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RBSE Class 11 Biology Chapter 16 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. अन्तरापूलीय एधा का निर्माण होता है –
(अ) मज्जा से
(ब) मज्जा रश्मियों से
(स) जाइलम से
(द) फ्लोएम से
Answer: (ब) मज्जा रश्मियों से
In simple words: अन्तरापूलीय एधा का निर्माण मज्जा रश्मियों से होता है, जो पौधे के तने में एक खास तरह की कोशिकाओं का समूह है। यह पौधों में द्वितीयक वृद्धि में मदद करती है।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि मज्जा रश्मियाँ संवहन बंडलों के बीच पाई जाती हैं और द्वितीयक वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
Question 2. एधा वलय बनाता है –
(अ) बाहर जाइलम अन्दर फ्लोएम
(ब) बाहर फ्लोएम अन्दर जाइलम
Answer: (ब) बाहर फ्लोएम अन्दर जाइलम
In simple words: एधा वलय इस तरह से बनता है कि इसके बाहर की तरफ फ्लोएम ऊतक होते हैं और अन्दर की तरफ जाइलम ऊतक होते हैं। यह पौधों को मोटा होने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: हमेशा याद रखें कि एधा, जाइलम और फ्लोएम के बीच स्थित होता है और दोनों ऊतकों का निर्माण करता है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 16 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. अन्तः पूलीय एधा किस प्रकार के विभज्योतक का उदाहरण है ?
Answer: अन्तः पूलीय एधा पाश्र्व विभज्योतक का उदाहरण है। यह पौधे की चौड़ाई बढ़ाने का काम करता है। यह एक विशेष प्रकार का ऊतक है जो पौधे के विकास में सहायक होता है।
In simple words: यह एक पाश्र्व विभज्योतक है, जो पौधे की मोटाई बढ़ाता है।
🎯 Exam Tip: पाश्र्व विभज्योतक पौधे की मोटाई (द्वितीयक वृद्धि) के लिए जिम्मेदार होते हैं, जबकि शीर्षस्थ विभज्योतक लम्बाई बढ़ाते हैं।
Question 2. एधा में कितने प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं ? नाम लिखिए।
Answer: एधा में दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं: किरण आद्यक (ray initials) और तरूप आद्यक (fusiform initials)। ये कोशिकाएँ पौधे की वृद्धि और संरचना बनाने में मदद करती हैं।
In simple words: एधा में दो तरह की कोशिकाएँ होती हैं: किरण आद्यक और तरूप आद्यक।
🎯 Exam Tip: किरण आद्यक आमतौर पर संवहन रश्मियों (vascular rays) का निर्माण करते हैं, और तरूप आद्यक जाइलम और फ्लोएम बनाते हैं।
Question 3. कॉर्क किस प्रकार की कोशिकाओं से बनता है ?
Answer: कॉर्क की कोशिकाएँ मोटी भित्ति वाली, मृत, आयताकार होती हैं, जिनमें कोई अन्तराकोशिकीय अवकाश नहीं होता। इन कोशिकाओं में सुबेरिन नामक पदार्थ होता है और ये अरीय पंक्तियों में व्यवस्थित होती हैं। ये कोशिकाएँ पौधे को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
In simple words: कॉर्क मोटी, मृत, आयताकार और सुबेरिन वाली कोशिकाओं से बनता है, जो पास-पास जुड़ी होती हैं।
🎯 Exam Tip: सुबेरिन कॉर्क कोशिकाओं को जल और गैस के लिए अभेद्य बनाता है, जिससे पौधा सूखने से बचता है।
Question 4. स्तम्भ में कॉर्क एधा का विभेदन कहाँ होता है ?
Answer: स्तम्भ में कॉर्क एधा का विभेदन प्रायः अधस्त्वचा की कोशिकाओं से होता है। ये कोशिकाएँ विशेष प्रकार के ऊतक में बदल जाती हैं जो कॉर्क का निर्माण करती हैं।
In simple words: कॉर्क एधा आमतौर पर पौधे के तने की अधस्त्वचा की कोशिकाओं से बनती है।
🎯 Exam Tip: विभेदन (differentiation) वह प्रक्रिया है जहाँ कोशिकाएँ विशेष कार्य करने के लिए बदल जाती हैं।
Question 5. पू.
Answer: सर्वप्रथम रंभ क्षेत्र में संवहन एधा का निर्माण होता है। फ्लोएम के नीचे की ओर मृदूतक विभज्योतकी होकर एधा बनाता है, और प्रत्येक आदिदारु के विपरीत परिरंभ की कुछ कोशिकायें भी एधा बनाती हैं। यह पौधे की संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
In simple words: संवहन एधा सबसे पहले रंभ क्षेत्र में बनती है, जहाँ फ्लोएम के नीचे और आदिदारु के सामने वाली कोशिकाएँ एधा बनाती हैं।
🎯 Exam Tip: संवहन एधा द्वितीयक जाइलम और फ्लोएम का निर्माण करके पौधे की मोटाई बढ़ाने में सहायक होता है।
Question 7. परित्वक के घटक स्तरों के नाम लिखिए।
Answer: परित्वक काग (phellem), काग एधा (phellogen) और काग अस्तर (phelloderm) से मिलकर बनता है। ये तीनों परतें मिलकर पौधे को बाहरी सुरक्षा देती हैं।
In simple words: परित्वक में काग, काग एधा और काग अस्तर होते हैं।
🎯 Exam Tip: इन तीनों घटकों को सामूहिक रूप से परित्वक कहा जाता है, जो पौधे के तने की बाहरी रक्षात्मक परत बनाता है।
Question 8. वातरन्ध्रों के क्या कार्य हैं ?
