Official ISC Exam Papers for Class 12 Hindi
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Solved Previous Year Papers for Hindi
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ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper with Solutions
HINDI
SECTION A
Question 1.
Write a composition in HINDI in approximately 400 words on any ONE of the topics given below:- [20 Marks]
(a) आधुनिक युग में विवाह समारोहों पर भारी धन खर्च किया जाने लगा है। आपने अभी अभी ऐसा ही विवाह समारोह देखा है जिसमें अत्यधिक खर्च किया गया। आपके विचार में वहां पर किए गए किन किन खर्चों को किस प्रकार कम किया जा सकता था। विस्तार से लिखिए।
(b) बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है जो विनाश कर डालती है। इस पर एक सारगर्भित प्रस्ताव लिखिए।
(c) व्यक्ति की उन्नति में संस्कारों, शिक्षा और सामाजिक परिवेश का योगदान होता है। इस विषय का विवेचन कीजिए।
(d) कहा जाता है, उधार लेना और देना दोनों ही गलत हैं। इस विषय के पक्ष या विपक्ष में अपने विचार लिखें।
(e) समय के महत्त्व को जिसने नहीं समझा, वह जिन्दगी की दौड़ में पीछे रह जाता है। इस विषय का विवेचन कीजिए।
(f) निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर मौलिक कहानी लिखिए:-
(i) चढ़ते सूरज को सब सलाम करते हैं।
(ii) एक कहानी लिखिए जिसका अन्तिम वाक्य होगा - - - - - - - - बस संयुक्त परिवार का यही लाभ होता है।
Answer:
(विषय - (a) के अंतर्गत मॉडल रूपरेखा एवं मुख्य बिंदु)
1. भूमिका: आधुनिक समय में विवाह समारोहों का अति-आडंबरपूर्ण और प्रदर्शनकारी रूप, जिसमें लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं।
2. विषय वर्णन (देखे गए समारोह का प्रसंग): हाल ही में मित्र के यहाँ या पड़ोस में देखे गए विवाह का आँखों देखा हाल, जहाँ डीजे, भव्य सजावट, आतिशबाजी और भोजन की बर्बादी पर असीमित व्यय हुआ।
3. खर्चों को कम करने के उपाय:
- मेहमानों की अत्यधिक लंबी सूची को सीमित करना और केवल करीबी संबंधियों को आमंत्रित करना।
- अनावश्यक दिखावे, महंगे कैटरिंग और भोजन की बर्बादी पर रोक लगाना।
- डीजे और आतिशबाजी जैसे क्षणिक सुखों पर भारी धन खर्च करने से बचना।
- विवाह को सादगीपूर्ण और पारंपरिक तरीके से संपन्न करना।
4. निष्कर्ष: विवाह दो आत्माओं और परिवारों का पवित्र मिलन है, न कि धन के प्रदर्शन का मंच। सादगी से बचा हुआ धन नवदंपति के भविष्य या सामाजिक कार्यों में उपयोग किया जा सकता है।
Teacher's Note:
a) निबंध में भूमिका, विषय-विस्तार, प्रस्तुतिकरण, भाषा और उपसंहार का सही संतुलन होना अनिवार्य है तथा निर्धारित शब्द-सीमा (लगभग 400 शब्द) का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
b) छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे विषय के सभी पहलुओं को छूते हुए तार्किक और प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग करें, जिससे परीक्षक पर सकारात्मक प्रभाव पड़े।
Question 2.
Read the following passage and answer the questions that follow :-
परोपकार प्रकृति का सहज स्वाभाविक नियम है। जलवायु, मिट्टी, वृक्ष, प्रकाश, पशु, पक्षी आदि प्रकृति के सभी अंग किसी न किसी रूप में दूसरों की भलाई में तत्पर रहते हैं।
अर्थात् वृक्ष परोपकार के लिये फलते हैं, नदियाँ परोपकार के लिये बहती हैं, गाय परोपकार के लिये दूध देती है। यह शरीर भी परोपकार के लिये है। वास्तव में जब प्रकृति के जीव-जन्तु निःस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई में तत्पर रहते हैं तब विवेकशील प्राणी होते हुए भी मनुष्य यदि जाति की सेवा न कर सके तो जीवन सफलता के लिये कलंक स्वरूप है। मनुष्य होते हुए भी मनुष्य कहलाने का उसे कोई अधिकार नहीं है।
परोपकार ही मानवता का सच्चा आदर्श है। यही सच्ची मनुष्यता है। राष्ट्रकवि गुप्तजी ने यह कहा कि "वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिये मरे।" मनुष्य वही है जो केवल अपने सुख:दुख की चिंता में लीन नहीं रहता, केवल अपने स्वार्थ की ही बात नहीं सोचता, जिसका शरीर सोने के लिये नहीं देने के लिये है। उसका हृदय सागर की भाँति विशाल होता है, जिसमें समस्त मानव समुदाय के लिये प्रेम से भरा स्थान रहता है। सारे विश्व को वह अपना परिवार समझता है।
सचमुच परोपकार ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। यदि किसी मनुष्य के हृदय में त्याग और सेवा की भावना नहीं है, उसका मंदिरों में जाकर पूजा और अर्चना करना ढोंग और पाखंड है। प्रसिद्ध नीतिसार सादी का कथन है कि "अगर तू एक आदमी की तकलीफ को दूर करता है तो वह कहीं अधिक अच्छा काम है, बजाय कि तू हज को जाये और मार्ग की हर एक मंजिल पर सौ बार नमाज पढ़ता जाये।" सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य का सबसे बड़ा कर्त्तव्य है कि वह दूसरों के सुख-दुख की चिंता करे, क्योंकि उसका सुख-दुख दूसरों के सुख-दुख के साथ जुड़ा हुआ है। इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने स्वार्थ साधन में लिप्त न रहकर दूसरों की भलाई के लिए भी कार्य करे।
