकवचन है तथा Genera बहुवचन है। वंश प्रजाति से उच्चतर की वर्गिकी इकाई (Taxonomic unit) है। "ऐसी अनेक प्रजातियां जो एक-दूसरे से अधिकांश लक्षणों में समानता दर्शाती हैं, वंश का गठन करती हैं।" जब किसी वंश में केवल एक ही जाति या प्रजाति होती है तो ऐसे वंश को एकलप्ररूपी (monotypic) कहते हैं। एक ही वंश में सम्मिलित करने के लिए दो अथवा दो से अधिक जातियों के विभिन्न लक्षणों में कितनी कम या अधिक असमानताएं होनी चाहिए, यह सुनिश्चित करना पादप वर्गीकरण विज्ञानियों के विवेक पर निर्भर करता है। फिर भी, वंश की परिकल्पना संभवतया बहुत पुराने समय से उपयोग में है।
Question 2. पादप वर्गीकरण पद्धतियों को किस आधार पर कितने प्रकारों में बांटा जाता है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये?
Answer: समस्त प्रकार के वर्गीकरणों को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है, जो उनके आधार पर निर्भर करते हैं:
- कृत्रिम पद्धति (Artificial system):
यह पद्धति पौधों के वर्गीकरण के लिए केवल एक या कुछ सतही लक्षणों पर आधारित थी। यह प्रणाली अपूर्ण ज्ञान पर आधारित और सुविधा के लिए बनाई गई थी। इसके अंतर्गत थिओफ्रस्टस और कैरोलस लीनियस के वर्गीकरण महत्वपूर्ण हैं। थिओफ्रस्टस को वनस्पति विज्ञान का जनक कहा जाता है। उन्होंने पौधों को उनके स्वभाव के अनुसार चार समूहों - शाक (herb), उपक्षुप (undershrub), क्षुप (shrub) और वृक्षों (trees) में वर्गीकृत किया था। लीनियस ने पौधों को पुष्पों में पुंकेसरों और अंडपों की संख्या तथा पुष्प के एकलिंगी या द्विलिंगी होने के आधार पर वर्गीकृत किया। इस पद्धति को लैंगिक पद्धति (sexual system) भी कहते हैं। - प्राकृतिक पद्धति (Natural system):
यह पद्धति मुख्य रूप से पौधों की प्राकृतिक सजातीयता या समानताओं (natural affinities) पर आधारित है। इसमें पौधों के स्वभाव से लेकर उनकी संरचना, जड़, तना, पत्ती और पुष्प को महत्व दिया गया है। इस पद्धति में डी. जूसियू, डी. कैन्डौली, जॉन लिण्डले और बैन्थम व हुकर के वर्गीकरण महत्वपूर्ण हैं। जॉर्ज बैन्थम और जोसेफ डाल्टन हुकर ने अपनी पुस्तक 'जेनेरा प्लैन्टेरम' में यह वर्गीकरण प्रकाशित किया। यह वर्गीकरण वास्तविक अवलोकन और अध्ययन के बाद किया गया था, इसलिए यह प्रायोगिक दृष्टि से सबसे उत्तम माना जाता है और विश्व के वनस्पति संग्रहालयों में उपयोग किया जाता है। - जातिवृत्तीय पद्धति (Phylogenetic system):
इस पद्धति का विकास चाल्से डार्विन (1859) द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत "प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों का उद्भव" (Origin of species by natural selection) से हुआ है। इस पद्धति में पौधों का वर्गीकरण उनके विकास और जनन गुणों पर आधारित है, या यों कहें कि यह पौधों के जातिवृत्त (phylogeny) पर आधारित है। किसी जाति के उत्पत्ति काल से वर्तमान तक के संपूर्ण विकास को ही उस जाति का जातिवृत्त कहते हैं। जातिवृत्तीय वर्गीकरण में कुलों को पुष्प के विकास के अनुसार जटिलता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित किया गया है। इसमें नग्न पुष्प (naked flower) वाले आद्य (primitive) कुलों को पहले और अत्यधिक विकसित कुलों को अंत में रखा गया है। इस पद्धति के अंतर्गत एंग्लर व प्रन्टल, हचिन्सन और क्रॉनक्विस्ट के वर्गीकरण महत्वपूर्ण हैं।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण की तीनों पद्धतियों (कृत्रिम, प्राकृतिक, जातिवृत्तीय) के नाम, उनके मुख्य आधार और कम से कम एक-एक प्रमुख प्रतिपादक का नाम याद रखें।
Question 3. सिस्टेमेटिक्स (Systematics) को परिभाषित कीजिये?