Answer: वातरन्ध्रों का मुख्य कार्य वाष्पोत्सर्जन करना है। ये छोटे छिद्र होते हैं जो गैसों का आदान-प्रदान और पानी को भाप के रूप में बाहर निकालने में मदद करते हैं।
In simple words: वातरन्ध्र गैसों को बदलने और पानी को वाष्प के रूप में निकालने का काम करते हैं।
🎯 Exam Tip: वातरन्ध्र विशेष रूप से पुराने तनों और जड़ों में पाए जाते हैं, जहाँ छाल होती है, जबकि पत्तियों में स्टोमेटा होते हैं।
Question 9. पार्श्व मूलों की उत्पत्ति किस स्तर से होती है ?
Answer: पार्श्व मूलों की उत्पत्ति परिरंभ से प्रारम्भ होती है। परिरंभ पौधे की जड़ के अन्दर एक परत होती है जहाँ से नई जड़ें निकलना शुरू करती हैं।
In simple words: पार्श्व मूल परिरंभ से निकलते हैं।
🎯 Exam Tip: पार्श्व मूलों की उत्पत्ति अंतर्जात (endogenous) होती है, जिसका अर्थ है कि वे आंतरिक ऊतकों से उत्पन्न होते हैं।
RBSE Class 11 Biology Chapter 16 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. प्राथमिक एवं द्वितीयक वृद्धि में अन्तर बताइये।
Answer: प्राथमिक वृद्धि पौधे में शीर्षस्थ विभज्योतक (apical meristem) द्वारा होती है, जिससे पौधा लम्बाई में बढ़ता है। पत्तियों के आधार पर पर्णो (internodes) और पर्णी (nodes) पर अन्तर्वेशी विभज्योतक (intercalary meristem) से भी प्राथमिक वृद्धि होती है। इसके विपरीत, द्वितीयक वृद्धि पार्श्व विभज्योतक (lateral meristem) द्वारा होती है, जिससे पौधे की मोटाई बढ़ती है और छाल व कॉर्क जैसी संरचनाएँ बनती हैं। द्वितीयक वृद्धि के परिणामस्वरूप द्वितीयक जाइलम और फ्लोएम का निर्माण होता है।
In simple words: प्राथमिक वृद्धि से पौधा लम्बाई में बढ़ता है, जबकि द्वितीयक वृद्धि से पौधा मोटा होता है।
🎯 Exam Tip: प्राथमिक वृद्धि सभी पौधों में होती है, जबकि द्वितीयक वृद्धि मुख्य रूप से द्विबीजपत्री पौधों और जिम्नोस्पर्म में पाई जाती है।
Question 2. रंभीय व बाह्यरंभीय द्वितीयक वृद्धि में विभेद कीजिए।
Answer:
| रंभीय द्वितीयक वृद्धि (Stealer Secondary Growth) | बाह्यरंभीय द्वितीयक वृद्धि (Extra-stealer Secondary Growth) |
|---|---|
| 1. यह संवहन एधा की सक्रियता के कारण होती है। | 1. यह कॉर्क एधा (phellogen) की सक्रियता के कारण होती है। |
| 2. यह द्वितीयक वृद्धि अन्तः और अन्तरापूलीय एधा के कारण होती है। | 2. कॉर्क एधा के कारण होती है। |
| 3. इससे द्वितीयक जाइलम और फ्लोएम बनते हैं। | 3. द्वितीयक वल्कुट और परित्वक बनते हैं। |
| 4. वातरंध्र अनुपस्थित होते हैं, परन्तु द्वितीयक जाइलम में टाइलोसिस उपस्थित होते हैं। | 4. वातरंध्र उपस्थित होते हैं, परन्तु टाइलोसिस अनुपस्थित होते हैं। |
| 5. वार्षिक वलय, शरद एवं बसंत काष्ठ, अन्तःकाष्ठ और रसकाष्ठ बनते हैं। | 5. नहीं बनते। |
रंभीय द्वितीयक वृद्धि पौधे के अन्दर के संवहन ऊतकों में होती है, जबकि बाह्यरंभीय वृद्धि बाहरी परतों जैसे कॉर्क में होती है। दोनों प्रकार की वृद्धि पौधे को मोटा करती है।
In simple words: रंभीय वृद्धि पौधे के भीतरी संवहन ऊतकों में होती है और बाह्यरंभीय वृद्धि बाहरी कॉर्क में होती है।
🎯 Exam Tip: रंभीय वृद्धि संवहन एधा से संबंधित है और जाइलम-फ्लोएम बनाती है, जबकि बाह्यरंभीय वृद्धि कॉर्क एधा से संबंधित है और कॉर्क-परित्वक बनाती है।
Question 3. एधा की क्रियाशीलता पर वातावरण का क्या प्रभाव पड़ता हैं ?