बिना किसी स्वार्थ भाव से लेकर दूसरों की भलाई के लिये कार्य करना ही मनुष्यता है। इस परोपकार के अनेक रूप हो सकते हैं। यदि आप शरीर से शक्तिमान हैं तो आपका कर्त्तव्य है कि दूसरों के द्वारा सताये गये दीन-दुखियों की रक्षा करें। यदि आपके पास धन-सम्पदा है तो आपको विपत्तियों में फँसे अपने असहाय भाइयों का सहायक बनना चाहिए। भूखों को रोटी और निराश्रितों को आश्रय देना चाहिए। यदि आप यह सब कुछ करने में भी असमर्थ हैं तो अपने दुखी और पीड़ित भाइयों को मीठे शब्दों द्वारा धीरज और सांत्वना प्रदान कीजिए। यही नहीं, किसी भूले हुए को रास्ता देना देना, संकट में अच्छी सलाह देना, अंधों का सहारा बन जाना, घायल अथवा रोगी की चिकित्सा करना, ये सब परोपकार के महत्वपूर्ण अंग हैं। वास्तव में हृदय में किसी के प्रति शुभ विचार भी परोपकार का ही रूप है।
प्राचीनकाल में दधीचि नाम के प्रसिद्ध महर्षि थे। ईश्वर - प्राप्ति ही उनका जैसे लक्ष्य था। परन्तु परोपकार वश उन्होंने देवताओं को वज्र बनाने के लिए अपनी हड्डियाँ तक दान में दे दी थीं। गुरु तेग बहादुर ने परोपकार के लिए अपना शीर्ष और औरंगजेब को भेंट कर दिया था।
हमारा कर्त्तव्य है कि हम प्रकृति से शिक्षा लें तथा अपने महापुरुषों के जीवन का अनुकरण करें। निःस्वार्थ भाव से परोपकार के कार्यों में लगें।
प्रश्न :
(a) परोपकार से आप क्या समझते हैं? गद्यांश के अनुसार किन महापुरुषों ने अपने जीवन का त्याग परोपकार के लिये किया? [4 Marks]
Answer:
परोपकार का अर्थ बिना किसी स्वार्थ भाव के दूसरों की भलाई करना है। गद्यांश के अनुसार महर्षि दधीचि ने देवताओं को वज्र बनाने के लिए अपनी हड्डियाँ दान कर दी थीं तथा गुरु तेग बहादुर ने मानवता की रक्षा के लिए अपना शीर्ष औरंगजेब को भेंट कर दिया था।
Teacher's Note:
a) छात्र गद्यांश के सार को समझकर अपने शब्दों में स्पष्ट उत्तर लिखें।
b) महापुरुषों के उदाहरण देना न भूलें, क्योंकि यह प्रश्न का मुख्य भाग है।
(b) प्रकृति के अंग किस प्रकार हमें परोपकार की शिक्षा देते हैं? [4 Marks]
Answer:
प्रकृति के अंग जैसे जलवायु, मिट्टी, वृक्ष, प्रकाश, पशु और पक्षी निःस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई करते हैं। वृक्ष दूसरों के लिए फल देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं और गाय दूसरों के लिए दूध देती है; इस प्रकार वे हमें परोपकार की प्रेरणा देते हैं।
Teacher's Note:
a) प्रकृति के विभिन्न उपादानों का उल्लेख करना आवश्यक है।
b) केवल प्रश्नपत्र की भाषा की नकल करने से बचें, भाव को अपने शब्दों में ढालें।
(c) परोपकारी मनुष्य का स्वभाव कैसा होता है? [4 Marks]
Answer:
परोपकारी मनुष्य का स्वभाव अत्यंत विशाल और उदार होता है। वह केवल अपने सुख-दुख की चिंता नहीं करता, बल्कि पूरे विश्व को अपना परिवार समझता है। उसका हृदय सागर की भाँति विशाल होता है जिसमें सभी मानवों के प्रति प्रेम होता है।
Teacher's Note:
a) मनुष्य के उदार स्वभाव और विश्व-बंधुत्व की भावना को स्पष्ट करें।
b) अनावश्यक विस्तार से बचते हुए सटीक उत्तर दें।
(d) परोपकार मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म किस प्रकार होता है? [4 Marks]
Answer:
परोपकार ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है क्योंकि मंदिरों में जाकर पूजा-पाठ करना या ढोंग करना व्यर्थ है यदि हृदय में त्याग और सेवा की भावना न हो। किसी की तकलीफ दूर करना सच्ची ईश्वर-भक्ति और मानवता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
Teacher's Note:
a) बाह्य आडंबरों और सच्ची मानवता (परोपकार) के अंतर को समझें।
b) गद्यांश में दिए गए सादी के कथन के संदर्भ को समझकर लिखें।
(e) गद्यांश के आधार पर बताइए कि परोपकार के महत्त्वपूर्ण अंग कौन से हैं, किस किस तरह से परोपकार किया जा सकता है? [4 Marks]
Answer:
परोपकार के अनेक रूप हैं जैसे शरीर से शक्तिमान होने पर दीन-दुखियों की रक्षा करना, धनवान होने पर असहायों की सहायता करना, भूखों को भोजन और निराश्रितों को आश्रय देना। यदि ये सब संभव न हो तो मीठे शब्दों से सांत्वना देना, रास्ता दिखाना या किसी रोगी की सहायता करना भी परोपकार के ही अंग हैं।
Teacher's Note:
a) परोपकार के विभिन्न रूपों का बिंदुवार या स्पष्ट रूप से उल्लेख करें।
b) गद्यांश के आधार पर उत्तर को संक्षिप्त और सारगर्भित रखें।
Question 3.
