Official RBSE Solutions for Class 11 Hindi: Chapter 02 महाकवि जयशंकर प्रसाद
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Chapter-wise Solutions for Hindi: Chapter 02 महाकवि जयशंकर प्रसाद
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RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह गद्य Chapter 2 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. प्रेमचन्दजी की पत्रिका का नाम था
(क) हंस
(ख) इन्दु
(ग) निगमागम चन्द्रिका
(घ) कोई नहीं।
Answer: (क) हंस
In simple words: प्रेमचंद जी जिस पत्रिका के साथ जुड़े थे, उसका नाम 'हंस' था। यह उनकी एक प्रसिद्ध पत्रिका थी।
🎯 Exam Tip: साहित्यिक कृतियों और रचनाकारों से संबंधित प्रश्नों में, पत्रिका का नाम और लेखक का संबंध याद रखना महत्वपूर्ण है।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह गद्य Chapter 2 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. शिवपूजन सहायजी की कचहरी में नियुक्ति किस रूप में हुई?
Answer: शिवपूजन सहायजी की नियुक्ति कचहरी में हिन्दी नकलनवीस के रूप में हुई थी। इसका मतलब था कि वे हिंदी में दस्तावेजों की नकल किया करते थे।
In simple words: शिवपूजन सहायजी को कचहरी में हिंदी में नकल करने वाले कर्मचारी के रूप में नौकरी मिली थी।
🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में पद या कार्य का नाम सटीक रूप से बताना आवश्यक है।
Question 2. प्रसादजी की पुश्तैनी दुकान किसकी थी?
Answer: प्रसादजी की पुश्तैनी दुकान जर्दा और सुर्ती (तंबाकू उत्पादों) की थी। यह दुकान उनके परिवार की पुरानी परंपरा थी।
In simple words: प्रसादजी के परिवार की पुरानी दुकान जर्दा और सुर्ती बेचने की थी।
🎯 Exam Tip: पारिवारिक पृष्ठभूमि या व्यवसाय से संबंधित जानकारी को याद रखें।
Question 3. प्रसादजी के लेखन-कार्य का उद्देश्य क्या था?
Answer: प्रसादजी के लेखन का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना या प्रसिद्धि पाना नहीं था। उनका उद्देश्य केवल अपनी आत्मा की खुशी के लिए लिखना था (स्वान्तःसुखाय)।
In simple words: प्रसादजी का लिखने का मकसद पैसा या नाम कमाना नहीं था, वे सिर्फ अपने मन की खुशी के लिए लिखते थे।
🎯 Exam Tip: लेखक के मूल उद्देश्य या प्रेरणा को स्पष्ट रूप से व्यक्त करें।
Question 4. प्रसादजी के साहित्य-गुरु कौन थे?
Answer: प्रसादजी के साहित्य-गुरु महामहोपाध्याय देवीप्रसाद शुक्ल कवि चक्रवर्ती थे। वे उनके मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत थे।
In simple words: प्रसादजी के साहित्यिक गुरु का नाम महामहोपाध्याय देवीप्रसाद शुक्ल कवि चक्रवर्ती था।
🎯 Exam Tip: गुरु-शिष्य परंपरा वाले प्रश्नों में गुरु का नाम सही बताना महत्वपूर्ण है।
Question 5. प्रसादजी किस युग में उत्पन्न हुए थे?
Answer: प्रसादजी हिंदी साहित्य के छायावाद और रहस्यवाद के युग में उत्पन्न हुए थे। यह युग हिंदी साहित्य में अपनी खास पहचान रखता है।
In simple words: प्रसादजी हिंदी साहित्य के छायावाद और रहस्यवाद के समय में पैदा हुए थे।
🎯 Exam Tip: कवि या लेखक के युग का नाम सही बताना उनकी साहित्यिक पहचान के लिए जरूरी है।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह गद्य Chapter 2 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. प्रसादजी की पुश्तैनी दुकान पर किन-किन साहित्यकारों द्वारा किन-किन विषयों पर विचार-विमर्श होता था? स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रसादजी की पुश्तैनी दुकान पर रात को दस-ग्यारह बजे तक कई प्रसिद्ध साहित्यकार इकट्ठा होते थे। वे वहाँ पर शास्त्रीय समस्याओं और विभिन्न विषयों पर गहरी चर्चा करते थे।
In simple words: प्रसादजी की दुकान पर रात में कई बड़े लेखक मिलते थे और शास्त्रीय बातों पर विचार करते थे।
🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में साहित्यकारों के जमावड़े और चर्चा के मुख्य विषय दोनों का उल्लेख करें।
Question. "प्रसादजी की स्मरण-शक्ति बड़ी विलक्षण थी।” उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रसादजी की याददाश्त बहुत खास थी। वे अपने साहित्यकार दोस्तों के साथ बातचीत करते समय वैदिक मंत्रों और उपनिषदों के वाक्य याद करके सुना देते थे। उन्हें संस्कृत के बड़े कवियों ने किस शब्द का कब और किस अर्थ में प्रयोग किया था, यह भी उदाहरण के साथ पता था। शालिहोत्र और आयुर्वेद जैसे शास्त्रों के मुख्य विषयों को वे उनके लक्षणों के साथ बताते थे। उन्हें हीरा, मोती, मूंगा जैसे सभी रत्नों के गुण और दोष शास्त्रीय प्रमाणों के साथ याद थे। इसके अलावा, बनारस की पुरानी परंपराओं, वहाँ के अमीर लोगों और पंडितों की कहानियाँ भी उन्हें याद थीं। यह सब उनकी अद्भुत याददाश्त को दर्शाता है।
