GSEB Class 11 Sanskrit Solutions Chapter 7 नाट्यमेतन्मया कृतम्

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नाट्यमेतन्मया कृतम् Exercise

अधोलिखितानां प्रश्नानां संक्षेपतः संस्कृतभाषया उत्तरं लिखत।

Question 1. सामवेदात् किं जग्राह?
Answer: सामवेद से संगीत ग्रहण किया गया।
In simple words: नाट्यशास्त्र के लिए संगीत सामवेद से लिया गया।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न नाट्यशास्त्र के विभिन्न तत्वों के स्रोत को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. लोकवृत्तानुकरणं किम् अस्ति?
Answer: लोकव्यवहार का अनुकरण ही नाट्य है।
In simple words: नाट्य का अर्थ है लोगों के जीवन और व्यवहार का प्रदर्शन करना।

🎯 Exam Tip: इस परिभाषा को याद रखना नाट्यशास्त्र की मूल अवधारणा को समझने में सहायक है।

 

Question 3. पाठ्यं कस्मात् वेदात् जग्राह?
Answer: पाठ्य सामग्री ऋग्वेद से ली गई।
In simple words: नाट्य के संवाद और पाठ ऋग्वेद से ग्रहण किए गए हैं।

🎯 Exam Tip: नाट्यशास्त्र के प्रत्येक अंग के वैदिक स्रोत को जानना परीक्षा में अच्छे अंक दिला सकता है।

 

Question 4. कति वेदाः सन्ति? तेषां नामानि लिखत।
Answer: चार वेद हैं। उनके नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं।
In simple words: संस्कृत परंपरा में चार मुख्य वेद हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद।

🎯 Exam Tip: वेदों के नामों को सही क्रम में और शुद्ध रूप से लिखना महत्वपूर्ण है।

 

Explain With Reference To Context:

नाट्याख्यः पञ्चमः वेदः

सन्दर्भ: यह पंक्तियाँ पाठ्यपुस्तक के 'नाट्यमेतन्मयाकृतम्' नामक पद्य पाठ से उद्धृत की गई हैं। इस पाठ में नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति का इतिहास, उसकी विषय-वस्तु, उद्देश्य और महत्व का वर्णन मिलता है। इन पंक्तियों के माध्यम से नाट्य-शास्त्र की महिमा का बखान किया गया है।

अनुवाद: नाटक नामक पंचम वेद है।

विश्व के पुस्तकालयों में सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद हैं। संस्कृत में विद्यमान देववाणी के रूप में अपौरुषेय वेद भारत की एक गौरवशाली और अद्भुत विरासत हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद- इन चारों वेदों का स्थान न केवल संस्कृत साहित्य में, बल्कि विश्व साहित्य में भी उत्कृष्टतम है।

वेद संस्कृत साहित्य में ज्ञान का एक अनुपम भंडार हैं। अतः जब कोई व्यक्ति अपने किसी प्रिय ग्रंथ को महिमामंडित करना चाहता है, उसकी महिमा को सर्वश्रेष्ठ रूप से प्रस्तुत करना चाहता है, तो उसे वेदों के समकक्ष 'पंचम वेद' के रूप में स्थापित करता है।

इस प्रकार, नाट्यशास्त्र को पंचम वेद के रूप में दर्शाकर उसकी गरिमा बढ़ाई जाती है। व्यास द्वारा रचित महाभारत के प्रशंसक भी उसकी महिमा का बखान करते हुए महाभारत को पंचम वेद कहते हैं।

इस तरह, नाट्यशास्त्र को महिमामंडित करने के लिए इसे पंचम वेद कहा गया है। नाट्यशास्त्र को वेदों के समान कहने का एक मुख्य कारण यह भी है कि इसके प्रमुख अंग - पाठ्य, अभिनय, गीत और रस- ये सभी चारों वेदों से लिए गए हैं।