(a) Correct the following sentences :-
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए :- [5 Marks]
(i) तुम प्रातःकाल के समय उठकर क्या करते हो?
(ii) मेरी पढ़ाई में बहुत नुकसान हो रहा है।
(iii) वह विद्वान लड़की है।
(iv) हमने रात को खूब सोया।
(v) फूलों का सौन्दर्य देखते ही बनती है।
Answer:
(i) तुम प्रातःकाल उठकर क्या करते हो? (अथवा: तुम सुबह उठकर क्या करते हो?)
(ii) मेरी पढ़ाई का बहुत नुकसान हो रहा है।
(iii) वह विदुषी लड़की है।
(iv) हम रात को खूब सोए। (अथवा: मैं रात को खूब सोया।)
(v) फूलों का सौन्दर्य देखते ही बनता है।
Teacher's Note:
a) वाक्य शुद्धि में लिंग, वचन, कारक और अनावश्यक शब्दों (जैसे 'प्रातःकाल के समय' में 'के समय') का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
b) 'विद्वान' पुरुष के लिए और 'विदुषी' स्त्री के लिए प्रयुक्त होता है, अतः लिंग के अनुसार उचित शब्द चुनें।
(b) Use the following idioms in sentences of your own to illustrate their meaning :-
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करने के लिए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए :- [5 Marks]
(i) बाल बाँका न होना。
(ii) मैदान मारना।
(iii) हाथ तंग होना。
(iv) घर सिर पर उठाना।
(v) खाक में मिलना।
Answer:
(i) बाल बाँका न होना (कोई हानि न पहुँचना): ईश्वर की कृपा हो तो बुरे से बुरे समय में भी भक्त का बाल बाँका नहीं होता।
(ii) मैदान मारना (सफलता प्राप्त करना): भारतीय क्रिकेट टीम ने शानदार प्रदर्शन कर मैच जीतकर मैदान मार लिया।
(iii) हाथ तंग होना (धन की कमी होना): व्यापार में घाटा होने के कारण इस समय मेरा हाथ बहुत तंग है।
(iv) घर सिर पर उठाना (बहुत शोरगुल या उपद्रव मचाना): अध्यापक के कक्षा से बाहर जाते ही बच्चों ने घर सिर पर उठा लिया।
(v) खाक में मिलना (नष्ट हो जाना या प्रतिष्ठा धूमिल होना): घमंडी व्यक्ति का अहंकार अंततः खाक में मिल जाता है।
Teacher's Note:
a) मुहावरों का वाक्य प्रयोग ऐसा होना चाहिए जिससे उनका अर्थ स्पष्ट झलके।
b) केवल अर्थ लिखकर न छोड़ें, वाक्य में सटीक प्रयोग करना अनिवार्य है।
SECTION B
काव्य - तरंग
Question 4.
'सच्ची मित्रता' शीर्षक चौपाइयों में तुलसीदास किस प्रकार सच्चे मित्र के गुणों पर प्रकाश डाला है? [12½ Marks]
Answer:
तुलसीदास जी द्वारा रचित 'सच्ची मित्रता' (रामचरितमानस के किष्किंधाकांड से संकलित) चौपाइयों में सच्चे और अच्छे मित्र के लक्षणों का बहुत ही सुंदर और मार्मिक वर्णन किया गया है। आचार्य तुलसी के अनुसार सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्र को बुरे मार्ग पर जाने से रोकता है और हमेशा सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
सच्चे मित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. निवारण और प्रेरणा: सच्चा मित्र अपने मित्र के अवगुणों को छिपाकर उसके गुणों को प्रकट करता है और उसे कुमार्ग से हटाकर सुमार्ग की ओर अग्रसर करता है।
2. संकट में साथ: जब मित्र पर विपत्ति या दुःख के काले बादल छा जाते हैं, तो सच्चा मित्र कभी साथ नहीं छोड़ता, बल्कि उसकी परेशानी को अपनी परेशानी समझकर उसकी हरसंभव मदद करता है।
3. निःस्वार्थ भाव: सच्चे मित्र के मन में कोई कपट या स्वार्थ नहीं होता। वह ऊपर से कोमल और मीठे वचन बोलता है किंतु मन में कुटिलता रखने वाले कपटी मित्रों से दूर रहने की सलाह दी गई है, क्योंकि ऐसे मित्र सांप के समान धोखेबाज होते हैं।
4. सच्चा परामर्श: सच्चा मित्र बिना किसी संकोच के सही सलाह देता है तथा स्नेह और संवेदना रखता है। तुलसीदास जी ने कुमित्र का त्याग करने और सच्चे मित्र का साथ निभाने पर विशेष बल दिया है।
Teacher's Note:
a) उत्तर लिखते समय प्रसंग, तुलसीदास की काव्य शैली (दोहा-चौपाइयाँ) तथा पाठ के केंद्रीय भाव का उल्लेख अवश्य करें।
b) पद्यांश के कुछ अंश या पंक्तियाँ उदाहरण स्वरूप देने से उत्तर अधिक प्रभावशाली बनता है।
Question 5.
