RBSE Solutions Class 12 Hindi Chapter 13 गुल्ली-डंडा (कहानी)

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Detailed Chapter 13 गुल्ली-डंडा (कहानी) RBSE Solutions for Class 12 Hindi

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Class 12 Hindi Chapter 13 गुल्ली-डंडा (कहानी) RBSE Solutions PDF

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. इस कहानी में कथानायक विलायती खेलों का सबसे बड़ा ऐब क्या मानते हैं ?
(क) महँगा होना
(ख) सस्ता होना
(ग) चोट को डर
(घ) अधिक समय लगना
Answer: (क) महँगा होना
In simple words: कहानी में लेखक का मानना है कि विदेशी खेल बहुत महंगे होते हैं, जबकि गुल्ली-डंडा जैसे देशी खेल सस्ते होते हैं और आसानी से खेले जा सकते हैं।

🎯 Exam Tip: जब कोई ऐसा सवाल आए कि लेखक या कहानी का नायक क्या सोचता है, तो उसके विचारों को सीधे और सरल शब्दों में लिखें, जैसे यहाँ विदेशी खेलों की महंगी लागत के बारे में बताया गया है।

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. कहानी में लेखक जिस मित्र से मिला, उसका नाम क्या है ?
Answer: कहानी में लेखक अपने जिस मित्र से मिला, उसका नाम गया है।
In simple words: लेखक का दोस्त, जिससे वह कहानी में मिलता है, उसका नाम गया है।

🎯 Exam Tip: पात्रों के नाम हमेशा सही लिखें, क्योंकि यह कहानी को समझने के लिए बहुत ज़रूरी है।

 

Question 2. कहानी का नायक बड़ा होकर क्या बनता है ?
Answer: बड़ा होकर कहानी का नायक इंजीनियर बनता है।
In simple words: कहानी में मुख्य लड़का जब बड़ा होता है, तो वह एक इंजीनियर बन जाता है।

🎯 Exam Tip: नायक के बारे में मुख्य जानकारी, जैसे उसका पेशा, हमेशा याद रखें क्योंकि यह कहानी के विकास में महत्वपूर्ण होता है।

 

Question 3. कथानायक ने गया को गुल्ली-डंडा मैच देखने के लिए कब का समय दिया ?
Answer: कथानायक ने गुल्ली-डंडा का मैच देखने के लिए गया को शाम का समय दिया था।
In simple words: कहानी का नायक गया को गुल्ली-डंडा का खेल देखने के लिए शाम को आने के लिए कहता है।

🎯 Exam Tip: कहानी में समय और स्थान जैसी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दें, क्योंकि वे अक्सर सवालों में पूछी जाती हैं।

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. गया के व्यक्तित्व की तीन विशेषताएँ बताइए।
Answer: गया के व्यक्तित्व की तीन विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. गया गरीब परिवार का एक पतला, लंबा और सांवले रंग का लड़का था।
2. वह गुल्ली-डंडा का बहुत माहिर और कुशल खिलाड़ी था। गुल्ली कभी उसकी पकड़ से छूटती नहीं थी।
3. गया समझदार था। वह कहानी के नायक के अफसर होने के नाते उसका सम्मान करता था और उसकी बेईमानी का विरोध नहीं करता था। लेकिन जब वह मैच देखने का न्योता देता है, तो इससे पता चलता है कि वह अब भी एक अच्छा खिलाड़ी है।
In simple words: गया एक गरीब, दुबला-पतला लड़का था, गुल्ली-डंडा में बहुत अच्छा खिलाड़ी था, और वह समाज में पद के महत्व को समझता था।

🎯 Exam Tip: किसी पात्र के गुणों का वर्णन करते समय, उसकी शारीरिक बनावट, कौशल और व्यवहार को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें।

 

Question 3. खेल में पदने से बचने के लिए कथानायक क्या चालें चलता है ?
Answer: कथानायक नहीं चाहता था कि गया उसे खेल में आउट करे, इसलिए वह आउट होने से बचने के लिए कई चालें चलता था। वह गया को एक दिन पहले खिलाए अमरूद की याद दिलाता था। आउट होने के बाद भी वह डंडा चलाता था। वह गया को खेलने की बारी नहीं आने देता था। अगर गुल्ली थोड़ी दूर गिरती थी, तो वह खुद उसे उठा लाता था और दो बार डंडा मारता था। अगर गुल्ली डंडे से लग भी जाती थी, तो भी वह अनजान बन जाता था। वह अंधेरा होने का बहाना बनाकर आउट होने से बचना चाहता था।
In simple words: लेखक खेल में आउट होने से बचने के लिए गया को अमरूद खिलाने की बात याद दिलाता था, बेईमानी से डंडा चलाता था, और अंधेरे का बहाना करता था।

🎯 Exam Tip: कहानी में नायक की चालों को क्रम से लिखें और बताएं कि हर चाल का क्या मकसद था।

 

Question 4. कथानायक के अनुसार बच्चों में ऐसी कौन-सी शक्ति होती है, जो बड़ों में नहीं होती ?
Answer: कथानायक के अनुसार, बच्चों में यह खास शक्ति होती है कि वे झूठी बातों को भी आसानी से सच मान लेते हैं। बड़ों में ऐसी शक्ति नहीं होती। बड़े लोग तो सच को भी झूठ में बदल देते हैं, लेकिन बच्चों की तरह झूठ को सच नहीं बना सकते।
In simple words: लेखक कहता है कि बच्चे झूठ को भी सच मान लेते हैं, जबकि बड़े लोग सच को झूठ बना सकते हैं।

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में, बच्चों और बड़ों के स्वभाव के अंतर को साफ-साफ बताएं, खासकर उनकी सोच और मान्यताओं में।

 

Question 5. कथानायक और गया के बीच स्मृतियाँ सजीव होने में कौन-सी बात बाधा बनती है ? और क्यों ?
Answer: कथानायक अब एक बड़ा अधिकारी था, जबकि गया एक मामूली साईस (घोड़ों की देखभाल करने वाला) था। दोनों के बीच पद और प्रतिष्ठा का बहुत बड़ा अंतर था। जब यह अंतर गया के सामने आता था, तो वह समझ जाता था कि अब बचपन की तरह उनमें समानता नहीं रही। इसी कारण उनकी पुरानी यादें पूरी तरह से ताज़ा नहीं हो पाती थीं।
In simple words: लेखक और गया के बीच उनके पद और सामाजिक प्रतिष्ठा का अंतर उनकी पुरानी यादों को पूरी तरह से ताजा होने से रोक रहा था।

🎯 Exam Tip: जब संबंध में बाधा के बारे में पूछा जाए, तो मुख्य कारण (जैसे सामाजिक या आर्थिक अंतर) और उसके प्रभाव को स्पष्ट करें।

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 निबंधात्मक प्रश्नोत्तर

 

Question 1. गुल्ली-डंडा कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि पद और प्रतिष्ठा मनुष्य और मनुष्य के बीच के नैसर्गिक सम्बन्ध को समाप्त कर देते हैं।
Answer: बचपन मनुष्य के जीवन का वह समय होता है, जब प्रेम और अपनेपन की स्वाभाविक भावना होती है। बच्चे सभी से प्यार करते हैं और सबको एक समान समझते हैं। लेकिन जब बच्चा बड़ा होता है और समाज में आता है, तो यह भावना खत्म हो जाती है। ऊँच-नीच और भेदभाव जैसी बातें समाज की देन हैं। जो बच्चे बचपन में साथ खेलते हैं, बड़े होने पर उनके बीच की समानता और अपनेपन की भावना खत्म हो जाती है। जब कोई व्यक्ति बड़ा होकर किसी बड़े पद पर पहुँचता है और उसे बहुत सम्मान और अच्छी आय मिलती है, तो वह खुद को दूसरों से बड़ा मानने लगता है।
लेखक को गया के खेल में बचपन वाली दक्षता नहीं दिखी। लेखक को लगा कि उसकी अफसरशाही ने उनके बीच एक दीवार बना दी है। गया उसके साथ खेल नहीं रहा था, बल्कि उसका मन रखने के लिए खेल रहा था। वह लेखक की हर बेईमानी को बिना विरोध किए सह रहा था। लेखक के पद और प्रतिष्ठा ने दोनों में असमानता की भावना पैदा कर दी थी।
In simple words: कहानी दिखाती है कि बचपन में सब दोस्त समान होते हैं, लेकिन बड़े होकर जब कोई व्यक्ति ऊँचे पद और सम्मान पर पहुँच जाता है, तो उसके और उसके पुराने दोस्तों के बीच का प्राकृतिक रिश्ता बदल जाता है और बराबरी खत्म हो जाती है।

🎯 Exam Tip: ऐसे विस्तृत प्रश्नों में, कहानी के मुख्य संदेश को स्पष्ट करने के लिए बचपन की समानता और बड़े होने पर आए बदलावों का तुलनात्मक वर्णन करें।

 

Question 2. कथानायक की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।
Answer: गुल्ली-डंडा कहानी के कथानायक की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
* थानेदार का पुत्र: कथानायक कस्बे में तैनात थानेदार का बेटा था। उसके पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी थी और समाज में उन्हें सम्मान मिलता था।
* प्रेम और समानता: कथानायक के मन में अपने दोस्तों के लिए प्यार की भावना थी। वह सबको बराबर समझता था और उनके साथ मिलकर खेलता था। अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति के कारण वह खुद को दूसरों से ऊँचा या नीचा नहीं समझता था।
* गुल्ली-डंडा का खिलाड़ी: उसे गुल्ली-डंडा खेलने का बहुत शौक था। वह अपने दोस्तों के साथ सुबह से ही खेलने निकल पड़ता था। वह खेल में इतना मगन रहता था कि उसे खाने-नहाने की भी याद नहीं रहती थी। घर पर उसकी प्रतीक्षा होती रहती थी।
* पढ़ाई में प्रवीण: वह पढ़ने-लिखने में होशियार था। बड़ा होकर वह इंजीनियर बना और जिले के अधिकारी पद पर नियुक्त हुआ।
* बाल मित्रों तथा क्रीड़ा भूमि की स्मृति: वह अपने बचपन के दोस्तों और खेल के मैदानों की यादों से व्याकुल रहता था। जिले के दौरे पर आने के समय वह पुरानी जगहों को देखने निकलता है और अपने बचपन के दोस्त गया को ढूंढ लेता है। वह उस जगह को गले लगाना चाहता था।
* नई जगह देखने को उत्सुक: उसके पिता का तबादला एक बड़े शहर में हो गया। वह यह जानकर खुश होता है। अपने दोस्तों से बिछड़ने की चिंता छोड़कर वह नई जगह देखने को उत्सुक रहता है। वह उस जगह के बारे में अपने दोस्तों को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है। उसके दोस्त उसके सौभाग्य पर उससे ईर्ष्या करते हैं।
In simple words: कहानी का नायक थानेदार का बेटा, प्रेम और समानता में विश्वास रखने वाला, गुल्ली-डंडा का शौकीन, पढ़ाई में होशियार, पुरानी यादों से जुड़ा हुआ और नई जगहों को देखने के लिए उत्सुक था।

🎯 Exam Tip: नायक की विशेषताओं को बताते समय, प्रत्येक विशेषता के लिए एक संक्षिप्त विवरण दें, और उदाहरण के तौर पर कहानी से जुड़ी घटनाएँ बताएं।

 

Question 3. निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) मैं समझता था ............. यह सरासर अन्याय था।
(ख) मैं खेल में न था ............. मैं छोटा हो गया हूँ।
Answer: इन गद्यांशों की व्याख्या "महत्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्याएँ" शीर्षक के अंतर्गत दी गई है। (कृपया संबंधित अनुभाग देखें।)
In simple words: इन हिस्सों का मतलब समझने के लिए आपको कहानी के मुख्य व्याख्या वाले भाग को देखना होगा।

🎯 Exam Tip: जब गद्यांशों की व्याख्या का प्रश्न आए और उत्तर में किसी अन्य अनुभाग का संदर्भ दिया गया हो, तो सुनिश्चित करें कि आप उस अनुभाग को ढूंढकर और समझकर उत्तर दें।

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 2. गया गुल्ली पर इस तरह लपकता था -
(क) जैसे बन्दर फलों पर लपकता है।
(ख) जैसे शेर शिकार पर लपकता है।
(ग) जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है।
(घ) जैसे वकील मुवक्किल पर लपकता है।
Answer: (ग) जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है।
In simple words: गया गुल्ली पकड़ने में इतना फुर्तीला था, जैसे छिपकली कीड़े पकड़ती है।

🎯 Exam Tip: मुहावरेदार या तुलनात्मक वाक्यों को ध्यान से पढ़ें और सही विकल्प चुनें जो सटीक अर्थ बताता हो।

 

Question 3. लॉन, कोर्ट, नेट, थापी की जरूरत किस खेल में नहीं होती ?
(क) क्रिकेट ।
(ख) वालीबाल
(ग) बैडमिन्टन
(घ) गुल्ली-डंडा।
Answer: (घ) गुल्ली-डंडा
In simple words: गुल्ली-डंडा एक ऐसा खेल है जिसमें मैदान, जाल या रैकेट जैसी चीजों की जरूरत नहीं होती।

🎯 Exam Tip: खेलों की विशेषताओं से संबंधित प्रश्नों में, हर विकल्प के गुणों को याद रखें और सही जवाब चुनें।

 

Question 4. मतई, मोहन, दुर्गा, गया तथा कृष्णा में से कथानायक का सहचर नहीं था –
(क) मतई
(ख) मोहन
(ग) कृष्णा
(घ) दुर्गा।
Answer: (ग) कृष्णा
In simple words: कथानायक के बचपन के दोस्तों में से कृष्णा नहीं था।

🎯 Exam Tip: कहानी के पात्रों और उनके संबंधों को ध्यान से याद रखें, खासकर जब किसी पात्र की पहचान के बारे में पूछा जाए।

 

