Official NCERT Book for Class 6 Sanskrit: Chapter 16 Vrikshah Satpurushah Iva
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पाठ 16: वृक्षः सत्पुरुषः इव
पयावरणसंरक्षणस्य विषये एका प्रदर्शनी विद्यालये आयोजिता अस्ति। छात्रा: तां प्रदर्शनीं प्रश्यन्ति। शिक्षकेण सह संलापं च कुर्वन्ति।
[चित्र: एक पार्क में शिक्षक और छात्र, पाठ्यपुस्तक में देखें]
श्रीमन्!: अहं जीवशास्त्रस्य पुस्तकेन पठामि यत् वृक्षा: शुद्धं वायुं यच्छन्ति।
श्रीमन्!: मम माता अपि वदति यत् वृक्षा: पूज्या: भवन्ति।
प्रिया: छात्रा: !: सत्यम्, बुक्षा: शुद्धं वायुं, फलानि, पुष्पाणि च सर्वैं अपि यच्छन्ति। अत: ते पूज्या: ।
श्रीमन्!: अहं एके सुभापिते पठितवती यत् 'बृक्षा: सत्पुरुषः इव' सन्ति इति।
किं एवम्?: अस्तु, तर्हि तत सभापिते श्रावयतु।
शिक्षक की टिप्पणी
इस पाठ में संस्कृत का एक सूक्ति (सुभाषित) दिया गया है जो वृक्षों और अच्छे मनुष्यों की तुलना करता है। आप पाठ को ध्यान से पढ़िए और समझिए कि वृक्ष कैसे सत्पुरुष (अच्छे आदमी) की तरह होते हैं। इस तुलना को याद रखना आपके लिए महत्वपूर्ण होगा।
छायामान्यस्य कृवर्न्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यापि परार्थीय बृक्षा: सत्पुरुषः इव।।
फलान्यपि परार्थीय वृक्षा: सत्पुरुषः इव।।
पद्छेद: छायामान् यस्य कृवर्न्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलानि अपि परार्थीय वृक्षा: सत्पुरुषः इव।
अन्वय: अहो! एषां वृक्षाणां जन्म सर्वप्राणिनां उपजीवनम् सुजनस्य इव येषां तेषां सभापिते श्रावयतु।
भावार्थ: श्रीकृष्ण: युधिष्ठिर वदति-हे युधिष्ठिर! एतेषां वृक्षाणां जन्म श्रेष्ठं अस्ति, यत: एतेषां जनानां निराशा न भवति तथेव वृक्षाणां समीपे आगत्य अर्थिनां जनानां निराशा न भवति। तेषां सत्पुरुषः इव।
दशकुप्समा वापी दशवापीसमो हदः। दशहदसमः पुत्रः दशपुत्रसमः वृक्षः।।
दशहदसमः पुत्रः दशपुत्रसमः वृक्षः।।
पद्छेद: दशकुप्समा वापी, दशवापीसमो हदः। दशहदसमः पुत्रः, दशपुत्रसमः वृक्षः।।
अन्वय: बृक्षा: परोपकराय फलानि, नद्योना जलस्य उपयोगम् आपि अन्येषा कृते एव शिरीरम्।
भावार्थ: बृक्षस्य फलानि अन्ये खादन्ति, न तु बृक्षः। स्वयं खादति फलानि बृक्षा। मेघा: आपि जलं बर्षन्ति, किन्तु बृक्षूया उत्पन्नं सस्यं स्वयं न खादन्ति। अनेन प्रकारेण सज्जनानां सम्पद: अपि परोपकराय भवतु।
शिक्षक की टिप्पणी
इन दोनों सुभाषितों में वृक्षों के गुणों का वर्णन है। पहली सुभाषित में कहा गया है कि वृक्ष अपने लिए छाया में रहते हैं, लेकिन फल दूसरों को देते हैं। दूसरी सुभाषित में कहा गया है कि वृक्ष सबसे अधिक उपयोगी है-एक कुआँ दस बार खोदने जितना, एक तालाब दस कुओं जितना, एक पुत्र दस तालाबों जितना, लेकिन एक वृक्ष दस पुत्रों जितना उपयोगी है। इन तुलनाओं को समझिए।
व्यर्थ शब्दार्थौ जानीम:
| शब्द: | अर्थ: | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थ लिखन्तु |
|---|---|---|---|---|
| आतपे | सूर्यतापे | धूप में | In the sunlight | |
| परार्थीय | अन्येषाम् उपकारायः | दूसरो के उपकार के लिए | For the sake of others | |
| सत्पुरुषा: | सज्जना: | सज्जन लोग | Noble men | |
| वापी | दीर्घिका | बावड़ी | Stepwell | |
| हद: | सरोवर: | तालाब/झील | Pond / Lake | |
| ड्रुम: | बृक्षा: | पेड़ | Tree | |
| वरम् | श्रेष्ठम् | श्रेष्ठ | Best | |
| अर्थिन: | प्राप्तुम् इच्छुका: | प्राप्त करने के इच्छुक | Wishing to receive | |
| वहन्ति | प्रवहन्ति | बहती है | Flows | |
| वल्कलम् | बृक्षस्य त्वक् | पेड़ की छाल | Bark of tree | |
| दारुभिः | काष्ठे: | लकड़ियों से | By Wood | |
| महोहस: | बृक्षा: | पेड़ | Trees | |
| अम्भ: | जलम् | पानी | Water | |
| वारिवाहा: | मेघा: | बादल | Clouds | |
| विभुतयः | समृद्धयाँ | समृद्धियों | Prosperity |
वयम् अभ्यासं कुर्मः:
- पाठे लिखितानि सुभाषितानि सुस्पष्टयैं, अवगच्छन्तु, लिखन्तु स्मर्तु च।
- पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानां उत्तारांणि एकपदेन लिखन्तु -
- बृक्षा: स्वयं कुत् तिष्ठन्ति ?
- परोपकरायः का: वहन्ति ?
- दशबापीसमः: क: भवति ?
मुख्य बिंदु
- वृक्षाः सत्पुरुषसदृशाः सन्ति क्योंकि ते स्वमातृप्रेरणया स्वयं न खादन्ति, अपि तु सर्वेभ्यः फलानि वितरन्ति।
- सुभाषितमध्ये वृक्षस्य महत्वं दर्शितं यत् कूपे, वापीमध्ये, हर्दे च अपेक्षया वृक्षः अधिकं मूल्यवान् अस्ति।
- परोपकारे नियुक्तमनोभावेन वृक्षाः सदा अन्येषां सुखार्थे कार्यं कुर्वन्ति, फलतः ते सत्पुरुषसमानाः ज्ञायन्ते।
यह अध्याय के पहले 5 पृष्ठों का पूर्वावलोकन है। पूरा अध्याय पाने के लिए नीचे क्लिक करें।
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