गुप्त जी ने 'विश्वराज्य' शीर्षक कविता में विश्व मानवता का संदेश दिया है। स्पष्ट कीजिए। [12½ Marks]
Answer:
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता 'विश्वराज्य' द्विवेदी युग की राष्ट्रीय चेतना और विश्व-बंधुत्व की भावना को प्रकट करने वाली एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण रचना है। इस कविता के माध्यम से कवि ने संपूर्ण मानव जाति को जाति, पाति, देश और धर्म की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर एक विश्व परिवार के रूप में रहने का संदेश दिया है।
कविता में व्यक्त मुख्य संदेश और विचार निम्नलिखित हैं:
1. प्रकृति की समानता: कवि का तर्क है कि ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना करते समय कोई भेद नहीं किया है। हम सबकी जननी मातृभूमि एक है, आकाश, वायु, जल, सूर्य और चंद्र सभी के लिए समान हैं। ऐसे में इंसानों द्वारा धरती को टुकड़ों में बाँटना और आपस में लड़ना सर्वथा अनुचित है।
2. विश्व-बंधुत्व की भावना: कवि स्पष्ट करते हैं कि मानव जाति का एकमात्र मार्ग 'विश्वराज्य' है। जिस प्रकार एक ही शरीर के विभिन्न अंग होने पर भी पूरा शरीर सुख-दुख में एक साथ स्पंदित होता है, उसी प्रकार पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
3. आपसी वैमनस्य का अंत: कवि आह्वान करते हैं कि हमें आपस की फूट, जातिगत भेदभाव और सांप्रदायिक झगड़ों को त्याग देना चाहिए। यदि संसार का कोई भी देश प्राकृतिक आपदा या संकट में हो, तो अन्य देशों का कर्तव्य है कि वे आगे बढ़कर उसकी सहायता करें।
4. वसुधैव कुटुंबकम की सार्थकता: 'वसुधैव कुटुंबकम' (संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार है) के विचार को चरितार्थ करते हुए गुप्त जी ने प्रेम, करुणा, त्याग और सेवा का मार्ग अपनाने पर बल दिया है, जिससे एक सुंदर और शांतिपूर्ण विश्व की स्थापना हो सके।
Teacher's Note:
a) उत्तर में 'विश्व मानवता' और 'राष्ट्रीय प्रेम' के मूल भाव को स्पष्ट करना आवश्यक है।
b) केवल साधारण सारांश लिखने के बजाय कविता की पंक्तियों को उदाहरण के रूप में अवश्य उद्धृत करें।
Question 6.
'सुमन के प्रति' किसकी रचना है? इसमें विकसित और मुरझाए फूल में क्या अन्तर दिखाया गया है? फूल के माध्यम से क्या भाव व्यक्त किया गया है? [12½ Marks]
Answer:
'सुमन के प्रति' महादेवी वर्मा की एक अत्यंत प्रसिद्ध और मर्मस्पर्शी छायावादी रचना है। इस कविता के माध्यम से कवयित्री ने प्रकृति के प्रतीक फूल के जीवन के माध्यम से मानव जीवन की नश्वरता, संघर्ष, और उसकी महत्ता का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है।
विकसित और मुरझाए फूल में अंतर:
1. विकसित फूल: जब फूल कली से खिलकर पूर्ण विकसित होता है, तो वह अपनी सुंदरता, सुगंध और रंग से संसार को आनंदित करता है। भौरे उसका यशगान करते हैं, चाँदनी उसे हँसाती है और हर कोई उसका स्वागत करता है। वह प्रकृति और समाज दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है।
2. मुरझाया फूल: इसके विपरीत, जब समय बीतता है और यौवन समाप्त होता है, तो वही फूल वायु के झोंके से अलग होकर जमीन पर गिर जाता है और उसकी पंखुड़ियाँ बिखर जाती हैं। तब वही भौरे और संसार के लोग उससे मुँह मोड़ लेते हैं, उसकी उपेक्षा करते हैं और उसे पैरों तले कुचल देते हैं।
फूल के माध्यम से व्यक्त भाव:
कवयित्री ने फूल के बहा-बहाकर मानव जीवन की सच्चाई को उजागर किया है। मनुष्य के जीवन में भी यौवन, सुख और समृद्धि के दिनों में सभी अपने होते हैं, किंतु विपत्ति या वृद्धावस्था आने पर कोई साथ नहीं देता। कवयित्री मुरझाए फूल को सांत्वना देती हैं कि उसका निःस्वार्थ त्याग और बलिदान व्यर्थ नहीं गया है, क्योंकि उसने अपने जीवन में दूसरों को सुगंध और प्रसन्नता दी है। यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन क्षणभंगुर है, अतः स्वार्थ को छोड़कर परोपकार और सेवा में ही जीवन की सार्थकता है।
Teacher's Note:
a) कवयित्री महादेवी वर्मा की छायावादी शैली और दर्शन को ध्यान में रखते हुए उत्तर लिखें।
b) विकसित और मुरझाए फूल की अवस्थाओं का तुलनात्मक वर्णन स्पष्ट रूप से किया जाना चाहिए।
कथा सुरभि
Question 7.