In simple words: प्रसादजी की याददाश्त बहुत अच्छी थी। वे वैदिक मंत्र, उपनिषद, संस्कृत कवियों के शब्दों के अर्थ, शालिहोत्र और आयुर्वेद के विषय, और रत्नों के गुण-दोष सब उदाहरण के साथ याद रखते थे।
🎯 Exam Tip: स्मरण-शक्ति की विलक्षणता साबित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से दिए गए उदाहरणों को विस्तार से लिखें।
Question 3. साहित्यकारों के जीवन की विडम्बना को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
Answer: साहित्यकारों के जीवन की यह दुखद सच्चाई है कि जब तक वे जीवित रहते हैं, तब तक उन्हें सही सम्मान नहीं मिलता। उनके साहित्य की कड़ी आलोचना होती है और कई लोगों को उनकी सफलता पसंद नहीं आती। लेखक ने बताया है कि जीते-जी न तो प्रेमचंद, न प्रसाद, और न निराला को कभी आदर मिला। लेकिन जब वे इस दुनिया से चले गए, तो उनकी खूब तारीफ होने लगी और साहित्य के क्षेत्र में उनकी महान बुद्धि को पहचान मिली। यह एक तरह की परंपरा-सी बन गई है कि साहित्यकार की मृत्यु के बाद ही उसे पूजा जाता है।
In simple words: साहित्यकारों को जीते-जी सम्मान नहीं मिलता और उनकी आलोचना होती है। उनकी मृत्यु के बाद ही लोग उनकी प्रशंसा करते हैं और उन्हें पहचान मिलती है।
🎯 Exam Tip: विडंबना को स्पष्ट करते हुए, जीवित अवस्था और मृत्यु के बाद मिलने वाले सम्मान में अंतर को रेखांकित करें।
Question 4. “उनकी तीव्र आलोचना करने वाले भी उनके पास पहुँचकर यथोचित आदर-मान ही पाते थे।” उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
Answer: लेखक कहते हैं कि महाकवि प्रसाद सभी के प्रति अच्छी भावना रखते थे। इस कारण जो लोग उनकी कड़ी आलोचना करते थे, उनसे भी वे कोई दुश्मनी नहीं रखते थे। उदाहरण के लिए, प्रेमचंदजी ने एक बार 'हंस' पत्रिका में प्रसादजी के ऐतिहासिक नाटकों की आलोचना करते हुए लिखा था कि 'प्रसाद पुराने इतिहास के मुर्दे उखाड़ते हैं'। जिस समय 'हंस' पत्रिका में यह बात छपी थी, उसी समय प्रेमचंदजी हमेशा की तरह प्रसादजी के साथ बैठकर साहित्यिक चर्चा कर रहे थे। उस समय प्रसादजी के मन में प्रेमचंदजी के प्रति कोई बुरी भावना नहीं थी और वे उनका उचित आदर करते हुए बातें कर रहे थे।
In simple words: प्रसादजी सभी से प्यार से मिलते थे। जो उनकी आलोचना करते थे, वे उनसे भी आदर से बात करते थे। जैसे, प्रेमचंद ने उनके नाटकों की आलोचना की, फिर भी प्रसादजी उनसे खुशी से मिलते और बातें करते थे।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में उदाहरण के माध्यम से प्रसादजी के उदार स्वभाव को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह गद्य Chapter 2 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. शिवपूजन सहाय के 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' रेखाचित्र के आधार पर प्रसादजी के व्यक्तित्व की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
Answer: आचार्य शिवपूजन सहाय ने 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' रेखाचित्र में प्रसादजी के व्यक्तित्व की कई खास बातें बताई हैं। उनके व्यक्तित्व का वर्णन इस प्रकार है:
3. **व्यवसाय में कुशल**: वे अपने पैतृक व्यवसाय, जैसे किमाम-इत्र आदि बनाने में भी बहुत माहिर थे।
4. **सर्वशास्त्रज्ञ**: प्रसादजी को भारतीय शास्त्रों, आयुर्वेद, शालिहोत्र, वेद, उपनिषद् और संस्कृत साहित्य के सभी हिस्सों का गहरा ज्ञान था।
5. **लोकज्ञान से सम्पन्न**: उन्हें अलग-अलग व्यवसायों की खास शब्दावली और कई तरह की बोलियों का पूरा ज्ञान था।
6. **व्यवसाय में कुशल**: प्रसादजी अपने पुश्तैनी काम में कुशल थे और किमाम-इत्र आदि बनाने में माहिर थे।
7. **स्वाध्यायशील**: प्रसादजी पढ़ाई के शौकीन थे और रात में भी पढ़ते रहते थे। इसी स्वाध्याय से उन्होंने सभी शास्त्रों और कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था।
In simple words: शिवपूजन सहाय ने बताया कि प्रसादजी बहुत ज्ञानी थे, उन्हें कई शास्त्रों और भाषाओं का ज्ञान था। वे अपने व्यवसाय में भी माहिर थे और रात में पढ़ाई करते थे।