Answer: एधा की क्रियाशीलता पर पर्यावरणीय कारकों का सीधा असर पड़ता है। जिन जगहों पर मौसम में बड़ा बदलाव होता है, वहाँ एधा की सक्रियता पूरे साल एक जैसी नहीं रहती। खासकर ठंडी और बसंत ऋतु में बनी लकड़ी (काष्ठ) में बहुत फर्क होता है। बसंत ऋतु में पौधे के सभी हिस्सों में काम करने की गति बढ़ जाती है और वह ज्यादा पानी ऊपर चढ़ाते हैं। इस समय कोशिकाएँ तेजी से बँटती हैं और जाइलम ऊतक बनाती हैं, जिससे बसंत काष्ठ (spring wood) बनता है। इसमें बड़ी नलिकाएँ होती हैं। ठंडी या शरद ऋतु में एधा की सक्रियता कम हो जाती है, जिससे कम जाइलम बनता है। इसमें नलिकाएँ छोटी होती हैं और रेशे ज्यादा होते हैं। इस लकड़ी को शरद काष्ठ (autumn wood) कहते हैं। ये दोनों प्रकार की लकड़ी संकेन्द्री वलयों में मिलकर वार्षिक वलय बनाती हैं, जो पौधे की उम्र बताती हैं।
In simple words: मौसम बदलने से एधा की काम करने की क्षमता बदल जाती है, जिससे बसंत में ज्यादा और शरद में कम लकड़ी बनती है।
🎯 Exam Tip: वार्षिक वलयों की चौड़ाई देखकर उस वर्ष की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अनुमान लगाया जा सकता है, जिससे जलवायु अध्ययन में मदद मिलती है।
Question 4. शरद काष्ठ एवं बसन्त काष्ठ में क्या अन्तर है ?
Answer:
| बसन्त काष्ठ (Spring Wood) | शरद काष्ठ (Autumn Wood) |
|---|---|
| 1. इसका निर्माण बसंत ऋतु में होता है। | 1. इसका निर्माण शरद ऋतु में होता है। |
| 2. यह हल्के रंग का होता है। | 2. यह गहरे रंग का होता है। |
| 3. इसका घनत्व कम होता है। | 3. इसका घनत्व अधिक होता है। |
| 4. तन्तु बहुत कम पाए जाते हैं। | 4. तन्तु बहुत अधिक होते हैं। |
| 5. वाहिकाएँ बड़ी तथा चौड़ी होती हैं। | 5. वाहिकाएँ छोटी तथा अपेक्षाकृत संकरी होती हैं। |
बसंत काष्ठ तब बनता है जब पौधा तेजी से बढ़ता है, यह हल्का और कम घना होता है, जबकि शरद काष्ठ धीमी वृद्धि के समय बनता है, यह गहरा और सघन होता है। ये दोनों मिलकर एक पेड़ में वार्षिक वलय बनाते हैं।
In simple words: बसंत काष्ठ बसंत में बनता है, यह हल्का और चौड़ा होता है, जबकि शरद काष्ठ शरद में बनता है, यह गहरा और सँकरा होता है।
🎯 Exam Tip: बसंत काष्ठ तेजी से जल संवहन के लिए अनुकूल होता है, जबकि शरद काष्ठ यांत्रिक मजबूती प्रदान करता है।
Question 5. छाल का निर्माण कैसे होता है ?
Answer: छाल वृक्ष के तने से सूखकर टूटने वाले बाहरी स्तरों को कहते हैं। एधा से बाहर के सभी ऊतक जैसे द्वितीयक फ्लोएम, प्राथमिक फ्लोएम, प्राथमिक वल्कुट, द्वितीयक वल्कुट आदि मिलकर छाल बनाते हैं। जब कॉर्क एधा वलय के रूप में बनती है, तो कॉर्क भी वलय के रूप में बनती है, इसे वलय छालवल्क (ring bark) कहते हैं, जैसे भोजपत्र (Betula)। कुछ पौधों में कॉर्क एधा अलग-अलग पट्टियाँ बनाती है, जिससे छाल छोटे-छोटे टुकड़ों में उतरती है, इसे शल्कीय छालवल्क (scale bark) कहते हैं, जैसे अमरूद। छाल पौधे को बाहरी चोटों और सूखने से बचाती है।
In simple words: छाल में एधा के बाहर के सभी ऊतक शामिल होते हैं, जो पेड़ को बाहर से सुरक्षा देते हैं। यह दो प्रकार की हो सकती है - वलय या शल्कीय।
🎯 Exam Tip: छाल में मुख्य रूप से कॉर्क, कॉर्क एधा और द्वितीयक वल्कुट शामिल होते हैं, जो पौधे के लिए एक महत्वपूर्ण रक्षात्मक परत बनाते हैं।
Question 6. मूल में एधा का निर्माण किस प्रकार होता है ?
Answer: जड़ों में अरीय पूल होते हैं और एधा का निर्माण द्विबीजपत्री मूल में होता है। सबसे पहले फ्लोएम पूल के नीचे की मृदूतक कोशिकाएँ विभज्योतकी (meristematic) हो जाती हैं। जितने फ्लोएम पूल होते हैं, उतनी ही एधा पट्टियाँ बन जाती हैं। ये पट्टियाँ चाप के रूप में होती हैं। जल्दी ही परिरंभ की वे कोशिकाएँ जो प्रोटोजाइलम के ठीक सामने होती हैं, वे भी विभज्योतक हो जाती हैं और बँटकर कुछ परतें बनाती हैं। ये परतें कुछ समय बाद बनी एधा पट्टियों से मिल जाती हैं, जिससे पूरा संवहन एधा लहरदार वलय के रूप में दिखने लगता है। यह वलय द्वितीयक जाइलम और द्वितीयक फ्लोएम बनाता है। जाइलम अधिक बनता है और फ्लोएम कम बनता है। कुछ समय बाद यह लहरदार वलय गोल हो जाता है, जिससे द्वितीयक वृद्धि होती है। इस पूरी प्रक्रिया में जड़ की चौड़ाई बढ़ती है।
In simple words: जड़ में एधा फ्लोएम के नीचे की कोशिकाओं और प्रोटोजाइलम के सामने की कोशिकाओं से बनती है, जो मिलकर एक वलय बनाती है और जड़ को मोटा करती है।
🎯 Exam Tip: जड़ में एधा का निर्माण हमेशा फ्लोएम के नीचे से शुरू होता है और फिर परिरंभ की कोशिकाओं से जुड़ता है, जिससे एक पूर्ण वलय बनता है।
Question 7. अन्तःकाष्ठ व रसकाष्ठ में क्या अन्तर है ?