मुंशी तोताराम निर्मलार्शी में दया के पात्र क्यों बन गए? [12½ Marks]
Answer:
मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित उपन्यास 'निर्मला' अनमेल विवाह की कुप्रथा और उसके भयानक परिणामों को उजागर करने वाली एक अत्यंत मार्मिक कृति है। इस उपन्यास में मुंशी तोताराम ढलती उम्र के एक विधुर व्यक्ति हैं जो अपनी से बहुत छोटी उम्र की युवती निर्मला से विवाह कर लेते हैं। यही निर्णय उनके जीवन के पतन और उन्हें दया का पात्र बना देता है:
1. अनमेल विवाह की भूल: तोताराम ने अपनी उम्र और पारिवारिक स्थिति को ताक पर रखकर अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दहेज के लालच में या अन्य कारणों से निर्मला जैसी युवा युवती से विवाह किया, जो वैचारिक और आयु की दृष्टि से उनके अनुकूल नहीं थी।
2. परिवार में असंतोष और कलह: तोताराम के घर में पहले से बड़े बेटे (मंसाराम आदि) थे। निर्मला के आने से घर का पारिवारिक संतुलन बिगड़ गया। तोताराम का अत्यधिक प्रेम और संदेह उनके जीवन को नर्क बना देता है।
3. संशय और अविश्वास: तोताराम के मन में निर्मला और मंसाराम के संबंध को लेकर शंका और संशय घर कर जाता है, जिसके कारण वे लगातार मानसिक प्रताड़ना सहते हैं और दूसरों के बहकावे में आकर अपने ही बेटे को घर से निकाल देते हैं।
4. अंतिम एकाकीपन और पतन: तोताराम की इस भूल के कारण उनका हँसता-खेलता परिवार बिखर जाता है। मंसाराम की अकाल मृत्यु हो जाती है, निर्मला आत्मग्लानि और वियोग में घुट-घुटकर प्राण त्याग देती है, और तोताराम पूरी तरह अकेले, असहाय और समाज की दृष्टि में अत्यंत दयनीय स्थिति में पहुँच जाते हैं।
Teacher's Note:
a) उपन्यास के मुख्य पात्र तोताराम की त्रासदी के मूल कारणों (अनमेल विवाह और शंकालु स्वभाव) को स्पष्ट करें।
b) घटनाक्रम को क्रमानुसार लिखकर उत्तर को तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक बनाएँ।
Question 8.
"यह स्नेह, वात्सल्य और विनय की देवी है या ईर्ष्या और अमंगल की मायाविनी मूर्ति?" मंसाराम निर्मला के किस व्यवहार से सोच में पड़ गया और क्यों? कथन के आधार पर स्पष्ट कीजिए। [12½ Marks]
Answer:
मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास 'निर्मला' में मंसाराम तोताराम का बड़ा बेटा है, जो अपनी सौतेली माँ निर्मला के प्रति आदर औरस्नेह का भाव रखता है। निर्मला भी मंसाराम को बहुत चाहती है और उसकी बीमारी के समय उसकी सेवा व प्राण रक्षा के लिए अपना रक्त तक देने को तैयार हो जाती है। परंतु एक समय ऐसा आता है जब मंसाराम निर्मला के व्यवहार को देखकर गहरी दुविधा और सोच में पड़ जाता है:
1. घटना का संदर्भ: जब तोताराम के मन में निर्मला और मंसाराम के पवित्र संबंधों को लेकर संशय और शंका उत्पन्न हो जाती है, तो वह मंसाराम को हॉस्टल भेजने का निर्णय लेता है। तोताराम के कठोर रुख और समाज के तानों से निर्मला अत्यंत व्यथित हो जाती है।
2. भोजन न करने की जिद: जब मंसाराम को हॉस्टल भेजने की बात पक्की हो जाती है, तो वह विरोधस्वरूप भोजन करने से मना कर देता है। निर्मला व्याकुल होकर रोते हुए उसे मनाने जाती है और अत्यंत करुण स्वर में अनुरोध करती है कि वह भोजन कर ले।
3. तोताराम का आना और गलतफहमी: ठीक उसी समय मुंशी तोताराम वहाँ आ जाते हैं। वे निर्मला को मंसाराम के पास रोते हुए और हाथ पकड़कर अनुरोध करते देख लेते हैं। तोताराम के मन में ईर्ष्या और संदेह की ज्वाला भड़क उठती है और वे निर्मला को बहुत खरी-खोटी सुनाते हैं।
4. मंसाराम की मानसिक स्थिति: मंसाराम यह सब देखकर स्तब्ध रह जाता है। वह सोचता है कि जिस निर्मला को उसने अब तक वात्सल्य, ममता और पवित्रता की मूर्ति माना था, वही अब उसके पिता की दृष्टि में ईर्ष्या और अमंगल का कारण बन गई है। यह विरोधाभास और पारिवारिक कुचक्र उसे गहरी मानसिक पीड़ा और असमंजस में डाल देता है.
Teacher's Note:
a) प्रश्न के दोनों भागों (घटना का वर्णन और मंसाराम की मानसिक स्थिति) को भली-भांति स्पष्ट करें।
b) प्रसंग की प्रासंगिकता और पात्रों के मनोवैज्ञानिक द्वंद्व को उत्तर में अवश्य दर्शाएँ।
Question 9.