🎯 Exam Tip: व्यक्तित्व की विशेषताओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करें और प्रत्येक बिंदु के साथ संक्षिप्त विवरण दें।
Question 2. 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' पाठ को सार अपने शब्दों में लिखिए।
Answer: इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए पाठ का सार शुरुआत में दिया गया है, कृपया उसे देखें और अपने शब्दों में लिखें।
In simple words: इस पाठ का सार पहले ही दिया गया है, उसे देखकर उत्तर लिखना है।
🎯 Exam Tip: जब पाठ का सार लिखने को कहा जाए, तो मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में और अपनी भाषा में प्रस्तुत करें।
Question 3. शिवपूजन सहाय की दृष्टि में प्रसादजी महान् साहित्यकार के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ थे।" स्पष्ट कीजिए।
Answer: 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' रेखाचित्र में शिवपूजन सहाय ने बताया है कि प्रसादजी केवल एक महान साहित्यकार और महाकवि ही नहीं थे, बल्कि और भी बहुत कुछ थे। वे असाधारण याददाश्त वाले थे। अपने समाज के गुणों से भरपूर और कई कलाओं के रहस्य को समझने वाले थे। काशी की सभी खास बातों के वे जानकार थे। वे काशी के पुराने रईसों, पंडितों, नर्तकों, और गायिकाओं की कहानियाँ जानते थे। वे धार्मिक स्वभाव के थे। व्यापारियों, मल्लाहों, सुनारों और पशु-पक्षियों के लक्षणों के बारे में भी जानते थे। प्रसादजी को वैदिक साहित्य और पुराने इतिहास का गहरा ज्ञान था। वे संस्कृत साहित्य के मुख्य हिस्सों को बहुत ध्यान से पढ़ते थे। वे शालिहोत्र और आयुर्वेद के महत्वपूर्ण विषयों पर सुंदर प्रवचन देते थे। उन्हें मोती, हीरा जैसे रत्नों के गुण-दोषों का पूरा ज्ञान था। इसी तरह वे किमाम-इत्र आदि बनाने में भी माहिर थे। वैद्यक-ग्रंथों के श्लोक सुनाकर वे जड़ी-बूटियों के ज्ञान में भी निपुण थे। इस तरह प्रसादजी लोक-ज्ञान से भरे एक महान व्यक्ति थे।
In simple words: शिवपूजन सहाय के अनुसार, प्रसादजी सिर्फ कवि ही नहीं, बल्कि एक अद्भुत याददाश्त वाले, कई कलाओं के जानकार, धार्मिक, लोक-ज्ञान से भरपूर और शास्त्रों के गहरे विद्वान थे।
🎯 Exam Tip: लेखक द्वारा बताई गई विभिन्न विशेषताओं को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें ताकि उत्तर विस्तृत और प्रभावशाली लगे।
Question 4. प्रसादजी के परिवार में त्योहारों को किस प्रकार मनाया जाता था? स्पष्ट कीजिए। वर्तमान में त्योहार मनाने के तरीकों में क्या परिवर्तन आया है? स्पष्ट कीजिए।
Answer: लेखक बताते हैं कि प्रसादजी के घर के सामने बने शिव मंदिर में महाशिवरात्रि का त्योहार उनके परिवार की पुरानी परंपरा के अनुसार मनाया जाता था। इसमें शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम होता था और ज़्यादातर साहित्य से जुड़े लोग इस उत्सव में शामिल होते थे। श्रावणी पूर्णिमा, यानी रक्षाबंधन का त्योहार भी वे बड़े उत्साह और उदारता से मनाते थे। उस दिन प्रसादजी चाँदी और तांबे के सिक्के दान में देते थे। गाने-बजाने पर जोर दिया जाता था और अच्छे खाने-पीने का भी खास इंतजाम होता था। इस प्रकार, अब त्योहार मनाने के तरीकों में काफी बदलाव आ गया है।
In simple words: प्रसादजी के घर में शिवरात्रि और रक्षाबंधन जैसे त्योहार बहुत धूमधाम से मनाए जाते थे, जहाँ संगीत, दान और अच्छे खाने-पीने का रिवाज था। आजकल त्योहार मनाने के तरीकों में काफी बदलाव आ गया है।
🎯 Exam Tip: त्योहारों के प्राचीन और वर्तमान स्वरूप की तुलना करते हुए, दोनों की विशेषताओं को स्पष्ट करें।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह गद्य Chapter 2 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. प्रसादजी की पुश्तैनी दुकान कहाँ पर थी?
(क) कचहरी में
(ख) नरियरी बाजार में
(ग) बेनिया बाग में
(घ) चौक में
Answer: (ख) नरियरी बाजार में
In simple words: प्रसादजी के परिवार की पुरानी दुकान नरियरी बाजार में थी।
🎯 Exam Tip: स्थान से संबंधित प्रश्नों में सही जगह का नाम याद रखना आवश्यक है।
Question 2. प्रसादजी ने किस पत्रिका का सम्पादन किया था?
(क) हंस
(ख) इन्दु
(ग) मतवाला
(घ) प्रताप
Answer: (ख) इन्दु
In simple words: प्रसादजी ने 'इन्दु' नाम की पत्रिका को संपादित किया था।
🎯 Exam Tip: प्रमुख साहित्यकारों से संबंधित पत्रिका के नाम को ठीक से याद करें।
Question 4. काशी में उनसे लाभान्वित होने वाले लोग उनके परिवार को क्या नाम देते थे?
