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Detailed Chapter 12 आण्विक जीवविज्ञान RBSE Solutions for Class 11 Biology
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Class 11 Biology Chapter 12 आण्विक जीवविज्ञान RBSE Solutions PDF
RBSE Class 11 Biology Chapter 12 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. डी.एन.ए. का द्विसूत्री मॉडल प्रतिपादित करने वाले वैज्ञानिक थे –
(a) खुराना एवं निरेनबर्ग
(b) वाटसन व क्रिक
(c) बीडल व टेटम
(d) मॉर्गन एवं ब्रिजेज
Answer: (b) वाटसन व क्रिक
In simple words: डीएनए के डबल हेलिक्स मॉडल को वाटसन और क्रिक ने बनाया था। यह मॉडल डीएनए की संरचना को समझने में बहुत मददगार साबित हुआ।
🎯 Exam Tip: डीएनए के द्विसूत्री मॉडल के प्रतिपादन और इसमें योगदान देने वाले वैज्ञानिकों के नाम याद रखें।
Question 2. निम्नलिखित में से एक रज्जुकी डी.एन.ए. पाया जाता है –
(a) जीवाणु में
(b) TMV में
Answer: (b) TMV में
In simple words: एकल-स्ट्रैंड डीएनए आमतौर पर टीएमवी (टोबैको मोज़ेक वायरस) में पाया जाता है। जबकि, अधिकांश जीवों में डबल-स्ट्रैंड डीएनए होता है।
🎯 Exam Tip: एक-रज्जुकी डीएनए वाले जीवों के उदाहरण याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एक विशेष स्थिति है।
Question 3. ट्रांसलोकेशन क्या है?
(a) ट्रांसक्रिप्शन
(b) ट्रांसलेशन
(c) ट्रांसडक्शन
(d) टर्मिनेलाइजेशन
Answer: (a) ट्रांसक्रिप्शन
In simple words: प्रश्न में विकल्प गलत दिए गए हैं। 'ट्रांसलोकेशन' एक प्रक्रिया है जहाँ राइबोसोम mRNA पर एक कोडॉन आगे बढ़ता है। विकल्पों में से कोई भी इसका सही उत्तर नहीं है, लेकिन दिए गए उत्तरमाला के अनुसार, इसे ट्रांसक्रिप्शन माना गया है जो कि गलत है।
🎯 Exam Tip: ट्रांसलोकेशन, ट्रांसक्रिप्शन, और ट्रांसलेशन जैसी प्रक्रियाओं के सही अर्थ और अंतर को समझना महत्वपूर्ण है ताकि भ्रम से बचा जा सके।
Question 4. कोडोन क्या है ?
(a) mRNA में उपस्थित दो क्षारकों का क्रम
(b) rRNA में उपस्थित तीन क्षारकों का क्रम
(c) mRNA में उपस्थित तीन क्षारकों का क्रम
(d) tRNA में उपस्थित दो क्षारकों का क्रम
Answer: (c) mRNA में उपस्थित तीन क्षारकों का क्रम
In simple words: कोडोन mRNA पर मौजूद तीन क्षारकों का एक समूह होता है, जो एक विशेष अमीनो एसिड को बनाता है।
🎯 Exam Tip: कोडोन की परिभाषा और यह कितने क्षारकों से मिलकर बनता है, यह समझना महत्वपूर्ण है।
Question 5. सिन्ट्रान जीन की है -
(a) संरचनात्मक इकाई
(b) पुनर्योजन इकाई
(c) अनुपूरक इकाई
(d) उत्परिवर्तन इकाई
Answer: (a) संरचनात्मक इकाई
In simple words: सिस्ट्रॉन जीन की सबसे छोटी इकाई होती है जो एक प्रोटीन को बनाने के लिए जरूरी होती है, यानी यह जीन की कार्यात्मक इकाई है।
🎯 Exam Tip: जीन की विभिन्न कार्यात्मक इकाइयों जैसे सिस्ट्रॉन, रिकॉन और म्यूटॉन के बारे में स्पष्ट जानकारी रखें।
Question 6. आर.एन.ए. पॉलीमेरेज का कार्य है –
(a) rRNA संश्लेषण
(b) Hn – RNA संश्लेषण
(c) tRNA संश्लेषण
(d) उपरोक्त सभी
Answer: (d) उपरोक्त सभी
In simple words: आरएनए पॉलीमरेज़ एक एंजाइम है जो आरएनए के सभी प्रकारों जैसे rRNA, Hn-RNA और tRNA को बनाने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: आरएनए पॉलीमरेज़ के विभिन्न कार्यों और उन आरएनए के प्रकारों को समझें जिनका यह संश्लेषण करता है।
RBSE Class 11 Biology Chapter 12 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. डी.एन.ए. मुख्य रूप से जीवों में कहा पाया जाता है ?
Answer: डीएनए मुख्य रूप से सभी सजीव कोशिकाओं के केंद्रक में पाया जाता है। यह कुछ कोशिकाओं के माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट में भी होता है।
In simple words: डीएनए ज़्यादातर कोशिकाओं के केंद्रक में होता है, और कुछ हिस्सों में जैसे माइटोकॉन्ड्रिया में भी मिलता है।
🎯 Exam Tip: डीएनए के प्रमुख स्थान और उसके अपवादों को याद रखें।
Question 3. डी.एन.ए. के दो प्रकारों के नाम लिखिए।
Answer: डीएनए के दो मुख्य प्रकार नीचे दिए गए हैं:
1. A - DNA
2. B - DNA
In simple words: डीएनए के दो मुख्य रूप ए-डीएनए और बी-डीएनए हैं।
🎯 Exam Tip: डीएनए के विभिन्न रूपों को याद रखना और उनके मुख्य अंतरों को समझना उपयोगी है।
Question 4. आर.एन.ए. के थाइमीन के स्थान पर कौनसी नाइट्रोजन क्षारक पाई जाती है ?
Answer: आर.एन.ए. में थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल (Uracil) नामक नाइट्रोजन क्षारक पाई जाती है। डीएनए में थाइमीन होता है, जबकि आरएनए में यह यूरेसिल से बदल जाता है।
In simple words: आरएनए में थाइमीन की जगह यूरेसिल होता है।
🎯 Exam Tip: डीएनए और आरएनए के नाइट्रोजन क्षारकों के बीच के मुख्य अंतर को याद रखें, खासकर थाइमीन और यूरेसिल का अंतर।
Question 5. रिकॉन क्या है ?
Answer: रिकॉन डीएनए का वह सबसे छोटा टुकड़ा है जो जीन के पुनर्योजन (recombination) की इकाई होता है। यह एक ऐसी इकाई है जिसमें आनुवंशिक सामग्री का आदान-प्रदान हो सकता है।
In simple words: रिकॉन डीएनए का सबसे छोटा हिस्सा है जो आनुवंशिक पदार्थों को बदलने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: रिकॉन की परिभाषा और इसकी भूमिका को स्पष्ट रूप से समझें, खासकर पुनर्योजन के संदर्भ में।
Question 6. त्रिक कोड क्या है ?