"ऐसे सौभाग्य से मैं वैद्युय को बुरा नहीं समझती। दरीप्राणि उस धनी से कहीं सुखी है, जिसे उसका धन साँप बनकर काटने दौड़े। उपवास कर लेना आसान है, विषैला भोजन करना उससे कहीं अधिक मुश्किल है।" इस कथन के आधार पर सुधा के किस स्वभाव का पता चलता है, स्पष्ट कीजिए। [12½ Marks]
Answer:
मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास 'निर्मला' में सुधा डॉक्टर भुवन की पत्नी है और निर्मला की छोटी बहन कृष्णा की ननद (या संबधित पात्र) है। उपन्यास में सुधा का चरित्र बहुत ही स्पष्टवक्ता, व्यावहारिक, साहसी और यथार्थवादी रूप में उभरकर आता है। उपर्युक्त कथन से सुधा के व्यक्तित्व के निम्नलिखित पक्षों का पता चलता है:
1. साहसी और स्पष्टवक्ता स्वभाव: सुधा समाज के पाखंडी और धन-लोलुप स्वरूप से पूरी तरह परिचित है। वह घुमा-फिराकर बात करने के बजाय सीधी और खरी बात कहने में विश्वास रखती है। वह किसी के दबाव में नहीं आती।
2. धन से अधिक मानसिक शांति को महत्त्व: सुधा का मानना है कि अंधी धन-दौलत और ऐश्वर्य, जिसमें शांति न हो, साँप के समान डसने वाली होती है। इसके विपरीत, अभाव में रहकर भी यदि मन में संतोष और प्रेम है, तो वह जीवन कहीं अधिक सुखी है।
3. निर्मला के प्रति सहानुभूति और यथार्थबोध: सुधा अपनी समझदारी से जानती है कि निर्मला का जीवन अनमेल विवाह के कारण कैसे बर्बाद हुआ है। वह समाज की रूढ़ियों और स्वार्थी पुरुषों के कारनामों पर तीखा व्यंग्य करती है।
4. स्वाभिमानी दृष्टिकोण: वह जीवन की कठिन परिस्थितियों (विषैला भोजन रूपी कष्टों) का सामना करने को उपवास (सामान्य त्याग) से कठिन मानती है, जो उसके गहरे जीवन-अनुभव और परिपक्वता को दर्शाता है।
Teacher's Note:
a) सुधा के चरित्र की विशेषताओं (स्पष्टवादिता, यथार्थवाद, संतोष) को कथन के संदर्भ में समझाएँ।
b) यह स्पष्ट करें कि सुधा ने धन-वैभव की तुलना विषैले भोजन से क्यों की है।
Question 10.
"संन्यास का अर्थ गृहस्थ जीवन से पलायन नहीं वरन् उसका पालन करना है।" कहानी का सार लिखते हुए उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। [12½ Marks]
Answer:
सुदर्शन द्वारा रचित कहानी 'संन्यास' गृहस्थ जीवन के उत्तरदायित्व और सच्चे संन्यास के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालने वाली एक अत्यंत प्रेरणादायक कहानी है।
कहानी का सार:
कहानी का मुख्य पात्र पालू है, जो गुजरात का रहने वाला एक मस्तमौला और संगीतप्रेमी युवक है। उसका विवाह एक परिवार में हो जाता है, किंतु उसका मन बांसुरी बजाने और मौज-मस्ती में लगा रहता था। घर की जिम्मेदारियों से विमुख रहने के कारण घरवाले उसे ताने देते थे। एक दिन तंग आकर एक चौधरी ने अपनी बेटी की शादी पालू से कर दी। कुछ समय बाद पालू के एक पुत्र हुआ, किंतु दुर्भाग्य से उसकी पत्नी और माता-पिता की मृत्यु हो गई। इन दुखों से आहत होकर पालू संसार से विरक्त हो जाता है और कहता है कि वह संन्यासी बनेगा। वह अपने बच्चे को अपनी भाभी की गोद में डालकर घर छोड़ देता है और पर्वत पर स्वामी विद्यानंद के आश्रम में चला जाता है। वहाँ वह कठोर साधना करता है, किंतु उसके मन को शांति नहीं मिलती। स्वामी विद्यानंद उसे समझाते हैं कि "तू अपने आदर्श से दूर जा रहा है।" वे उसे याद दिलाते हैं कि उसका पहला कर्तव्य अपने छोटे बच्चे और परिवार के प्रति था, जिसे छोड़कर भागना संन्यास नहीं बल्कि कायरता है। पालू को अपनी भूल का अहसास होता है और वह वापस लौटकर अपने गृहस्थ धर्म का पालन करता है।
कहानी का उद्देश्य:
इस कहानी का मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि भागकर जंगलों में जाने या पूजा-पाठ का ढोंग करने से ईश्वर नहीं मिलते। अपने परिवार, समाज और कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से निर्वाह करना ही सबसे बड़ा संन्यास और धर्म है।
Teacher's Note:
a) कहानी के मुख्य पात्र पालू के माध्यम से लेखक के संदेश को स्पष्ट करें।
b) सारांश लिखते समय अनावश्यक विस्तार से बचें और मूल उद्देश्य पर विशेष ध्यान दें।
Question 11.
'भाग्य रेखा' कहानी में यजमान मजदूर-वर्ग का व्यक्ति है, जो क्रान्ति में विश्वास रखता है। कथन के आधार पर स्पष्ट कीजिए। [12½ Marks]
Answer:
भीष्म साहनी की कहानी 'भाग्य रेखा' वर्तमान समाज की आर्थिक विषमताओं, पूंजीपतियों के शोषण और मजदूरों की दयनीय स्थिति पर एक तीखा व्यंग्य है। इस कहानी का मुख्य पात्र एक मजदूर है जो कर्नाटक सर्कस के पास काम की तलाश में बैठा रहता है। वह खुद भयंकर गरीबी, बीमारी (दमा) और अपंगता (मशीन में उंगलियाँ कट जाने) का शिकार है, किंतु उसका वैचारिक दृष्टिकोण क्रांति और संघर्ष की प्रेरणा देता है:
1. आर्थिक विषमता का शिकार: मजदूर और उसके मालिक के बीच गहरी खाई है। अमीर लोग मौज-मस्ती करते हैं और गरीबों के खून-पसीने की कमाई पर पलते हैं, जबकि मजदूर को दो वक्त की सूखी रोटी भी नसीब नहीं होती।
2. व्यवस्था के प्रति आक्रोश: जब एक ज्योतिषी उसकी हथेली देखकर उसकी गरीबी और भाग्य को कोसता है और कहता है कि उसकी तकदीर में ही दुख लिखा है, तो मजदूर उस पर भड़क उठता है और हथेली खींच लेता है।
3. क्रांति में अटूट विश्वास: मजदूर स्पष्ट रूप से कहता है कि इंसान का भाग्य कोई भगवान या लकीरें तय नहीं करतीं, बल्कि मनुष्य खुद अपने कर्मों और संघर्ष से अपनी तकदीर बदलता है। मई दिवस (मजदूर दिवस) के अवसर पर जब मजदूरों का जुलूस निकलता है और उन पर गोलियाँ चलाई जाती हैं, तो वह दमा का मरीज होने के बावजूद उस क्रांति और संघर्ष का समर्थन करता है।
4. संदेश: लेखक ने इसके माध्यम से यह दर्शाया है कि मजदूरों को अपनी मुक्ति के लिए भाग्य के भरोसे बैठने के बजाय एकजुट होकर पूंजीवादी शोषण के खिलाफ आवाज उठानी होगी और क्रांति का मार्ग अपनाना होगा।
Teacher's Note:
a) कहानी के पात्र (मजदूर) के संघर्ष और उसकी क्रांतिकारी सोच को स्पष्ट रूप से रेखांकित करें।
b) समाज की आर्थिक असमानता और लेखक के व्यंग्य को उत्तर में भली-भांति समझाएँ।
Question 12.