(क) पहाराज
(ख) कविराज
(ग) काशीराज
(घ) दरबार
Answer: (घ) दरबार
In simple words: काशी के लोग, जिन्हें प्रसादजी के परिवार से फायदा मिलता था, उन्हें 'दरबार' कहकर पुकारते थे।
🎯 Exam Tip: किसी विशेष समूह द्वारा दिए गए उपनाम या संबोधन को याद रखें।
Question 5. प्रसादजी हिन्दी खडी बोली के अलावा किस भाषा के मर्मज्ञ थे?
(क) अवधी भाषा
(ख) ब्रज भाषा
(ग) भोजपुरी भाषा
(घ) पूर्वी भाषा
Answer: (ख) ब्रज भाषा
In simple words: प्रसादजी को हिंदी खड़ी बोली के साथ-साथ ब्रज भाषा का भी गहरा ज्ञान था।
🎯 Exam Tip: लेखक की भाषा दक्षता से संबंधित प्रश्नों में, अन्य भाषाओं के ज्ञान का उल्लेख करें।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह गद्य Chapter 2 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. शिवपूजन सहाय काशी नागरी प्रचारिणी सभा में क्यों जाते थे?
Answer: शिवपूजन सहाय काशी नागरी प्रचारिणी सभा में इसलिए जाते थे क्योंकि वहाँ हिंदी के कवि आते थे। वे हिंदी से बहुत प्रेम करते थे, इसलिए वहाँ शामिल होते थे।
In simple words: शिवपूजन सहाय हिंदी कवियों से मिलने और हिंदी प्रेम के कारण काशी नागरी प्रचारिणी सभा में जाते थे।
🎯 Exam Tip: किसी स्थान पर जाने के पीछे के कारण को स्पष्ट रूप से बताएं, खासकर यदि वह लेखक की रुचि से जुड़ा हो।
Question 2. लेखक की रहने की व्यवस्था किसने, कहाँ पर की थी?
Answer: लेखक के बड़े साले ने उनके रहने का इंतजाम मुनसरिम शिवप्रसाद द्विवेदी के घर खजुरी मोहल्ले में किया था।
In simple words: लेखक के बड़े साले ने उनके रहने की व्यवस्था खजुरी मोहल्ले में मुनसरिम शिवप्रसाद द्विवेदी के घर पर की थी।
🎯 Exam Tip: निवास व्यवस्था से संबंधित प्रश्नों में व्यक्ति और स्थान दोनों का उल्लेख करें।
Question 4. प्रसादजी को किसके लच्छेदार वाक्य कण्ठस्थ थे?
Answer: प्रसादजी को वैदिक ऋचाओं और उपनिषदों के सुंदर वाक्य कंठस्थ, यानी जुबानी याद थे। उन्हें इनका गहरा ज्ञान था।
In simple words: प्रसादजी को वैदिक मंत्र और उपनिषदों के वाक्य मुँह जुबानी याद थे।
🎯 Exam Tip: किसी व्यक्ति की स्मरण-शक्ति से जुड़े प्रश्नों में, उन विशिष्ट ग्रंथों या कथनों का उल्लेख करें जो उन्हें याद थे।
Question 5. प्रसादजी किन ग्रन्थों के मौखिक उद्धरण सुना देते थे?
Answer: प्रसादजी शालिहोत्र, आयुर्वेद, और हीरा, मोती, मूंगा जैसे रत्नों के गुण-दोषों से जुड़े शास्त्रीय प्रमाणों के मौखिक उद्धरण सुना देते थे।
In simple words: प्रसादजी शालिहोत्र, आयुर्वेद और रत्नों के गुण-दोषों से जुड़ी बातों के उदाहरण मुँह जुबानी सुनाते थे।
🎯 Exam Tip: जिन ग्रंथों या विषयों के उद्धरण दिए जाते थे, उनके नाम सही-सही लिखें।
Question 6. अपने व्यवसाय से सम्बन्धित किन चीजों के निर्माण में प्रसाद पूरी तरह दक्ष थे?
Answer: प्रसादजी अपने पारिवारिक व्यवसाय से जुड़े जर्दा, किमाम और इत्र आदि बनाने में पूरी तरह कुशल थे। वे इस कला में बहुत निपुण थे।
In simple words: प्रसादजी जर्दा, किमाम और इत्र बनाने में बहुत माहिर थे।
🎯 Exam Tip: व्यवसाय से संबंधित वस्तुओं के नाम सटीक रूप से बताएं।
Question 7. प्रसादजी कब वैद्यराज प्रतीत होते थे?
Answer: प्रसादजी तब वैद्यराज (आयुर्वेद के जानकार चिकित्सक) जैसे लगते थे, जब वे आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के गुणों का वर्णन करते हुए वैद्यक ग्रंथों के श्लोक सुनाते थे।
In simple words: जब प्रसादजी जड़ी-बूटियों के गुण बताते और वैद्यक श्लोक सुनाते थे, तो वे वैद्यराज लगते थे।
🎯 Exam Tip: वैद्यराज प्रतीत होने के कारण को स्पष्ट करें, जिसमें जड़ी-बूटियों और वैद्यक श्लोकों का उल्लेख हो।
Question 8. बनारस में काशी-नरेश को क्या प्रतिष्ठा प्राप्त थी?