इस प्रकार, नाट्यशास्त्र वेदों और वेदांगों से ही उत्पन्न हुआ है। नाट्यशास्त्र का मूल स्रोत वेद और वेदांग होने के कारण इसे पंचम वेद के रूप में मानना उचित है।

 

नाट्यमेतद्भविष्यति :

सन्दर्भ – प्रश्न 1 के अनुसार है। (प्रथम दो वाक्य)

अनुवाद: यह नाटक होगा।

व्याख्या: यह पंक्ति नाट्य शास्त्र के प्रथम अध्याय से ली गई है और इसके माध्यम से नाट्यशास्त्र के उद्देश्य को प्रकट किया गया है।

नाट्य शास्त्र का लक्ष्य केवल मनोरंजन प्रदान करना नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति, यश की वृद्धि, आयु का हित और बुद्धि का विकास भी है, जो व्यक्ति मात्र को प्रेरणादायक उपदेश देता है।

नाट्य-शास्त्र के इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सभी नाट्यकारों ने अपने नाटकों में इन उद्देश्यों की पूर्ति की है। संस्कृत भाषा में ऐसी कोई नाट्य कृति नहीं है जिससे जन-गण-मन को कोई बोध प्राप्त न हो।

इस प्रकार, नाटक केवल मनोरंजन के साथ-साथ जीवन को उदात्त और ऊर्ध्वगामी बनाने का उपदेश भी अत्यंत प्रभावी रूप से लोगों तक पहुँचता है।

 

नाट्येऽस्मिन् न दृश्यते :

सन्दर्भ: पूर्ववत् है।

अनुवाद: इस नाटक में दिखाई नहीं देता।

व्याख्या: ब्रह्माजी द्वारा देवताओं को एक ऐसा क्रीडनीयक (खिलौना) दिया गया, जो मनोरंजन के साथ-साथ उपदेश भी दे सके, वही नाट्यशास्त्र है। देवताओं ने आचार्य भरत को यह अद्भुत उपहार प्रदान किया। अतः यह शास्त्र केवल मनोरंजन का शास्त्र नहीं, बल्कि ज्ञान का एक अद्भुत कोष भी है।

इस पंक्ति के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि संपूर्ण विश्व में विद्यमान सभी ज्ञान नाट्यशास्त्र में समाहित हैं। ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला योग या कर्म नहीं है जिसका वर्णन नाट्य-शास्त्र में न हो। नाट्य-शास्त्र सभी प्रकार की विधाओं और शिल्पों का प्रवर्तक है।

सभी प्रकार की कलाओं, शिल्पों, विद्याओं आदि का वर्णन इस नाट्य-शास्त्र में किया गया है। इस प्रकार ऐसा कोई विषय नहीं है जो नाट्यशास्त्र में नहीं दिखता।

 

Answer The Following Questions In Your Mother-Tongue:

Question 1. Why is drama said to be the fifth Veda?
Answer: नाट्यशास्त्र, जो चारों वेदों और वेदांगों से उत्पन्न हुआ है, मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान का एक असाधारण भंडार है। इसलिए, इस शास्त्र की गरिमा और श्रेष्ठता को वेदों के समतुल्य दर्शाने के लिए, नाटक को पांचवां वेद कहा जाता है।
In simple words: नाट्यशास्त्र को चार वेदों के समान ही पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसमें ज्ञान और मनोरंजन दोनों का समावेश है, इसलिए इसे पांचवां वेद कहा गया।

🎯 Exam Tip: नाट्यशास्त्र को पांचवां वेद कहने के पीछे के तार्किक कारणों को विस्तार से समझाएँ।

 

Question 2. Whom does a play give repose?
Answer: नाटक दुःखी, थके हुए, शोकग्रस्त और तपस्वियों को शांति प्रदान करता है।
In simple words: नाटक उन सभी लोगों को राहत देता है जो पीड़ा, थकान या दुख में हैं।