Question 5. कथानायक अपने तथा गया के बीच दीवार मानता है –
(क) अपनी ऊँची पढ़ाई को
Answer: (क) अपनी ऊँची पढ़ाई को
In simple words: लेखक अपनी उच्च शिक्षा को गया के साथ अपने संबंध में एक रुकावट मानता है।

🎯 Exam Tip: जब संबंध में बाधा के बारे में पूछा जाए, तो मुख्य कारण (जैसे सामाजिक या आर्थिक अंतर) और उसके प्रभाव को स्पष्ट करें।

 

Question 6. गुल्ली-डंडा खेल से सम्बन्धित शब्द है –
(क) गुच्ची
(ख) पाला
(ग) लॉन
(घ) नेट।
Answer: (क) गुच्ची
In simple words: गुल्ली-डंडा खेल से जुड़ा एक खास शब्द 'गुच्ची' है, जो खेल का एक हिस्सा है।

🎯 Exam Tip: किसी विशेष खेल या विषय से जुड़े शब्दों को याद रखें, क्योंकि वे अक्सर सीधे पूछे जाते हैं।

 

Question 7. गया और कथानायक भीमताल तक गये थे –
(क) पैदल
(ख) मोटर में बैठकर
(ग) घोड़े पर बैठकर
(घ) साइकिल पर बैठकर
Answer: (ख) मोटर में बैठकर
In simple words: गया और लेखक भीमताल तक जाने के लिए मोटरगाड़ी का इस्तेमाल करते हैं।

🎯 Exam Tip: कहानी में पात्रों के यात्रा के साधनों और स्थानों को ध्यान से देखें, क्योंकि वे अक्सर याद रखने में आसान होते हैं और सीधे पूछे जाते हैं।

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. प्रेमचन्द द्वारा लिखी हुई पहली कहानी कौन-सी है ?
Answer: 'पंचपरमेश्वर' प्रेमचन्द की पहली कहानी मानी जाती है। कुछ लोग 'संसार का अनमोल रतन' को भी उनकी पहली कहानी मानते हैं।
In simple words: प्रेमचंद की पहली कहानी 'पंचपरमेश्वर' है, पर कुछ लोग 'संसार का अनमोल रतन' को भी उनकी पहली कहानी मानते हैं।

🎯 Exam Tip: लेखक के महत्वपूर्ण कार्यों, खासकर उनकी पहली रचनाओं के नाम याद रखें।

 

Question 2. बंगाली भाषा के उपन्यासकार शरतचन्द्र ने प्रेमचन्द को क्या उपाधि प्रदान की थी ?
Answer: बंगाली भाषा के उपन्यासकार शरतचन्द्र ने प्रेमचन्द को 'उपन्यास-सम्राट' की उपाधि दी थी।
In simple words: शरतचंद्र ने प्रेमचंद को 'उपन्यास-सम्राट' का नाम दिया था।

🎯 Exam Tip: लेखकों को मिली उपाधियाँ और उन्हें देने वाले व्यक्ति के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. प्रस्तुत कहानी का नाम 'गुल्ली डंडा' क्यों रखा गया है ?
Answer: प्रेमचन्द की नजर में 'गुल्ली-डंडा' सभी खेलों का राजा है। इसलिए कहानी का नाम 'गुल्ली-डंडा' रखा गया है।
In simple words: कहानी का नाम 'गुल्ली डंडा' इसलिए रखा गया क्योंकि प्रेमचंद इसे सभी खेलों में सबसे अच्छा मानते थे।

🎯 Exam Tip: कहानी के शीर्षक का औचित्य समझाते हुए, लेखक के विचारों को स्पष्ट करें और बताएं कि शीर्षक क्यों उपयुक्त है।

 

Question 5. बचपन में लेखक को गया के साथ झगड़ा क्यों हुआ था ?
Answer: बचपन में लेखक को गया के साथ झगड़ा इसलिए हुआ था क्योंकि गया लेखक को गुल्ली-डंडा के खेल में आउट करना चाहता था, लेकिन लेखक आउट नहीं होना चाहता था। वह बहाने बनाकर खेल से भाग रहा था।
In simple words: लेखक और गया के बीच झगड़ा इसलिए हुआ क्योंकि गया लेखक को खेल में आउट कर रहा था, और लेखक आउट नहीं होना चाहता था।

🎯 Exam Tip: कहानी में दोस्तों के बीच के झगड़े का मुख्य कारण और उसके पीछे की भावना को संक्षेप में बताएं।

 

Question 6. "मैं समझता था, न्याय मेरी ओर है"- लेखक ऐसा क्यों समझता था ?
Answer: लेखक ऐसा इसलिए समझता था क्योंकि उसने एक दिन पहले गया को अमरूद खिलाया था। लेखक को लगता था कि अमरूद खाने के बाद गया को उससे अपनी बारी मांगने का कोई हक नहीं था।
In simple words: लेखक को लगता था कि उसने गया को अमरूद खिलाया था, इसलिए गया को खेल में उसकी बारी नहीं मांगनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: उद्धरण वाले प्रश्नों में, उद्धरण के पीछे के कारण को स्पष्ट करें और बताएं कि लेखक के विचार क्या थे।

 

Question 7. लेखक के पिता कौन थे ?
Answer: लेखक के पिता थानेदार थे।
In simple words: लेखक के पिताजी थानेदार के पद पर थे।

🎯 Exam Tip: कहानी के मुख्य पात्रों और उनके परिवार के सदस्यों के पेशे को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. इंजीनियर बनने के बाद कस्बे में आने पर लेखक किसके लिए व्याकुल था ?
Answer: इंजीनियर बनने के बाद कस्बे में आने पर लेखक अपने बचपन के खेल के मैदानों (क्रीड़ास्थलों) को देखने के लिए व्याकुल था।
In simple words: इंजीनियर बनने के बाद लेखक को अपने बचपन के खेल के मैदानों की बहुत याद आ रही थी।

🎯 Exam Tip: नायक की भावनाओं और उसके कारणों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करें, खासकर जब वह किसी स्थान या स्मृति के लिए व्याकुल हो।

 

Question 9. गया झेंप क्यों रहा था ?
Answer: लेखक ने गया के सामने गुल्ली-डंडा खेलने का प्रस्ताव रखा था। गया इसलिए झेंप रहा था क्योंकि लेखक की पद-प्रतिष्ठा और अपनी मामूली स्थिति के अंतर के कारण वह उस प्रस्ताव को स्वीकार करने में संकोच कर रहा था।
In simple words: गया इसलिए शरमा रहा था क्योंकि लेखक एक बड़ा अफसर था और वह खुद एक साधारण आदमी था, इसलिए वह उसके साथ खेलने में हिचकिचा रहा था।

🎯 Exam Tip: पात्रों के व्यवहार के पीछे के सामाजिक या भावनात्मक कारणों को स्पष्ट करें।

 

Question 9. लेखक के साथ गुल्ली-डंडा खेलते समय गया ने असंतोष प्रकट क्यों नहीं किया ?
Answer: गया लेखक के साथ गुल्ली-डंडा खेल नहीं रहा था, बल्कि उसे सिर्फ खिला रहा था। इसलिए, जब लेखक बेईमानी कर रहा था, तब भी गया ने कोई असंतोष प्रकट नहीं किया।
In simple words: गया इसलिए चुप था क्योंकि वह लेखक को सिर्फ खिला रहा था, खुद खेल नहीं रहा था, इसलिए उसने लेखक की बेईमानी पर गुस्सा नहीं किया।

🎯 Exam Tip: पात्रों के शांत रहने या प्रतिक्रिया न देने के कारणों को बताएं, खासकर जब यह उनके सामाजिक स्थिति या संबंध को दर्शाता हो।

 

Question 10. 'मैं खेल में न था'- कहने का क्या तात्पर्य है ?
Answer: 'मैं खेल में न था' कहने का मतलब है कि लेखक गया की दया का पात्र था। गया उसे अपने बराबर का खिलाड़ी नहीं मानता था। वह सिर्फ दया दिखाकर लेखक को खेल में जिता रहा था।
In simple words: इस बात का मतलब है कि लेखक सिर्फ गया की दया पर खेल रहा था, क्योंकि गया उसे अपना बराबरी का खिलाड़ी नहीं मानता था।

🎯 Exam Tip: वाक्यांशों के गहरे अर्थ को समझाते समय, उसके पीछे की भावना और पात्रों के बीच के संबंध को स्पष्ट करें।

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. कहानी का शीर्षक 'गुल्ली-डंडा' क्यों रखा गया है ?
Answer: गुल्ली-डंडा खेल में गुल्ली और डंडा दोनों का होना बहुत ज़रूरी है। इन दोनों चीजों के बिना यह खेल खेला नहीं जा सकता। इस कहानी में लेखक और गया के गुल्ली-डंडा खेलने का वर्णन है। कहानी का मुख्य केंद्र गुल्ली और डंडा ही है। इसलिए, यह शीर्षक पूरी तरह से सही है।
In simple words: कहानी का नाम 'गुल्ली-डंडा' रखा गया क्योंकि यह खेल के बारे में है, और गुल्ली-डंडा इस खेल के दो सबसे मुख्य हिस्से हैं।

🎯 Exam Tip: शीर्षक की सार्थकता बताते समय, कहानी के मुख्य विषय और केंद्रीय तत्वों का उल्लेख करें।

 

Question 2. 'गुल्ली-डंडा' कहानी की विषय-वस्तु क्या है ?
Answer: लेखक और गया द्वारा खेले गए गुल्ली-डंडा का खेल ही इस कहानी का मुख्य विषय है। इस कहानी में लेखक ने बहुत ही कुशलता से इस सच्चाई को दिखाया है कि पद और प्रतिष्ठा इंसानों के बीच की प्राकृतिक समानता को खत्म कर देते हैं। इंजीनियर बनने के बाद लेखक गुल्ली-डंडा खेल में गया का बराबरी का खिलाड़ी नहीं रह जाता।
In simple words: कहानी का मुख्य विषय यह दिखाना है कि कैसे पद और सामाजिक प्रतिष्ठा बचपन की दोस्ती और समानता को खत्म कर देती है।

🎯 Exam Tip: कहानी की विषय-वस्तु बताते समय, उसके मुख्य संदेश और पात्रों के बीच के संबंधों में आए बदलावों पर ध्यान दें।

 

Question 3. गुल्ली-डंडा को सब खेलों का राजा क्यों कहा गया है
Answer: गुल्ली-डंडा एक महंगा खेल नहीं है। किसी भी पेड़ की टहनी से गुल्ली और डंडा आसानी से बनाए जा सकते हैं। इसे खेलने के लिए किसी लॉन, कोर्ट, नेट या रैकेट की ज़रूरत नहीं होती। इसे किसी भी खुली जगह में खेला जा सकता है। यह खेल सिर्फ दो खिलाड़ी होने पर भी खेला जा सकता है, और इसके लिए किसी बड़ी टीम की ज़रूरत भी नहीं होती।
In simple words: गुल्ली-डंडा को सभी खेलों का राजा कहा गया है क्योंकि यह बहुत सस्ता है, आसानी से खेला जा सकता है, और इसमें किसी खास जगह या उपकरण की ज़रूरत नहीं होती।

🎯 Exam Tip: किसी खेल की विशेषताओं को बताते समय, उसके फायदे (जैसे सस्ता होना, आसानी से उपलब्ध होना) और खेलने की सरलता पर जोर दें।

 

Question 4. 'गरीब लड़कों के लिए क्यों यह व्यसन मढ़ते हो-" इस कथन में किस बात का निषेध किया गया है ?
Answer: इस कथन में यह निषेध किया गया है कि भारत में देशी खेलों को छोड़कर अंग्रेजी खेल खिलाए जाते हैं। स्कूलों में मोटी फीस की बड़ी रकम इन्हीं खेलों पर खर्च की जाती है। देशी खेल सस्ते होते हैं, जबकि अंग्रेजी खेल अमीर लोगों के लिए होते हैं। भारतीय लोग गरीब हैं, इसलिए उन्हें अंग्रेजी खेल खिलाना गलत है। लेखक ने गरीब भारतीय विद्यार्थियों को अंग्रेजी खेल खिलाने का विरोध किया है।
In simple words: इस बात में यह कहा गया है कि गरीब बच्चों को महंगे अंग्रेजी खेल खिलाने के बजाय सस्ते देशी खेल खिलाने चाहिए।

🎯 Exam Tip: जब किसी कथन में निषेध पूछा जाए, तो उस बात का स्पष्टीकरण करें जिसे मना किया गया है और उसके पीछे के कारणों को भी बताएं।

 

Question 6. लेखक के साथ गुल्ली-डंडा खेलने वाले गया की क्या विशेषताएँ हैं ?
Answer: गया एक बहुत ही कुशल और चतुर खिलाड़ी था। वह लेखक से दो-तीन साल बड़ा था। वह दुबला, पतला और लंबा था। उसकी उँगलियाँ बंदरों की तरह पतली और लंबी थीं। उसमें बंदरों जैसी फुर्ती थी। वह गुल्ली को बहुत तेज़ी से लपकता था और गुल्ली कभी उसकी पकड़ से नहीं छूटती थी। खेल में सब उसे अपना साथी बनाना पसंद करते थे।
In simple words: गया गुल्ली-डंडा का बहुत माहिर खिलाड़ी था, फुर्तीला था, और सब उसे अपनी टीम में लेना चाहते थे।

🎯 Exam Tip: पात्रों की शारीरिक और खेल से जुड़ी विशेषताओं को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें, जिससे उनका चित्रण स्पष्ट हो सके।

 

Question 7. आप 'गुल्ली-डंडा' खेल से सम्बन्धित किन शब्दों से परिचित हैं ? नामोल्लेख करके किन्हीं दो के बारे में बताइए।
Answer: 'गुल्ली-डंडा' खेल से संबंधित कुछ शब्द हैं: डंडा, गुल्ली, गुच्ची, पदना, पदाना, दाँव देना, दाँव लेना, टाँड लगाना, हुच। इनमें से दो का वर्णन इस प्रकार है:
* गुच्ची: यह जमीन पर डंडे की मदद से बनाई गई एक खाई या दरार होती है जिस पर गुल्ली रखकर डंडे से उछाली जाती है।
* हुच जाना: इसका मतलब है कि खिलाड़ी खेल से बाहर हो गया। जब गुल्ली गुच्ची पर रखे डंडे से टकराती है, तो खिलाड़ी अपनी बारी से हट जाता है।
In simple words: गुल्ली-डंडा खेल में कई शब्द होते हैं जैसे गुच्ची (जमीन पर बनी खाई) और हुच जाना (खिलाड़ी का खेल से बाहर हो जाना)।