Answer: प्रत्येक अमीनो अम्ल के लिए तीन नाइट्रोजन क्षारकों के एक क्रम को ही त्रिक कोड या कोडोन कहते हैं। यह कोडोन आनुवंशिक जानकारी को अमीनो अम्ल में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: तीन नाइट्रोजन बेस का एक समूह त्रिक कोड कहलाता है, जो एक अमीनो एसिड बनाता है।
🎯 Exam Tip: त्रिक कोड की परिभाषा और अमीनो एसिड संश्लेषण में इसकी भूमिका को याद रखें।
Question 7. यूकैरियोटिक कोशिकाओं में आर.एन.ए. पॉलीमेरेज कहाँ पाया जाता है ?
Answer: यूकैरियोटिक कोशिकाओं में आर.एन.ए. पॉलीमेरेज केंद्रक (Nucleus) में पाया जाता है। यह केंद्रक के अंदर आरएनए के निर्माण के लिए जिम्मेदार होता है।
In simple words: यूकैरियोटिक कोशिकाओं में आरएनए पॉलीमरेज़ केंद्रक में होता है।
🎯 Exam Tip: यूकैरियोटिक कोशिकाओं में आरएनए पॉलीमरेज़ के स्थान और उसकी भूमिका को याद रखें।
Question 8. प्रोटीन संश्लेषण को आरम्भिक कूट क्या है ?
Answer: प्रोटीन संश्लेषण का आरम्भिक कूट "AUG" है। यह कोडोन मेथिओनिन नामक अमीनो अम्ल को कोड करता है और प्रोटीन निर्माण की शुरुआत का संकेत देता है।
In simple words: प्रोटीन बनने की शुरुआत 'AUG' कोड से होती है।
🎯 Exam Tip: आरम्भिक कूट और उसके द्वारा कोड किए जाने वाले अमीनो अम्ल को याद रखें, क्योंकि यह प्रोटीन संश्लेषण का पहला चरण है।
Question 2. Z - DNA के बारे में आप क्या जानते हैं ?
Answer: Z-DNA की दोनों शृंखलाएँ वामावर्त ढंग से कुंडलित (left handed) होती हैं। यह क्षारकों और डीऑक्सीराइबोज शर्करा के बीच ग्लाइकोसाइडिक बंध बनने के कारण बनता है। इसकी दोहरी कुंडलित संरचना टेढ़ी-मेढ़ी (Zip – zag) होती है। इसके हर कुंडल में 12 न्यूक्लिओटाइड युग्म होते हैं और चूड़ी का अंतराल 69 Å होता है। यह डीएनए मुख्य रूप से जीनोम के उन हिस्सों में पाया जाता है जो कोशिका के काम को नियंत्रित करते हैं। Z-DNA की खोज अलेक्जेण्डर रिचे और उनके साथियों ने की थी। इस तरह का डीएनए लारग्रंथि गुणसूत्रों (Salivary gland chromosome) में भी मौजूद होता है।
In simple words: Z-DNA एक खास तरह का डीएनए है जिसकी दोनों तारें बाएं हाथ की तरह मुड़ी होती हैं। यह कोशिका के कामों को नियंत्रित करने वाले जीनोम के हिस्सों में मिलता है।
🎯 Exam Tip: Z-DNA की मुख्य विशेषताओं जैसे उसकी कुंडलित दिशा, न्यूक्लिओटाइड युग्मों की संख्या और मिलने के स्थान पर ध्यान दें।
Question 3. जीन की परिभाषा लिखिए।
Answer: जीन एक सजीव कोशिका के जीवन चक्र की हर क्रिया को नियंत्रित और निर्देशित करने वाली सबसे छोटी आनुवंशिक इकाई है। यह लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाने में मदद करती है। सिमार बेन्जर की नई सोच के अनुसार जीन को कई भागों में बांटा जा सकता है:
1. सिस्ट्रॉन (Cistron): यह डीएनए का सबसे बड़ा खंड है और जीन की संरचनात्मक इकाई है। यह किसी खास लक्षण के लिए एक उत्पाद बनाता है।
2. रिकॉन (Recon): यह डीएनए का वह सबसे छोटा खंड है जो जीन के पुनर्योजन (recombination) की इकाई है।
3. म्यूटॉन (Muton): यह डीएनए का वह सबसे छोटा खंड है जिसमें उत्परिवर्तन (mutation) करने की क्षमता होती है।
4. रेप्लिकॉन (Replicon): यह डीएनए का वह हिस्सा है जो अपनी नकल बनाने (replication) के लिए जिम्मेदार होता है।
5. कॉम्पलान (Complan): यह डीएनए का वह सबसे छोटा हिस्सा है जो अनुपूरण (complementation) के लिए जिम्मेदार होता है।
6. ओपेरॉन (Operon): ये डीएनए के ऐसे खंड हैं जो एक खास क्रियात्मक इकाई के रूप में काम करते हैं। इसमें संरचनात्मक जीन और ऑपरेटर जीन दोनों मिलकर काम करते हैं।
यहां यह भी बताया गया है कि ऐसी जीन पूरक जीन कहलाती है। यदि दोनों अप्रभावी रूप में मौजूद हों तो भी एक नया लक्षण दिख सकता है।
In simple words: जीन सबसे छोटी आनुवंशिक इकाई है जो कोशिका के सभी कामों को नियंत्रित करती है। इसके कई हिस्से होते हैं, जैसे सिस्ट्रॉन, रिकॉन, और म्यूटॉन, जिनके अलग-अलग काम हैं।
🎯 Exam Tip: जीन की मूल परिभाषा के साथ-साथ उसकी विभिन्न उप-इकाइयों (सिस्ट्रॉन, रिकॉन, म्यूटॉन) और उनके कार्यों को विस्तार से समझें।
Question 5. आनुवंशिक कूट को परिभाषित कीजिए।
Answer: आनुवंशिक कूट, न्यूक्लिओटाइडों की संख्या और उनका क्रम है जो एक अमीनो अम्ल को विशिष्ट बनाता है। इसे कोडोन या कूट कहते हैं। सभी कोडोन का समूह 20 अमीनो अम्लों को विशिष्ट बनाने का काम करता है, जिसे आनुवंशिक कूट (Genetic Code) कहा जाता है।
In simple words: आनुवंशिक कोड न्यूक्लिओटाइडों का एक समूह है जो बताता है कि कौन सा अमीनो एसिड बनाना है।
🎯 Exam Tip: आनुवंशिक कूट की परिभाषा और यह कैसे अमीनो अम्लों को कोड करता है, इस पर ध्यान दें।
Question 6. जीन अभिव्यक्ति के एक दिशीय संचरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: एक दिशीय संचरण (Uni Directional Flow) के अनुसार, प्रोटीन संश्लेषण में आनुवंशिक जानकारी का संचार सिर्फ एक दिशा में होता है। सबसे पहले, यह जानकारी अनुलेखन (Transcription) की प्रक्रिया से डीएनए से मैसेंजर आरएनए (m-RNA) में ट्रांसफर होती है। इसके बाद, विभिन्न प्रकार के आरएनए के माध्यम से m-RNA प्रोटीन की भाषा में अनुलिपिकरण या अनुवाद (Translation) करता है। इस पूरी प्रक्रिया को सेंट्रल डोगमा (Central Dogma) कहते हैं। इस प्रक्रिया को एक फ़्लो के रूप में देखा जा सकता है:
DNA
\( \implies \) अनुलेखन (Transcription)
\( \implies \) m-RNA
\( \implies \) अनुवादन (Translation)
\( \implies \) प्रोटीन
In simple words: जीन अभिव्यक्ति का मतलब है कि जानकारी डीएनए से आरएनए और फिर प्रोटीन तक जाती है, एक सीधी लाइन में। इसे सेंट्रल डोगमा कहते हैं।
🎯 Exam Tip: सेंट्रल डोगमा की अवधारणा और अनुलेखन तथा अनुवाद की प्रक्रियाओं को क्रमबद्ध तरीके से समझें।
Question 7. यूकैरियोटिक कोशिका में पाये जाने वाले पालीमेरेज व उनके स्थल बताइये।
Answer: यूकैरियोटिक कोशिका में तीन तरह के पॉलीमरेज़ एंजाइम पाए जाते हैं। उनके नाम, स्थान और आरएनए संश्लेषण में उनका योगदान नीचे दी गई तालिका में दिया गया है:
| स्थल (Site) | एन्जाइम (Enzyme) | आर.एन.ए. संश्लेषण |
|---|---|---|
| 1. केन्द्रक (Nucleus) | RNA पॉलीमेरेज । | r - RNA के संश्लेषण में योगदान |
| 2. केन्द्रीय द्रव्य (Nucleoplasm) | RNA पॉलीमेरेज ।। | विषमांगी आर.एन.ए. (Hn – RNA) के संश्लेषण में काम आता है। साथ ही Hn – RNA से m – RNA बनाता है। |
In simple words: यूकैरियोटिक कोशिकाओं में तीन तरह के आरएनए पॉलीमरेज़ होते हैं जो अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरह के आरएनए बनाने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: यूकैरियोटिक आरएनए पॉलीमरेज़ के प्रकार, उनके स्थान और प्रत्येक के विशिष्ट कार्यों को तालिका के रूप में याद रखना आसान होगा।
Question 8. अमीनो अम्लों का सक्रियण से आप क्या समझते हैं?
Answer: कोशिका द्रव्य में सभी 20 प्रकार के अमीनो अम्ल पहले निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। लेकिन, ट्रांसफर आरएनए (tRNA) से जुड़ने से पहले, अमीनो अम्ल मैग्नीशियम आयन (\(Mg^{++}\)) और अमीनोएसिल tRNA सिंथेटेस (aminoacyl ~ tRNA synthetase) एंजाइम की मौजूदगी में एटीपी (ATP) के साथ मिलकर सक्रिय हो जाते हैं। इन सक्रिय अमीनो अम्लों को अमीनोएसिल एडिनिलेट (aminoacyl ~ adenylate) कहते हैं। इस प्रक्रिया को इस प्रकार दर्शाया जा सकता है:
अमीनो अम्ल \( + \) ATP \(\xrightarrow{\text{A.A. एन्जाइम}}\) अमीनो एसिल एडिनिलेट \( + \) पाइरोफॉस्फेट
\( \xrightarrow{\text{Mg}^{++}}\) (AMP-AA) (PP)
इसके बाद, अमीनोएसिल tRNA सिंथेटेस एंजाइम के नियंत्रण में, अमीनो एसिल एडिनिलेट tRNA अणुओं से जुड़ जाते हैं। इससे अमीनो एसिल tRNA कॉम्प्लेक्स (amino acyl ~ tRNA कॉम्प्लेक्स) बनता है, जिसे इस प्रकार दिखाया जा सकता है:
AMP-AA \( + \) tRNA \(\xrightarrow{\text{AA.t.RNA}}\) AA~t.RNA \( + \) AMP
\( \implies \) अमीनो एसिल t.RNA कॉम्पलेक्स \( + \) एडीनोसीन मोनोफॉस्फेट
In simple words: प्रोटीन बनने से पहले, अमीनो एसिड को एक्टिव किया जाता है। वे एटीपी और एक खास एंजाइम के साथ मिलकर सक्रिय होते हैं, फिर tRNA से जुड़कर तैयार होते हैं।
🎯 Exam Tip: अमीनो अम्ल के सक्रियण की प्रक्रिया, इसमें शामिल एंजाइम (tRNA सिंथेटेस) और ऊर्जा स्रोत (ATP) को याद रखें।
RBSE Class 11 Biology Chapter 12 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. डी.एन.ए. आनुवंशिक पदार्थ है, समझाइये।
Answer: विभिन्न वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया कि डीएनए (DNA) ही आनुवंशिक पदार्थ (Hereditary material) है। इसके समर्थन में कई प्रमाण दिए गए हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख प्रयोग नीचे दिए गए हैं:
1. जीवाणु रूपांतरण या ग्रिफिथ प्रयोग (Bacterial Transformation or Griffith's Experiment):
वर्ष 1928 में फ्रेडरिक ग्रिफिथ ने डिप्लोकोकस नीमोनी (Diplococcus pneumoniae) जीवाणु पर प्रयोग किए। यह जीवाणु स्तनधारियों में निमोनिया पैदा करता है। उन्होंने इस जीवाणु के दो प्रकारों (strains) का पता लगाया:
* एक प्रकार के जीवाणु खुरदरी भित्ति (Rough walled) वाले होते हैं और उन पर पॉलीसैकेराइड का खोल नहीं होता है। ये निमोनिया नहीं करते और इन्हें अनुग्र विभेद (Nonvirulent strain) या R II कहते हैं। जब इन्हें चूहों में डाला जाता है, तो चूहे जीवित रहते हैं।
* दूसरे प्रकार के जीवाणु चिकनी भित्ति (Smooth walled) वाले होते हैं और उन पर पॉलीसैकेराइड का खोल होता है। ये निमोनिया करते हैं और इन्हें उग्र विभेद (Virulent strain) या S III कहते हैं। जब इन्हें चूहों में डाला जाता है, तो चूहे मर जाते हैं।
ग्रिफिथ ने चार अलग-अलग प्रयोग किए:
1. जब उग्र विभेद S III के जीवाणुओं को चूहे में डाला गया, तो चूहे निमोनिया से मर गए।
2. जब अनुग्र विभेद R II के जीवाणुओं को चूहे में डाला गया, तो चूहे जीवित रहे।
3. जब उग्र विभेद S III को गर्म करके मार दिया गया और फिर चूहों में डाला गया, तो चूहे जीवित रहे।
4. सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग में, ग्रिफिथ ने गर्म करके मारे गए S III जीवाणुओं को जीवित R II जीवाणुओं के साथ मिलाकर चूहों में डाला। इस बार, चूहे निमोनिया से मर गए, और उनके खून में जीवित S III जीवाणु पाए गए।