Answer:
| अन्तः काष्ठ (Heart Wood) | रस काष्ठ (Sap Wood) |
|---|---|
| 1. यह पेड़ के तने का भीतरी और पुराना भाग होता है। | 1. यह पेड़ के तने का बाहरी और नया भाग होता है। |
| 2. यह गहरा भूरा या कत्थई रंग का होता है। | 2. यह हल्का रंग का होता है। |
| 3. जल का संवहन नहीं होता है। | 3. संवहन होता है। |
| 4. काष्ठ में मृत और नष्ट हुई कोशिकाएँ होती हैं, जिनमें टेनिन, तेल, गोंद आदि जमा होते हैं। | 4. इन पदार्थों का जमाव नहीं होता है और न ही नष्ट हुई कोशिकाएँ, रेजिन और अकार्बनिक पदार्थ जमा होते हैं। |
| 5. टाइलोसिस उपस्थित होते हैं। | 5. अनुपस्थित होते हैं। |
| 6. द्वितीयक वृद्धि से बना सबसे पुराना द्वितीयक जाइलम होता है। | 6. द्वितीयक वृद्धि से बना अभी का द्वितीयक जाइलम होता है। |
| 7. पौधे को यांत्रिक सहायता देती है। | 7. पौधे में जल का संवहन करती है। |
| 8. आर्थिक दृष्टि से काष्ठ उपयोगी होती है। | 8. अनुपयोगी होती है। |
अन्तःकाष्ठ पेड़ का पुराना, मृत और मजबूत हिस्सा होता है जो पानी नहीं ले जाता, जबकि रसकाष्ठ नया, जीवित हिस्सा है जो पानी ले जाता है।
In simple words: अन्तःकाष्ठ पुराना और मजबूत होता है, पानी नहीं ले जाता; रसकाष्ठ नया और सक्रिय होता है, पानी ले जाता है।
🎯 Exam Tip: अन्तःकाष्ठ की कठोरता और कीट प्रतिरोधकता उसे फर्नीचर और इमारती लकड़ी के लिए अधिक उपयोगी बनाती है।
Question 8. घरों में फर्नीचर बनाने के लिए अन्तःकाष्ठ का इस्तेमाल क्यों किया जाता है ? कारण स्पष्ट कीजिए।
Answer: घरों में फर्नीचर बनाने के लिए अन्तःकाष्ठ का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह बहुत टिकाऊ और मजबूत होता है। द्वितीयक वृद्धि के कारण नया जाइलम लगातार बनता रहता है। तने के पुराने या केन्द्रीय भाग की कोशिकाओं में तेल, रेजिन, गोंद, टेनिन आदि पदार्थ जमा होते रहते हैं, और ये कोशिकाएँ मृत व दृढ़ हो जाती हैं। तने का यह भाग कठोर और गहरे भूरे या कत्थई रंग का हो जाता है, जिसे अन्तःकाष्ठ या कठोर काष्ठ (Heart wood or duramen) कहते हैं। यह काष्ठ सबसे ज्यादा टिकाऊ होता है क्योंकि इसमें मौजूद तेल, रेजिन, गोंद आदि के कारण इस पर जीवाणु या कवक का असर नहीं होता और यह जल्दी खराब नहीं होता।
In simple words: अन्तःकाष्ठ का उपयोग फर्नीचर के लिए इसलिए होता है क्योंकि इसमें तेल और रेजिन जैसे पदार्थ होते हैं, जो इसे बहुत मजबूत और कीट-प्रतिरोधी बनाते हैं।
🎯 Exam Tip: अन्तःकाष्ठ की रासायनिक संरचना और मृत कोशिकाओं की उपस्थिति उसे अत्यधिक टिकाऊ बनाती है, जो फर्नीचर के लिए आवश्यक गुण है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 16 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. संवहन एधा का निर्माण कैसे होता है ? द्विबीजपत्री पादपों में रंभीय द्वितीयक वृद्धि का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: संवहन एधा (Fascicular cambium) और कॉर्क एधा (cork cambium) पौधे में द्वितीयक वृद्धि के लिए जिम्मेदार होते हैं। यह द्वितीयक वृद्धि मुख्य रूप से अनावृत्तबीजी (Gymnosperm) और द्विबीजपत्री पादपों की जड़ों और तनों में होती है। द्वितीयक वृद्धि पौधे के अन्दर दो जगहों पर होती है। पहली, रंभ (Stele) के अन्दर संवहन एधा द्वारा जिसे रंभीय द्वितीयक वृद्धि कहते हैं, और दूसरी, रंभ के बाहर कॉर्क एधा द्वारा जिसे बाह्यरंभीय द्वितीयक वृद्धि कहते हैं।
रंभीय द्वितीयक वृद्धि (Stelar secondary growth):
स्तम्भ में संवहन पूलों में फ्लोएम व जाइलम के बीच एधा पाई जाती है, जिसे संवहन एधा या पूलीय एधा (Vascular cambium) कहते हैं। यह एधा शीर्षस्थ विभज्योतक से उत्पन्न प्राएधा (Procambium) से बनती है और विभज्योतक होती है। द्वितीयक वृद्धि के समय पूलीय एधा पहले सक्रिय होकर बाहर की ओर फ्लोएम और अन्दर की ओर जाइलम बनाने लगती है।