🎯 Exam Tip: खेल या विषय से संबंधित तकनीकी शब्दों को सूचीबद्ध करें और किन्हीं दो का संक्षिप्त और स्पष्ट विवरण दें।

 

Question 8. “यह सरासर अन्याय था” – लेखक की दृष्टि में अन्याय क्या था? क्या आप भी ऐसा मानते हैं ?
Answer: लेखक गया को अपनी बारी दिए बिना ही जाना चाहता था। वह बचने के लिए कई चालें चल रहा था, लेकिन गया उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था। एक दिन पहले लेखक ने गया को अमरूद खिलाया था। लेखक को लगता था कि अमरूद खाने के बाद भी गया का अपनी बारी लेने पर अड़ा रहना अन्याय था। रिश्वत देकर लोग हत्या के आरोप से भी बच जाते हैं, तो गया का लेखक का अमरूद खाकर उससे बारी लेने का हक कैसे हो सकता था। लेखक का अमरूद खिलाना उसकी बारी से बचने की एक चाल थी। असल में, इसका न्याय-अन्याय से कोई लेना-देना नहीं था। मैं इसे गया का अन्यायपूर्ण काम नहीं मानता।
In simple words: लेखक को लगा कि गया का अमरूद खाने के बाद भी अपनी बारी मांगना अन्याय था। लेकिन यह लेखक की अपनी चाल थी और असल में यह कोई अन्याय नहीं था।

🎯 Exam Tip: कथन का विश्लेषण करते समय, लेखक की राय और अपनी राय को अलग-अलग स्पष्ट करें, और हर विचार के लिए तर्क दें।

 

Question 9. "उसने मेरी पीठ पर डंडा जमा दिया”- किसने किसकी पीठ पर डंडा मारा ? इसको क्या परिणाम हुआ?
Answer: गया लेखक से अपनी बारी लेना चाहता था। जब लेखक राजी नहीं हुआ, तो झगड़ा होने लगा और गया ने लेखक की पीठ पर डंडा मार दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि लेखक रोने लगा। यह देखकर गया घबराकर भाग गया। अब लेखक को भी मौका मिल गया। उसने अपनी आँखें पोंछी और डंडे की चोट को भूलकर हंसते हुए अपने घर चला गया। इस तरह उसे गया को अपनी बारी देने से छुटकारा मिल गया।
In simple words: गया ने लेखक की पीठ पर डंडा मारा क्योंकि लेखक अपनी बारी देने को तैयार नहीं था। इससे लेखक रोने लगा, गया डरकर भाग गया और लेखक अपनी बारी देने से बच गया।

🎯 Exam Tip: घटना के कारणों, क्रियाओं और परिणामों को क्रमबद्ध तरीके से बताएं, ताकि पूरी घटना स्पष्ट हो सके।

 

Question 10. लेखक के पिता का तबादला होने पर उन पर, उनकी पत्नी पर तथा लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा ?
Answer: लेखक के पिता का तबादला होने पर पिताजी दुखी थे क्योंकि वह अच्छी आमदनी वाली जगह थी। अम्माजी भी दुखी थीं क्योंकि वहाँ चीजें सस्ती मिलती थीं और मुहल्ले की स्त्रियों से उनका अच्छा मेल-जोल हो गया था। लेकिन लेखक बहुत खुश था। उसे अपने दोस्तों से बिछड़ने का जरा भी दुख नहीं था। वह अपने दोस्तों से बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था कि वह जिस बड़े शहर में जा रहा है, वहाँ आसमान छूते ऊँचे मकान हैं और अंग्रेजी स्कूल हैं जहाँ मास्टरों को बच्चों को पीटने पर जेल हो जाती है। बच्चों को यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ और उनकी आँखों में यह साफ दिख रहा था कि लेखक उनकी नजर में बहुत बड़ा हो गया है। बच्चों में झूठ को भी सच बना लेने की शक्ति होती है, जिसे बड़े लोग समझ नहीं पाते। लेखक के दोस्तों को उससे ईर्ष्या हो रही थी, मानो वे कह रहे हों, "तुम भगवान हो, हमें तो इसी उजड़े गांव में जीना और मरना है।"
In simple words: लेखक के पिता और मां तबादले से दुखी थे क्योंकि उन्हें अच्छी जगह और दोस्त छोड़ना पड़ रहे थे, लेकिन लेखक नए शहर जाने की खुशी में अपने दोस्तों को छोड़कर भी खुश था और उन्हें अपनी नई जगह के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बता रहा था।

🎯 Exam Tip: परिवार के हर सदस्य पर तबादले के अलग-अलग प्रभावों को स्पष्ट करें, उनकी भावनाओं और कारणों को उजागर करें।

 

Question 11. "बच्चों में मिथ्या को सत्य बना लेने की शक्ति है"- लेखक तथा उसके कस्बे के साथियों के व्यवहार के आधार पर इस कथन पर टिप्पणी कीजिए।
Answer: लेखक ने अपने दोस्तों से बढ़ा-चढ़ाकर बातें कीं कि वह अपने पिता के साथ जिस बड़े शहर में जा रहा है, वहाँ आसमान छूने वाले ऊँचे मकान हैं और अंग्रेजी स्कूल हैं जहाँ मास्टरों को बच्चों को पीटने पर जेल जाना पड़ता है। उसके दोस्तों ने उसकी इन गप्पों को सच मान लिया और आश्चर्यचकित हो गए, जिससे लेखक उनकी नजर में बहुत बड़ा हो गया। बच्चों का यह व्यवहार इस बात का सटीक प्रमाण है कि उनमें झूठी बातों को भी सच मान लेने की क्षमता होती है।
In simple words: लेखक के दोस्तों ने उसकी बड़ी-बड़ी बातें (जैसे ऊँचे मकान और अंग्रेजी स्कूल) सच मान लीं, जिससे लेखक की नजर में वे बहुत बड़े बन गए। यह दिखाता है कि बच्चे झूठ को भी सच मान लेते हैं।

🎯 Exam Tip: कथन की पुष्टि करने के लिए कहानी से सीधे उदाहरण दें और बताएं कि यह उदाहरण कथन को कैसे सिद्ध करता है।

 

Question 12. "ऐसा जी होता था कि उस धरती से लिपटकर रोऊँ और कहूँ, तुम मुझे भूल गईं। मैं अब भी तुम्हारा वही रूप देखना चाहता हूँ।” इस कथन से मनुष्य की किस मनोवृत्ति का पता चलता है ? इस सम्बन्ध में आपका क्या मत है ?
Answer: इस कथन से पता चलता है कि जिस जगह किसी व्यक्ति का बचपन बीता होता है, वह जगह उसे बहुत प्यारी होती है। वह उसकी यादों में बस जाती है। बड़ा होने पर भी वह उस जगह को देखना पसंद करता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सच्चाई है। मेरे विचार से इसका खंडन करने का कोई कारण नहीं है। ऐसा करना मानव मन की प्रवृत्ति के प्रति अज्ञानता दिखाना होगा।
In simple words: यह कथन दिखाता है कि इंसान को अपनी जन्मभूमि से गहरा लगाव होता है और वह हमेशा उसे वैसे ही देखना चाहता है जैसे बचपन में देखा था। यह एक सच्ची मानवीय भावना है।

🎯 Exam Tip: भावनात्मक कथनों में, उस भावना (जैसे लगाव या याद) की पहचान करें और बताएं कि वह मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा क्यों है।

 

Question 13. लेखक बीस साल बाद गया को देखकर उससे गले मिलना चाहता था। उसने ऐसा क्यों नहीं किया?
Answer: जब लेखक कस्बे में अपने पुराने खेल के स्थानों को देखने पहुँचा, तो एक लड़के ने उसके कहने पर उसके बचपन के दोस्त गया को बुला लिया। गया को आता देखकर लेखक उससे गले मिलना चाहता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसने सोचा कि वह खुद इंजीनियर है और जिले का एक बड़ा अफसर है, जबकि गया एक मामूली आदमी है। इसलिए उसे गले लगाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि वह उसकी बराबरी का नहीं था।
In simple words: लेखक गया से गले नहीं मिला क्योंकि अब वह एक बड़ा अफसर था और गया एक साधारण आदमी, जिससे दोनों के बीच सामाजिक अंतर आ गया था।

🎯 Exam Tip: पात्रों के बीच के सामाजिक अंतर और उसके कारण उनके व्यवहार में आए बदलाव को स्पष्ट करें।

 

Question 14. गुल्ली-डंडा खेलने के लेखक के प्रस्ताव पर गया तथा लेखक दोनों ही झेंप रहे थे। इसका कारण क्या था ?
Answer: लेखक ने गया के सामने गुल्ली-डंडा खेलने का प्रस्ताव रखा। गया मुश्किल से राजी हुआ। वह इसलिए झेंप रहा था क्योंकि वह एक मामूली मजदूर था और लेखक एक बड़ा अफसर। दोनों में बराबरी की स्थिति नहीं थी। लेखक के मन में भी झेंप का भाव था। वह सोच रहा था कि गया के साथ उसे खेलता देखकर लोग इसे अजूबा समझेंगे और तमाशा बनाएंगे, जिससे वहाँ भारी भीड़ जमा हो जाएगी।
In simple words: लेखक और गया दोनों खेलने में इसलिए झेंप रहे थे क्योंकि उनके सामाजिक पद में बहुत अंतर था, और लेखक को डर था कि लोग इसे तमाशा समझेंगे।

🎯 Exam Tip: पात्रों के संकोच या शर्मिंदगी के पीछे के सामाजिक और व्यक्तिगत कारणों को स्पष्ट करें।

 

Question 15. "कुछ ऐसी मिठास थी उसमें कि आज तक उससे मन मीठा होता रहता है।” इस कथन में लेखक किस मिठास के बारे में बता रहा है ?
Answer: इस कथन में लेखक बचपन में दोस्तों के साथ खेले जाने वाले गुल्ली-डंडा खेल की मिठास के बारे में बता रहा है। यह मिठास खेल के आनंद, बचपन की बेफिक्री, दोस्तों के साथ बिताए गए अनमोल पलों और बिना किसी भेदभाव के खेलने की खुशी से जुड़ी थी। गुल्ली-डंडा जैसा खेल, भले ही छोटा हो, उसमें दुनिया भर की मिठाइयों और तमाशों का आनंद भरा होता था।
In simple words: लेखक बचपन में गुल्ली-डंडा खेलने की खुशी, दोस्तों के साथ बिताए बेफिक्र पलों और खेल के अनमोल आनंद को 'मिठास' कहता है, जिसे वह आज भी याद करता है।

🎯 Exam Tip: उद्धरणों के पीछे की भावनाओं (जैसे आनंद, नोस्टैल्जिया) को स्पष्ट करें और बताएं कि वे भावनाएँ कहानी के किस हिस्से से जुड़ी हैं।

 

Question 16. "लेकिन आज गुल्ली को उससे वह प्रेम नहीं रहा”- कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: गया 'गुल्ली-डंडा' खेलने में बहुत माहिर था। गुल्ली पकड़ने में उसका कोई मुकाबला नहीं था। वह उसकी पकड़ से छूटती नहीं थी और सीधे उसकी हथेलियों में आ जाती थी। बीस साल बाद जब लेखक ने उसके साथ खेला, तो देखा कि गया अपनी यह क्षमता खो चुका था। वह अब गुल्ली को ठीक से लपक नहीं पा रहा था और गुल्ली उसके हाथ से इधर-उधर निकल रही थी।
In simple words: इस कथन का मतलब है कि गया अब गुल्ली-डंडा खेलने में उतना माहिर नहीं रहा जितना बचपन में था, क्योंकि अब वह गुल्ली को ठीक से पकड़ नहीं पाता।

🎯 Exam Tip: किसी कथन का आशय स्पष्ट करते समय, उसके वर्तमान अर्थ और उसके पीछे के बदलावों (जैसे कौशल में कमी) को बताएं।

 

Question 17. बीस साल बाद हुए लेखक और गया के बीच गुल्ली-डंडा के खेल को आप कैसा खेल मानते हैं?
Answer: इंजीनियर बनने के बाद लेखक बीस साल बाद उसी कस्बे में पहुँचा और अपने बालसखा गया के साथ भीमताल में गुल्ली-डंडा खेलने गया। वहाँ दोनों ने गुल्ली-डंडा खेला। हम इस खेल को एक सच्चा खेल नहीं मानते। लेखक नियम के खिलाफ खेल रहा था और बेईमानी कर रहा था। गया कोई विरोध नहीं कर रहा था और उसकी हर गलती को चुपचाप देख रहा था। खिलाड़ियों के बीच जो समानता की भावना होनी चाहिए, वह इस खेल में नहीं थी, क्योंकि एक अफसर था तो दूसरा एक मामूली मजदूर था।
In simple words: लेखक और गया के बीच बीस साल बाद का खेल एक सच्चा खेल नहीं था, बल्कि लेखक की बेईमानी और उनके सामाजिक पद के अंतर के कारण यह सिर्फ एक दिखावा था।

🎯 Exam Tip: किसी घटना या खेल का विश्लेषण करते समय, उसमें मौजूद असमानताओं और नैतिक मुद्दों को उजागर करें।

 