इस प्रयोग से यह निष्कर्ष निकला कि R II जीवाणुओं ने गर्म करके मारे गए S III जीवाणुओं से कुछ आनुवंशिक सामग्री प्राप्त करके खुद को S III में बदल लिया था, जिससे वे उग्र बन गए। इसे ही ग्रिफिथ प्रभाव या जीवाणु रूपांतरण (Bacterial transformation) कहते हैं। इस रूपांतरण के कारण चूहे मर गए।
2. ऐवरी, मैकलिऑड एवं मैक्कार्टी (Experiment of Avery, MacLeod and McCarty, 1933-44):
इन वैज्ञानिकों ने ग्रिफिथ के प्रयोगों को कांच के पात्रों (in vitro) में दोहराया। उन्होंने देखा कि S III जीवाणुओं के डीएनए को R II जीवाणुओं में डालने से रूपांतरण होता है।
इन वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि प्रोटीन को तोड़ने वाले एंजाइम (प्रोटीऐज) और आरएनए को तोड़ने वाले एंजाइम (राइबो न्यूक्लिऐज) इस रूपांतरण को प्रभावित नहीं करते हैं। इससे साबित होता है कि रूपांतरित होने वाला पदार्थ प्रोटीन या आरएनए नहीं है। अंत में, उन्होंने पुष्टि की कि डीएनए ही वह पदार्थ है जो रूपांतरण के लिए जिम्मेदार है।
3. हर्षे एवं चेज का प्रयोग (Experiment of Hershey and Chase, 1952):
ए.डी. हर्षे और एम.जे. चेज ने 1952 में टी2 बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage) नामक वायरस पर प्रयोग किए। उन्होंने बैक्टीरियोफेज डीएनए को रेडियोएक्टिव फास्फोरस (P32) से और प्रोटीन को रेडियोएक्टिव सल्फर (S35) से लेबल किया।
* जब P32-लेबल वाले बैक्टीरियोफेज को जीवाणुओं से संक्रमित कराया गया, तो रेडियोएक्टिविटी जीवाणुओं के अंदर मिली।
* जब S35-लेबल वाले बैक्टीरियोफेज को जीवाणुओं से संक्रमित कराया गया, तो रेडियोएक्टिविटी जीवाणुओं के बाहर ही रह गई।
इससे साबित हुआ कि केवल डीएनए ही जीवाणु कोशिका में प्रवेश करता है, प्रोटीन नहीं। डीएनए ही आनुवंशिक सूचनाओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है।
इन सभी प्रयोगों ने स्पष्ट रूप से सिद्ध किया कि डीएनए ही आनुवंशिक पदार्थ है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लक्षणों को ले जाता है।
In simple words: कई वैज्ञानिकों ने प्रयोगों से यह साबित किया कि डीएनए ही वह चीज़ है जो माता-पिता से बच्चों में गुण ले जाता है। ग्रिफिथ ने जीवाणुओं में बदलाव दिखाया, ऐवरी, मैकलिऑड और मैक्कार्टी ने बताया कि वह बदलाव डीएनए के कारण था, और हर्षे व चेज ने वायरसों का इस्तेमाल करके इसे और पक्का किया।
🎯 Exam Tip: डीएनए के आनुवंशिक पदार्थ होने के प्रमाण के लिए ग्रिफिथ, ऐवरी-मैकलिऑड-मैक्कार्टी और हर्षे-चेज के प्रयोगों को विस्तार से और उनके निष्कर्षों के साथ याद रखें।
Question 2. डी.एन.ए. की संरचना के वॉटसन एवं क्रिक मॉडल का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: जे.डी. वॉटसन और एफ.एच.सी. क्रिक ने 1953 में डीएनए अणु की डबल हेलिक्स (द्विकुंडलीय) संरचना का मॉडल पेश किया। इस काम के लिए उन्हें 1962 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस मॉडल के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
1. डीएनए अणु दो पॉली न्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं से बना होता है जो एक-दूसरे के चारों ओर दक्षिणावर्त (right-handed) ढंग से कुंडलित होती हैं, जैसे एक घुमावदार सीढ़ी।
2. ये दोनों शृंखलाएँ एक-दूसरे के समानांतर (parallel) होती हैं लेकिन इनकी ध्रुवता विपरीत (antiparallel) होती है। इसका मतलब है कि एक शृंखला का 3'-सिरा दूसरी शृंखला के 5'-सिरे के सामने होता है।
3. प्रत्येक कुंडल लगभग 34.4 Å की दूरी पर होता है, जिसमें 10 क्षार युग्म (base pairs) होते हैं। दो क्षार युग्मों के बीच की दूरी 3.4 Å होती है।
4. डबल हेलिक्स में, न्यूक्लियोटाइड के फॉस्फेट समूह बाहर की तरफ होते हैं जबकि नाइट्रोजन क्षारक अंदर की तरफ होते हैं। नाइट्रोजन क्षारक हेलिक्स की धुरी से 90° के कोण पर व्यवस्थित होते हैं।
5. दोनों शृंखलाएँ आपस में हाइड्रोजन बंधों (hydrogen bonds) द्वारा जुड़ी रहती हैं। एडिनीन (A) थाइमीन (T) के साथ दो हाइड्रोजन बंधों से जुड़ता है, जबकि साइटोसीन (C) ग्वानीन (G) के साथ तीन हाइड्रोजन बंधों से जुड़ता है।
6. क्षारकों के बीच युग्मन (pairing) खास होता है, क्योंकि शर्करा अणुओं के बीच की दूरी 10 से 11 Å होती है। इस दूरी में हमेशा एक प्यूरीन क्षारक और एक पिरिमिडीन क्षारक आपस में जुड़ते हैं।
इरविन चारगॉफ ने 1950 में डीएनए के मात्रात्मक विश्लेषण से क्षार तुल्यता नियम दिया, जिसके अनुसार किसी भी डीएनए अणु में A की मात्रा T के बराबर और G की मात्रा C के बराबर होती है (\(A=T\) और \(G=C\))।
In simple words: वाटसन और क्रिक ने डीएनए का एक मॉडल बताया जिसमें दो तारें एक-दूसरे के चारों ओर मुड़ी होती हैं, जैसे सीढ़ी। इन तारों में नाइट्रोजन बेस होते हैं जो जोड़े बनाते हैं, जैसे A हमेशा T से और C हमेशा G से जुड़ता है।
🎯 Exam Tip: वाटसन और क्रिक मॉडल के मुख्य बिंदुओं को क्रमबद्ध तरीके से याद रखें, जिसमें दोहरे कुंडल की दिशा, क्षार युग्मन के नियम (चारगॉफ का नियम), और हाइड्रोजन बंधों की संख्या शामिल है।
Question 3. डी.एन.ए. की प्रतिकृति की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
