GSEB Class 11 Sanskrit Solutions Chapter 5 भस्मावशेष मदनं चकार

NCERT Solutions for Class 11 Sanskrit: Chapter 05 भस्मावशेष मदनं चकार

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Practice Class 11 Sanskrit Solutions: Chapter 05 भस्मावशेष मदनं चकार

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GSEB Solutions Class 11 Sanskrit भस्मावशेष मदनं चकार Textbook Questions and Answers

भस्मावशेष मदनं चकार Exercise

1. अधोलिखितेभ्यः विकल्पेभ्यः समुचितम् उत्तरं चिनुत।

 

Question 1. कः देवः पुष्पधन्वा कथ्यते ?
(क) इन्द्रः
(ख) शङ्करः
(ग) विष्णुः
(घ) कामदेवः
Answer: (घ) कामदेवः
In simple words: कामदेव को ही पुष्पधन्वा कहा जाता है क्योंकि उनके धनुष फूलों के बने होते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में सही देवता की पहचान करना महत्वपूर्ण है जिसे पुष्पधन्वा के रूप में जाना जाता है, जो कामदेव हैं।

 

Question 2. भगवान् शङ्करः कीदृशः ?
(क) द्विनेत्रः
(ख) अयुग्मनेत्रः
(ग) बहुनेत्रः
(घ) सहस्राक्षः
Answer: (ख) अयुग्मनेत्रः
In simple words: भगवान शिव को अयुग्मनेत्र कहा जाता है क्योंकि उनके तीन नेत्र हैं, और तीन एक विषम संख्या है।

🎯 Exam Tip: यह समझना आवश्यक है कि 'अयुग्मनेत्र' का अर्थ विषम संख्या वाले नेत्रों से है, जो भगवान शिव के त्रिनेत्र स्वरूप को दर्शाता है।

 

Question 3. अम्बुराशि: इति शब्दस्य का पर्याय: ?
(क) समुद्रः
(ख) नभः
(ग) तपोवनम्
(घ) पर्वतः
Answer: (क) समुद्रः
In simple words: 'अम्बुराशि:' शब्द का अर्थ जल का भंडार है, जिसका पर्यायवाची 'समुद्र' है।

🎯 Exam Tip: संस्कृत पर्यायवाची शब्दों को याद रखना महत्वपूर्ण है, जैसे 'अम्बुराशि' का अर्थ समुद्र होता है।

 

Question 4. प्रभो, क्रोधं संहर इति देवानां गिरः कुत्र चरन्ति ?
(क) स्वर्गे
(ख) समुद्रे
(ग) आकाशे
(घ) अरण्ये
Answer: (ग) आकाशे
In simple words: देवताओं की वाणी, 'हे प्रभो, क्रोध शांत करो,' आकाश में गूँज उठी।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में उस स्थान की पहचान करना है जहाँ देवताओं की क्रोध शांत करने की प्रार्थना सुनाई दी थी।

2. संस्कृतभाषया उत्तरत।

 

Question 1. गौरी गिरिशाय किम् उपनिन्ये ?
Answer: गौरी ने भगवान शिव को कमल के बीजों की माला अर्पित की।
In simple words: देवी गौरी ने तपस्यारत भगवान शिव को कमल गट्टे की माला भेंट की।

🎯 Exam Tip: यह जानना आवश्यक है कि पार्वती ने शिव को तपस्या के दौरान क्या भेंट किया था।

 

Question 2. पुष्पधन्वा किं नाम बाणं समधत्त ?
Answer: पुष्पधन्वा (कामदेव) ने सम्मोहन नामक बाण का प्रयोग किया।
In simple words: कामदेव ने भगवान शिव पर सम्मोहन नामक अचूक बाण चलाया।

🎯 Exam Tip: कामदेव द्वारा प्रयोग किए गए बाण का नाम याद रखना एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

 

Question 3. हरः कुत्र विलोचनानि व्यापारयामास ?
Answer: भगवान शिव ने पार्वती के मुखमंडल पर अपनी दृष्टि केंद्रित की।
In simple words: शिव ने अपनी आँखें पार्वती के चेहरे पर डालीं।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न उस दिशा या वस्तु के बारे में है जिस पर शिव ने अपनी दृष्टि डाली थी, जो पार्वती का मुखमंडल था।