इसी समय संवहन पूलों के बीच स्थित मज्जा रश्मि (medullary rays) की वे कोशिकाएँ जो पूलीय एधा की सीधी पंक्ति में होती हैं, वे भी विभज्योतकी (meristematic) हो जाती हैं। इससे संवहन पूलों के बीच एक नई एधा बनती है, इसे अन्तरपूलीय एधा (Interfascicular cambium) कहते हैं। अब पूलीय एधा और अन्तरपूलीय एधा मिलकर एक पूरा वलय (ring) बनाते हैं। यह वलय कोशिकाओं की एक परत का बना होता है। पूलीय एधा वलय की कोशिकाएँ बाह्यत्वचा के समानान्तर तल में बँटती हैं।
जब भी एधा की कोशिका बँटती है, तो इससे बनने वाली दो कोशिकाओं में से एक जाइलम या फ्लोएम बनाती है और दूसरी विभज्योतकी बनी रहती है। इस तरह एधा से दोनों तरफ नई कोशिकाएँ बनती हैं। जो नई कोशिकाएँ केन्द्र की ओर बनती हैं, वे जाइलम के तत्वों में बदल जाती हैं, और बाहर की ओर बनने वाली फ्लोएम तत्वों में बदल जाती हैं। इस प्रकार बने नए जाइलम व फ्लोएम को द्वितीयक जाइलम व द्वितीयक फ्लोएम कहते हैं।
एधा द्वारा इन द्वितीयक ऊतकों का निर्माण एकान्तर क्रम में चलता रहता है। किन्तु अन्दर की ओर बनने वाले जाइलम की मात्रा फ्लोएम की तुलना में अधिक होती है। इस प्रकार स्तम्भ की मोटाई बढ़ती जाती है। यह क्रम हर वृद्धि ऋतु में होता है। इसी एधा से मज्जा किरणों के क्षेत्र में बनने वाली कोशिकाओं से, मज्जा या संवहन किरणों (Pith or vascular rays) का निर्माण होता है। द्वितीयक जाइलम में वाहिकायें (vessels), वाहिनिकायें (trachieds), काष्ठ रेशे (wood fibres) तथा काष्ठ मृदूतक (wood parenchyma) बनते हैं, और द्वितीयक फ्लोएम में चलनी नलिकायें (sieve tubes), सह-कोशिकायें (companion cells), फ्लोएम या वास्ट रेशे (phloem or bast fibres) व फ्लोएम मृदूतक (phloem parenchyma) का निर्माण होता है।
एधा की कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं: रश्मि प्रारम्भिक कोशिकायें (Ray initials) तथा प्यूजीफॉर्म प्रारम्भिक कोशिकायें (Fusiform initials)। रश्मि प्रारम्भिक कोशिकायें समभुजी मृदूतकीय कोशिकाएँ होती हैं जो संवहन रश्मियों या द्वितीयक मज्जा रश्मियों (Vascular rays or secondary medullary rays) का निर्माण करती हैं। प्राथमिक व द्वितीयक मज्जा रश्मियाँ भोज्य पदार्थ तथा जल को परिधि की ऊतकों तक पहुँचाती हैं। फ्यूजीफॉर्म प्रारम्भिक कोशिकायें लम्बी व नुकीली सिरे वाली होती हैं।
In simple words: संवहन एधा, जिसे पूलीय एधा और अन्तरपूलीय एधा कहते हैं, द्वितीयक जाइलम और फ्लोएम बनाकर पौधे की मोटाई बढ़ाती है।
🎯 Exam Tip: रंभीय द्वितीयक वृद्धि में संवहन एधा का वलय पूरा होना और द्वितीयक जाइलम व फ्लोएम का निर्माण समझना महत्वपूर्ण है।
Question 2. निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिये –
(अ) वार्षिक वलय
(ब) वातरंध्र
(स) अन्तकाष्ठ व रसकाष्ठ
(द) पावं मूलों की उत्पत्ति
Answer:
(अ) वार्षिक वलय या वृद्धि वलय (Annual rings or Growth rings):
पूरे साल मौसम में बदलाव होने से संवहन एधा की सक्रियता भी बदल जाती है। बसंत ऋतु और ज्यादा ठंडी के मौसम में बनी लकड़ी में बहुत अंतर होता है। बसंत (spring) ऋतु में रस के संवहन की ज्यादा जरूरत होती है और इस समय एधा तेजी से काम करती है, जिससे बसंत काष्ठ (spring wood or early wood) बनता है। इसमें नलिकाएँ बड़ी होती हैं। शरद ऋतु में एधा की सक्रियता कम हो जाती है, जिससे कम जाइलम बनता है। इसमें नलिकाएँ छोटी होती हैं और रेशे ज्यादा होते हैं। इस लकड़ी को शरद काष्ठ (autumn wood or late wood) कहते हैं। ये दोनों काष्ठ मिलकर संकेन्द्री वलयों में रहते हैं और वार्षिक वलय बनाते हैं। जब पौधे में हर साल इस तरह की वृद्धि होती है, तो वार्षिक वलय संकेन्द्री वलयों (concentric rings) में व्यवस्थित रहते हैं। इन वार्षिक वलयों को गिनकर पौधे की आयु (age) का पता लगाया जा सकता है। इस अध्ययन को वृक्षकालानुक्रमण (Dendrochronology) कहते हैं। वार्षिक वलय की चौड़ाई पर मौसम का भी असर होता है। अच्छे मौसम में वलय चौड़े होते हैं और खराब मौसम में सँकरे।