Answer: डीएनए में अपनी खुद की कॉपी या प्रतिकृति (replication) बनाने की क्षमता होती है। इस प्रक्रिया को प्रतिलिपीकरण या डीएनए द्विगुणन (duplication) भी कहते हैं। इसमें पहले से मौजूद डीएनए अणु से नया डीएनए अणु बनता है। डीएनए अपने जैसे ही संरचनात्मक प्रतिकृति बनाने या संश्लेषण करने में भाग लेता है। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है:
1. डीएनए अणु की प्रतिकृति के समय न्यूक्लिओटाइड के क्षारकों के बीच के हाइड्रोजन बंध टूट जाते हैं। इससे पॉली न्यूक्लियोटाइड की दोनों शृंखलाएँ अलग हो जाती हैं।
2. अलग हुई दोनों शृंखलाएँ एक-दूसरे की पूरक (complementary) होती हैं। यदि एक शृंखला में एडिनीन क्षारक है, तो दूसरी शृंखला में इसके पूरक के रूप में थाइमीन होगा।
3. इस प्रकार, अलग हुई दोनों शृंखलाएँ खुलती हैं और एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करती हैं। ये दोनों शृंखलाएँ नई शृंखला बनाने के लिए साँचे या टेम्पलेट (template) का काम करती हैं।
4. इन दोनों साँचों के अलावा, लगभग 20 प्रकार के एंजाइम और कोशिका में मौजूद न्यूक्लिओटाइड (A, G, C, T) इस क्रिया में हिस्सा लेते हैं। डीएनए प्रतिकृति में इस्तेमाल होने वाले एंजाइम और कारक मिलकर डीएनए रेप्लिकेट सिस्टम या रेप्लिसोम कहलाते हैं।
5. वाटसन-क्रिक के अनुसार, डीएनए अणु में दोनों शृंखलाएँ एक साथ कुंडलित रहती हैं। प्रतिकृति बनाने के लिए इस कुंडल का खुलना ज़रूरी है, ताकि साँचे के हिस्सों को पढ़ा जा सके।
6. हेलीकेस (helicase) एंजाइम डीएनए के दोहरे कुंडल को एक छोटे हिस्से से खोलता है। इससे एक प्रतिकृति द्विशाख (replication fork) बनता है। इस क्रिया के लिए ऊर्जा की ज़रूरत होती है, जो एटीपी (ATP) के रूप में मिलती है। हर एक नाइट्रोजनी क्षारक युग्म को खोलने के लिए 2 ATP अणुओं का इस्तेमाल होता है।
7. जिस जगह से प्रतिकृति शुरू होती है, उसे प्रारंभिक बिंदु (initiation point) कहते हैं। जब डीएनए की दोहरी कुंडल खुलती है, तो दो रज्जुक या शृंखलाएँ मिलती हैं। इनमें से एक रज्जुक 3' सिरे से द्विशाख से दूर होता है, जिसे अग्रग शृंखला (leading strand) कहते हैं। दूसरी शृंखला 3' सिरे से द्विशाख के पास होती है, जिसे पश्चगामी शृंखला (lagging strand) कहते हैं।
8. डीएनए संश्लेषण तब तक शुरू नहीं होता जब तक आरएनए प्राइमर (primer) टेम्पलेट सूत्र के प्रारंभिक बिंदु पर जुड़ नहीं जाता। आरएनए प्राइमर लगभग 100 नाइट्रोजन क्षारकों की शृंखला होती है। इसके संश्लेषण के लिए एक खास आरएनए पॉलीमरेज़ (RNA polymerase) की ज़रूरत होती है।
9. आरएनए प्राइमर के जुड़ने के बाद, पैतृक डीएनए शृंखला के द्विशाख के 3' सिरे पर नए न्यूक्लिओटाइड इकाइयाँ डीएनए पॉलीमरेज़ एंजाइम की मौजूदगी में जुड़ने लगती हैं। इस तरह, नई शृंखला 5' सिरे से 3' सिरे की ओर बढ़ती है। डीएनए की दोनों शृंखलाओं में दोनों टेम्पलेट 5' सिरा विपरीत दिशा में होता है। इसलिए, डीएनए की प्रतिकृति की दिशा भी दोनों शृंखलाओं में 5' से 3' की ओर, यानी विपरीत दिशा में होती है।
10. नई डीएनए शृंखला में न्यूक्लिओटाइड इकाइयाँ 5' से 3' दिशा में डीएनए पॉलीमरेज़ III एंजाइम की मौजूदगी में जुड़ती हैं।
11. डीएनए संश्लेषण में, डीएनए अणु की दोनों शृंखलाओं की प्रतिकृति अलग-अलग तरह की होती है। अग्रगामी रज्जुक (leading strand) टेम्पलेट 3' से 5' दिशा में लगातार (continuous) संश्लेषण करता है, जबकि पश्चगामी रज्जुक (lagging strand) टेम्पलेट 5' से 3' दिशा में छोटे-छोटे टुकड़ों या खंडों में संश्लेषण करता है। इन खंडों को ओकाज़ाकी खंड (Okazaki fragments) कहते हैं।
12. ये ओकाज़ाकी खंड डीएनए लाइगेज (ligase) एंजाइम द्वारा जोड़ दिए जाते हैं। इस तरह, अग्रगामी और पश्चगामी रज्जुक टेम्पलेट से नई डीएनए शृंखलाएँ सर्पिल बनाकर पूरा डीएनए अणु बनाती हैं। ओकाज़ाकी खंडों के जुड़ने पर आरएनए प्राइमर को हटा दिया जाता है और खाली जगह को डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिओटाइड से भर दिया जाता है।
13. डीएनए द्विशाख की खुली शृंखलाओं पर जैसे-जैसे न्यूक्लिओटाइड जुड़ते जाते हैं, नई शृंखलाएँ सर्पिल बनाती जाती हैं। प्रतिकृति द्विशाख के आगे डीएनए टोपोआइसोमरेज़ (topoisomerase) एंजाइम होते हैं जो डीएनए वलय को एक स्थलाकृति से दूसरी में बदलते हैं। टोपोआइसोमरेज़ डीएनए गाइरेज़ (gyrase) डीएनए के कुंडलित होने और व्यावर्तन को नियंत्रित करता है, जबकि टोपोआइसोमरेज़ हेलीकेस (helicase) कुंडलित संरचना को खोलने में मदद करता है।
In simple words: डीएनए की प्रतिकृति का मतलब है कि डीएनए अपनी खुद की कॉपी बनाता है। इसमें डीएनए के दोनों तार अलग होते हैं, और हर तार एक नया तार बनाने के लिए टेम्पलेट का काम करता है। यह प्रक्रिया एंजाइमों की मदद से होती है और इसमें डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़े भी बनते हैं जो बाद में जुड़ जाते हैं।
🎯 Exam Tip: डीएनए प्रतिकृति के प्रत्येक चरण (खुला होना, प्राइमर का निर्माण, संश्लेषण की दिशा, ओकाज़ाकी खंड) और उसमें शामिल प्रमुख एंजाइमों के कार्यों को क्रमबद्ध रूप से याद रखें।
Question 4. आर.एन.ए. का रासायनिक संगठन एवं भौतिक संरचना बताइये।