Question 18. “गया वह सारी बे-कायदगियाँ [देख रहा था - लेखक द्वारा देखी] गई कोई तीन बे-कायदगियाँ गिनाइए।
Answer: गया देख रहा था कि उसका साथी खिलाड़ी लेखक अनियमितता कर रहा था। गया द्वारा देखी गईं तीन अनियमितताएँ निम्नलिखित हैं:
1. लेखक आउट हो जाने पर भी डंडा चला रहा था और गया की बारी नहीं आने दे रहा था।
2. गुल्ली पर कम चोट पड़ने पर, वह कुछ दूर गिरती तो लेखक खुद उसे उठा लाता और दोबारा टांड लगाता था।
3. गुल्ली डंडे में लगने पर भी लेखक उसे स्वीकार नहीं करता था।
In simple words: गया ने लेखक की तीन गलतियाँ देखीं: लेखक आउट होने पर भी खेलता रहा, गुल्ली को खुद उठा लाता था, और गुल्ली डंडे से लगने पर भी स्वीकार नहीं करता था।

🎯 Exam Tip: अनियमितताओं या गलतियों को सूचीबद्ध करते समय, उन्हें स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से लिखें।

 

Question 18. बेकायदगियाँ देखकर भी गया चुप क्यों था ?
Answer: बेकायदगियाँ देखकर भी गया चुप था क्योंकि वह लेखक का मन रखने के लिए खेल रहा था। वह लेखक को अपने बराबरी का खिलाड़ी नहीं मानता था। वह विरोध करके लेखक को खेल से हटाना या आउट करना नहीं चाहता था। लेखक अफसर था और गया एक मजदूर। इसलिए, सारी अनियमितताओं को देखकर, सुनकर और जानकर भी वह चुप था।
In simple words: गया इसलिए चुप था क्योंकि वह लेखक का मन रखने के लिए खेल रहा था, और अपने सामाजिक पद के कारण वह लेखक की बेईमानी का विरोध नहीं कर सका।

🎯 Exam Tip: पात्रों के व्यवहार के पीछे के कारणों को गहराई से समझाएं, खासकर जब उनके सामाजिक पद या संबंधों का इसमें प्रभाव हो।

 

Question 19. "इस सत्य को झुठलाना वैसे ही था, जैसे दिन को रात बताना”- के अनुसार बताइए कि किस सत्य को, किसने तथा क्यों झुठलाया ?
Answer: इस कथन के अनुसार, लेखक गुल्ली के डंडे से टकराने के सत्य को झुठला रहा था। गुल्ली डंडे से इतनी जोर से टकराई थी कि आवाज़ बंदूक की गोली जैसी थी, जिसे झुठलाना दिन को रात बताने जैसा था। लेखक ने यह सत्य इसलिए झुठलाया क्योंकि वह खेल में अपनी बारी (पदने) से बचना चाहता था। वह गया को अपनी बारी नहीं देना चाहता था और अपनी बेईमानी से खेलने की कोशिश कर रहा था।
In simple words: लेखक गुल्ली के डंडे से टकराने की बात को झूठ बता रहा था, ताकि उसे खेल में अपनी बारी न देनी पड़े और वह बेईमानी से खेलता रहे।

🎯 Exam Tip: उद्धरण वाले प्रश्नों में, उस 'सत्य' की पहचान करें जिसे झुठलाया जा रहा है, और फिर 'किसने' और 'क्यों' जैसे प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दें।

 

Question 20. "इसी वक्त मुआमला साफ कर लेना अच्छा होगा”- लेखक ने ऐसा विचार क्यों किया ?
Answer: गया को बहुत देर तक आउट होते देखकर और खेल में अपनी बेईमानियों से कुछ पसीजकर लेखक ने गया से खेलने का प्रस्ताव किया। गया ने अंधेरा होने के कारण अगले दिन अपनी बारी लेने की बात कही। लेखक जानता था कि जल्दी ही पूरा अंधेरा हो जाएगा और उसे अपनी बारी से मुक्ति मिल जाएगी। अगले दिन खेलने पर गया को बहुत समय मिलेगा। इसलिए, उसने गया को अपनी बारी उसी समय देकर मामला खत्म करना ठीक समझा।
In simple words: लेखक को लगा कि तुरंत मामला खत्म कर देना ठीक होगा ताकि उसे अपनी बारी देने से छुटकारा मिल जाए, क्योंकि अंधेरा होने वाला था और अगले दिन गया को पूरा समय मिल जाता।

🎯 Exam Tip: पात्रों के तात्कालिक विचारों और उनके पीछे के कारणों को स्पष्ट करें, खासकर जब वे कोई त्वरित निर्णय लेते हों।

 

Question 21. “कल गया ने मेरे साथ खेला नहीं, केवल खेलने का बहाना किया ?” गया के एक दिन पहले लेखक के साथ हुए खेल के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
Answer: एक दिन पहले शाम को गुल्ली-डंडा के मैच में गया पहले से भी अधिक परिपक्वता से और पूरी दक्षता के साथ खेल रहा था। वह साथ के खिलाड़ियों की बेईमानियों को भी सहन नहीं कर रहा था। एक दिन पहले लेखक को अपने साथ गया के खेल की याद आई और उसने महसूस किया कि कल गया ने उसके साथ खेला नहीं था, बल्कि सिर्फ खेलने का बहाना किया था। गया न तो खेल में अपनी कुशलता दिखा रहा था और न ही लेखक की गलतियों का विरोध कर रहा था। वह तो बस लेखक को खिला रहा था और उसका मन रख रहा था।
In simple words: लेखक ने महसूस किया कि गया उसके साथ सच्चा खेल नहीं रहा था, बल्कि सिर्फ उसका मन रखने के लिए खेल रहा था क्योंकि गया न तो अपनी पूरी क्षमता से खेल रहा था और न ही लेखक की बेईमानी का विरोध कर रहा था।

🎯 Exam Tip: किसी कथन की पुष्टि करते समय, कहानी से संबंधित घटनाओं और पात्रों के व्यवहार का हवाला दें।

 

Question 22. "वह बड़ा हो गया है, मैं [छोटा हो गया हूँ] तथा क्यों हुआ ?
Answer: लेखक ने देखा कि उसके साथ खेलते समय गया बेमन से खेल रहा था। वह खेल में अपनी दक्षता नहीं दिखा रहा था और न ही उसकी गलतियों का विरोध कर रहा था। वह खेल नहीं रहा था, बल्कि सिर्फ खेलने का बहाना कर रहा था। लेखक के विचार में इसका कारण दोनों के बीच पद, प्रतिष्ठा और आर्थिक संपन्नता का गहरा अंतर होना था। गया उसे अपने बराबरी का खिलाड़ी नहीं मानता था और उसे एक अकुशल खिलाड़ी समझता था। खेल में गया बड़ा था और लेखक छोटा था।
In simple words: लेखक ने महसूस किया कि उनके बीच के सामाजिक और आर्थिक अंतर के कारण गया बेमन से खेल रहा था और लेखक को अपने बराबर नहीं मानता था, जिससे लेखक खुद को छोटा महसूस कर रहा था।

🎯 Exam Tip: पात्रों की भावनाओं और उनके कारणों को स्पष्ट करें, खासकर जब वे सामाजिक या आर्थिक असमानताओं से जुड़े हों।

 

Question 23. 'गुल्ली-डंडा' आपकी दृष्टि में कैसा शीर्षक है ? क्या आप इस कहानी का कोई अन्य उपयुक्त शीर्षक रखना चाहेंगे ?
Answer: हमारी राय में कहानी का शीर्षक 'गुल्ली-डंडा' पूरी तरह से उपयुक्त है। इस कहानी में बचपन के दोस्तों द्वारा गुल्ली-डंडा खेलने का बहुत सजीव वर्णन है। यदि कोई और शीर्षक देना हो तो 'अकुशल खिलाड़ी', 'बेईमान खिलाड़ी', 'एक अफसर एक मजदूर' जैसे शीर्षक दिए जा सकते हैं। वैसे 'गुल्ली-डंडा' बहुत ही सटीक शीर्षक है। इसलिए, हम कोई अन्य शीर्षक देना नहीं चाहेंगे।
In simple words: 'गुल्ली-डंडा' एक अच्छा शीर्षक है क्योंकि यह खेल और दोस्तों के रिश्ते को दिखाता है। दूसरे नाम जैसे 'अकुशल खिलाड़ी' भी सोचे जा सकते हैं, पर यह सबसे बेहतर है।

🎯 Exam Tip: शीर्षक का मूल्यांकन करते समय, उसकी सार्थकता, कहानी के विषय से जुड़ाव और वैकल्पिक शीर्षकों के औचित्य को समझाएं।

 

Question 24. स्वयं को कथा-नायक कल्पित करते हुए गया के साथ अपने खेल की विशेषताओं पर विचार कीजिए।
Answer: यदि मैं स्वयं को कथा-नायक मानता, तो गया के साथ मेरा खेल बचपन में बहुत ही उत्साहपूर्ण और समानता से भरा होता। हम दोनों बिना किसी भेदभाव के खेलते। गया अपनी अद्भुत गुल्ली-डंडा क्षमता दिखाता और मैं भी उसका पूरा सम्मान करता। हम नियम से खेलते, कोई बेईमानी नहीं करते और हर दाँव खुशी से देते-लेते। लेकिन बड़े होने पर जब पद और प्रतिष्ठा का अंतर आता, तो मैं कोशिश करता कि हमारी दोस्ती पर इसका असर न पड़े। मैं गया के साथ अपने पुराने रिश्ते को महत्व देता और उसे कभी छोटा महसूस नहीं होने देता। खेल में मैं उसकी हर गलती पर चुप नहीं रहता, बल्कि एक दोस्त की तरह उसे सही करने की कोशिश करता।
In simple words: अगर मैं नायक होता, तो बचपन में खेल बराबरी का होता। बड़े होकर भी मैं गया के साथ अपने पुराने रिश्ते को महत्व देता, ईमानदारी से खेलता और सामाजिक अंतर को दोस्ती के बीच नहीं आने देता।

🎯 Exam Tip: ऐसे कल्पनाशील प्रश्नों में, कहानी के मुख्य विषयों (जैसे समानता, दोस्ती, सामाजिक अंतर) को अपनी काल्पनिक भूमिका में शामिल करें और अपने विचारों को स्पष्ट करें।

 

Question 25. अब गली-मोहल्लों में लड़के कौन-सा खेल खेलते दिखाई देते हैं ? अब गुल्ली-डंडा क्यों नहीं खेला जाता ?
Answer: अब गली-मोहल्लों में लड़के क्रिकेट खेलते हुए दिखाई देते हैं। आजकल क्रिकेट की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई है। पहले लड़के गलियों में गुल्ली-डंडा खेला करते थे, लेकिन अब गुल्ली-डंडा नहीं खेला जाता। शायद गाँवों के लड़के भी इसे नहीं खेलते। इसका कारण यह है कि दूरदर्शन आदि पर क्रिकेट जैसा खेल ज्यादा दिखाया जाता है और गुल्ली-डंडा खेलने वालों को अब नहीं देखा जाता। इसे गंवारूपन और पिछड़ापन माना जाता है। प्रचार और प्रोत्साहन की कमी के कारण बच्चे गुल्ली-डंडा नहीं खेलते।
In simple words: आजकल लड़के क्रिकेट खेलते हैं। गुल्ली-डंडा इसलिए नहीं खेला जाता क्योंकि टीवी पर क्रिकेट ज्यादा दिखाया जाता है, इसे पिछड़ा माना जाता है और इसे कोई बढ़ावा नहीं मिलता।

🎯 Exam Tip: सामाजिक बदलावों और उनके कारणों को स्पष्ट करें, खासकर जब यह खेलों की लोकप्रियता से संबंधित हो।

 

Question 26. 'गुल्ली-डंडा' के आधार पर प्रेमचन्द की भाषा-शैली पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: 'गुल्ली-डंडा' कहानी में प्रेमचन्द ने बच्चों के लोकप्रिय खेल का वर्णन किया है। इसके लिए प्रेमचन्द ने सरल और विषय के अनुकूल भाषा का चुनाव किया है। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ उर्दू और स्थानीय भाषा के शब्द, मुहावरे भी शामिल हैं, जिससे उसमें प्रवाह है। इसमें ज़्यादातर वर्णनात्मक शैली का उपयोग किया गया है। ज़रूरत के हिसाब से विचारात्मक, विवेचनात्मक और व्यंग्यात्मक शैलियाँ भी इस्तेमाल हुई हैं। इसमें सूत्र वाक्य भी मौजूद हैं।
In simple words: प्रेमचंद ने 'गुल्ली-डंडा' में सरल, कहानी के अनुसार भाषा का उपयोग किया है। इसमें हिंदी, उर्दू और स्थानीय शब्दों के साथ मुहावरे भी हैं, और यह ज्यादातर वर्णन करने वाली शैली में लिखी गई है।

🎯 Exam Tip: लेखक की भाषा-शैली का वर्णन करते समय, उपयोग की गई शब्दावली (जैसे तत्सम, उर्दू) और शैली (जैसे वर्णनात्मक, व्यंग्यात्मक) के प्रकारों का उल्लेख करें।

 

Question 27. गुल्ली-डंडा कहानी के पात्रों का परिचय दीजिए।
Answer: गुल्ली-डंडा कहानी में कथानायक, गया, मतई, मोहन और दुर्गा मुख्य पात्र हैं। कथानायक थानेदार का बेटा था और बड़ा होकर इंजीनियर बन जाता है। उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी। गया गरीब था, वह चर्मकार था और डिप्टी साहब का साईस (घोड़ों की देखभाल करने वाला) बन गया। वह गुल्ली-डंडा खेलने में बहुत माहिर था। मतई, मोहन और दुर्गा भी उसके साथी खिलाड़ी थे। उनमें से मतई की मृत्यु हो चुकी थी।
In simple words: कहानी में मुख्य पात्र कथानायक (जो इंजीनियर बनता है) और गया (जो गरीब साईस बनता है) हैं। मतई, मोहन और दुर्गा उनके बचपन के दोस्त हैं, जिनमें मतई अब नहीं रहा।

🎯 Exam Tip: पात्रों का परिचय देते समय, उनके नाम, मुख्य भूमिका, सामाजिक स्थिति और कहानी में उनके योगदान को स्पष्ट करें।

 