Answer: बनारस में काशी-नरेश को यह सम्मान प्राप्त था कि लोग उन्हें केवल 'हर हर महादेव' कहकर हाथ जोड़कर प्रणाम करते थे। यह उनकी बहुत बड़ी प्रतिष्ठा थी।
In simple words: बनारस में काशी-नरेश का इतना सम्मान था कि लोग उन्हें 'हर हर महादेव' कहकर प्रणाम करते थे।
🎯 Exam Tip: किसी शासक की प्रतिष्ठा को दर्शाने वाले खास रीति-रिवाज या संबोधन का उल्लेख करें।
Question 9. प्रसादजी के परिवार की काशी में क्या प्रतिष्ठा थी?
Answer: प्रसादजी के परिवार की काशी में बहुत प्रतिष्ठा थी। उनसे लाभान्वित होने वाले लोग उनके परिवार को 'दरबार' नाम से पुकारते थे।
In simple words: प्रसादजी के परिवार का काशी में बहुत नाम था, और उनसे फायदा उठाने वाले लोग उन्हें 'दरबार' कहते थे।
🎯 Exam Tip: परिवार की प्रतिष्ठा और उसके कारण मिलने वाले विशिष्ट संबोधन को बताएं।
Question 10. काशी में होली के बाद कौन-सा महोत्सव होता था?
Answer: काशी में होली के बाद गंगा नदी की बीच धारा में 'बुढ़वा मंगल' का महोत्सव मनाया जाता था।
In simple words: होली के बाद काशी में गंगा के बीच 'बुढ़वा मंगल' उत्सव होता था।
🎯 Exam Tip: त्योहारों और उनसे जुड़े स्थानों के नाम सही-सही याद रखें।
लेखक ने प्रसादजी की यह विशेषता बताई कि वे हलवाई वैश्य होने के कारण स्वादिष्ट भोजन और मिठाइयाँ बनाने में भी बहुत माहिर थे। अगर भोज आदि में सौ मेहमानों के लिए भोजन बनाना हो, तो बादाम और पिस्ते की बर्फी में कितना मेवा, मावा, चीनी और केसर-इलायची लगेगी, इसका पूरा हिसाब वे मुँह जुबानी बता देते थे। वे कई तरह की मिठाइयों की सामग्री की सही मात्रा बता देते थे और हलवाइयों की तरह सभी चीजों की गुणवत्ता का पूरा ज्ञान रखते थे।
Question 2. प्रसादजी किनके दाँव-पेच एवं बोलियों के रहस्य जानते थे?
Answer: प्रसादजी अपनी जवानी में कुश्ती भी लड़ चुके थे। उन्होंने मल्ल-विद्या (कुश्ती की कला) का भी अध्ययन किया था। वे पहलवानों के अजीब किस्से सुनाते थे और उनके दाँव-पेच के कई नाम भी उन्हें याद थे। अलग-अलग व्यापार-क्षेत्रों में दलालों की बोलियों में अजीब अर्थ वाले शब्द प्रचलित थे। प्रसादजी उन शब्दों के मूल और सारे रहस्यों को भी बता देते थे। इसी तरह वे सुनारों और मल्लाहों की बोलियों के रहस्य भी जानते थे। इसका मतलब यह है कि अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ ऐसे शब्द इस्तेमाल होते हैं जिनके प्रयोग का रहस्य हर कोई नहीं जानता, लेकिन प्रसादजी को उन सभी का रहस्य पता था।
In simple words: प्रसादजी को पहलवानों के दाँव-पेच और उनकी बोलियों का ज्ञान था। साथ ही, वे सुनारों, मल्लाहों और व्यापारियों के खास शब्दों के रहस्य भी जानते थे।
🎯 Exam Tip: प्रश्न में पूछे गए सभी समूहों (पहलवान, दलाल, सुनार, मल्लाह) का उल्लेख करें और उनकी विशिष्ट बोलियों या दाँव-पेच के ज्ञान को स्पष्ट करें।
Question 3. प्रसादजी की कविता-पाठ करने की क्या विशेषता बतायी गई है?
Answer: प्रसादजी कभी किसी कवि-सम्मेलन में शामिल नहीं होते थे, लेकिन दोस्तों के साथ वे खुलकर कविता-पाठ करते थे। गंगा में बजड़े (नाव) पर दोस्तों के आग्रह पर वे बड़े उत्साह से कविता-पाठ करते थे और भाव-विभोर हो जाते थे। उनकी आवाज बहुत मधुर थी और वे सुर, राग आदि के पूरे जानकार थे। एक बार हिंदी शब्द-सागर के संपादकों के सम्मान समारोह में अपने गुरुजी के कहने पर प्रसादजी ने कविता-पाठ किया था, जिससे पूरी सभा मंत्रमुग्ध हो गई थी। खुद प्रसादजी भी कविता-पाठ करते समय भावुक हो जाते थे। इस तरह वे बहुत भावुक व्यक्ति थे।
In simple words: प्रसादजी कवि-सम्मेलनों में नहीं जाते थे, पर दोस्तों के साथ गंगा में बजड़े पर मधुर आवाज में पूरे उत्साह और भावुकता से कविता-पाठ करते थे। वे सुर और राग के जानकार थे।
🎯 Exam Tip: कविता-पाठ की विशेषताओं में उनकी शैली, आवाज, भावुकता और सार्वजनिक या निजी मंच पर पाठ के तरीके को शामिल करें।
Question 4. “जगत् की यही परम्परागत रीति जान पड़ती है।” इस कथन को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
Answer: आचार्य शिवपूजन सहाय ने महाकवि प्रसाद के बारे में यह बात कही है। जब तक प्रसादजी जीवित रहे, साहित्य जगत में उन्हें पूरा सम्मान नहीं मिला। उनके नाटकों, कहानियों और कविताओं को लेकर उस समय बहुत पक्षपातपूर्ण आलोचना होती रही। एक बनी-बनाई लीक पर चलकर उनकी बहुत उपेक्षा की गई या उनके साहित्य का सही मूल्यांकन नहीं किया गया। हमारे देश में ऐसी परंपरा बन गई है कि जीवित व्यक्ति की उपेक्षा की जाती है और उसके मरने के बाद खूब प्रशंसा की जाती है, और उसके कार्यों को गौरवशाली बताया जाता है। असल में, इस तरह की परंपरा बिल्कुल सही नहीं है।
In simple words: शिवपूजन सहाय ने कहा कि दुनिया में यह रिवाज है कि लोग जीवित व्यक्ति की उपेक्षा करते हैं और मरने के बाद उसकी प्रशंसा करते हैं। यह प्रसादजी के साथ भी हुआ, उन्हें जीते-जी सम्मान नहीं मिला पर मरने के बाद उनकी खूब तारीफ हुई।
🎯 Exam Tip: कथन का अर्थ स्पष्ट करने के लिए, लेखक के उदाहरण को विस्तार से समझाएं कि कैसे जीते-जी उपेक्षा और मरने के बाद सम्मान एक सामान्य परंपरा है।
Question 5. शिवपूजन सहाय प्रसादजी के घर की परिक्रमा किसलिये करते थे?