🎯 Exam Tip: नाटक के सामाजिक और भावनात्मक लाभों को संक्षिप्त रूप से लिखें।

 

Question 3. Which different (characteristics) aspects of a play are accepted from the four Vedas?
Answer: नाट्य में ऋग्वेद से पाठ्य सामग्री, सामवेद से संगीत (गीत), यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से विभिन्न रसों को ग्रहण किया गया है। इस प्रकार चारों वेदों से क्रमशः पाठ्य, गीत, अभिनय और रस आदि तत्वों को लिया गया है।
In simple words: नाटक के विभिन्न हिस्से - पाठ्य, गीत, अभिनय और रस - क्रमशः ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद से लिए गए हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक वेद से ग्रहण किए गए नाट्य तत्व का सही मिलान करना याद रखें।

 

Write An Analytical Note On:

Rasa

जिस प्रकार भोजन में छह रस होते हैं, उसी प्रकार साहित्य में नौ रस होते हैं। जैसे एक ही रस का सेवन अरुचिकर हो सकता है, वैसे ही यदि ये नौ-रस न हों, तो कोई भी व्यक्ति साहित्य पढ़ने में रुचि नहीं लेगा। ये रस साहित्य के प्रति मानवीय रुचि बनाए रखते हैं और रसों की वृद्धि भी करते हैं।

संस्कृत साहित्य में इन नौ रसों का विस्तृत विवेचन किया गया है। ये नौ रस हैं- श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत रस।

 

Abhinaya-Acting

अभिनय नाटक का एक अविभाज्य अंग है। भारतीय संस्कृति में संस्कृत साहित्य में 'कला' शब्द से चौंसठ प्रकार की कलाओं का वर्णन किया गया है। इन चौंसठ कलाओं में से एक कला अभिनय भी है। संस्कृत नाट्य परंपरा में अभिनय के चारों प्रकार स्वीकृत हैं:

1. आंगिक, 2. वाचिक, 3. आहार्य, 4. सात्विक। नाट्यशास्त्रियों ने नाट्य के अंग के रूप में अभिनय को स्वीकारने की प्रेरणा यजुर्वेद से ली है। नाट्यशास्त्र में अभिनय के इन चारों अंगों का विस्तृत वर्णन किया गया है।

 

Veda

विश्व-साहित्य में वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। वेद ज्ञान का अक्षय भंडार हैं। वेदों में वर्णित विषय मानवमात्र के कल्याण के लिए सर्वत्र और सर्वदा, हर काल में उपयोगी होते हैं। वेदों को अपौरुषेय माना जाता है। भारत के परम वैज्ञानिक ऋषियों ने अपने ध्यान से वेदों का दर्शन किया था।

तत्पश्चात् गुरु-शिष्य-परंपरा के माध्यम से आज तक वेद सुरक्षित रहे हैं तथा उनके उच्चारण की परंपरा भी पूर्ववत् बनी हुई है। प्राचीनतम वेद चार हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेद संपूर्ण धर्म का और भारतीय संस्कृति का मूल आधार हैं - अतः कहा गया है -

'वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।'

इस प्रकार, नाट्यशास्त्र का आधार भी पवित्र वेद ही है। ऋग्वेद से पाठ्य, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गीत और अथर्ववेद से रसों को ग्रहण किया गया है। अतः भारत के समस्त ग्रंथों, विचारों, शास्त्रों और पुराणों का मूलाधार वेद ही हैं।

 

Write A Critical Note On:

Origin Of A Netyaveda

नाट्यवेद की उत्पत्ति :

विश्व साहित्य में नाट्य विद्या का आरंभ सर्वप्रथम संस्कृत साहित्य में हुआ, यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संस्कृत साहित्य के नाट्य-विद्या के आदि ग्रंथ के रूप में नाट्य-शास्त्र कीर्ति-पताका आज भी दिग-दिगंत में व्याप्त है।