"कामकाज कहानी में तीन कहानियाँ होने के बाद भी उनमें कथानक-ऐक्य है।" कैसे? स्पष्ट कीजिए। [12½ Marks]
Answer:
श्रीचंद्रगुप्त विद्यालंकार की कहानी 'कामकाज' तीन लघु कहानियों का एक सुंदर संग्रह है। देखने में इन तीनों कहानियों के पात्र, परिवेश और घटनाएँ अलग-अलग प्रतीत होती हैं, किंतु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर इनमें एकसूत्रता और 'कथानक-ऐक्य' (Unity of Plot) स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वह एकता है—आधुनिक महानगरीय जीवन की व्यस्तता और उसके कारण मानवीय संवेदनाओं, करुणा और दया का मद्धिम पड़ जाना।
इन तीनों कहानियों का विश्लेषण इस प्रकार है:
1. पहली कथा (लाला कस्तूरीमल): लाला जी कपड़ों के व्यापारी हैं। वे क्वेटा से आए अपने संबंधी से मिलते हैं, जिन्हें क्वेटा में आए भूकंप की कोई चिंता नहीं है, बल्कि वे अपनी व्यावसायिक व्यस्तता में इतने डूबे हैं कि वे सस्ती धोतियाँ खरीदने की बात करते हैं।
2. दूसरी कथा (चौकीदार यूसुफ): रावलपिंडी जेल का चौकीदार यूसुफ एक ईमानदार कर्मचारी है। उसके ससुर की गंभीर बीमारी का समाचार आता है, किंतु जेलर उसे तुरंत छुट्टी देने से इनकार कर प्रशासनिक नियमों और कागजी कार्रवाई में उलझा देता है। अंततः मानवीय संवेदना पीछे छूट जाती है।
3. तीसरी कथा (कर्मचारी देसराज): बैंक में काम करने वाला देसराज जेब में पैसे होने और रास्ते में एक बेहोश व्यक्ति के कराहने के बावजूद 'पानी-पानी' चिल्लाने पर उसकी मदद नहीं करता, क्योंकि उसे बैंक पहुँचने और रेलवे रसीद कटाने की जल्दी होती है।
निष्कर्ष:
इस प्रकार, तीनों कहानियों की पृष्ठभूमि और पात्र अलग होने पर भी सबका केंद्रीय विषय एक ही है—महानगरीय जीवन की अंधी दौड़, जहाँ इंसान इतना व्यस्त और यंत्रवत हो गया है कि उसके भीतर की दया, प्रेम और संवेदना मर चुकी है। यही अंतःसूत्र तीनों कहानियों को आपस में जोड़कर 'कथानक-ऐक्य' प्रदान करता है।
Teacher's Note:
a) तीनों लघु कथाओं का संक्षिप्त परिचय देते हुए उनके केंद्रीय विषय की समानता को स्पष्ट करें।
b) यह समझाएँ कि कैसे अलग-अलग कहानियाँ मिलकर एक ही बड़े उद्देश्य (मानवीय संवेदनाओं का ह्रास) को सिद्ध करती हैं।
ज्वालामुखी के फूल
Question 13.
"भला इस झगड़े का निर्णय कैसा होगा। यह किशोर राजा क्या न्याय करेगा?" यह आशंका कौन व्यक्त कर रहा है? किशोर राजा कौन है? झगड़ा किस-किसमें रहा है तथा क्यों? किशोर राजा ने इस झगड़े का क्या निर्णय किया? [12½ Marks]
Answer:
विष्णुगुप्त चाणक्य के नाटक या प्रसंग 'ज्वालामुखी के फूल' से संबंधित इस प्रसंग के उत्तर निम्नलिखित हैं:
1. आशंका व्यक्त करने वाला पात्र: यह आशंका स्वयं विष्णुगुप्त चाणक्य व्यक्त कर रहे हैं, जो खेल-खेल में न्याय कर रहे बालक की परीक्षा ले रहे हैं।
2. किशोर राजा कौन है: किशोर राजा वास्तव में मगध के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य हैं, जो अपने बचपन या युवाकाल में न्याय का खेल खेल रहे थे।
3. झगड़ा किनके बीच और क्यों था: झगड़ा दो स्त्रियों के बीच एक छोटे से बच्चे को लेकर था। दोनों स्त्रियाँ उस बच्चे को अपना-अपना बेटा बता रही थीं और उस पर अधिकार जता रही थीं।
4. किशोर राजा (चंद्रगुप्त) का निर्णय: जब दोनों स्त्रियाँ अपनी जिद पर अड़ी रहीं और कोई पीछे हटने को तैयार नहीं हुआ, तब किशोर राजा चंद्रगुप्त ने अत्यंत बुद्धिमत्ता और कड़ाई से निर्णय दिया कि "वधिक! इस शिशु को बीच से चीरकर इन दोनों स्त्रियों में बराबर-बराबर बाँट दे।" इस कठोर आदेश को सुनते ही सच्ची माँ का ममता से भरा हृदय तड़प उठा और उसने चीख कर कहा कि बच्चा उसी स्त्री को दे दिया जाए, कम-से-कम उसकी जान तो बची रहेगी। इसके विपरीत, झूठी स्त्री इस निर्णय पर चुप रही। इस प्रकार किशोर राजा ने असली और नकली माँ की पहचान कर न्यायपूर्वक बच्चा असली माँ को सौंप दिया।
Teacher's Note:
a) प्रश्न के चारों भागों का अलग-अलग और स्पष्ट उत्तर देना अनिवार्य है।
b) चाणक्य की देखरेख में चंद्रगुप्त द्वारा किए गए न्याय की इस प्रसिद्ध कथा के मर्म को समझाएँ।
Question 14.