 

Question 4. शैलसुता कीदृशैः अङ्गः भावं विवृण्वती अभवत् ?
Answer: शैलसुता (पार्वती) प्रस्फुटित बालकदम्ब के समान अंगों से अपने मनोभावों को प्रकट कर रही थीं।
In simple words: पार्वती ने अपने शरीर के अंगों से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया, जो खिलते हुए कदम्ब फूलों जैसे दिख रहे थे।

🎯 Exam Tip: पार्वती के शारीरिक हाव-भाव का वर्णन याद रखना महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से उनकी तुलना बालकदम्ब से।

 

Question 5. शङ्करस्य तृतीयात् अक्ष्णः सहसा किं निष्पपात ?
Answer: भगवान शंकर के तीसरे नेत्र से अचानक अग्नि (कृशानु) निकली।
In simple words: शिव के तीसरे नेत्र से अचानक आग की ज्वाला निकली।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न शिव के तीसरे नेत्र से निकलने वाली शक्ति या वस्तु की पहचान पर केंद्रित है, जो अग्नि थी।

 

Question 6. का मदनं भस्मावशेषं चकार ?
Answer: शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया।
In simple words: भगवान शिव ने कामदेव को जलाकर राख कर दिया।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर यह है कि किसने कामदेव को भस्म किया, जो भगवान शिव थे।

3. Answer In Mother-Tongue:

 

Question 1. What did Parvati offer Shiva who was practicing penance ? How?
Answer: पार्वती ने अपनी ताम्र-जैसी कांति वाले हाथों से सूर्य की किरणों से सूखे हुए मंदाकिनी के कमल के बीजों की माला तपस्यारत भगवान शिव को अर्पित की।
In simple words: पार्वती ने तपस्या कर रहे शिव को अपने तांबे जैसे हाथों से कमल के बीजों की माला भेंट की, जो मंदाकिनी नदी से प्राप्त हुई थी और सूर्य की किरणों से सूखी हुई थी।

🎯 Exam Tip: पार्वती द्वारा शिव को भेंट की गई वस्तु और उसके विशिष्ट विवरण को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. What was the effect on Shiva of the Sammohan arrow shot at him by Kamdeva.
Answer: कामदेव के बाण के प्रभाव से भगवान शिव का धैर्य कुछ क्षणों के लिए भंग हो गया, और उन्होंने पार्वती के बिम्ब-फल जैसे लाल ओष्ठ वाले मुखमंडल पर दृष्टि डाली।
In simple words: कामदेव के सम्मोहन बाण से शिव क्षण भर के लिए विचलित हो गए और उन्होंने पार्वती के लाल होठों वाले मुख पर देखा।

🎯 Exam Tip: कामदेव के बाण के तत्काल प्रभाव और शिव की प्रतिक्रिया का वर्णन करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. Controlling his sensual agitation what did he concentrate on?
Answer: इंद्रियों के क्षोभ को नियंत्रित करते हुए, शंकर ने अपने चित्त में विकार के कारण का पता लगाने की इच्छा से सभी दिशाओं के अंतिम छोर तक देखा।
In simple words: शिव ने अपनी इंद्रियों को नियंत्रित किया और अपने मन के विकार को समझने के लिए चारों दिशाओं में देखा।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में शिव द्वारा अपनी इंद्रियों को वश में करने के बाद उनकी एकाग्रता के उद्देश्य को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. How was Kamdeva when Shankara saw him?
Answer: शंकर ने कामदेव को देखा जो अपनी मुट्ठी बांधे हुए थे, उनके कंधे झुके हुए थे, उनका बायां पैर मुड़ा हुआ था, और वे सुंदर धनुष को गोलाकार करके प्रहार करने के लिए तैयार खड़े थे।
In simple words: शिव ने कामदेव को प्रहार के लिए तैयार देखा, उनकी मुट्ठी बंधी हुई थी, कंधे झुके हुए थे, और वे अपने धनुष को गोलाकार स्थिति में पकड़े हुए थे।