Answer: शिवपूजन सहाय प्रसादजी के घर की परिक्रमा इसलिए करते थे, क्योंकि वे उनसे मिलने और उनके व्यक्तित्व को नजदीक से जानने की लालसा रखते थे। इसका अर्थ है कि वे उनके घर के आस-पास घूमते रहते थे ताकि मौका मिलने पर उनसे मिल सकें।
In simple words: शिवपूजन सहाय प्रसादजी से मिलने और उन्हें जानने की इच्छा से उनके घर के चक्कर लगाते थे।
🎯 Exam Tip: परिक्रमा के पीछे के वास्तविक कारण को स्पष्ट करें, जो यहाँ प्रसादजी के प्रति सम्मान और जानने की जिज्ञासा है।
Question 6. प्रसादजी अपनी आलोचना करने वालों के साथ कैसा व्यवहार करते थे? लिखिए।
Answer: प्रसादजी ने अपने नाटकों में ऐतिहासिक घटनाओं और पात्रों को दिखाया था। उनके इन नाटकों पर मुंशी प्रेमचंद ने 'हंस' पत्रिका में संपादकीय लिखते हुए आलोचना की थी कि 'प्रसादजी पुराने इतिहास के मरे हुए मुर्दे उखाड़ते हैं'। ऐसी आलोचना होने पर भी प्रसादजी ने प्रेमचंद के साथ हमेशा की तरह दोस्ताना व्यवहार किया। इस तरह, प्रसादजी अपनी आलोचना करने वालों के साथ बिना किसी भेदभाव के व्यवहार करते थे और सभी का उचित आदर-सम्मान करते थे।
In simple words: प्रसादजी अपनी आलोचना करने वालों से भी अच्छे से मिलते थे। प्रेमचंद ने उनके नाटकों की आलोचना की, फिर भी प्रसादजी ने उनसे हमेशा दोस्ती निभाई और आदर दिया।
🎯 Exam Tip: प्रसादजी के उदार स्वभाव और आलोचकों के प्रति उनके सम्मानपूर्ण व्यवहार को उदाहरण सहित स्पष्ट करें।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह गद्य Chapter 2 निबन्धात्मक प्रश्न
Question 1. 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' संस्मरणात्मक रेखाचित्र के आधार पर 'प्रसाद के विद्याव्यसनी स्वभाव पर प्रकाश डालिए।
Answer: इस रेखाचित्र में लेखक ने प्रसादजी के पढ़ाई के प्रति गहरे लगाव की ओर इशारा किया है और बताया है कि वे हमेशा पढ़ने में लीन रहते थे। प्रसादजी को नियमित रूप से स्कूल जाने का मौका नहीं मिला था। वे दिन भर अपने व्यवसाय में व्यस्त रहते थे, लेकिन जब रात में सारा संसार सो जाता था, तब वे पढ़ने में लग जाते थे। उन्होंने वैदिक मंत्रों और उपनिषदों का विस्तार से अध्ययन किया था। वे शालिहोत्र, वैद्यक, संस्कृत साहित्य के सभी अंगों और भारतीय दर्शन में पूरी तरह से पारंगत थे। वेदांगों और भारतीय शास्त्रों में उनकी बुद्धि बहुत तेज थी। असल में, प्रसादजी ने धन कमाने या नाम कमाने के लिए साहित्य का अध्ययन या लेखन नहीं किया था। वे जन्मजात प्रतिभाशाली कवि और साहित्यकार थे। 'कामायनी' महाकाव्य, 'आँसू', अन्य कविताएँ, नाटक, उपन्यास और कहानियाँ - उनका सारा साहित्य उनकी खास प्रतिभा का सबूत है। वे अपने मन की खुशी के लिए लिखते थे और उस समय के साहित्यकारों के बीच अपनी खास प्रतिभा को दिखाते थे।
In simple words: प्रसादजी को पढ़ाई का बहुत शौक था। उन्हें स्कूल जाने का मौका नहीं मिला, पर वे रात में खूब पढ़ते थे। उन्हें वेद, उपनिषद, संस्कृत साहित्य और भारतीय दर्शन का गहरा ज्ञान था। वे अपनी खुशी के लिए लिखते थे और जन्म से ही प्रतिभाशाली साहित्यकार थे।
🎯 Exam Tip: प्रसादजी के विद्याव्यसनी स्वभाव को साबित करने के लिए उनके स्वाध्याय, विभिन्न शास्त्रों के ज्ञान और लेखन के उद्देश्य का उल्लेख करें।
रचनाकार का परिचय सम्बन्धी प्रश्न –
Question 1. रेखाचित्रकार शिवपूजन सहाय का साहित्यिक परिचय दीजिए।