"मगध के उपमहामात्य आर्य शटकार की सहायता मिलती रहने के कारण चाणक्य को किसी प्रकार की असुविधा नहीं थी।" आर्या शटकार चाणक्य को आर्थिक सहायता तथा अन्य सुविधाएँ क्यों दे रहे थे? [12½ Marks]
Answer:
सम्राट महापद्म नंद और महामात्य शटकार के बीच के ऐतिहासिक और राजनीतिक द्वंद्व से जुड़ी इस कथा के अनुसार, आर्य शटकार द्वारा चाणक्य को आर्थिक सहायता और अन्य सुविधाएँ देने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
1. नंदवंश से प्रतिशोध की आग: सम्राट महापद्म नंद ने बिना किसी अपराध के शटकार को सपरिवार कारावास में डाल दिया था, जहाँ भूख-प्यास से तड़प-तड़पकर शटकार के आठों पुत्रों और पत्नी की मृत्यु हो गई थी। इस अमानवीय अत्याचार के कारण शटकार के हृदय में नंदवंश के प्रति भयंकर प्रतिशोध की आग धधक रही थी।
2. लक्ष्य की समानता: आर्य शटकार अच्छी तरह जानते थे कि अकेले वे नंदवंश और महामात्य राक्षस का विनाश करने में समर्थ नहीं हैं। दूसरी ओर, आचार्य चाणक्य भी नंदवंश के संपूर्ण विनाश का संकल्प ले चुके थे। इसलिए दोनों का उद्देश्य एक ही था—नंदवंश का समूल नाश।
3. साधन संपन्नता और गुप्त सहयोग: चाणक्य उस समय अत्यंत साधारण स्थिति में रहकर अपनी योजनाएँ बना रहे थे। शटकार के पास धन-संपदा और प्रशासनिक पहुँच थी। इसलिए शटकार ने चाणक्य को गुप्त रूप से प्रचुर मात्रा में धन, आर्थिक सहायता और आवश्यक सुविधाएँ प्रदान कीं, ताकि चाणक्य बिना किसी आर्थिक बाधा के अपने महान उद्देश्य (नंदवंश के विनाश) को पूरा कर सकें।
Teacher's Note:
a) शटकार के व्यक्तिगत दुखों और नंदवंश के प्रति उनके द्वेष को मुख्य कारण के रूप में स्पष्ट करें।
b) यह समझाएँ कि कैसे शटकार और चाणक्य का साझा उद्देश्य नंदवंश के पतन का आधार बना।
Question 15.
आर्य राक्षस ने मगध का महामात्य बनना क्यों स्वीकार कर लिया? उन्होंने पद स्वीकार कर पहला निर्णय क्या दिया? [12½ Marks]
Answer:
'ज्वालामुखी के फूल' नाटक के अंत में आर्य राक्षस द्वारा मगध का महामात्य पद स्वीकार करने के संदर्भ में निम्नलिखित तथ्य हैं:
1. महामात्य पद स्वीकार करने का कारण: आर्य राक्षस अपने मित्र चंदनदास और उसके परिवार की रक्षा करना चाहते थे। चंदनदास ने राजा की ओर से भारी दबाव होने के बावजूद आर्य राक्षस के परिवार को अपने यहाँ शरण दी थी और प्राणदंड स्वीकार किया था, किंतु राक्षस का पता नहीं बताया था। जब मलयकेतु ने राक्षस का अपमान करके अपने शिविर से निकाल दिया और चंदनदास को सूली पर चढ़ाने का निर्णय हुआ, तब आर्य राक्षस ने अपने प्रिय मित्र चंदनदास के प्राणों की रक्षा करने के लिए ही चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में महामात्य का पद स्वीकार करना उचित समझा।
2. पद स्वीकार करने के बाद पहला निर्णय: महामात्य का पद संभालते ही आर्य राक्षस ने अपनी पहली आज्ञा यह दी कि चंदनदास को तुरंत कारावास से मुक्त किया जाए और उनके सभी राजकीय अधिकार व सम्मान बहाल किए जाएँ। इस प्रकार उन्होंने अपने निष्ठावान मित्र चंदनदास के जीवन की रक्षा की और चाणक्य की राजनीतिक कूट तथा चंद्रगुप्त की उदारता ने मिलकर राज्य में न्याय स्थापित किया।
Teacher's Note:
a) राक्षस के इस निर्णय के पीछे उनकी मित्रता की निष्ठा और चंदनदास का त्याग मुख्य कारण था।
b) उत्तर में राक्षस के पहले निर्णय (चंदनदास की मुक्ति) का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए।
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