नाट्य-शास्त्र में ही इस विद्या की उत्पत्ति का इतिहास वर्णित है। नाट्य-शास्त्र के प्रथम अध्याय में नाट्योत्पत्ति से संबंधित एक कथा का वर्णन है। इस कथा के अनुसार, देवगण ब्रह्मा के पास जाकर एक ऐसे क्रीडनीयक (खिलौने) की याचना करते हैं जो आनंद के साथ उपदेश भी प्रदान कर सके तथा जन-सामान्य भी इससे लाभान्वित हो सके।

देवगणों की याचना के उत्तर में ब्रह्माजी ने जो क्रीडनीयक उन्हें प्रदान किया, वह नाट्य-शास्त्र ही था। देवगणों ने यह क्रीडनीयक रूपी नाट्यशास्त्र आचार्य भरत को प्रदान किया।

आचार्य भरत के माध्यम से सभी शास्त्रों और सभी प्रकार के शिल्पों का प्रवर्तक यह वेद और वेदांगों से उत्पन्न अद्भुत उपहार मानव-मात्र को प्राप्त हुआ है। आचार्य भरतमुनि ने अपने शत-पुत्रों की सहायता से इंद्रध्वज महोत्सव के अवसर पर सर्वप्रथम इस नाटक का मंचन किया।

 

Benefits Of A Play / A Drama

नाट्य की लोकोपकारकता :

नाट्य विद्या का परम उद्देश्य केवल व्यक्ति मात्र का परम हित करना है। नाट्योत्पत्ति की कथा के अनुसार, यह स्पष्ट है कि ब्रह्माजी ने न केवल मनोरंजन के लिए, अपितु जन-जन के सर्वविध हित को साधने वाला क्रीडनीयक देवताओं को प्रदान किया। देवगणों द्वारा आचार्य भरत को दिया गया नाट्य-शास्त्र एक अद्भुत उपहार है, जो समस्त शास्त्रों से युक्त है। नाट्यशास्त्र सभी प्रकार की शिल्पकलाओं से परिपूर्ण है।

इतना ही नहीं, चारों वेदों और वेदों के छह अंगों, जो संपूर्ण विश्व के ज्ञानकोष के रूप में प्रसिद्ध हैं, उन वेदांगों के ज्ञान से युक्त यह नाट्य-शास्त्र शिल्प-विद्या का प्रवर्तक है। नाट्यशास्त्र में वर्णित अथाह ज्ञान-सिंधु की महिमा को समझते हुए इसे पंचम वेद भी कहा जाता है।

नाट्यशास्त्र में वर्णित पाठ्य, अभिनय, गीत और रस-इन चार अंगों को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद से लिया गया है। नाट्यशास्त्र का उद्देश्य दर्शकों के मन में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है। दर्शक के मन में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करने की एक अदम्य इच्छा-शक्ति उत्पन्न होती है।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए नाट्य शास्त्र में कहीं धर्म का वर्णन है, तो कहीं अर्थ, काम, क्रीड़ा, हास-परिहास, युद्ध, वध और शांति का वर्णन भी होता है। धर्म में प्रवृत्त लोगों के कल्याण के लिए धर्म का और कामोपसेवी जनों के हित के लिए काम का, दुष्ट जनों के निग्रह का वर्णन नाट्य शास्त्र में किया गया है। दुःखी, थके हुए, शोकग्रस्त और तपस्वियों को विश्रांति प्रदान करते हुए नाट्य-शास्त्र धर्म, यश, आयुष्य, हित और बुद्धि की वृद्धि करता है।

लोकोपदेश करने के लिए नाट्य-शास्त्र सर्वाधिक प्रभावशाली साधन है। ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प, विद्या या कला योग या कर्म नहीं है जिसका वर्णन नाट्य-शास्त्र में न किया गया हो। आशय यह है कि नाट्य-शास्त्र मानवोपयोगी सभी प्रकार के ज्ञान, कला और शिल्प आदि से समृद्ध पंचम वेद के रूप में प्रख्यात है तथा इससे श्रेष्ठतर लोकोपकारक साधन कोई और उपलब्ध नहीं हो सकता है।