Answer: RNA कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) और केन्द्रिका (Nucleolus) में पाया जाता है। कोशिकाद्रव्य में यह राइबोसोम्स के रूप में स्वतंत्र अवस्था में होता है। यह माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट में भी पाया जाता है। कुछ पादप वायरसों (जैसे TMV) में RNA आनुवंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करता है। RNA का रासायनिक विश्लेषण के अनुसार, यह मुख्य रूप से तीन घटकों या यौगिकों से मिलकर बना होता है:
1. शर्करा (Sugar): राइबोज
2. फास्फेट (Phosphate): \( H_3PO_4 \) के रूप में
3. नाइट्रोजन क्षार (Nitrogen base): नाइट्रोजन क्षार दो प्रकार के होते हैं-
(a) प्यूरीन: एडीनीन (Adenine) और ग्वानीन (Guanine)
(b) पिरिमिडीन: सायटोसिन (Cytosine) और यूरेसिल (Uracil)
RNA की संरचना में एक पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला होती है, जिसे राइबोटाइड (Ribotide) कहते हैं। प्रत्येक राइबोटाइड तीन प्रकार के अणुओं - पेन्टोज शर्करा, फॉस्फेट, और नाइट्रोजन क्षार से मिलकर बना होता है। ये अनेक राइबोटाइड मिलकर एक पॉलीराइबोटाइड (Polyribotide) श्रृंखला बनाते हैं। राइबोटाइड को राइबोसाइड (नाइट्रोजन क्षार और राइबोज शर्करा) और फॉस्फेट में बांटा जा सकता है। राइबोसाइड अणु में एडीनोसिन (A), ग्वानोसीन (G), साइटीडिन (C) और यूरेडिन (U) जैसे चार नाइट्रोजन क्षार राइबोज शर्करा के अणु से जुड़े होते हैं।
RNA अशाखित पॉलीन्यूक्लियोटाइड की एकल स्ट्रैंडयुक्त संरचना होती है। यह अक्सर पीछे की ओर मुड़कर स्वयं ही हेलिक्स बनाती है। इस कुंडलित भाग को RNA की द्वितीयक (Secondary) संरचना और अकुंडलित भाग को प्राथमिक (Primary) संरचना कहते हैं। RNA अणु बनते समय एडिनीन (A) यूरेसिल (U) के साथ द्विबन्ध से और साइटोसीन (C) ग्वानीन (G) के साथ त्रिबन्ध से जुड़ते हैं। अकुंडलित क्षेत्र में पूरक क्षार नहीं होते हैं। इसलिए RNA अणु में प्यूरीन्स और पिरामिडिन्स की मात्रा DNA के समान नहीं होती है।
In simple words: RNA हमारे शरीर में एक महत्वपूर्ण अणु है, जो कोशिकाओं के तरल हिस्से और केंद्र में मिलता है। यह शुगर, फॉस्फेट और नाइट्रोजन के टुकड़ों से बना होता है। यह अक्सर खुद पर मुड़कर कुंडली जैसी संरचना बनाता है।
🎯 Exam Tip: RNA के घटकों और उनकी भूमिका को याद रखें, विशेषकर नाइट्रोजन क्षारों के प्रकार और वे कैसे जुड़ते हैं।
Question 5. आर.एन.ए. के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
Answer: RNA को मुख्य रूप से दो प्रकारों में बांटा गया है, जो उनके कार्यों पर आधारित हैं:
1. आनुवंशिक RNA (Genetic RNA)
2. अआनुवंशिक RNA (Non-genetic RNA)
1. आनुवंशिक RNA (Genetic RNA):
यह RNA मुख्य रूप से कुछ पादप विषाणुओं, कुछ जन्तु विषाणुओं और कई जीवाणुभोजी (Bacteriophage) में पाया जाता है। इन जीवों में DNA नहीं होता है, और RNA ही आनुवंशिक पदार्थ का काम करता है। यह एक या दो स्ट्रैंड वाला हो सकता है। दोहरी स्ट्रैंड वाले RNA में नाइट्रोजन क्षार DNA की तरह जोड़ों में मिलते हैं।
विभिन्न वायरसों का आनुवंशिक RNA (Genetic RNA of Different Viruses) इस प्रकार है:
| वाइरस का प्रकार | वाइरस का नाम | आरएनए प्रकार |
|---|---|---|
| 2. जन्तु वाइरस (Animal Viruses) | पोलियो माइलाइटिस | एक-रज्जुकी (SS) |
| रियो वाइरस | द्वि-रज्जुकी (DS) | |
| 3. जीवाणुभोजी (Bacteriophages) | MS 2 | एक-रज्जुकी (SS) |
| F2 | एक-रज्जुकी (SS) | |
| F 17 | एक-रज्जुकी (SS) |
2. अआनुवंशिक RNA (Non-genetic RNA):
जिन जीवों में DNA आनुवंशिक पदार्थ होता है, उनमें अलग-अलग प्रकार के RNA मिलते हैं जिन्हें अआनुवंशिक RNA कहते हैं। ये DNA टेम्पलेट (साँचे) द्वारा बनते हैं। यह हमेशा एक स्ट्रैंड (Single strand, SS) वाला होता है और इसका मुख्य काम कोशिका में प्रोटीन संश्लेषण करना होता है। यह तीन प्रकार के होते हैं:
सभी प्रकार के RNA को एक फ्लो चार्ट द्वारा निम्नांकित क्रम में बांटा जा सकता है:
जेनेटिक RNA
[प्रायः यह अधिकतर पादप वायरसों एवं कुछ जन्तु वायरसों में पाया जाता है तथा इनके सभी आनुवंशिक लक्षणों का नियंत्रण करता है।]
नॉन-जेनेटिक RNA
[वायरसों के अतिरिक्त सभी सजीवों में पाये जाने वाले RNA इसी वर्ग में आते हैं।]
संदेशवाहक RNA (m-RNA) --- राइबोसोमल RNA (r-RNA) --- स्थानान्तरण RNA (t-RNA)
विभिन्न प्रकार के अआनुवंशिक RNA का संक्षिप्त विवरण:
(i) संदेशवाहक RNA (Messenger RNA): इसे दूत RNA या अस्थायी RNA (Unstable RNA) या टेम्पलेट (Template RNA) भी कहा जाता है। इसे संक्षेप में m-RNA कहते हैं।
(ii) राइबोसोमल RNA (Ribosomal RNA or r-RNA): यह RNA राइबोसोम्स में पाया जाता है और कोशिकीय RNA का सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग 80%) होता है। इसे अघुलनशील RNA (Insoluble RNA) भी कहते हैं। यह प्रोटीन संश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण है और इसका निर्माण केंद्रक में होता है।
