NCERT Class 5 Hindi Veena Chapter 09 Nyay (न्याय) PDF Download

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पाठ 9: न्याय

पाठ परिचय

सिद्धार्थ - कपिलवस्तु के राजकुमार

शुद्धोदन - कपिलवस्तु के महाराजा

सखा - सिद्धार्थ का मित्र

देवदत्त - सिद्धार्थ का चचेरा भाई

मंत्री - महाराजा का मंत्री

प्रतिहारी

पहला दृश्य

(रंगमंच पर राज-उद्यान का एक दृश्य। संख्याकाला मंच पर लालिमा क्रिणे चित्र बनाती है। पुष्प झूमते हैं। दूर नेपथ्य में वन से लोती गायों का स्वर उठता हुआ। पक्षी विदा का गान गाते हैं। उद्यान में इस समय कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ प्रसन्न मन एक वेदी पर बैठे हो पास ही उनका एक सखा है। दोनों बातें कर रहे हैं।)

सिद्धार्थ - देखो मित्र! कैसा सुहावना समय है! कैसी शांति है। पक्षी लीट रहे हैं! वे अपने बच्चों से मिलने को व्याकुल हैं और गायें अपने बछड़ों को प्यार करने के लिए उतावली हो रही हैं।

(गायों के बछड़े-बछियों के रेभाने के स्वर उठते हैं।)

सखा - हाँ कुमार! यह बात तो है। सोने के वक्त नींद भी आ जाती है। भला कुमार, वे कैसे जानते हैं कि यह समय उनकी माँओं के घर लौटने का है?

सिद्धार्थ - ऐसा कैसे हो जाता है मित्र! बड़े अचरज की बात है।

सखा - अचरज तो है ही। देखो न, सुरज रोज सवेरे पूरब से निकलता है और शाम को पश्चिम में छिप जाता है।

सिद्धार्थ - और गर्मी हर साल एक ही समय पर शुरू होती है। पानी भी हर साल नियत समय पर पड़ता है। ऐसा मालूम होता है कि हर बस्तु का एक स्वभाव होता है।

(तीर निकालते हुए हँस सुख मानता है और बड़े अनुराग से कुमार की गोदी में दुबक जाता है। कुमार स्नेह से उसके शरीर पर हाथ फेरते हैं।)

सिद्धार्थ - किस निर्देश्य ने इस भोले-भोले पक्षी को ध्यायल किया है? इसने किसी का क्या बिगाड़ा था?

शिक्षक की टिप्पणी

इस नाटक में सिद्धार्थ और सखा प्राकृतिक जगत को देखकर सवाल पूछ रहे हैं। यह पहला दृश्य यह दिखाता है कि कैसे अवलोकन (देखना और सुनना) से नई सीख मिलती है। ध्यान से पढ़िए कि प्रकृति में कौन-कौन से नियम हैं और सिद्धार्थ उन्हें कैसे समझ रहा है।

सखा - हाँ कुमार! यह बात तो है। सोने के वक्त नींद भी आ जाती है। भला कुमार, वे कैसे जानते हैं कि यह समय उनकी माँओं के घर लौटने का है?

सिद्धार्थ - (ऊपर देखते हुए) और मित्र, ये तो राजहंस हैं! बड़े अचरज की बात है।

सखा - देखो, इक्ट्ठे उड़ते हुए ये कैसे अच्छे लगते हैं!

सिद्धार्थ - सचमुच अच्छे लगते हैं। इनकी गरदन तो देखो, कैसे आगे को निकली हुई है, जैसे हवा में तैर रहे हों!

सखा - और तुम क्या समझते हो कुमार! ये तेर तो रहे ही हैं। पानी पर चलना तेरना कहलाता है और हवा में चलना उड़ना।

सिद्धार्थ - (ऊपर देखते-देखते) अच्छी बात है, मैं गुरुजी से पूछूँगा, योगी किसे कहते हैं... और मित्र, देखो! यह क्या हुआ?