Question 28. अवसर मिलने पर आप गुल्ली-डंडा कैसे खेलेंगे ?
Answer: अवसर मिलने पर मैं गुल्ली-डंडा ज़रूर खेलूँगा। मैं खेल के सभी नियमों का पालन करूँगा। मैं किसी भी तरह की बेईमानी नहीं करूँगा। मैं अपनी बारी दूँगा और बारी लूँगा भी। खेल में झगड़ा भी नहीं करूँगा। इस तरह मेरा खेल पवित्र और निष्कलंक होगा।
In simple words: अगर मुझे गुल्ली-डंडा खेलने का मौका मिलेगा, तो मैं सभी नियमों का पालन करूँगा, कोई बेईमानी नहीं करूँगा और ईमानदारी से खेलूँगा।

🎯 Exam Tip: ऐसे व्यक्तिगत प्रश्नों में, अपने विचारों को स्पष्ट करें और बताएं कि आप कहानी से मिली सीख को कैसे लागू करेंगे।

Rbse Class 12 Hindi सरयू Chapter 13 निबंधात्मक प्रश्नोत्तर

 

Question 1. 'गुल्ली-डंडा' कहानी की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
Answer: 'गुल्ली-डंडा' कहानी गुल्ली-डंडा नामक भारतीय खेल और उसके खिलाड़ियों से संबंधित है। कहानी की शुरुआत से अंत तक पाठक की रुचि बनी रहती है। गया और लेखक के खेल के साथ कहानी आगे बढ़ती है और अंत में इस मनोवैज्ञानिक सच्चाई के साथ समाप्त होती है कि पद और प्रतिष्ठा इंसानों के बीच की प्राकृतिक समानता को खत्म कर देते हैं।
In simple words: 'गुल्ली-डंडा' एक ऐसी कहानी है जो भारतीय खेल गुल्ली-डंडा और दोस्तों के रिश्ते के बारे में है। यह दिखाती है कि सामाजिक पद कैसे लोगों के बीच की दोस्ती और समानता को बदल देता है।

🎯 Exam Tip: कहानी की कथावस्तु की समीक्षा करते समय, उसके मुख्य विषय, पात्रों का विकास और केंद्रीय संदेश को संक्षेप में बताएं।

 

Question 2. 'गुल्ली-डंडा' कहानी के पात्र गया का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Answer: 'गुल्ली-डंडा' कहानी में दो मुख्य पात्र हैं: कथानायक (लेखक) और गया। गया के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
* कुशल खिलाड़ी: गया गुल्ली-डंडा का बहुत माहिर खिलाड़ी था। वह गुल्ली को बहुत आसानी से पकड़ लेता था और उसका निशाना कभी चूकता नहीं था। वह जिस टीम में होता था, उसकी जीत पक्की होती थी। सब उसे अपना साथी बनाना चाहते थे।
* शारीरिक बनावट: गया दुबला-पतला और लंबा था। उसके हाथ की उँगलियाँ बंदरों की तरह लंबी थीं। उसका रंग सांवला था और वह बहुत फुर्तीला था।
* आर्थिक स्थिति: गया एक गरीब चर्मकार था। उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। बड़ा होकर वह डिप्टी साहब के यहाँ साईस बन जाता है।
* समझदार: गया समझदार है और वह समाज में पद और प्रतिष्ठा के महत्व को समझता है। जब लेखक अफसर बनकर लौटता है, तो गया उसके साथ सम्मान से पेश आता है। वह लेखक के कहने पर खेलता तो है, लेकिन दोनों के बीच के अंतर को भूल नहीं पाता। वह सिर्फ खेलने का दिखावा करता है। जब लेखक उसे बचपन में डंडा मारने की घटना याद दिलाता है, तो वह उसे बचपन की बात कहकर भुलाने को कहता है।
In simple words: गया एक गरीब, फुर्तीला और माहिर गुल्ली-डंडा खिलाड़ी था। वह सामाजिक पद के महत्व को समझता था और बड़ा होकर साईस बनता है।

🎯 Exam Tip: किसी पात्र का चरित्र-चित्रण करते समय, उसके गुणों, शारीरिक बनावट, सामाजिक स्थिति और व्यवहार को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें।

 

Question 3. 'गुल्ली-डंडा' की संवाद-योजना पर संक्षेप में विचार व्यक्त कीजिए।
Answer: 'गुल्ली-डंडा' कहानी के संवाद नाटकीय और आकर्षक हैं। कहानीकार ने छोटे और लंबे दोनों तरह के संवादों का इस्तेमाल किया है, लेकिन छोटे संवाद ज़्यादा हैं। संवादों की भाषा सरल और पात्रों के अनुकूल है। लेखक ने संवादों का इस्तेमाल कहानी को आगे बढ़ाने में किया है। 'गुल्ली-डंडा' के संवाद पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को दिखाने में भी मदद करते हैं। निम्नलिखित उदाहरणों पर विचार कीजिए:
* गया ने झुककर सलाम किया – 'हाँ मालिक, भला पहचानँगा क्यों नहीं। आप मजे में रहे ?'
* 'बहुत मजे में । तुम अपनी कहो ?'
* 'डिप्टी साहब का साईस हूँ।'
* 'मतई, मोहन, दुर्गा सब कहाँ हैं ? कुछ खबर है ?'
* 'मतई तो मर गया। दुर्गा और मोहन दोनों डाकिए हो गए हैं। आप ?'
* 'मैं तो जिले का इंजीनियर हूँ।'
* 'सरकार तो पहले ही बहुत जहीन थे।'
* 'अब कभी गुल्ली-डंडा खेलते हो।'
In simple words: कहानी के संवाद छोटे, सरल और पात्रों के हिसाब से हैं। ये कहानी को आगे बढ़ाते हैं और पात्रों के स्वभाव को भी दिखाते हैं।

🎯 Exam Tip: संवाद योजना का विश्लेषण करते समय, संवादों की भाषा, लंबाई, शैली और कहानी में उनके उद्देश्य को स्पष्ट करें।

अथवा

 

Question. 'गुल्ली-डंडा' कहानी में किस मनोवैज्ञानिक सत्य का उद्घाटन हुआ है?
Answer: 'गुल्ली-डंडा' कहानी में प्रेमचंद ने यह बताया है कि बचपन के दोस्त बड़े होकर अपनी पद और प्रतिष्ठा के कारण एक-दूसरे से समान व्यवहार नहीं कर पाते। उनकी दोस्ती में बनावट आ जाती है। यह एक सच्चाई है कि सामाजिक या आर्थिक अंतर के कारण लोगों के बीच की स्वाभाविक समानता खत्म हो जाती है। उनका व्यवहार पहले जैसा सच्चा नहीं रहता, उसमें दिखावा और दूरी आ जाती है। बाहरी दिखावे के कारण उनका आपसी संबंध कमजोर हो जाता है।
In simple words: यह कहानी दिखाती है कि जैसे-जैसे लोग बड़े होते हैं, उनके पद और पैसों के अंतर से उनकी बचपन की दोस्ती और समानता खत्म हो जाती है।

🎯 Exam Tip: जब कहानी में मनोवैज्ञानिक सत्य पूछा जाए, तो संबंधों में बदलाव और उसके कारणों पर प्रकाश डालें, जैसे पद और प्रतिष्ठा का प्रभाव।

 

Question. “तब मैं उसका समकक्ष था। इसमें कोई भेद न था। यह पद पाकर अब मैं केवल उसकी दया के योग्य हूँ'- लेखक के इस कथन का क्या आशय है? वह छोटा तथा गया बड़ा कैसे हो गया है?
Answer: बीस साल बाद लेखक एक अफ़सर बनकर अपने गाँव लौटा। उसने अपने बचपन के दोस्त गया के साथ गुल्ली-डंडा खेला तो उसे लगा कि गया अब पहले जैसा कुशल खिलाड़ी नहीं रहा। गया न तो गुल्ली को सही से पकड़ पा रहा था, न ही गलत खेल का विरोध कर रहा था। अगले दिन जब गया के बुलावे पर लेखक ने उसका खेल देखा, तो उसे गया का खेल पहले से भी बेहतर लगा। इसे देखकर लेखक समझा कि कल गया उसके साथ खेल नहीं रहा था, बल्कि उसे सिर्फ़ खिला रहा था। वह गया को अब अपने बराबर का खिलाड़ी नहीं मानता था। लेखक को लगा कि गया सिर्फ़ उसका मन रखने के लिए उस पर दया करके उसके साथ खेलने का नाटक कर रहा था। इसलिए, लेखक की नज़र में वह खुद छोटा और गया बड़ा हो गया था। यह कहानी दिखाती है कि बचपन में साथ खेलने वाले दोस्त बड़े होने पर जब पद और पैसों के कारण अलग हो जाते हैं, तो उनके बीच की समानता खत्म हो जाती है। यह अंतर उनके खेल में भी रुकावट डालता है। पद, सामाजिक और आर्थिक अंतर लोगों के बीच की स्वाभाविक समानता को मिटा देते हैं। उनका व्यवहार अब बनावटी और दिखावे वाला हो जाता है।
In simple words: लेखक का मतलब था कि बचपन में वह और गया बराबर थे, लेकिन अफ़सर बनने के बाद लेखक खुद को गया से बड़ा और गया को अपनी दया का पात्र समझने लगा। गया ने लेखक का मन रखने के लिए खेला, इसलिए लेखक ने महसूस किया कि वह छोटा हो गया और गया बड़ा।

🎯 Exam Tip: इस तरह के भावपूर्ण कथन में लेखक के विचारों और समाज के बदलते रिश्तों को सरल भाषा में समझाएं। बचपन की समानता और बड़े होने पर आए अंतर पर जोर दें।

 

Question 5. 'गुल्ली-डंडा' लेखक की दृष्टि में कैसा खेल है? उसके बारे में लेखक की स्मृतियों का उल्लेख करते हुए बताइए कि आपको यह खेल कैसा लगता है?
Answer: लेखक की नज़र में गुल्ली-डंडा एक बहुत अच्छा भारतीय खेल है। यह खेल सस्ता है क्योंकि इसे खेलने के लिए पेड़ की टहनी से गुल्ली और डंडा आसानी से बनाए जा सकते हैं। इस खेल को सिर्फ़ दो लोग भी खेल सकते हैं। लेखक इसे सब खेलों का राजा मानता है। उनका मानना है कि अंग्रेजी खेल महंगे होते हैं और गरीब भारतीयों के लिए ठीक नहीं। बचपन में लेखक सुबह होते ही अपने दोस्तों के साथ खेलने निकल जाते थे। वे पेड़ की टहनी काटकर गुल्ली और डंडा बनाते थे और खेलने में इतने खो जाते थे कि उन्हें समय का पता ही नहीं चलता था। उन्हें न नहाने-खाने की सुध रहती थी। उनके पिताजी घर पर उनके आने का इंतजार करते थे और माँ भी बार-बार दरवाजे पर देखती थी। घरवालों को लगता था कि लड़के का भविष्य खराब हो गया है, लेकिन लेखक गुल्ली-डंडा के खेल में सब कुछ भूल जाता था।
मेरे विचार में, गुल्ली-डंडा एक सस्ता और भारतीय खेल है। इसे बढ़ावा देना चाहिए। विदेशी खेलों की तुलना में भारतीय खेल खेलना देश की आर्थिक स्थिति के लिए अच्छा है और यह सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता को भी बढ़ाता है।
In simple words: लेखक गुल्ली-डंडा को सस्ता और सबसे अच्छा भारतीय खेल मानते हैं क्योंकि इसे खेलने के लिए किसी महंगी चीज़ की ज़रूरत नहीं होती और इसे कहीं भी, बस दो लोग मिलकर खेल सकते हैं। बचपन में वह इसे पूरी लगन से खेलता था, सब कुछ भूलकर।

🎯 Exam Tip: खेल के बारे में लेखक के विचारों को स्पष्ट करें और व्यक्तिगत राय देते समय उसके पक्ष में तर्क भी दें। सस्तापन, सरलता और भारतीयता पर बल दें।

 

Question 7. "मैं समझता था न्याय मेरी ओर है।" लेखक किसको न्याय समझता है? वह जिसको न्याय समझता है क्या आप भी उसको न्याय समझते हैं? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
Answer: लेखक गया को बिना दाँव दिए जाना चाहता था, लेकिन गया उसे जाने नहीं दे रहा था। लेखक ने गया को एक दिन पहले एक अमरूद खिलाया था। उसने वह अमरूद वापस माँगा और कहा कि अगर गया अमरूद नहीं लौटाएगा, तो वह दाँव नहीं देगा। लेखक को लगा कि रिश्वत देने से भी लोग खून के आरोप से बच जाते हैं, तो गया को अमरूद देकर उसने न्याय को अपने पक्ष में कर लिया है। अब गया को उससे दाँव माँगने का अधिकार नहीं है। लेखक की यह सोच बचपन पर आधारित और अजीब है। असल में, यह न्याय नहीं है। रिश्वत देकर न्याय नहीं मिलता, यह तो अपराध है। लेखक का ऐसा सोचना सिर्फ उसका बचपना है। न्याय के लिए दाँव देने की बात को गलत तरीके से पेश करना है।
In simple words: लेखक ने सोचा कि अमरूद खिलाकर उसने न्याय अपने पक्ष में कर लिया है और गया अब दाँव मांग नहीं सकता। लेकिन यह सोचना गलत है, क्योंकि रिश्वत देकर न्याय नहीं मिलता।

🎯 Exam Tip: तर्कपूर्ण उत्तर देते समय, लेखक के बचपन के दृष्टिकोण और वास्तविक न्याय के बीच के अंतर को साफ-साफ बताएं।

 