(iii) स्थानान्तरण-RNA (Transfer RNA - t-RNA): यह RNA केंद्रक के अंदर DNA से बनता है और फिर कोशिका द्रव्य में आ जाता है। इसका मुख्य काम कोशिका द्रव्य में अमीनो-अम्ल को पकड़कर राइबोसोम तक ले जाना और m-RNA पर सही जगह पर फिट करना है, जिससे पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला बन सके। यह जल में घुलनशील होता है, इसलिए इसे विलेय या घुलनशील RNA (Soluble RNA) भी कहते हैं।
In simple words: RNA कई तरह के होते हैं। कुछ RNA आनुवंशिक जानकारी ले जाते हैं, खासकर वायरसों में। दूसरे RNA, जैसे मैसेंजर RNA (m-RNA), राइबोसोमल RNA (r-RNA), और ट्रांसफर RNA (t-RNA), प्रोटीन बनाने में मदद करते हैं। m-RNA संदेश लाता है, r-RNA राइबोसोम का हिस्सा होता है, और t-RNA अमीनो एसिड ले जाता है।
🎯 Exam Tip: RNA के मुख्य तीन प्रकारों (mRNA, tRNA, rRNA) और उनके विशिष्ट कार्यों को विस्तार से समझाएं। उदाहरणों के साथ वर्णन करें।
Question 6. आनुवंशिक कूट पर निबन्ध लिखिए।
Answer:
आनुवंशिक कूट की परिभाषा (Definition of Genetic Code):
प्रोटीन बनाने के लिए DNA में मौजूद क्षारकों का विशिष्ट क्रम ही आनुवंशिक कूट (Genetic Code) कहलाता है। DNA से यह जानकारी ट्रांसक्रिप्शन (Transcription) की प्रक्रिया द्वारा m-RNA में क्षारकों के विशिष्ट क्रम में बदल जाती है, जिसे कोडोन (Codon) कहते हैं। यह कोडोन ही पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में अमीनो अम्लों के क्रम को तय करता है। t-RNA में मौजूद तीन क्षारकों का समूह, जो m-RNA के कोडोन का पूरक होता है, उसे एन्टीकोडोन (Anticodon) कहते हैं।
आनुवंशिक कूट की खोज (Discovery of Genetic Code):
निरेनबर्ग, मैथाई और एम. डब्ल्यू. ने प्रायोगिक रूप से सिद्ध किया कि तीन नाइट्रोजन क्षारकों का क्रम एक अमीनो अम्ल को तय करता है, जिसे त्रिक कोड कहते हैं। हरगोविंद खुराना और रॉबर्ट होले को आनुवंशिक कोड पर काम करने के लिए सन् 1968 में नोबेल पुरस्कार मिला।
1. आनुवंशिक कूट त्रिक कूट होती है (The Code is triplet):
जैसा कि पहले बताया गया है, 20 अमीनो अम्लों को कोडित करने के लिए एकक (सिंगलेट) या द्विक (डबलेट) कूट पर्याप्त नहीं होते। इसलिए, त्रिक कूट ही 20 अमीनो अम्लों को कोडित कर सकता है। यह m-RNA के तीन नाइट्रोजन क्षारकों के विशिष्ट अनुक्रम (Codon) से बनता है। इस तरह के क्षारकों के अलग-अलग अनुक्रमों से 64 कोडोन बन सकते हैं। यदि आनुवंशिक कूट को चार-चार का माना जाए तो 256 कोडोन बनेंगे, जो बहुत ज़्यादा या अनावश्यक हैं।
| त्रिक कोड 4x4x4=64 शब्द | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|
| द्वितीय क्षारक (शब्द) | ||||||
| U | C | A | G | |||
| तृतीय क्षारक (शब्द) | U | UUU Phe. | UCU Ser | UAU Tyr | UGU Cys | U |
| UUA Leu. | UCA | UAA समापन | UGA समापन | A | ||
| UUG | UCG | UAG समापन | UGG Tryp. | G | ||
| C | CUU | CCU Prol. | CAU His. | CGU Arg. | C | |
| CUC Leu. | CCC | CAC | CGC | A | ||
| CUA | CCA | CAA GluN. | CGA | G | ||
| CUG | CCG | CAG | CGG | U | ||
| A | AUU | ACU | AAU | AGU | C | |
| AUC Ileu. | ACC | AAC Asp.N | AGC Ser. | A | ||
| AUA | ACA | AAA | AGA | G | ||
| AUG Meth. | ACG Thr. | AAG Lys. | AGG Arg. | U | ||
| G | GUU | GCU Ala | GAU | GGU | C | |
| GGU Gly. | GCC | GAC Asp. | GGC | A | ||
| GUA Val. | GCA | GAA Glu. | GGA | G | ||
| GUG | GCG | GAG | GGG | |||
3. अनतिव्यापी कूट (Non-overlapping Code):
इसका मतलब है कि किसी खास प्रोटीन के लिए एक ही अक्षर का उपयोग दो अलग-अलग कोडोन में नहीं किया जा सकता। यानी, 6 क्षारकों से 4 अमीनो अम्लों के लिए कूट बनाना संभव है, लेकिन असल में 6 क्षारक एक समय में अधिकतम दो अमीनो अम्लों के लिए ही काफी होते हैं।
4. कोमारहित कूट (Commaless Code):
दो कोडोनों के बीच कोई विराम चिह्न या कोमा नहीं होता है। ये लगातार होते हैं। जब श्रृंखला खत्म होती है, तो वहां एक समापन कूट आ जाता है। समापन कूट किसी भी अमीनो अम्ल को कोडित नहीं करते हैं। ये कूट-UAA, UAG और UGA होते हैं, जिन्हें समापन कोडोन (termination codon) कहते हैं।
5. आनुवंशिक कूट की सार्वत्रिकता (Universality of Genetic Code):
यह सिद्ध हो चुका है कि बैक्टीरिया से लेकर इंसानों तक सभी जीवों में एक ही तरह का आनुवंशिक कूट पाया जाता है। जैसे UUU, फेनिल एलानिन जीवाणु, चूहों और मानव में एक जैसा काम करता है। लेकिन माइटोकॉन्ड्रिया और सीलियायुक्त प्रोटोजोआ इसके अपवाद हैं।
6. आनुवंशिक कूट में अपह्रास (Degeneracy in Genetic Code):
केवल दो अमीनो अम्ल (ट्रिप्टोफेन और मीथिओनिन) ऐसे हैं जिनके लिए सिर्फ एक-एक कोडोन होता है। बाकी सभी अमीनो अम्लों के लिए दो या दो से अधिक त्रिक कोडोन होते हैं। यह प्रणाली जीवों को हानिकारक उत्परिवर्तनों से बचाती है।
7. आरम्भन कोडोन तथा समापन कोडोन (Initiation and termination codon):
प्रोटीन संश्लेषण का आरम्भन कूट AUG होता है और तीन समापन कोडोन-UAA, UAG, UGA होते हैं। ये
🎯 Exam Tip: आनुवंशिक कूट की सभी सात मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट रूप से समझाएं, और प्रत्येक के लिए एक संक्षिप्त उदाहरण दें।
Question 8. अमीनो अम्लों का सक्रियण से आप क्या समझते हैं?