(ब) वातरन्ध्र (Lentical):
पौधे के तने का बाहरी स्तर बाह्यत्वचा होता है, जिस पर छोटे छिद्रों द्वारा गैसों का आदान-प्रदान होता है। परन्तु द्वितीयक वृद्धि के बाद जब कॉर्क व छाल बन जाती है, तो कॉर्क के कारण यह आदान-प्रदान नहीं हो पाता। फिर भी यह आदान-प्रदान वातरन्ध्रों द्वारा होता है। रंभ के अन्दर और बाहर लगातार द्वितीयक वृद्धि होने से नए द्वितीयक ऊतक बनते रहते हैं, जिससे कॉर्क स्तर पर दबाव पड़ने से छाल फट जाती है। यही फटे स्थल वातरन्ध्र कहलाते हैं। वातरन्ध्र आमतौर पर रन्ध्रों वाले स्थलों पर ही बनते हैं। इन स्थलों पर कॉर्क एधा बाहर की ओर कॉर्क कोशिकाएँ नहीं बनाती, बल्कि अन्तराकोशिकीय अवकाश वाली मृदूतक कोशिकाएँ बनाती है, जिन्हें पूरक कोशिकाएँ (complementary cells) कहते हैं। वातरन्ध्रों के द्वारा गैस का आदान-प्रदान और वाष्पोत्सर्जन होता है।
(स) अन्तः काष्ठ व रस काष्ठ (Heart wood and Sap wood):
जैसे-जैसे पौधे में द्वितीयक वृद्धि होती जाती है, नया बनने वाला काष्ठ केन्द्र में स्थित मज्जा की पुरानी कोशिकाओं और प्राथमिक जाइलम पर दबाव डालता रहता है। इस दबाव से ये कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं और मृत होने से पहले कुछ प्रतिरोधी (antiseptic) पदार्थ जैसे टेनिन, गोंद व अकार्बनिक पदार्थों का स्रावण करती हैं। दबाव के कारण कुछ जाइलम तत्व भी नष्ट हो जाते हैं। इन कोशिकाओं में व्यर्थ पदार्थ (waste products) जमा हो जाते हैं। दबाव के कारण कुछ जाइलम मृदूतक द्वितीयक जाइलम की वाहिकाओं की भित्ति के गर्त से वाहिका गुहा (vessel lumen) में घुसकर गुब्बारे जैसी संरचनाएँ बनाती हैं, जो वाहिका गुहिका को अवरुद्ध कर देती हैं। इन गुब्बारे जैसी संरचनाओं को टाइलोसिस (Tyloses) कहते हैं। टाइलोसिस हमेशा अन्तःकाष्ठ में मिलते हैं और इसकी आयु बढ़ाते हैं। टाइलोसिस वाली वाहिकाओं से जल का संवहन नहीं होता है। पुराने वृक्ष के तने को काटें तो केन्द्र का भाग अधिक गहरे रंग का होता है, इसे अन्तः काष्ठ (heart wood) कहते हैं। बाहरी क्षेत्र कम गहरे रंग का होता है, इसे रस काष्ठ (sap wood) कहते हैं।
अन्तः काष्ठ क्षेत्र में ही दबाव से नष्ट हुई मृत कोशिकाएँ और टाइलोसिस होते हैं। अन्तः काष्ठ के तत्वों में टेनिन, गोंद, तेल व रेजिन जमा होने के कारण इसका रंग गहरा काला होता है। इसमें जल का संवहन नहीं होता, इसका कार्य वृक्ष को यांत्रिक सहायता (mechanical support) देना होता है। इस काष्ठ पर जीवाणु व कवक का असर नहीं होता, इसलिए यह कठोर काष्ठ (duramen) होता है। यह काष्ठ ज्यादा टिकाऊ और मजबूत होने के कारण इसका उपयोग फर्नीचर के निर्माण में होता है। स्तम्भ के केन्द्र वाले गहरे भाग के बाहर कम गहरे रंग का काष्ठ क्षेत्र होता है, इसे रस काष्ठ (sap wood) कहते हैं। इस भाग में मौजूद द्वितीयक जाइलम पुराना नहीं होता, इस क्षेत्र की कोशिकाओं द्वारा जल व घुलित लवणों का सक्रिय संवहन होता है। इस काष्ठ को एलबर्नम (alburnum) भी कहते हैं। पुराने वृक्षों में कभी-कभी अन्तः काष्ठ नष्ट होने से वृक्ष अन्दर से खोखला हो जाता है।
(द) पार्श्व मूलों की उत्पत्तिः
पार्श्व मूलों की उत्पत्ति हमेशा स्थायी ऊतकों से होती है। आवृतबीजी पौधों में आदिदारु के सामने परिरंभ की कोशिकाएँ विभज्योतकी हो जाती हैं और इनमें परिनत विभाजन होने से इस क्षेत्र में कोशिकाओं के कुछ और स्तर बन जाते हैं। अब इनमें अपनत विभाजन होते हैं। परिनत व अपनत विभाजनों से एक उभार बनता है, जिसे पार्श्व मूल आद्यक कहते हैं। यह वृद्धि अरीय दिशा में अंतश्चर्म और वल्कुट में से होते हुए अधिचर्म को भेदकर बाहर निकल आती है। पार्श्व मूल आद्यक की वृद्धि से इसके अरीय मार्ग में आने वाली अंतश्चर्म और वल्कुट कोशिकाएँ दाब पड़ने से घुल जाती हैं। इस प्रकार पार्श्व मूल बाहर की ओर निकलने लगती हैं। विकास के दौरान आद्यक मूल शीर्ष में त्वचाजन, वल्कुटजन तथा रंभजन आदि ऊतकजन अलग-अलग हो जाते हैं। वृद्धि के दौरान अंतश्चर्म एवं वल्कुट की कुछ कोशिकाएँ बँटकर पार्श्व मूल आद्यक का मूल गोप बनाती हैं, जो मूल शीर्ष के बाहर निकलने पर त्वचाजन द्वारा परिवर्धित सामान्य मूल गोप से बदल जाता है। पार्श्वमूल की उत्पत्ति रंभ क्षेत्र के ऊतक यानी परिरंभ से होती है, इसे अंतर्जात उत्पत्ति कहते हैं।