Question 8. लेखक तथा गया के बीच भीमताल पर खेले गए 'गुल्ली-डंडा' खेल का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
Answer: बीस साल बाद लेखक एक बड़े अफ़सर के तौर पर अपने जिले के दौरे पर पहुँचे। कस्बे में अपने बचपन के खेलने की जगहों को देखने गए और वहां उनकी मुलाकात अपने बचपन के दोस्त गया से हुई। लेखक ने गया को गुल्ली-डंडा खेलने का प्रस्ताव दिया, और वे भीमताल पर पहुँचे। वहां चारों तरफ़ शांति थी। जेठ महीने की शाम थी। लेखक ने एक पेड़ से टहनी काटी और गुल्ली-डंडा बनाया। खेल शुरू हुआ। लेखक ने गुच्ची में गुल्ली रखकर उछाली। गया ने उसे पकड़ने के लिए हाथ फैलाए, पर गुल्ली उसके पास से निकल गई। बचपन में गुल्ली गया की पकड़ से कभी नहीं छूटती थी, लेकिन अब वह उसे पकड़ नहीं पा रहा था। लेखक को भी खेलने का अभ्यास नहीं रहा था। वह अपनी कमी को बेईमानी से पूरा कर रहा था। वह कई तरह की चालाकियाँ कर रहा था। हुच होने पर भी डंडा चला रहा था। वह गया को अपनी बारी ही नहीं आने दे रहा था। आधे घंटे तक गया को पदाने के बाद, एक बार गुल्ली-डंडे में ज़ोर से आवाज हुई, पर लेखक ने इसे स्वीकार नहीं किया। ऐसा दो-तीन बार हुआ। गया ने भी कोई विरोध नहीं किया। आखिर, लेखक ने दया दिखाते हुए गया को खेलने का मौका दिया। गया एक मिनट में ही हुच हो गया। तब तक अंधेरा हो चुका था। वे मोटर से वापस अपने ठिकाने पर पहुँच गए।
In simple words: लेखक और गया बीस साल बाद भीमताल पर गुल्ली-डंडा खेले। लेखक ने बेईमानी की और गया ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि अब उनके बीच दोस्ती की पुरानी समानता नहीं रही थी।

🎯 Exam Tip: घटना का वर्णन करते समय, लेखक और गया के बदलते संबंधों को खेल के दौरान उनके व्यवहार के माध्यम से स्पष्ट करें।

प्रेमचन्द की कहानियों में समाज के सच्चे चित्र मिलते हैं। उनके पात्र किसान, मजदूर, धनी, गरीब, ज़मींदार, उच्च वर्ग और दलित वर्ग सभी प्रकार के होते हैं।

उनकी कहानियों की मुख्य विशेषताएँ:

  • प्रेमचन्द की शुरुआती कहानियाँ घटनाओं पर आधारित थीं। बाद की कहानियों में सामाजिक समस्याओं और पात्रों की भावनाओं को दिखाया गया है, लेकिन गहराई से मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कम है।
  • कहानियों की कथावस्तु भारत के लोगों के जीवन, समाज और राष्ट्र की तत्कालीन स्थिति पर आधारित है। उनमें सुंदर संवाद योजना है और पात्रों का चरित्र-चित्रण सफलतापूर्वक हुआ है। लेखक ने अपने समय और स्थान का ध्यान रखा है। उनकी कहानियाँ उद्देश्यपूर्ण और संदेश देने वाली होती हैं।
  • कहानियों की भाषा सरल और विषय के अनुसार है। शैली ज्यादातर वर्णनात्मक है। कहीं-कहीं विचार, विश्लेषण और व्यंग्य शैलियों का भी प्रयोग हुआ है।
  • प्रेमचन्द की कहानियों में सच्चाई और आदर्श का मेल है। वे आदर्शवादी-यथार्थवादी कहानीकार हैं।

लेखक – परिचय:

 

Question. प्रेमचन्द का जीवन परिचय तथा साहित्यिक उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए।
Answer: प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही गाँव में हुआ था। उनकी माँ का नाम आनन्दी देवी और पिता का नाम अजायबराय था, जो डाक मुंशी थे। प्रेमचन्द ने बचपन में ही अपने माता-पिता दोनों को खो दिया था। उनका असली नाम धनपतराय श्रीवास्तव था। 1898 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और शिक्षक बन गए। 1919 में उन्होंने बी.ए. किया और शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरी शादी की और उनके तीन बच्चे हुए। पहले वे 'नबावराय' नाम से उर्दू में लिखते थे। जब अंग्रेज़ सरकार ने उनकी किताब 'सोजे वतन' पर पाबंदी लगा दी, तो मुंशी दयानारायण की सलाह पर वे 'प्रेमचन्द' नाम से हिंदी में लिखने लगे। सन् 1936 में बीमारी के कारण उनका निधन हो गया।
In simple words: प्रेमचन्द का जन्म लमही गांव में 1880 में हुआ था। वे पहले 'नबावराय' नाम से लिखते थे, फिर 'प्रेमचन्द' नाम से हिंदी में लिखने लगे। वे एक प्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार थे, जिनका निधन 1936 में हुआ।

🎯 Exam Tip: जीवनी लिखते समय जन्मस्थान, माता-पिता का नाम, असली नाम, शिक्षा, प्रमुख कार्य और मृत्यु जैसी मुख्य जानकारियों को क्रम से लिखें।

साहित्यिक परिचय –

प्रेमचन्द हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार और कहानी सम्राट थे। यह उपाधि उन्हें बंगाली भाषा के प्रसिद्ध कथाकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने दी थी। प्रेमचन्द ने हिंदी गद्य में कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक आदि को बहुत समृद्ध किया। उन्होंने संपादन और अनुवाद का काम भी सफलतापूर्वक किया। प्रेमचन्द ने 301 कहानियाँ लिखीं, जिनमें से तीन अब नहीं मिलतीं। कुछ विद्वान 'संसार का अनमोल रतन' को उनकी पहली कहानी मानते हैं, जबकि कुछ अन्य 'पंच परमेश्वर' (1916 ई.) को पहली कहानी मानते हैं। उनका उपन्यास 'मंगलसूत्र' अधूरा रह गया था, जिसे उनके बेटे अमृतराय ने पूरा किया।

रचनाएँ –

प्रेमचन्द की निम्नलिखित रचनाएँ हैं:

  • (1) कहानी – 'सोजे वतन' – यह उर्दू भाषा में लिखी कहानियों का संग्रह है (1908)। उनके जीवन काल में प्रकाशित कहानी-संग्रह हैं- 'सप्त सरोज', 'नवनिधि', 'प्रेम पूर्णिमा', 'प्रेम पचीसी', 'प्रेम प्रतिमा', 'प्रेम द्वादशी', 'समर यात्रा', 'मान सरोवर-भाग-1 व 2', 'कफन'। उनकी मृत्यु के बाद भी कई कहानियाँ प्रकाशित हुईं।
  • नाटक – 'संग्राम', 'कर्बला'।
  • निबन्ध – 'प्रेमचन्द: विविध प्रसंग' (तीन भाग), 'प्रेमचन्द: कुछ विचार', 'साहित्य का उद्देश्य', 'कहानी कला (तीन भाग)', 'हिन्दी उर्दू की एकता', 'महाजनी सभ्यता', 'उपन्यास', 'जीवन में साहित्य का स्थान' आदि।
  • अनुवाद – 'टालस्टॉय की कहानियाँ' तथा गाल्सवर्दी के तीन नाटक – 'हड़ताल', 'चाँदी की डिबिया', और 'न्याय'।
  • सम्पादन – 'माधुरी', 'मर्यादा', 'हंस' तथा 'जागरण' नामक पत्र-पत्रिकाएँ।

पाठ - सार

 

Question. 'गुल्ली-डंडा' कहानी का सारांश लिखिए।
Answer:
यह कहानी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई है, जिसमें बचपन की यादों को संजोया गया है। गुल्ली-डंडा एक भारतीय खेल है। लेखक बचपन में अपने दोस्तों के साथ यह खेल खेलता था। बड़ा होकर अफ़सर बनने के बाद, जब वह अपने बचपन के दोस्तों से मिला और उनके साथ गुल्ली-डंडा खेलने लगा, तो उसे महसूस हुआ कि खेल में पहले जैसा आनंद नहीं आ रहा है। उनकी अफ़सरी ने उनके और दोस्तों के बीच एक दीवार बना दी थी।
गुल्ली-डंडा एक भारतीय खेल है जो विदेशी खेलों जितना महंगा नहीं है। इसे दो खिलाड़ी भी खेल सकते हैं। इसमें सिर्फ़ लकड़ी के एक डंडे और एक गुल्ली की ज़रूरत होती है। अंग्रेजी खेल अमीर लोगों के लिए हैं, जबकि भारतीय खेल सस्ते हैं। गुल्ली-डंडा को सभी खेलों का राजा माना जाता है। अगर गुल्ली से आंख फूटने का डर है, तो क्रिकेट में सिर फूटने और टांग टूटने जैसे खतरे भी होते हैं।
लेखक बचपन में सुबह ही घर से निकल जाते थे और पेड़ों पर चढ़कर टहनियां काटकर डंडा और गुल्ली बनाते थे। खेलने वालों में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था। खेल में लड़ाई भी होती थी। वे खेल में इतने मगन रहते थे कि नहाना-खाना भी भूल जाते थे। उन्हें गुल्ली में मिठाइयों की मिठास और खेलों का आनंद मिलता था।
लेखक के साथ खेलने वालों में एक दोस्त गया भी था। वह दुबला-पतला और लंबा था। वह गुल्ली को इतनी तेज़ी से पकड़ता था कि वह कभी चूकता नहीं था। जिस टीम में वह होता था, उसकी जीत तय होती थी। सभी उसे अपनी टीम में रखना चाहते थे। एक दिन लेखक गया के साथ खेल रहा था और वह पद रहा था। लेखक ने पदने से बचने के लिए कई कोशिशें कीं, पर गया अपना दाँव लिए बिना उसे जाने नहीं दे रहा था। जब लेखक की कोई बात नहीं बनी, तो वह अपने घर की ओर भागा।
गया ने उसे दौड़कर पकड़ लिया और डंडा तानकर कहा कि दाँव दिए बिना नहीं जा सकते। दोनों में झगड़ा होने लगा। एक दिन पहले लेखक ने गया को अमरूद खिलाया था। लेखक ने वह अमरूद वापस माँगा। दोनों में मारपीट और गाली-गलौज हुई। गया ने लेखक की पीठ पर डंडा मारा, जिससे लेखक रोने लगा। यह देखकर गया पीछे हट गया, और लेखक घर की ओर भागा। वह थानेदार का बेटा था, फिर भी एक मामूली लड़के से पिट गया था, लेकिन उसने इसकी शिकायत घर में नहीं की। उन्हीं दिनों लेखक के पिता का तबादला हो गया और वे अपने पिता के साथ एक बड़े शहर में चले गए।
In simple words: यह कहानी बचपन की गुल्ली-डंडा खेल और दोस्ती के बारे में है। लेखक और गया दोस्त थे, लेकिन बड़े होकर लेखक के अफ़सर बनने से उनकी दोस्ती में दूरी आ गई। कहानी बताती है कि गुल्ली-डंडा एक सस्ता और अच्छा खेल है, जिसमें बचपन में सब मिल-जुलकर खेलते थे, पर बड़े होकर पद और पैसे रिश्तों को बदल देते हैं।

🎯 Exam Tip: सारांश लिखते समय कहानी के मुख्य घटनाक्रम और केंद्रीय संदेश को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करें। हर प्रमुख खंड को छोटे-छोटे पैराग्राफ में बांटें।

स्थान की तलाश –

गया मुश्किल से राजी हुआ। लेखक डाक बंगले आया और अपनी मोटर में गया के साथ एकांत जगह की तलाश में निकला। रास्ते में उसने गया से पूछा कि क्या उसे उसकी याद आती थी। गया ने बताया कि वह उसे हमेशा याद करता था। लेखक ने बचपन में गया द्वारा मारे गए डंडे की याद दिलाई और कहा कि वह उसके बचपन की सबसे मीठी याद है। वे बस्ती से तीन मील दूर भीमताल पर आ पहुँचे थे। यहाँ चारों ओर सन्नाटा था।

खेल का प्रारम्भ –

लेखक ने एक पेड़ से टहनी काटकर डंडा और गुल्ली बनाए और खेल शुरू किया। उसने गुच्ची में गुल्ली रखकर उछाली। गुल्ली गया के सामने से निकली, लेकिन वह उसे पकड़ नहीं सका। पहले गुल्ली उसके हाथों से कभी नहीं छूटती थी। लेखक आधे घंटे तक गया को पदाता रहा। वह तरह-तरह की बेईमानी कर रहा था, पर गया चुप था। गुल्ली डंडे में लगी, लेकिन लेखक ने बेईमानी की। गया तब भी चुप रहा, बचपन में वह ऐसी बातें सह नहीं करता था। तीसरी बार गुल्ली डंडे से टकराई तो लेखक ने गया को दाँव देने का फैसला किया। उसे गया पर दया आ रही थी। वैसे भी अंधेरा होने लगा था। गया ने खेलना शुरू किया, पर अभ्यास छूटने के कारण वह एक मिनट में ही अपना दाँव खो बैठा। मोटर में बैठकर दीपक जलने के समय तक वे पड़ाव पर पहुँच गए।