Answer:
अमीनो अम्ल का सक्रियण (Activation of Amino Acids):
कोशिका द्रव्य में सभी 20 प्रकार के अमीनो अम्ल आमतौर पर निष्क्रिय रहते हैं। लेकिन t-RNA से जुड़ने से पहले, अमीनो अम्ल \( Mg^{++} \) और अमीनोएसिल t-RNA सिन्थेटेज (aminoacyl - tRNA synthetase) एन्जाइम की मौजूदगी में ATP के साथ मिलकर सक्रिय हो जाते हैं। इन सक्रिय अमीनो अम्लों को अमीनोएसिल एडिनिलेट (aminoacyl - adenylate) कहते हैं।
अमीनो अम्ल + ATP \( \xrightarrow{\text{A.A. एन्जाइम Mg^{++}}} \) अमीनो एसिल एडिनिलेट + पाइरोफॉस्फेट (AMP-AA) (PP)
इसके बाद, अमीनो एसिल t-RNA सिन्थेटेज एन्जाइम के नियंत्रण में, अमीनो एसिल एडिनिलेट t-RNA अणुओं से जुड़ जाते हैं। इस तरह अमीनो एसिल t-RNA कॉम्प्लेक्स (amino acyl - t-RNA कॉम्प्लेक्स) बनता है।
AMP-AA + t-RNA \( \xrightarrow{\text{AA-tRNA synthetase}} \) AA~t.RNA + AMP (एडीनोसीन मोनोफॉस्फेट)
अमीनो एसिल t-RNA कॉम्प्लेक्स
2. अमीनो अम्लों का t-RNA का स्थानान्तरण (Transfer of Amino Acids to t-RNA):
अनुलिपिकरण के इस चरण में, सक्रिय अमीनो अम्ल (AA) के अणु ऐसे t-RNA अणुओं पर चले जाते हैं जिनका अणुभार कम होता है। ये कम अणुभार वाले t-RNA अणु कोशिका द्रव्य में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं। प्रत्येक अमीनो अम्ल (AA) के लिए एक खास t-RNA अणु होता है। सक्रिय अमीनो अम्ल (AA) के t-RNA पर चले जाने से AMP और सक्रियकारी एन्जाइम अलग हो जाते हैं। यह प्रक्रिया इस प्रकार होती है:
अमीनो एसाइल-AMP-एंजाइम कॉम्प्लेक्स + t-RNA \( \xrightarrow{\text{अमीनो एसाइल सिन्थेटेज}} \) t-RNA-अमीनो एसाइल कॉम्प्लेक्स + AMP + एंजाइम
इस प्रकार मुक्त एंजाइम फिर से सक्रिय होकर दूसरे अमीनो अम्ल अणु को t-RNA से जोड़ सकता है। इस क्रिया के लिए अमीनो एसाइल सिन्थेटेज और \( Mg^{++} \) आयनों की उपस्थिति जरूरी है। m-RNA एक खास जगह पर t-RNA से जुड़ा रहता है। mRNA के कोडोन संदेशों का अनुवाद करने के लिए t-RNA के अणुओं में एन्टीकोडोन (Anticodon) होता है। t-RNA को ग्राहक या अडेप्टर कहा जाता है।
(i) पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का प्रारंभन (Initiation of Polypeptide Chain):
यहां पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का प्रारंभन Mett-RNA नामक न्यूक्लिक अम्ल से होता है। प्रोटीन संश्लेषण में, 40 S राइबोसोम उप-इकाई GTP के साथ शिथिलतापूर्वक जुड़ती है, और तीन प्रोटीन कारक (IF-1, IF-2, IF-3) मिलकर पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला बनाने में मदद करते हैं। इसके अलावा, अमीनो एसाइल t-RNA (AA-t-RNA) ग्राही स्थल से जुड़ता है, जबकि दाता स्थल (Donor site) से पेप्टाइड श्रृंखला को बढ़ाने वाला t-RNA जुड़ता है।
(ii) पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का दीर्धीकरण (Elongation of Polypeptide Chain):
यूकैरियोटिक कोशिका में, 70 S-m-RNA F-met-t-RNA संकुल बनने के बाद, पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला को लगातार लंबा करने का काम अमीनो अम्लों (AA) के जुड़ने से होता है।
(अ) जब दाता स्थल P (P-site) से F-met-t-RNA का जुड़ाव होता है, तब ऊर्जा की जरूरत होती है, जो GTP के अणु से मिलती है।
(ब) पूरी तरह सक्रिय लेकिन खाली पड़े 70S के A स्थल पर दूसरा अमीनो एसाइल t-RNA जुड़ता है और कॉम्प्लेक्स बनाता है। इस प्रक्रिया में, कोशिका द्रव्यीय राइबोसोमल प्रोटीन (दीर्धीकरण कारक T) भी अमीनो एसाइल t-RNA से जुड़ता है।
(स) दीर्धीकरण कारक T (Elongation Factor EF-T): यह GTP के साथ जुड़कर एक विशिष्ट संकुल EF-TU-GTP बनाता है और EF-TS को छोड़ देता है। इसके बाद यह संकुल (Complex) अमीनो एसाइल t-RNA के साथ जुड़कर EFTU-GTP अमीनो एसाइल बनाता है, जो राइबोसोम के A स्थल (सक्रिय और खाली) पर जुड़ जाता है। इसी बीच GTP का जल अपघटन (Hydrolysis) होता है और अकार्बनिक फास्फेट (Pi) और GDP बनता है। यह क्रिया एन्जाइम ट्रांसलोकिज की उपस्थिति में पूरी होती है।
(द) अब, GDP (गुआनोसीन डाइफास्फेट), EFTU-GDP संकुल के रूप में राइबोसोम से अलग हो जाता है। इस प्रक्रिया से सक्रिय अमीनो अम्ल (AA) बिल्कुल सही जगह पर जुड़ता है।
(य) राइबोसोम इसके बाद m-RNA को 5-3 दिशा में हटा देता है, और यह m-RNA पर मौजूद प्रारंभिक बिंदु (Initiation Points) पूरी तरह से स्वतंत्र हो जाता है, जो दूसरे राइबोसोम के साथ जुड़ने के लिए तैयार रहता है। इस तरह एक m-RNA के साथ कई राइबोसोम जुड़ते रहते हैं, जिससे एक पॉलीराइबोसोम संकुल (Polyribosome Complex) बनता है। हर राइबोसोम पर एक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला बनती रहती है, लेकिन विभिन्न राइबोसोम पर उनका आकार और आकृति अलग-अलग होती है।
(iii) पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का समापन (Termination of Polypeptide Chain):
जब प्रोटीन संश्लेषण समाप्त होना होता है, तो कोशिका में इसे रोकने के लिए विशेष संकेत देने वाले कोडोन
🎯 Exam Tip: प्रोटीन संश्लेषण की तीनों प्रमुख अवस्थाओं (प्रारंभन, दीर्धीकरण और समापन) को क्रमबद्ध तरीके से समझाएं और उनमें शामिल मुख्य घटकों (जैसे tRNA, mRNA, राइबोसोम, एन्जाइम) की भूमिका बताएं।
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