Answer: आचार्य शिवपूजन सहाय एक मेहनती पत्रकार, समझदार साहित्यकार और राष्ट्रभाषा हिंदी के सच्चे भक्त थे। उनका शुरुआती जीवन काशी में बीता था और उन्होंने ललित-गद्य-रचना से लिखना शुरू किया। उन्होंने 'मतवाला' पत्र का संपादन किया। उन्हें हिंदी में आंचलिक उपन्यास की शुरुआत करने वाला माना जाता है। इस नजर से उनका 'देहाती दुनिया' उपन्यास खास है। 'वे दिन वे लोग' उनका संस्मरणात्मक रेखाचित्र है, 'प्रेम कली' उनका बेहतरीन गद्य-काव्य है और 'दो घड़ी' उनकी सबसे अच्छी हास्य-व्यंग्य रचना है।
In simple words: शिवपूजन सहाय एक मेहनती पत्रकार और हिंदी साहित्यकार थे। उन्होंने 'मतवाला' पत्रिका का संपादन किया और 'देहाती दुनिया' जैसे आंचलिक उपन्यास लिखे। 'वे दिन वे लोग' और 'प्रेम कली' उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
🎯 Exam Tip: साहित्यिक परिचय देते समय, जन्म-मृत्यु वर्ष, प्रमुख कार्य, कृतियाँ और उनकी साहित्यिक पहचान (जैसे आंचलिक उपन्यासकार) का उल्लेख करें।
महाकवि जयशंकर प्रसाद लेखक परिचय-
Question. आचार्य शिवपूजन सहाय का जन्म सन् 1893 में हुआ। मैट्रिक तक अध्ययन करने के बाद स्वाध्याय से इन्होंने अपना व्यक्तित्व निखारा, 'मतवाला' पत्र का सम्पादन किया। ये एक कर्मठ पत्रकार, आरम्भिक ललित गद्य-लेखक, निबन्धकार, साहित्यसेवी और राष्ट्रभाषा हिन्दी के अनन्य उपासक थे। इनके गद्य-लेखन में स्वाभाविकता एवं सहजता के साथ ठेठ देहाती बोलचाल की भाषा का विन्यास आकर्षक, चित्रोपम एवं सशक्त दिखाई देता है। इनका 'वे दिन वे लोग' संस्मरणात्मक रेखाचित्र व्यंग्य-विनोद से सम्पन्न श्रेष्ठ कृतित्व है। इनका निधन सन् 1963 में हुआ।
Answer: आचार्य शिवपूजन सहाय का जन्म वर्ष 1893 में हुआ था। उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई के बाद खुद ही पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ाया। उन्होंने 'मतवाला' नामक पत्रिका का संपादन किया। वे एक मेहनती पत्रकार थे, शुरुआती दौर में ललित गद्य-लेखक, निबंधकार, साहित्य प्रेमी और हिंदी भाषा के पक्के भक्त थे। उनके गद्य-लेखन में स्वाभाविक सरलता और ठेठ देहाती बोलचाल की भाषा का सुंदर मेल दिखाई देता है, जो पढ़ने में आकर्षक और प्रभावी लगता है। उनकी रचना 'वे दिन वे लोग' एक संस्मरणात्मक रेखाचित्र है, जिसमें हास्य और व्यंग्य भी है। उनका निधन वर्ष 1963 में हुआ था।
In simple words: शिवपूजन सहाय का जन्म 1893 में हुआ था। उन्होंने 'मतवाला' पत्रिका का संपादन किया और वे एक मेहनती पत्रकार, लेखक और हिंदी के भक्त थे। उनके लेखन में साधारण भाषा और देसी अंदाज होता था। उनकी प्रसिद्ध किताब 'वे दिन वे लोग' है। उनका निधन 1963 में हुआ।
🎯 Exam Tip: लेखक परिचय में जन्म-मृत्यु वर्ष, प्रमुख कार्य, कृतियाँ और उनकी साहित्यिक शैली का संक्षेप में उल्लेख करें।
पाठ-सार
Question. शिवपूजन सहाय द्वारा लिखित 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' नामक संस्मरणात्मक रेखाचित्र का सार इस प्रकार है:
काशी-निवास-लेखक बताता है कि मैट्रिक पास करते ही वह मुगलसराय चला गया। वहाँ से आजीविका की खातिर बनारस की 'दीवानी अदालत में नकलनवीस नियुक्त हुआ और खजुरी मोहल्ले में रहने लगा।
नागरी प्रचारिणी सभा में जाना-लेखक विद्यार्थी जीवन में आरा की नागरी प्रचारिणी सभा में जाया करता था। काशी में आने पर वहाँ भी नागरी प्रचारिणी सभा में जाने लगा। वहीं पर बाबू श्यामसुन्दर दास को नजदीक से देखने का मौका मिला।
महाकवि प्रसाद के दर्शनों की लालसा-लेखक महाकवि प्रसाद को नजदीक से देखना चाहता था। नागरी प्रचारिणी सभा में उसे प्रसाद की पत्रिका 'इन्दु' को देखने का अवसर मिल गया था। गोवर्धन सराय में प्रसादजी का घर था। लेखक कभी-कभी वहाँ तक चले जाता था। बनारस की चौक कोतवाली के पीछे मस्जिद के सामने नरियरी बाजार में प्रसाद की पुश्तैनी जर्दा-सुर्ती की दुकान थी। प्रसाद वहाँ पर बैठते थे। लेखक इन सब स्थानों पर प्रसाद के व्यक्तित्व को नजदीक से देखने की लालसा से जाता रहता था।