🎯 Exam Tip: कामदेव की शारीरिक मुद्रा और उनके प्रहार के लिए तैयारी का वर्णन करना महत्वपूर्ण है जब शिव ने उन्हें देखा था।

 

Question 5. What did gods living in the sky start telling Shankara?
Answer: जैसे ही भगवान शंकर के तीसरे नेत्र से अग्नि उत्पन्न हुई, आकाश में रहने वाले देवताओं ने उनसे कहा, "हे प्रभु, अपने क्रोध को शांत करें, शांत करें।"
In simple words: जब शिव के तीसरे नेत्र से आग निकली, तो देवताओं ने उनसे अपना क्रोध शांत करने का आग्रह किया।

🎯 Exam Tip: देवताओं की प्रार्थना के मुख्य बिंदु को याद रखना महत्वपूर्ण है, जो शिव से क्रोध शांत करने का अनुरोध था।

4. Explain With Reference To Context :

 

Question 1. धनुष्यमोघं समधत्त बाणम्।
Answer:
सन्दर्भ : यह पंक्ति 'भस्मावशेष मदनं चकार' नामक पद्य-पाठ से ली गई है, जो महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध 'कुमारसंभवम्' महाकाव्य से उद्धृत है। इसमें मदन-दहन का प्रसंग वर्णित है, जिसका मुख्य विषय शिव और पार्वती का विवाह है। महाकाव्य में विश्व के माता-पिता शिव और पार्वती का वर्णन किया गया है। तारकासुर नामक दैत्य के त्रास से मुक्ति के लिए शिव-पार्वती का विवाह आवश्यक था। शिव के ध्यान को भंग करने के लिए कामदेव को भस्म करने की घटना का वर्णन यहाँ किया गया है।
अनुवाद : कामदेव ने धनुष पर अचूक बाण चढ़ाया।
व्याख्या : इस प्रसंग में कामदेव को दहन करने की घटना का वर्णन है। देवताओं ने कामदेव को यह महत्वपूर्ण कार्य सौंपा था कि वे शिव का ध्यान भंग करके पार्वती से उनके विवाह को संभव बनाएं, क्योंकि यह देवों के कार्य को पूर्ण करने के लिए आवश्यक था। कामदेव इस कार्य को पूर्ण करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। कामदेव के सहायतार्थ वसंत ऋतु का आगमन होता है। पार्वती भगवान शिव की सेवा में लगी हुई थीं। जैसे ही पार्वती ने भगवान शिव को कमल गट्टे की माला अर्पित की, और भक्त-वत्सल शिव उसे स्वीकारने लगे, उसी क्षण कामदेव ने अपना सम्मोहन नामक अचूक बाण धनुष पर चढ़ाया। सम्मोहन बाण से मोहित व्यक्ति प्रभावित हो जाता है। यहाँ कामदेव शिव के ध्यान को पार्वती की ओर आकर्षित करने के लिए इस बाण का प्रयोग करते हैं।
In simple words: यह पंक्ति कामदेव द्वारा शिव पर सम्मोहन बाण चलाने के संदर्भ में है ताकि उनका ध्यान भंग हो और शिव-पार्वती का विवाह संभव हो सके।

🎯 Exam Tip: 'सन्दर्भ' और 'अनुवाद' को सटीक रूप से प्रस्तुत करना और 'व्याख्या' को प्रसंग के अनुसार स्पष्ट तथा संक्षिप्त शब्दों में समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. व्यापारयामास विलोचनानि।।
Answer:
अनुवाद : शिव ने दृष्टि डाली।
सन्दर्भ : इस संदर्भ के लिए पूर्व प्रश्न में दिए गए विवरण का अवलोकन करें।
व्याख्या : कामदेव के दहन की घटना के वर्णन में यह भी बताया गया है कि देव-कार्य की सिद्धि और ताड़कासुर के त्रास से मुक्ति के लिए कामदेव ने भगवान शिव पर सम्मोहन नामक बाण चलाया। इस बाण के प्रहार से भगवान शिव का धैर्य कुछ क्षणों के लिए विचलित हो गया। उन्होंने बिम्ब-फल जैसे लाल अधरों वाली पार्वती के मुखमंडल पर अपनी दृष्टि डाली। यह वर्णन कामदेव के बाण के प्रभाव से शिव की मनःस्थिति को दर्शाता है।
In simple words: यह कथन शिव के उस क्षण को संदर्भित करता है जब कामदेव के सम्मोहन बाण से प्रभावित होकर उन्होंने पार्वती के मुख की ओर देखा।