खेल देखने का निमंत्रण –

गया ने बताया कि अगले दिन सभी पुराने खिलाड़ी गुल्ली-डंडा खेलेंगे। उसने लेखक को खेल देखने का न्योता दिया। शाम को लेखक खेल देखने पहुँचा। उस दिन गया पूरी कुशलता से खेल रहा था। उसके डंडे से गुल्ली दो सौ गज दूर जाकर गिरती थी। पदने वाले एक युवक ने बेईमानी की तो गया का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा। अगर वह चुप न रहता तो मारपीट भी हो सकती थी। लेखक को लगा कि कल गया ने उसके साथ खेलने का सिर्फ़ नाटक किया था। उसने उस पर दया दिखाई थी। वह खेल नहीं रहा था, बल्कि लेखक को खिला रहा था, उसका मन रख रहा था। लेखक की अफ़सरी उसके और गया के बीच एक दीवार बन गई थी। उनमें अब समानता नहीं थी। गया उसका आदर कर सकता था, पर उसका दोस्त नहीं हो सकता था। बचपन में वह उसका दोस्त था और दोनों में कोई भेद नहीं था। खेल में अब लेखक उसकी दया का पात्र था। गया उसे अपनी बराबरी का नहीं समझता था। अब गया बड़ा हो गया था और लेखक छोटा हो गया था।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ 59) जी लोट पोट होना = बहुत खुश होना। लॉन = घास का मैदान। नेट = जाल। टहनी = डाली। विलायती = विदेशी, अंग्रेज़ी। ऐब = कमी या दोष। एक सैकड़ा = सौ रुपये। शुमार = गिनती। बिना हर्र फिटकरी चोखा रंग देना = बिना ज़्यादा खर्च किए अच्छा लाभ होना। दीवाने = पागल। अरुचि होना = पसंद न आना। दाम कौड़ी = धन, पैसा। व्यसन = बुरी आदत।
(पृष्ठ 60) दाग = निशान। स्मृतियाँ = यादें। अमीराना = धनवान लोगों से संबंधित। चोंचले = दिखावटी बातें। पदाना = गुल्ली-डंडा खेल में खिलाड़ी को दूसरे की जगह पर खेलना (फील्डिंग)। पदना = खेलना। गुंजाइश = जगह, अवसर। सुधि = ध्यान, याद। तमाशा = खेल। हमजोली = दोस्त, साथी। चपलता = फुर्ती। गोइयाँ = साथी। अखरना = बुरा लगना। गला छुड़ाना = छुटकारा पाना। शास्त्रे = नियमों की पुस्तकें। विहित = अनुकूल, मान्य। क्षम्य = माफ़ करने लायक। पिंड न छोड़ना = पीछा न छोड़ना, बाध्य करना। अनुनय-विनय = निवेदन। बेर = मौका। दिल्लगी = हंसी, मज़ाक। दाँव देना = खेल खिलाना, फील्डिंग करना। दाँव लेना = खेल खेलना।

(पृष्ठ 62) आवरण = पर्दा। लपकना = तेज़ी से पकड़ना। सलाम = नमस्कार। मजे में = खुश, प्रसन्न। साईस = घोड़ों की देखभाल करने वाला नौकर। जहीन = बहुत तेज़ बुद्धि का। मुश्किल = कठिनाई। टेका = छोटा सिक्का। जोड़ = बराबरी। झेप = संकोच। अजूब = अनोखा, पहले से न देखा-सुना। तमाशी = खेल, प्रदर्शन। जने = व्यक्ति। कुल्हाड़ी = लकड़ी काटने का औजार।
(पृष्ठ 63) उत्सुकता = जानने और कुछ करने की इच्छा। मगन = लीन। भाग में बदा होना = किस्मत में लिखा होना। मिठास = मीठापन। मील = दूरी का माप। सन्नाटी = पूरी तरह शांति, शब्दहीनता। कोस = दो मील से ज़्यादा दूरी। झूमक = कर्णफूल, झुमके। केसर में डूबी = लाल रंग में रंगी। चटपट = तुरंत। गुच्ची = ज़मीन में बना वह गड्ढा जहाँ गुल्ली रखी जाती है। लपकाया = पकड़ने के लिए फैलाया। वशीकरण = वश में करना, मोहित करना। चुम्बक = लोहे को अपनी ओर खींचने की शक्ति। धाँधली = बेईमानी, नियम के ख़िलाफ़ काम। कसर = कमी। हुच जाना = खेल से बाहर हो जाना। बारी = अवसर। ओछी = कम तेज़, हल्की। टांड लगानी = गुल्ली को डंडे से उछालना। बे-कायदगियाँ = अनियमित काम। कायदे-कानून = खेलने के नियम। अचूक = कभी असफल न होना, न चूकने लायक। टन से = आवाज करते हुए।
(पृष्ठ 64) घपला = अनियमितता। मजाल = साहस। चेष्टा = प्रयास। हरज = हानि। गैला = गाड़ी के जाने लायक रास्ता। गैला छुड़ाना = रास्ते की रुकावट दूर करना। उल्लास = प्रसन्नता। अनजाने = अज्ञानी। झुठलाना = झूठ साबित करना। प्रत्यक्ष = आँखों देखी। मुआमला = मामला। परवाह = चिंता। चिराग = दीपक। पड़ाव = ठहरने का स्थान। फुरसत = खाली समय।
(पृष्ठ 65) मैच = खेल की प्रतियोगिता। मण्डली = टीम। नैपुण्य = निपुणता, कुशलता, चतुराई। बेदिली = उदासी, अनमनापन। प्रौढ़ता = विकसित अवस्था। ताल ठोंकना = कुश्ती लड़ना। नौबत = अवसर, मौका। तमतमाना = क्रोध से लाल होना। कचूमर निकालना = पूरी तरह हराना। दीवार = बाधा। लिहाज = बड़ा मानना। अदब = आदर। साहचर्य = साथीपन, मित्रता। समकक्ष = समान। भेद = अंतर।

महत्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्याएँ

1. हमारे अँग्रेज दोस्त माने या ना मानें, मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूं। न लॉन की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली और दो आदमी भी आ गए, तो खेल शुरू हो गया। (पृष्ठ 59)

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित 'गुल्ली-डंडा' शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचन्द हैं।

प्रसंग: कहानीकार ने बताया है कि गुल्ली-डंडा भारत का एक लोकप्रिय खेल है। उन्होंने गुल्ली-डंडा को सभी खेलों का राजा कहा है और उन खूबियों का जिक्र किया है जिनके कारण वे इस खेल को सबसे अच्छा मानते हैं।

व्याख्या: लेखक का मानना है कि चाहे अंग्रेज़ दोस्त मानें या न मानें, गुल्ली-डंडा ही सभी खेलों का राजा है। उन्हें आज भी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देख कर बहुत खुशी होती है, और उनका मन करता है कि वे भी उनके साथ खेलने लगें। इस खेल के लिए किसी खास मैदान, कोर्ट, नेट या थापी की ज़रूरत नहीं होती। मज़े की बात तो यह है कि सिर्फ़ किसी पेड़ से एक टहनी काटकर गुल्ली और डंडा बना लो और दो लोग भी मिल जाएं, तो खेल शुरू हो जाता है।
In simple words: लेखक गुल्ली-डंडा को सबसे अच्छा खेल मानते हैं क्योंकि इसे खेलने के लिए किसी महंगी चीज़ की ज़रूरत नहीं होती और इसे कहीं भी, बस दो लोग मिलकर खेल सकते हैं।

विशेष:

  • कहानीकार ने गुल्ली-डंडा की खूबियों का जिक्र किया है।
  • कहानीकार गुल्ली-डंडा को सर्वश्रेष्ठ खेल मानता है।
  • भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है। इसमें अंग्रेज़ी भाषा के प्रचलित शब्द तथा मुहावरों का प्रयोग इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाते हैं।
  • शैली वर्णनात्मक है।

2. विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उनके सामान महँगे होते हैं। जब तक कम-से-कम एक सैकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार नहीं हो सकता। यहाँ गुल्ली-डंडा है कि बिना हर्र-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम अँग्रेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरुचि हो गई। स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रुपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाएँ, जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अँगरेजी खेल उनके लिए है जिनके पास धन है। गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो ? ठीक है, गुल्ली-डंडा से आँख फूट जाने का भय रहता है, तो क्रिकेट से सिर फूट जाने, तिल्ली फट जाने, टांग टूट जाने का भय नहीं रहता ! (पृष्ठ 59-60)

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित 'गुल्ली-डंडा' शीर्षक कहानी से लिया गया है। कथा सम्राट प्रेमचन्द इसके लेखक हैं।

प्रसंग: कहानीकार ने भारतीय लोकप्रिय खेल गुल्ली-डंडा का वर्णन करते हुए उसे खेलों का राजा कहा है। लेखक का मानना है कि विदेशी खेलों की तुलना में गुल्ली-डंडा में कई विशेषताएँ हैं। विदेशी खेलों की बजाय देश में स्वदेशी खेलों को बढ़ावा देना चाहिए।

व्याख्या: लेखक कहते हैं कि विदेशी (अंग्रेजी) खेलों की सबसे बड़ी कमी यह है कि वे बहुत महंगे होते हैं। उनसे जुड़ी चीजें खरीदने के लिए कम से कम सौ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इतना पैसा खर्च किए बिना आपको खिलाड़ी नहीं माना जा सकता। गुल्ली-डंडा के खेल के लिए किसी खास खर्च की ज़रूरत नहीं होती। लेकिन भारत के लोग विदेशी खेलों के पीछे पागल हो रहे हैं और उन्हें बहुत पसंद करते हैं। उन्हें अपने खेल अच्छे नहीं लगते। स्कूलों में हर बच्चे से तीन-चार रुपये सालाना केवल खेल की फीस ली जाती है और विदेशी खेल खिलाए जाते हैं। कोई यह नहीं सोचता कि भारतीय खेल स्कूलों में क्यों न खिलाए जाएं। इन खेलों को आयोजित करने पर कोई पैसा खर्च नहीं होता। अंग्रेजी खेल धनवान लोगों के लिए हैं। गरीब छात्रों को इन खेलों का शौकीन बनाना सही नहीं है। यह माना जा सकता है कि गुल्ली-डंडा में आंख फूटने का डर रहता है, लेकिन विदेशी खेलों में भी चोट लगने का डर रहता है। क्रिकेट में सिर फूटने, तिल्ली फटने और पैर टूटने का डर रहता है।
In simple words: लेखक बताते हैं कि विदेशी खेल महंगे होते हैं, जबकि गुल्ली-डंडा सस्ता है। वे सवाल करते हैं कि गरीब बच्चों को महंगे विदेशी खेलों का शौक क्यों लगाना चाहिए, जबकि गुल्ली-डंडा में भी उतने ही खतरे हैं।

विशेष:

  • कहानीकार ने अंग्रेजी खेलों की तुलना में भारतीय खेलों को सस्ता बताया है।

3. उनकी विचारधारा में मेरा अंधकारमय भविष्य टूटी हुई नौका की तरह डगमगा रहा है, और मैं हूँ कि पदाने में मस्त हूँ, न नहाने की सुधि है, न खाने की। गुल्ली है तो जरा-सी, पर उसमें दुनिया भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनन्द भरा हुआ है। (पृष्ठ 60)

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित 'गुल्ली-डंडा' शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक प्रसिद्ध कहानीकार प्रेमचन्द हैं।

प्रसंग: लेखक गुल्ली-डंडा की प्रशंसा करते हुए उसे सर्वश्रेष्ठ खेल बता चुके हैं। उनके विचार में भारतीय खेल विदेशी खेलों की तुलना में सस्ते होते हैं, इसलिए उन्हें बढ़ावा देना चाहिए। गुल्ली-डंडा एक रुचिकर खेल है, जिसमें खिलाड़ी सब कुछ भूलकर रम जाता है।

व्याख्या: लेखक कहते हैं कि वे गुल्ली-डंडा खेलने के लिए सुबह ही घर से निकल पड़ते थे और सब कुछ भूलकर उसी में खो जाते थे। उन्हें अपने घर वालों के नाराज़ होने का ध्यान नहीं रहता था। उन्हें याद नहीं रहता था कि दोपहर हो गई है और पिताजी रसोईघर में बैठकर रोटियों पर नाराज़गी दिखा रहे होंगे क्योंकि वे खाना खाने घर नहीं आए थे। माता-पिता यह सोचकर उनका इंतज़ार करते थे कि लड़का हर समय खेल में मगन रहता है और उसका भविष्य किसी टूटी नाव की तरह खराब हो रहा है। उधर लेखक गुल्ली-डंडा खेलने में इतने मगन थे कि उन्हें न नहाने की और न खाने की याद थी। गुल्ली भले ही छोटी हो, लेकिन उसे खेलने का आनंद बहुत गहरा होता है। उससे मिलने वाले आनंद में दुनिया भर की मिठाइयों की मिठास और सारे संसार के खेल-तमाशों की खुशी भरी होती है।
In simple words: लेखक गुल्ली-डंडा खेलने में इतने खो जाते थे कि उन्हें दुनिया की परवाह नहीं रहती थी, न खाना-पीना याद रहता था। उन्हें उस छोटे से खेल में दुनिया भर की खुशियां मिलती थीं।

विशेष:

  • गुल्ली-डंडा खेलने वालों की तन्मयता का उल्लेख हुआ है।
  • खिलाड़ी नहाना, खाना-पीना सब भूलकर गुल्ली-डंडा खेलने में लगा रहता है।
  • भाषा सरल तथा विषय के अनुकूल है।
  • शैली वर्णनात्मक तथा चित्रात्मक है।

4. मैं समझता था, न्याय मेरी ओर है। आखिर मैंने किसी स्वार्थ से ही उसे अमरूद खिलाया होगा। कौन निःस्वार्थ किसी। के साथ सलूक करता है। भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए ही देते हैं। जब गया ने अमरूद खाया, तो फिर उसे मुझसे दाँव लेने का क्या अधिकार है। रिश्वत देकर तो लोग खून पचा जाते हैं। यह मेरा अमरूद यों ही हजम कर जाएगी। अमरूद पैसे के पाँच वाले थे, जो गया के बाप को भी नसीब न होंगे। यह सरासर अन्याय था। (पृष्ठ 61)

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के 'गुल्ली-डंडा' शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक कहानी-सम्राट प्रेमचन्द हैं।

प्रसंग: गया और लेखक गुल्ली-डंडा खेल रहे थे। गया अपना दाँव माँग रहा था, लेकिन लेखक देना नहीं चाहता था। एक दिन पहले उसने गया को अमरूद खिलाया था। लेखक समझता था कि इस कारण न्याय उसके पक्ष में था और गया का दाँव माँगना उसके लिए अन्याय था।