Answer: सिस्टेमेटिक्स एक शब्द है जिसे टैक्सोनॉमी के बाद प्रचलन में लाया गया। इसे वर्गीकरण विज्ञान या वर्गीकरण पद्धति भी कहते हैं। इसके अंतर्गत पादपों की पहचान, नामकरण और वर्गीकरण का अध्ययन करने के साथ-साथ उनके बीच पाए जाने वाले अंतर्संबंधों और विविधताओं का भी अध्ययन किया जाता है।
In simple words: सिस्टेमेटिक्स विज्ञान की वह शाखा है जिसमें पौधों को पहचाना, नाम दिया और वर्गीकृत किया जाता है, साथ ही उनके आपसी रिश्तों और विविधताओं को भी समझा जाता है।
🎯 Exam Tip: सिस्टेमेटिक्स और टैक्सोनॉमी के बीच के अंतर को स्पष्ट करें, खासकर अंतर्संबंधों और विविधताओं के अध्ययन पर जोर दें।
Question 4. प्राचीन ग्रंथ "वृक्षायुर्वेद" में आधुनिक क्रसीफेरी कुल की व्याख्या किस प्रकार की गई है?
Answer: प्राचीन ग्रंथ "वृक्षायुर्वेद" में आधुनिक क्रसीफेरी कुल की व्याख्या उनके पुष्पों के चार दलों की रचना के आधार पर की गई है। इस रचना से स्वास्तिक जैसी आकृति बनती है, इसलिए इसे 'स्वास्तिक गणमय' कहा गया है। यह दिखाता है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भी पौधों के वर्गीकरण का ज्ञान था।
In simple words: पुराने ग्रंथ 'वृक्षायुर्वेद' में क्रसीफेरी कुल के फूलों को देखकर उन्हें 'स्वास्तिक गणमय' कहा गया, क्योंकि उनके फूलों की बनावट स्वास्तिक जैसी दिखती थी।
🎯 Exam Tip: 'वृक्षायुर्वेद' और 'स्वास्तिक गणमय' शब्दों का सही उल्लेख करके प्राचीन भारतीय वर्गीकरण ज्ञान को दर्शाएं।
Question 5. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक पादप का वानस्पतिक नाम कौनसी भाषा में लिया जाता है और क्यो ?
Answer: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक पादप का वानस्पतिक नाम लैटिन भाषा में लिया जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लैटिन भाषा को अपने सटीक और संक्षिप्त स्वभाव के कारण पादप नामकरण के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। यह एक मृत भाषा है, जिसका मतलब है कि इसमें समय के साथ कोई बदलाव नहीं होता, जिससे वैज्ञानिक नामों में स्थिरता बनी रहती है और वे विश्व स्तर पर समान रूप से स्वीकार्य होते हैं। इसलिए, पौधों के वैज्ञानिक नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लैटिन भाषा में दिए जाते हैं, और इसी भाषा के अनुसार लिखे और उच्चारित किए जाते हैं।
In simple words: पौधों के वैज्ञानिक नाम लैटिन भाषा में होते हैं क्योंकि यह एक स्थिर भाषा है। इससे पूरे विश्व में पौधों का एक ही नाम रहता है और कोई भ्रम नहीं होता।
🎯 Exam Tip: लैटिन भाषा के चयन के दो मुख्य कारण (स्थिरता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता) का उल्लेख करें।
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