🎯 Exam Tip: 'सन्दर्भ' को सही ढंग से जोड़ना और 'व्याख्या' में शिव की प्रतिक्रिया का स्पष्टीकरण देना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. दिशामुपान्तेषु ससर्ज दृष्टिम्।।
Answer:
अनुवाद : दिशाओं के अंतिम भाग में देखा।
सन्दर्भ : इस संदर्भ के लिए प्रश्न संख्या 1 में दिए गए विवरण का अवलोकन करें।
व्याख्या : जब कामदेव ने भगवान शिव का ध्यान पार्वती की ओर आकर्षित करने के लिए सम्मोहन बाण चलाया, तो शिव का ध्यान थोड़ा विचलित हुआ। उन्होंने अपनी इंद्रिय क्षोभ को नियंत्रित किया और अपने चित्त में उत्पन्न विकार के कारण को जानने की इच्छा से सभी दिशाओं के अंतिम छोर तक देखा। इस प्रकार, भगवान शिव ने अपनी मनःस्थिति के कारण को समझने के लिए चारों ओर दृष्टिपात किया।
In simple words: शिव ने कामदेव के बाण से हुए मानसिक विकार के कारण को जानने के लिए अपनी दृष्टि सभी दिशाओं के अंतिम छोर तक डाली।

🎯 Exam Tip: 'सन्दर्भ' को जोड़ते हुए, 'व्याख्या' में शिव के ध्यान विचलित होने के बाद उनके द्वारा की गई क्रिया का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. भस्मावशेष मदनं चकार।
Answer:
सन्दर्भ : इस संदर्भ के लिए पूर्व प्रश्न में दिए गए विवरण का अवलोकन करें।
अनुवाद : कामदेव को भस्म कर दिया।
व्याख्या : ताड़कासुर नामक दानव के त्रास से मुक्ति पाने के लिए शिव-पार्वती के विवाह का होना अत्यंत आवश्यक था। देवताओं ने शिव का ध्यान पार्वती की ओर आकर्षित करने का कार्य कामदेव को सौंपा। कामदेव ने इस देव-कार्य को पूर्ण करने के लिए शिव पर सम्मोहन नामक बाण चलाया। शिव ने कामदेव के बाण के प्रभाव से खुद को मुक्त करते हुए, अपने चित्त में विकार उत्पन्न करने वाले कामदेव पर दृष्टि डाली। कामदेव को देखते ही भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उनके तीसरे नेत्र से भयंकर अग्नि-ज्वालाएं निकलने लगीं। देवगणों ने आकाशमंडल से क्रोध शांत करने की प्रार्थना की। देवगणों की वाणी आकाश में गूँजती, तब तक भगवान शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि-ज्वालाओं से कामदेव भस्मीभूत हो चुके थे।
In simple words: शिव ने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया क्योंकि उन्होंने शिव के ध्यान को भंग करने का प्रयास किया था।

🎯 Exam Tip: 'सन्दर्भ' और 'अनुवाद' के साथ 'व्याख्या' में कामदेव के भस्म होने के कारणों और घटनाक्रम को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।

5. Write A Critical Note On:

 