Sanskrit Digest Std 11 GSEB नाट्यमेतन्मया कृतम् Additional Questions And Answers

नाट्यमेतन्मया कृतम् स्वाध्याय

अधोलिखितेभ्यः विकल्पेभ्यः समुचितम् उत्तरं चिनुत।

Question 1. पञ्चमः वेदः कः अस्ति?
(क) ऋग्वेदः
(ख) यजुर्वेदः
(ग) नाट्यम्
(घ) नृत्यम्
Answer: (ग) नाट्यम्
In simple words: नाट्य को पांचवां वेद माना जाता है।

🎯 Exam Tip: नाट्यशास्त्र को पांचवां वेद क्यों कहा जाता है, यह एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।

 

Question 2. चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् किम्?
(क) नाट्यम्
(ख) गीतम्
(ग) अथर्ववेदः
(घ) आयुर्वेदः
Answer: (क) नाट्यम्
In simple words: चारों वेदों के अंगों से नाट्य उत्पन्न हुआ है।

🎯 Exam Tip: नाट्यशास्त्र का मूल स्रोत चारों वेद और उनके अंग हैं।

 

Question 3. एतत् नाट्यं कदा भविष्यति
(क) प्रात:काले
(ख) उद्योगकाले
(ग) विश्रान्तिजननकाले
(घ) वर्षाकाले
Answer: (ग) विश्रान्तिजननकाले
In simple words: यह नाटक विश्राम के समय शांति प्रदान करेगा।

🎯 Exam Tip: नाटक का उद्देश्य लोगों को विश्राम और शांति प्रदान करना है।

 

Question 4. ऋग्वेदात् किं ग्रहीतम्?
(क) पाठ्यम्
(ख) गीतम्
(ग) नृत्यम्
(घ) अभिनयम्
Answer: (क) पाठ्यम्
In simple words: ऋग्वेद से नाटक के संवाद और पाठ्य सामग्री ली गई है।

🎯 Exam Tip: नाट्य के विभिन्न तत्वों के वैदिक स्रोतों को सटीक रूप से याद रखें।

 

Question 5. गीतम् कुतः ग्रहीतम् ?
(क) ऋग्वेदात
(ख) आयुर्वेदात्
(ग) नाट्यवेदात्
(घ) सामवेदात्
Answer: (घ) सामवेदात्
In simple words: नाट्य का संगीत सामवेद से लिया गया है।

🎯 Exam Tip: सामवेद का संबंध संगीत से है, यह याद रखना इस प्रश्न के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. रसाः कस्मात् ग्रन्थात् गृहीताः?
(क) आयुर्वेदात्
(ख) अथर्ववेदात्
(ग) नाट्यवेदात्
(घ) यजुर्वेदात्
Answer: (ख) अथर्ववेदात्
In simple words: नाट्य के भाव (रस) अथर्ववेद से लिए गए हैं।

🎯 Exam Tip: अथर्ववेद को अक्सर जादू-टोना और विभिन्न भावनाओं से जोड़ा जाता है, जो रसों के स्रोत से संबंधित है।

 

अधोलिखितानाम् प्रश्नानाम् संक्षेपतः संस्कृतभाषया उत्तरं लिखत।

Question 1. पञ्चमः वेदः कः
Answer: नाट्यम् पञ्चमः वेदः अस्ति।
In simple words: नाटक को पांचवां वेद माना जाता है।

🎯 Exam Tip: नाट्यशास्त्र की उपादेयता और महत्त्व को दर्शाने के लिए इसे पांचवें वेद की संज्ञा दी गई है।

 