In simple words: वार्षिक वलय पेड़ों की उम्र बताते हैं; वातरंध्र गैसों का आदान-प्रदान करते हैं; अन्तःकाष्ठ मजबूत फर्नीचर लकड़ी है और रसकाष्ठ पानी ले जाता है; पार्श्व मूल जड़ के भीतर से निकलते हैं।
🎯 Exam Tip: इन चारों अवधारणाओं को उनकी मुख्य विशेषताओं और कार्यों के साथ समझना जीव विज्ञान में पौधे की संरचना और वृद्धि को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 3. स्तम्भ व मल में बाह्यरम्भीय द्वितीयक वद्धि का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: बाह्यरंभीय द्वितीयक वृद्धि पौधे के रंभ क्षेत्र के बाहर होती है, जो मुख्य रूप से कॉर्क एधा (cork cambium) की सक्रियता से होती है।
इस सुरक्षात्मक परत के फटने से वल्कुट की बाहरी परतें, जो बाह्यत्वचा के ठीक नीचे होती हैं, विभज्योतकी बनकर विशेष एधा बनाती हैं, जिसे कॉर्क एधा (phellogen) कहते हैं। कॉर्क एधा बँटकर बाहर की ओर कॉर्क या काग (phellem) और अन्दर की ओर द्वितीयक वल्कुट या काग अस्तर (phelloderm) बनाती है। इन दोनों में से बाहर की ओर कॉर्क की कोशिकाएँ अधिक बनती हैं।
कॉर्क कोशिकाएँ सघन, एक-दूसरे से सटी हुई और मृत होती हैं, जो अरीय पंक्तियों में व्यवस्थित रहती हैं और अनुप्रस्थ काट में आयताकार होती हैं। इनकी प्राथमिक भित्ति पर सुबेरिन जमा होने से ये कोशिकाएँ गैस व जल के लिए अभेद्य (impervious) हो जाती हैं। इन कोशिकाओं में हवा भरी होने के कारण कॉर्क जल की सतह पर तैरता है। कॉर्क में सुबेरिन अम्लों के लिए भी रोधक होता है। कॉर्क पौधे को सुरक्षा और यांत्रिक शक्ति देता है, और यह लचीला भी होता है। कोशिकाओं में हवा भरे होने से यह वृक्षों की सतह पर एक कुसंवाहक (bad conductor) का भी काम करता है। कॉर्क का जलरोधी (water proof) गुण होने के कारण, इसका आर्थिक महत्त्व बहुत है।
वाणिज्यिक कॉर्क (commercial cork) भूमध्यसागरीय वृक्ष क्वेरकस सुबर (Quercus suber = Cork Oak) से मिलता है। इस कॉर्क को अक्षय काग (Virgin cork) भी कहते हैं। वृक्ष की 20 वर्ष की आयु होने पर कॉर्क उतारा जाता है। इसके नीचे काग अस्तर की जीवित कोशिकाएँ मर जाती हैं और अब वल्कुट की गहरी परतों में एक नई कागजन उत्पन्न होती है, जो पहले की तुलना में तेजी से कॉर्क बनाती है। 9-10 वर्षों में नई कॉर्क की परत काफी मोटी हो जाती है और व्यापारिक दृष्टि से इसे उतारकर उपयोग में ले लिया जाता है। यह कॉर्क उत्तम होता है। इसके बाद उतारा गया कॉर्क उत्तरोत्तर रूप से श्रेष्ठ होता चला जाता है, जब तक कि वृक्ष 150 वर्षों का नहीं हो जाता।
कॉर्क एधा से अन्दर की ओर बनने वाली कोशिकाएँ काग अस्तर या द्वितीयक वल्कुट (Phelloderm or secondary cortex) में बदल जाती हैं। ये कोशिकाएँ जीवित व मृदूतकीय (सामान्य वल्कुट की कोशिकाओं जैसी) होती हैं। ये कोशिकाएँ अरीय क्रम में व्यवस्थित रहती हैं और इनमें क्लोरोप्लास्ट उत्पन्न हो जाता है। कॉर्क, कॉर्क एधा व काग अस्तर को मिलाकर परित्वक (periderm) कहते हैं। परित्वक से संबंधित कुछ संरचनाएँ होती हैं। यदि कॉर्क एधा एक पूरा वलय में सक्रिय रहती है, तो छाल एक पतली परत वाले घेरे के रूप में बनती है, इसे रिंग बार्क (ring bark) कहते हैं, जैसे भोजपत्र (Betula utilis)। यदि कॉर्क एधा की अलग-अलग पट्टियाँ बनती हैं, तो इस कारण से छाल छोटे-छोटे टुकड़ों में उतरकर गिर जाती है, ऐसी छाल को शल्कीय छाल (Scaly bark) कहते हैं, जैसे अमरूद, पीपल। कार्य की दृष्टि से छाल पौधे के अन्दर वाले ऊतकों की रक्षा करती है।