व्याख्या: लेखक कहता है कि अमरूद खाकर भी गया का दाँव माँगना अन्याय था। लेखक न्याय के पक्ष में था। गया अन्याय करने पर अड़ा हुआ था और उसे जाने नहीं दे रहा था। गया ने उसका हाथ पकड़ रखा था। लेखक ने गया को गाली दी, तो गया ने भी उसे और बुरी गालियां दीं, इतना ही नहीं, उसने उसे चाँटा भी मार दिया। लेखक ने गया को दांतों से काट लिया। गया ने डंडा उठाकर लेखक की पीठ पर मारा। पीठ पर डंडा खाने के बाद लेखक रोने लगा। उसका रोना एक अचूक हथियार साबित हुआ। इसका जवाब गया के पास नहीं था। वह भाग खड़ा हुआ। लेखक ने अपने आंसू पोंछे और डंडे की चोट को भूलकर हंसते हुए अपने घर पहुँच गया। वह एक थानेदार का बेटा था, जबकि गया एक मामूली आदमी का बेटा था। एक मामूली लड़के से पिटना उसे अपमानजनक लगा, लेकिन उसने घर पर किसी से इसकी शिकायत नहीं की।
In simple words: लेखक को लगा कि अमरूद खिलाने के बाद गया का दाँव मांगना अन्याय है। झगड़े में गया ने लेखक को डंडा मारा, जिससे लेखक रोने लगा। गया डरकर भाग गया और लेखक ने चुपचाप घर जाकर खुद को अपमानित महसूस किया।

विशेष:

  • भाषा सरल, मुहावरेदार और प्रभावपूर्ण है।
  • शैली वर्णनात्मक है।
  • लेखक अमरूद खिलाकर गया को दाँव देने से बचना चाहता है।
  • वह न्याय को अपने पक्ष में मानकर अन्यायपूर्ण आचरण कर रहा है।

5. मुझे न्याय का बल था। वह अन्याये पर डटा हुआ था। मैं हाथ छुड़ाकर भागना चाहता था। वह मुझे जाने न देता ! मैंने उसे गाली दी, उसने उससे कड़ी गाली दी, और गाली ही नहीं, एक चाँटा जमा दिया। मैंने उसे दाँत से काट लिया, उसने मेरी पीठ पर डंडा जमा दिया। मैं रोने लगा। गया मेरे इस अस्त्र का मुकाबला न कर सका। भागा। मैंने तुरंत आँसू पोंछ डाले, डंडे की चोट भूल गया और हँसता हुआ घर जा पहुँचा। मैं थानेदार का लकड़ा एक अदने से लड़के के हाथों पिट गया, यह मुझे उस समय भी अपमानजनक मालूम हुआ, लेकिन घर में किसी से शिकायत न की। (पृष्ठ 61)

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित 'गुल्ली-डंडा' शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक प्रसिद्ध कहानीकार प्रेमचन्द हैं।

प्रसंग: गया और लेखक गुल्ली-डंडा खेल रहे थे। गया अपना दाँव माँग रहा था, लेकिन लेखक देना नहीं चाहता था। एक दिन पहले उसने गया को अमरूद खिलाया था। लेखक समझता था कि इस कारण न्याय उसके पक्ष में था और गया का दाँव माँगना उसके लिए अन्याय था।

व्याख्या: लेखक कहता है कि अमरूद खाकर भी गया का दाँव माँगना अन्याय था। लेखक न्याय के मार्ग पर था। गया अन्याय करने पर अड़ा हुआ था और उसे जाने नहीं दे रहा था। गया ने उसका हाथ पकड़ रखा था। लेखक ने गया को गाली दी, तो गया ने भी उसे और बुरी गालियां दीं, इतना ही नहीं, उसने उसे चाँटा भी मार दिया। लेखक ने गया को दांतों से काट लिया। गया ने डंडा उठाकर लेखक की पीठ पर मारा। पीठ पर डंडा खाने के बाद लेखक रोने लगा। उसका रोना एक अचूक हथियार साबित हुआ। इसका जवाब गया के पास नहीं था। वह भाग खड़ा हुआ। लेखक ने अपने आंसू पोंछे और डंडे की चोट को भूलकर हंसते हुए अपने घर पहुँच गया। वह एक थानेदार का बेटा था, जबकि गया एक मामूली आदमी का बेटा था। एक मामूली लड़के से पिटना उसे अपमानजनक लगा, लेकिन उसने घर पर किसी से इसकी शिकायत नहीं की।
In simple words: लेखक को लगा कि अमरूद खिलाने के बाद गया का दाँव मांगना अन्याय है। झगड़े में गया ने लेखक को डंडा मारा, जिससे लेखक रोने लगा। गया डरकर भाग गया और लेखक ने चुपचाप घर जाकर खुद को अपमानित महसूस किया।

विशेष:

  • भाषा सरल, मुहावरेदार और प्रभावपूर्ण है।
  • शैली वर्णनात्मक है। उसमें सजीवता और चित्र प्रधानता है।

6. उन्हीं दिनों पिताजी को वहाँ से तबादला हो गया। नई दुनिया देखने की खुशी में ऐसा फूला कि अपने हमजोलियों से बिछुड़ जाने का बिल्कुल दुःख न हुआ। पिताजी दुःखी थे। यह बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्माजी भी दुःखी थीं, यहाँ सब चीजें सस्ती थीं, और मुहल्ले की स्त्रियों से घेराव-सा हो गया था, लेकिन मैं मारे खुशी के फूला न समाता था। लड़कों से जीट उड़ा रहा था, वहाँ ऐसे घर थोड़े ही होते हैं। ऐसे-ऐसे ऊँचे घर हैं कि आसमान से बातें करते हैं। वहाँ के अँगरेजी स्कूल में कोई मास्टर लड़कों को पीटे, तो उसे जेहल हो जाए। मेरे मित्रों की फैली हुई आँखें और चकित मुद्रा बतला रही थी कि मैं उनकी निगाह में कितना ऊँचा उठ गया हूँ। बच्चों में मिथ्या को सत्य बना लेने की शक्ति है, जिसे हम, जो सत्य को मिथ्या बना लेते हैं, क्या समझेंगे ? उन बेचारों को मुझसे कितनी स्पर्धा हो रही थी। मानो कह रहे थे- तुम भगवान् हो भाई, जाओ। हमें तो इसी ऊजड़ ग्राम में जीना भी है और मरना भी। (पृष्ठ 61)

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित 'गुल्ली-डंडा' शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक कहानी-सम्राट प्रेमचन्द हैं।

प्रसंग: लेखक के पिता एक कस्बे में थानेदार थे। उनकी बदली एक बड़ी जगह पर हो गई थी। इस तबादले से वे खुश नहीं थे, लेकिन लेखक खुश था। उसे कस्बे के अपने दोस्तों से अलग होने का भी दुख नहीं था।

व्याख्या: लेखक का बचपन उस कस्बे में बीता था जहाँ वह दोस्तों के साथ पढ़ता और खेलता था। उसके पिता थानेदार थे और जब उनका तबादला एक बड़े शहर में हो गया, तो वे दुखी थे। माँ भी दुखी थीं क्योंकि वहाँ चीजें सस्ती मिलती थीं और पड़ोस की औरतें परिवार जैसी थीं। लेकिन लेखक को अपने दोस्तों से बिछुड़ने का कोई चिंता नहीं था। वह बड़े और नए शहर में जाने के विचार से खुश था। वह दोस्तों से डींग मारता था कि जहां वे जा रहे हैं, वह बहुत बड़ा शहर है। वहां आसमान छूने वाले ऊंचे मकान हैं। वहां अंग्रेजी स्कूल हैं, जहां अगर कोई मास्टर लड़कों को पीटे तो उसे जेल हो जाती है। लेखक की इन बातों को सुनकर उसके दोस्त आश्चर्यचकित थे। उनकी आंखें फैली हुई थीं, जिससे पता चलता था कि लेखक उनकी नजर में कितना बड़ा हो गया था। बच्चों में झूठ को सच बनाने की शक्ति होती है, जिसे बड़े लोग नहीं समझ सकते जो सच को झूठ बना देते हैं। लेखक के दोस्तों के मन में उसके प्रति ईर्ष्या का भाव था। वे मानो कह रहे थे- तुम बहुत बड़े हो गए हो, जाओ। हमें तो इसी पिछड़े गांव में ही रहना है।
In simple words: लेखक के पिता का तबादला एक बड़े शहर में हो गया, जिससे वे और माँ दुखी थे, पर लेखक खुश था। उसने दोस्तों से नए शहर की खूबियों के बारे में बताया, जिससे वे आश्चर्यचकित और ईर्ष्यालु हो गए।

विशेष:

  • लेखक बड़े नगर में जाने के विचार से प्रसन्न था और उसके दोस्त उसके इस सौभाग्य पर चकित होकर उससे लड़ाई कर रहे थे।

7. आँख किसी प्यासे पथिक की भाँति बचपन के उन क्रीड़ा-स्थलों को देखने के लिए व्याकुल हो रही थी; पर उस परिचित नाम के सिवा वहाँ और कुछ परिचित न था। जहाँ खंडहर था, वहाँ पक्के मकान खड़े थे। जहाँ बरगद का पुराना पेड़ था, वहाँ अब सुन्दर बगीचा था। स्थान की काया-पलट हो गई थी। अगर उसके नाम और स्थिति का ज्ञान न होता, तो मैं इसे पहचान भी न सकता। बचपन की संचित और अमर स्मृतियाँ बाँह खोले अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने को अधीर हो रही थीं, मगर वह दुनिया बदल गई थी। ऐसा जी होता था कि उस धरती से लिपटकर रोऊँ और कहूँ, तुम मुझे भूल गईं ! मैं तो अब भी तुम्हारा वही रूप देखना चाहता हूँ। (पृष्ठ 61-62)

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित 'गुल्ली-डंडा' शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक मुंशी प्रेमचन्द हैं।

प्रसंग: लेखक बीस साल बाद जब जिले का इंजीनियर बनकर अपने बचपन के कस्बे में पहुँचा, तो वह उन जगहों को देखने गया जहाँ वह अपने दोस्तों के साथ गुल्ली-डंडा खेला करता था। वह इन जगहों को देखने के लिए बहुत उत्सुक था।

व्याख्या: लेखक कहता है कि उसकी आँखें बचपन के खेल के मैदानों को देखने के लिए प्यासे राही की तरह बेचैन थीं, पर उस जगह के पुराने नाम के सिवा कुछ भी पहचाना नहीं जा रहा था। जहाँ पहले खंडहर थे, वहाँ अब पक्के मकान खड़े थे। पुराने बरगद के पेड़ की जगह सुंदर बगीचा था। उस स्थान का रूप पूरी तरह बदल गया था। अगर उसे उसका नाम और जगह की जानकारी न होती, तो वह उसे पहचान भी नहीं पाता। बचपन की सारी यादें और अमर स्मृतियाँ अपने पुराने दोस्तों से मिलने के लिए बेताब थीं, पर दुनिया बदल चुकी थी। लेखक का मन कर रहा था कि वह उस धरती से लिपटकर रोए और कहे, 'तुम मुझे भूल गई हो! मैं तो अब भी तुम्हें तुम्हारे पुराने रूप में ही देखना चाहता हूँ।'

बीस साल बाद इंजीनियर बनकर लौटे लेखक अपने बचपन के साथी गया के साथ गुल्ली-डंडा खेल रहे थे। लेखक ने खेल में बेईमानी की और गया ने उसका कोई विरोध नहीं किया। डंडे में गुल्ली लगने पर भी लेखक दाँव देने से मना कर रहा था। अचानक गुल्ली ज़ोर से डंडे से टकराई। आवाज इतनी तेज़ थी जैसे बंदूक से गोली चली हो। गुल्ली के डंडे से टकराने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता था? इस सच्चाई को झुठलाना संभव नहीं था, पर लेखक ने फिर भी झूठ बोलने की कोशिश की। उसने सोचा कि झूठ कहने में क्या नुकसान है? अगर गया उसकी बात मान लेता तो उसे आगे खेलने का मौका मिल जाता, और अगर नहीं मानता तो थोड़ी देर के लिए ही दाँव देना पड़ता। वह कोई न कोई बहाना बनाता, जैसे अंधेरा होने का बहाना करके जल्दी ही गया से पीछा छुड़ा लेता और दाँव देने से बच जाता। अगले दिन वह दाँव देने क्यों आता?
In simple words: लेखक बीस साल बाद अपने बचपन की खेल की जगहों को देखने गया, तो सब कुछ बदला हुआ पाया। उसे अपने बचपन की यादें आईं, पर वह जगह और उसके दोस्त बदल चुके थे। उसने गया के साथ गुल्ली-डंडा खेला, लेकिन बेईमानी की और दाँव देने से बचने के लिए बहाने बनाए।

विशेष:

  • गया के साथ खेलते समय लेखक लगातार बेईमानी कर रहा था। बल्ले में गुल्ली टकराने पर भी वह गया को दाव नहीं देता था।
  • गया कोई विरोध नहीं कर रहा था, इसका लाभ लेखक उठा रहा था।
  • भाषा तत्सम तथा उर्दू शब्दों के प्रयोग के कारण प्रभावशाली बन पड़ी है।
  • 'अँधेरे का बहाना करके जल्दी से गैला छुड़ा लूंगा'- में 'गैला छुड़ाना' मुहावरे का प्रयोग 'पीछा छुड़ाने' के अर्थ में हुआ है। 'गैल' या 'रास्ता गैल भूलना' या 'रास्ता भूलना' शब्द हिंदी में इस्तेमाल होते हैं, लेकिन कहानीकार का 'गैला छुड़ाना' अद्भुत प्रयोग है। इस अर्थ में 'गला छुड़ाना' मुहावरा इस्तेमाल होता है, जैसा कि लेखक ने पहले भी किया है- "मैंने गला छुड़ाने के लिए सब चालें चलीं।" 'गैला छुड़ाना' का अर्थ अपने रास्ते की रुकावट को हटाना माना जा सकता है।
  • शैली वर्णनात्मक है।

विशेष:

  • पद और प्रतिष्ठा मनुष्य-मनुष्य में बदलाव का कारण बन जाती है। बचपन में बराबर के साथी भी इस कारण छोटे-बड़े हो जाते हैं।
  • कहानीकार ने इस सच को 'गुल्ली डंडा' कहानी में व्यक्त किया है।
  • भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण है।
  • शैली विवेचनात्मक-विचारात्मक है।
  • गया की मन:स्थिति का विवेचन स्पष्टतापूर्ण किया गया है।

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