सखा - (धराराक) क्या हुआ कुमार? अरे, यह किसने तीर चलाया?

सिद्धार्थ - (उता/बला) और उस पक्षी को देखो... वह किस तेजी से धरती पर गिर रहा है। कुमार कुरुणा में भरकर उसे संभालते हैं।)

सिद्धार्थ - किस निर्देश्य ने इस भोले-भोले पक्षी को ध्यायल किया है? इसने किसी का क्या बिगाड़ा था?

देवदत्त - अहा, मेरा हँस तुम्हारे पास है। लाओ, इसे मुझे दो।

सिद्धार्थ - क्यों दूँ?

देवदत्त - क्योंकि यह मेरा है।

सिद्धार्थ - इसका प्रमाण?

देवदत्त - प्रमाण! और प्रमाण क्या? मैंने इसे मारा है। इसके शरीर में मेरा तीर लगा है।

सिद्धार्थ - तुम ही नहीं मित्र! कोई भी व्यक्ति, जिसके पास हदय है, इन निर्दोष पक्षियों को नहीं मार सकेगा लेकिन हाँ, तुम दोड़कर राजवेश्य से मरहम तो ले आओ।

सखा - अभी जाता हूँ!

(सखा जाता है। तभी कुमार देवदत्त को देखकर चिखता है और सिद्धार्थ की गोद में दुबक जाता है।)

सिद्धार्थ - हाँ, मैं तुम्हारी गवाही दूँगा देवदत्त! तुमने एक निर्दोष पक्षी को मारने का प्रयास किया है। इसका प्रमाण यह हँस है।

सखा - (कौंपता-सा) कुमार...

सिद्धार्थ - बताओ सखे। देखो तो, इसकी आँखें कितनी भोली हैं! इसकी छाती में कितना स्नेह पैदा होता है!

सखा - (सांस खींचकर) नहीं कुमार! मैं इसकी नहीं मार सकूँगा। लेकिन हाँ, तुम दोड़कर राजवेश्य से मरहम तो ले आओ, कैसे सुंदर पक्षी हैं।

सिद्धार्थ - तुम ही नहीं मित्र! कोई भी व्यक्ति, जिसके पास हदय है, इन निर्दोष पक्षियों को नहीं मार सकेगा लेकिन हाँ, तुम दोड़कर राजवेश्य से मरहम तो ले आओ।

सखा - अभी जाता हूँ!

(सखा जाता है। तभी कुमार देवदत्त को देखकर चिखता है और सिद्धार्थ की गोद में दुबक जाता है।)

शिक्षक की टिप्पणी

नाटक के इस हिस्से में सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच एक महत्वपूर्ण बहस होती है - किस चीज़ का मालिक कौन है? यह 'न्याय' की शुरुआत है। आप ध्यान दीजिए कि सिद्धार्थ सिर्फ 'मारा है, इसलिए मेरा है' - इस तर्क को स्वीकार नहीं करते। वे पूछते हैं कि 'प्रमाण क्या है?' यह सवाल ही न्याय की बुनियाद है।

मुख्य बिंदु

  • न्याय का मतलब है सही-गलत का फैसला करना। इसके लिए सवाल पूछने और सुनने की जरूरत है।
  • सिद्धार्थ और देवदत्त की बहस से पता चलता है कि ताकत या बल से किसी चीज़ का मालिक नहीं बन जाते - सही कारण होना चाहिए।
  • प्राकृतिक दुनिया (पक्षी, जानवर, मौसम) के अपने नियम होते हैं, और हर चीज़ का एक स्वभाव और प्रयोजन होता है।
  • करुणा और न्याय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं - जब तक आप किसी के दर्द को नहीं समझते, आप उसके साथ न्याय नहीं कर सकते।

यह अध्याय के पहले 5 पृष्ठों का पूर्वावलोकन है। पूरा अध्याय पाने के लिए नीचे क्लिक करें।

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