Question 2. सर्वशास्त्रार्थ-सम्पन्नं किम् अस्ति?
Answer: सर्वशास्त्रार्थ-सम्पन्नं नाट्यशास्त्रम् अस्ति।
In simple words: सभी शास्त्रों के ज्ञान से युक्त नाट्यशास्त्र है।

🎯 Exam Tip: नाट्यशास्त्र की व्यापकता और ज्ञान के भंडार के रूप में इसकी भूमिका को याद रखें।

 

Question 3. अभिनयम् कस्मात् वेदात् जग्राह?
Answer: अभिनयम् यजुर्वेदात् जग्राह।
In simple words: नाटक का अभिनय यजुर्वेद से लिया गया है।

🎯 Exam Tip: यजुर्वेद में यज्ञों और अनुष्ठानों की क्रियाविधि का वर्णन है, जो अभिनय से जुड़ा है।

 

नाट्यमेतन्मया कृतम् Summary In Hindi

नाट्यमेतन्मया कृतम् (यह नाट्यशास्त्र मेरे द्वारा किया गया अथवा यह नाट्यशास्त्र मैंने रचा।)

सन्दर्भ: संस्कृत साहित्य में नाट्य विद्या का आरंभ आचार्य भरत से हुआ है। नाट्याचार्य के रूप में प्रसिद्ध आचार्य भरत का कालखंड तीसरी शताब्दी ई.स. के आसपास माना जाता है। आचार्य भरत द्वारा रचित ग्रंथ नाट्य-शास्त्र संस्कृत भाषा के विद्वानों में तो सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय है ही, साथ ही नाट्य-विद्या से संबंधित विश्व की अनेक भाषाओं के विद्वानों में भी उतना ही प्रसिद्ध और लोकप्रिय है।

दूसरे शब्दों में, विश्व पटल पर ऐसा कोई नाट्यविद् संभव नहीं है जो आचार्य भरत और नाट्यशास्त्र से परिचित न हो।

नाट्यशास्त्र में नाट्य-विद्या से संबंधित सभी शास्त्रीय विषयों पर विचार किया गया है। नाट्य शास्त्र के प्रथम अध्याय में नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति से संबंधित एक कथा का वर्णन है। इस कथा के अनुसार, देवगण ब्रह्माजी के पास गए और उनसे एक ऐसे क्रीडनीयक (खिलौने) की याचना की, जो आनंद के साथ-साथ उपदेश भी प्रदान कर सके और जिससे हर व्यक्ति लाभ उठा सके।

देवगणों द्वारा की गई याचना की पूर्ति हेतु ब्रह्माजी ने जो क्रीडनीयक प्रदान किया, वह नाट्यशास्त्र ही था। देवों ने यह नाट्यरूपी क्रीडनीयक भरत-मुनि को प्रदान किया। आचार्य भरत ने अपने शत-पुत्रों की सहायता से इंद्रध्वज महोत्सव के प्रसंग पर सर्वप्रथम नाटक का मंचन किया।

इस प्रकार, नाट्यशास्त्र उद्देश्यपूर्ण होते हुए विभिन्न पात्रों की भूमिकाओं और व्यवहार को स्पष्ट करता है। नाट्योत्पत्ति की कथा के प्रसंग में नाट्य-संबंधित कई महत्वपूर्ण विषयों का विवेचन किया गया है। इस पाठ का अंश नाट्योत्पत्ति की कथा से ही उद्धृत किया गया है।

श्लोक संख्या 1 से 3 तक नाट्य-शास्त्र के उद्गम स्रोत और उसके आकार से संबंधित विषय का वर्णन करते हैं। श्लोक संख्या 4 से 8 तक नाट्यशास्त्र के उद्देश्य का वर्णन करते हैं, तथा नवम श्लोक में नाट्य-शास्त्र को संक्षिप्त रूप से परिभाषित किया गया है।

इस प्रकार, उपर्युक्त विषयों का वर्णन करते हुए नौ श्लोकों का संग्रह यहाँ दिया गया है। पाठ में दिए गए सभी श्लोक अनुष्टुप छंद में हैं।