वातरन्ध्र (Lentical): सामान्य रूप से तने का बाहरी स्तर बाह्यत्वचा होता है, जिस पर उपस्थित रंध्रों द्वारा गैसों का आदान-प्रदान होता है। परन्तु द्वितीयक वृद्धि के बाद जब कॉर्क व छाल बन जाती है, तो कॉर्क के कारण यह आदान-प्रदान नहीं हो पाता। फिर भी यह आदान-प्रदान वातरन्ध्रों द्वारा होता है। निरन्तर रंभ के अन्दर तथा रंभ के बाहर द्वितीयक वृद्धि होने से नए द्वितीयक ऊतक बनते रहते हैं, जिससे कॉर्क स्तर पर दबाव उत्पन्न होने से छाल फट जाती है। यही फटे स्थल वातरन्ध्र कहलाते हैं। वातरन्ध्र आमतौर पर रन्ध्रों वाले स्थलों पर ही बनते हैं। इन स्थलों पर कॉर्क एधा बाहर की ओर कॉर्क कोशिकाएँ नहीं बनाती, बल्कि अन्तराकोशिकीय अवकाश वाली मृदूतक कोशिकाएँ बनाती है, जिन्हें पूरक कोशिकाएँ (complementary cells) कहते हैं। वातरन्ध्रों के द्वारा गैस का आदान-प्रदान और वाष्पोत्सर्जन होता है।
In simple words: बाह्यरंभीय द्वितीयक वृद्धि में कॉर्क एधा बाहर की ओर कॉर्क बनाती है और अन्दर की ओर द्वितीयक वल्कुट, जो पौधे को सुरक्षा और मोटाई प्रदान करते हैं।
🎯 Exam Tip: बाह्यरंभीय द्वितीयक वृद्धि मुख्य रूप से कॉर्क एधा की गतिविधि पर निर्भर करती है, जिससे कॉर्क और परित्वक जैसे बाहरी सुरक्षात्मक ऊतक बनते हैं।
Question 4. द्विबीजपत्री पादपों की मूलों में द्वितीयक वृद्धि को सचित्र समझाइये।
Answer:
द्विबीजपत्री पौधों की जड़ों में द्वितीयक वृद्धि केवल द्विबीजपत्री मूलों में ही होती है। इन जड़ों में अरीय संवहन पूल सीमित संख्या में होते हैं। जाइलम बाहर की ओर होता है (बाह्यआदिदारुक)। सबसे पहले, प्रत्येक फ्लोएम पूल के नीचे की मज्जा किरण की कोशिकाएँ सक्रिय होकर विभज्योतकी हो जाती हैं। इससे एधा की मुड़ी हुई पट्टियाँ बनती हैं, जिनकी संख्या फ्लोएम पूलों जितनी होती है। जल्द ही, परिरंभ की वे कोशिकाएँ जो प्रोटोजाइलम के ठीक सामने होती हैं, वे भी विभज्योतक बन जाती हैं और धीरे-धीरे फ्लोएम के पास वाली एधा पट्टिकाओं से मिल जाती हैं। द्वितीयक वृद्धि पौधों को ऊँचाई के साथ-साथ मोटाई में भी बढ़ने में मदद करती है, जिससे वे अधिक मजबूत और स्थिर होते हैं।
इस प्रकार, जाइलम मृदूतक की मात्रा अधिक होती है। इस द्वितीयक संवहन ऊतक के अंदर प्राथमिक जाइलम धंसा रहता है और प्राथमिक फ्लोएम कुचली हुई अवस्था में दिखाई देता है। परिरंभ से बनी एधा की वे कोशिकाएँ जो प्रोटोजाइलम समूहों के ऊपर होती हैं, वे मज्जा किरणें (medullary rays) बनाती हैं। ये किरणें मृदूतक कोशिकाओं से बनी होती हैं और पट्टियों के रूप में प्रोटोजाइलम से लेकर द्वितीयक फ्लोएम तक फैली रहती हैं।
कॉर्क एधा की सक्रियता (Activity of cork cambium):
परिरंभ की परत विभज्योतकी होकर कॉर्क एधा या फेलोजन (cork cambium or phellogen) बनाती है। कॉर्क एधा बाहर की ओर भूरे रंग की कॉर्क कोशिकाएँ (cork cells = Phellem) बनाती है, और अंदर की ओर द्वितीयक वल्कुट (phelloderm) बनाती है, जिसमें मृदूतकीय कोशिकाएँ होती हैं। इन दोनों से परित्वक (periderm) बनता है। बाहर की सभी ऊतक जैसे अंतस्त्वचा (endodermis), वल्कुट और मुलीयत्वचा (epiblema) जल्दी ही उतर जाते हैं। जड़ों में भी तनों की तरह वातरंध्र बनते हैं, पर वार्षिक वलय नहीं बनते। जड़ों में छाल तनों की तुलना में कम मोटी होती है। परिरंभ भी छाल बनने में मदद करता है।
In simple words: द्विबीजपत्री पौधों की जड़ों में, खास तरह की वृद्धि होती है जो उन्हें मोटा करती है। पहले, कुछ कोशिकाएँ सक्रिय होकर एक वलय बनाती हैं। फिर, इस वलय से नए ऊतक बनते हैं, जिससे जड़ मोटी होती जाती है। छाल और कॉर्क भी इसी प्रक्रिया से बनते हैं, जो पौधे को बचाते हैं।
🎯 Exam Tip: जब भी "सचित्र वर्णन" के लिए कहा जाए, तो हमेशा उत्तर को स्पष्ट और सरल शब्दों में लिखें और सहायक चित्र अवश्य बनाएँ।
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