महाकवि प्रसाद का व्यक्तित्व-प्रसाद प्रतिदिन सन्ध्योपरान्त दुकान के सामने तख्त पर बैठते थे। बड़े-बड़े साहित्यकार वहीं पर आकर उनसे काव्यशास्त्र की चर्चा करते थे। रामकृष्णदास, प्रेमचन्द, महाकवि रत्नाकर, लाला भगवानदीन, आचार्य शुक्ल आदि महानुभाव वहाँ पर एकत्र हो जाते थे। उन सभी के मध्य महाकवि प्रसाद की सरस्वती मुखरित हो जाती थी। प्रसाद की. वेदों, उपनिषदों, आयुर्वेद, शालिहोत्र आदि सभी शास्त्रों में विलक्षण दक्षता थी। उनका शरीर गठीला था। वे सभी औषधियों के ज्ञाता तथा किमाम-इत्र आदि। के अच्छे निर्माता थे। वे किसी कवि-सम्मेलन में नहीं जाते थे और अपनी आलोचनी सुनकर भी निर्विकार भाव से चुप रहते थे।
धार्मिक प्रवृत्ति-महाकवि प्रसाद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। शिवरात्रि महोत्सव धूमधाम से मनाते थे। सभी त्योहारों पर वे परिवार की परम्परा के अनुसार दानदक्षिणा भी देते थे। काशी में उन्हें लोग 'दरबार' की संज्ञा देते थे तथा काशीनरेश के समान वे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उनका चरित्र पूर्णतया निष्कलंक था।
Answer: शिवपूजन सहाय द्वारा लिखे गए संस्मरणात्मक रेखाचित्र 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' का सार इस प्रकार है: लेखक बताते हैं कि मैट्रिक पास करने के बाद वे मुगलसराय चले गए और वहाँ बनारस की दीवानी अदालत में नकलनवीस (नकल करने वाला) नियुक्त हो गए और खजुरी मोहल्ले में रहने लगे। लेखक विद्यार्थी जीवन में आरा की नागरी प्रचारिणी सभा में जाते थे और काशी आने पर भी इसी सभा में जाने लगे, जहाँ उन्हें बाबू श्यामसुंदर दास को करीब से देखने का मौका मिला। लेखक प्रसादजी के दर्शन करना चाहते थे और उन्हें नागरी प्रचारिणी सभा में प्रसादजी की पत्रिका 'इन्दु' देखने का अवसर मिल गया था। प्रसादजी का घर गोवर्धन सराय में था और उनकी पुश्तैनी जर्दा-सुर्ती की दुकान नरियरी बाजार में थी, जहाँ वे बैठते थे। लेखक प्रसादजी के व्यक्तित्व को करीब से जानने के लिए इन सभी जगहों पर जाते रहते थे। प्रसादजी का व्यक्तित्व ऐसा था कि वे रोज शाम को दुकान के सामने तख्त पर बैठते थे। बड़े-बड़े साहित्यकार वहाँ आकर उनसे काव्यशास्त्र पर चर्चा करते थे। प्रसादजी को वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, शालिहोत्र जैसे सभी शास्त्रों का अद्भुत ज्ञान था। वे औषधियों और किमाम-इत्र आदि के भी अच्छे निर्माता थे। वे कवि-सम्मेलनों में नहीं जाते थे और अपनी आलोचना सुनकर भी शांत रहते थे। प्रसादजी धार्मिक स्वभाव के थे। वे शिवरात्रि महोत्सव धूमधाम से मनाते थे और सभी त्योहारों पर परिवार की परंपरा के अनुसार दान-दक्षिणा देते थे। काशी में लोग उन्हें 'दरबार' कहते थे और वे काशी नरेश के समान सम्मानित व्यक्ति थे। उनका चरित्र बिल्कुल साफ था।
In simple words: शिवपूजन सहाय ने जयशंकर प्रसादजी के जीवन के कई पहलू बताए हैं। वे बताते हैं कि कैसे प्रसादजी को पढ़ाई और ज्ञान का गहरा शौक था, वे अपने व्यवसाय में भी कुशल थे, और कैसे उन्हें काशी में बहुत सम्मान मिलता था। वे धार्मिक स्वभाव के थे और अपनी आलोचना सुनने पर भी शांत रहते थे।
🎯 Exam Tip: पाठ सार लिखते समय मुख्य घटनाओं, प्रसादजी के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं और लेखक के अनुभवों को संक्षिप्त और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करें।
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