अन्वय, शब्दार्थ एवं अनुवाद

1. अन्वय : अहम् सर्वशास्त्रार्थ-सम्पन्नं, सर्वशिल्पप्रवर्तकम्, नाट्याख्यम् पञ्चमं वेदं सेतिहासं करोमि।

शब्दार्थ : सर्वशास्त्रार्थसम्पन्नम् = सभी शास्त्रों से युक्त – सर्व चामी शास्त्रार्थः सर्वशास्त्रार्थाः (कर्मधारय समास), तैः सम्पन्नम्, तृतीया तत्पुरुष समास। सर्वशिल्पप्रवर्तकम् = सभी शिल्पों को प्रवर्तित करनेवाला – सर्वं च तत्

शिल्पम् इति सर्वशिल्पम् – कर्मधारय समास, तेषां प्रवर्तकम् – षष्ठी तत्पुरुष समास। नाट्याख्यम् = नाट्य नामक।

अनुवाद : मैं सभी शास्त्रों से सम्पन्न, सभी शिल्पों का प्रवर्तक, नाट्य नामक पांचवें वेद को इतिहास के साथ वर्णित करता हूँ।

2. अन्वय : ततः एवं संकल्प्य सर्ववेदान् अनुस्मरत् भगवान् चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् नाट्यवेदं चक्रे।।

शब्दार्थ : संङ्कल्प = संकल्प करके – सम् उपसर्ग + कल्प् धातु + ल्यप् प्रत्यय – संबंधक – भूत-कृदन्त। अनुस्मरत् = स्मरण करते हुए – अनु (उपसर्ग) + स्मृ धातु + शतृ प्रत्यय – वर्तमान कृदन्त। चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् = चारों वेद और उनके छह अंगों से उत्पन्न हुआ।

अनुवाद : इस प्रकार संकल्प करके वेदों का स्मरण करते हुए भगवान ने चारों वेद एवं वेदांगों से उत्पन्न नाट्य नामक पंचम वेद की रचना की।

3. अन्वय : ऋग्वेदात् पाठ्यम्, सामभ्य: गीतम् एवं यजुर्वेदात् अभिनयान् रसान् आथर्वणादृ अपि जग्राह।

शब्दार्थ : पाठ्यम् = पाठ, संवाद, उक्ति। सामभ्यः = सामवेद से। रस: – रसों का, संस्कृत साहित्य में नौ प्रकार के रसों का वर्णन है। यथा – श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत एवं शांत। जग्राह = ग्रहण किया, लिया। ग्रह धातु, परोक्ष भूतकाल, अन्य पुरुष, एकवचन।

अनुवाद : (उन्होंने) ऋग्वेद से पाठ्य सामग्री, सामवेद से गीत और यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस भी ग्रहण किया।

4. अन्वय : क्वचित् धर्मः, कचित् क्रीडा, क्वचित् शमः, क्वचित् हास्यम्, कचित् युद्धम्, कचित् कामः; कचित् वधः।

शब्दार्थ : क्वचित् = कहीं। शमः = शांति।

अनुवाद : (नाट्यशास्त्र में) कहीं पर धर्म, कहीं पर क्रीड़ा, कहीं पर अर्थ, कहीं शांति, कहीं हास्य, कहीं युद्ध, कहीं काम तो कहीं पर वध (का वर्णन होता है।)

5. अन्वय : धर्म-प्रवृत्तानाम् धर्मः कामोपसेविनाम् काम:, दुविनीतानां निग्रहः, विनीतानां दमक्रिया (वर्णिता)।

शब्दार्थ : धर्म प्रवृत्तानाम् = धर्म में प्रवृत्त लोगों का – धर्मे प्रवृत्तानाम् सप्तमी तत्पुरुष। कामोपसेवितानाम् = काम का सेवन करने वाले लोगों का – कामं सेवितुं शीलं येषाम्। निग्रहः = संयम, नियंत्रण। दम क्रिया = दमन क्रिया।

अनुवाद : (यहाँ नाट्यशास्त्र में) धर्म में प्रवृत्त लोगों का धर्म, काम का सेवन करने वाले लोगों का काम, दुर्विनीतों का निग्रह और विनीतों की दमन क्रिया (का वर्णन किया गया है।)

6. अन्वय : मया नानाभावोपसम्पन्नं, नाना अवस्थान्तरात्मम् लोकवृत्तानुकरणम् एतत् नाट्यम् कृतम्।।

शब्दार्थ : नानाभावोपसम्पन्नम् = विविध भावों से युक्त → नानाभावैः उपपन्नम् – तृतीया तत्पुरुष समास। नानावस्थान्तरात्मकम् = विविध अवस्थाओं से युक्त / नानावस्था: अन्तरे यस्य तत् – बहुव्रीहि समास। लोकवृत्तानुकरणम् = संसार की घटनाओं का वर्णनम्।

अनुवाद : मैंने विविध भावों से युक्त, विविध अवस्थाओं से युक्त तथा संसार की घटनाओं के अनुकरण से युक्त इस नाट्य शास्त्र की रचना की।

7. अन्वय : एतत् नाट्यम् दुःखार्तानाम्, श्रमार्तानां, शोकार्तानां, तपस्विनाम् विश्रान्तिजननं काले भविष्यति।

शब्दार्थ : दुःखार्तानाम् = दुःख से ग्रस्त लोगों का – दुःखैः आर्ताः – तेषाम्। विश्रान्ति – जननं जनक समय पर।

अनुवाद : यह नाटक दुःखार्त-जनों के, थके हुए जनों के, शोकग्रस्त जनों के, तपस्वियों के शांतिप्रद काल में होगा।

8. अन्वय : एतत् नाट्यम् धर्म्यम्, यशस्यम्, हितं, बुद्धिविवर्धनम् लोकोपदेश-जननं भविष्यति।

शब्दार्थ : धर्म्यम् = धर्म को। बुद्धिविवर्धनम् = बुद्धि की अभिवृद्धि करनेवाले को।

अनुवाद : यह नाटक धर्म, यश, हित एवं बुद्धि की अभिवृद्धि करनेवाला तथा लोकोपदेश-कर्ता होगा।

9. अन्वय : अस्मिन् नाट्ये यत् न दृश्यते तत् ज्ञानं न, तत् शिल्पं न, सा विद्या न, सा कला न, असौ योग: न, कर्म अपि न (वर्तते)।

शब्दार्थ : दृश्यते = दिखाई देता है, दृश् धातु, कर्मणि प्रयोग, वर्तमानकाल, अन्य पुरुष, एकवचन।

अनुवाद : इस नाटक में जो दिखाई नहीं देता वह ज्ञान नहीं है, वह शिल्प नहीं है, वह विद्या नहीं है, वह कला नहीं है, यह योग नहीं है तथा वह कर्म (भी) नहीं है।

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Yes, our experts have revised the GSEB Class 11 Sanskrit Solutions Chapter 7 नाट्यमेतन्मया कृतम् as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Sanskrit concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 11 GSEB solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using GSEB language because GSEB marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our GSEB Class 11 Sanskrit Solutions Chapter 7 नाट्यमेतन्मया कृतम् will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer GSEB Class 11 Sanskrit Solutions Chapter 7 नाट्यमेतन्मया कृतम् in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 11 Sanskrit. You can access GSEB Class 11 Sanskrit Solutions Chapter 7 नाट्यमेतन्मया कृतम् in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Sanskrit GSEB solutions for Class 11 as a PDF?

Yes, you can download the entire GSEB Class 11 Sanskrit Solutions Chapter 7 नाट्यमेतन्मया कृतम् in printable PDF format for offline study on any device.