Question 1. Event of burning Madan i.e., Madandahan (मदन-दहन का प्रसंग)
Answer:
कालिदास के 'कुमारसंभवम्' महाकाव्य में भगवान शिव-पार्वती के विवाह से पहले कामदेव के दहन का एक प्रसंग वर्णित है। तारकासुर नामक दानव से मुक्ति के लिए ब्रह्माजी ने यह उपाय बताया था कि शिव-पार्वती के पुत्र को सेनापति के रूप में तारकासुर से युद्ध कर उसे मारना होगा। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए शिव और पार्वती का विवाह अत्यंत आवश्यक था। ध्यान में लीन शिव का ध्यान भंग करने का साहस किसी में नहीं था। इस कार्य को करने में केवल कामदेव ही सक्षम थे। सभी देवताओं ने शिव-पार्वती के विवाह का दायित्व कामदेव को सौंपा। कामदेव, शिव के ध्यानभंग के परिणामस्वरूप उनकी क्रोधाग्नि से परिचित होते हुए भी, देव-कार्य पूर्ण करने के लिए यह कार्य अपने हाथ में लेते हैं। हिमालय पर तपस्यारत शिव की परिचर्या में लीन पार्वती उन्हें कमल गट्टे की माला पहनाती हैं। प्रियजनों के प्रति स्नेह रखने वाले भगवान शिव जैसे ही पार्वती के हाथ से यह माला स्वीकारने को तैयार होते हैं, उसी क्षण का इंतजार कर रहे कामदेव अपने धनुष की प्रत्यंचा पर अचूक सम्मोहन नामक बाण साधते हैं।
कामदेव द्वारा चलाए गए बाण के प्रभाव से भगवान शिव का धैर्य क्षण भर के लिए विचलित हो जाता है। वे बिम्ब-फल जैसे लाल ओष्ठों वाली पार्वती के मुखमंडल को मोहित होकर देखने लगते हैं। उसी क्षण शिव इंद्रिय-क्षोभ के कारण को सर्वत्र देखने लगते हैं। उसी समय मुट्ठी बांधे, प्रहार करने को तैयार कामदेव को भगवान शिव देख लेते हैं। कामदेव को देखते ही शिव का क्रोध असह्य हो जाता है। उनकी भौंहें वक्र हो जाती हैं। अपनी तपस्या को भंग करने वाले कामदेव को देखते ही भगवान शिव के तीसरे नेत्र से अग्नि की ज्वालाएं प्रकट होने लगती हैं। आकाशमंडल में देवगणों की वाणी गूंजने लगती है- 'हे प्रभो, क्रोध शांत करो, शांत करो'। परंतु देखते ही देखते भगवान शिव के तीसरे नेत्र से निकली अग्नि ज्वालाओं ने कामदेव को भस्म कर दिया। इस प्रकार, देवगणों और कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना पर भगवान शिव ने कामदेव को पुनः जीवित किया और उन्हें प्राणियों के मन में जन्म लेने का वरदान दिया। इस कारण कामदेव का एक नाम 'अनंग' है (बिना शरीर के) तथा मन से उत्पन्न होने के कारण उन्हें 'मनोज' भी कहा जाता है।
In simple words: कामदेव ने शिव के ध्यान को तोड़ने के लिए बाण चलाया, जिससे शिव क्रोधित हो गए और अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में, देवताओं और रति की प्रार्थना पर शिव ने कामदेव को बिना शरीर के (अनंग) और मन से उत्पन्न होने वाले (मनोज) के रूप में पुनर्जीवित किया।

🎯 Exam Tip: मदन-दहन के पूरे प्रसंग को क्रमबद्ध तरीके से समझाना, जिसमें कारण, घटना और परिणाम शामिल हों, महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. Act of Kamdeva (कामदेव का कार्य)
Answer:
कामदेव अत्यंत दुष्कर कार्य करने के लिए तैयार होते हैं। तारकासुर दैत्य से मुक्ति पाने के लिए शिव-पुत्र द्वारा उसका वध करना अनिवार्य था। अतः इस कार्य के लिए शिव एवं पार्वती का विवाह अत्यंत आवश्यक था। लेकिन ध्यानस्थ शिव के ध्यान को भंग करने का साहस किसी के लिए भी संभव नहीं था, और सभी शिव की क्रोधाग्नि से परिचित थे। फिर भी, दैत्य के त्रास से मुक्ति के लिए देव-कार्य को पूर्ण करने हेतु कामदेव यह कार्य करने के लिए तत्पर होते हैं। कामदेव के पास संसार के चक्र को गतिमान रखने के लिए पाँच बाण हैं – उन्मादन, तापन, शोषण, स्तंभन एवं संमोहन। भगवान शिव को पार्वती के प्रति आसक्त करने हेतु कामदेव अपने अचूक संमोहन नामक बाण का प्रयोग करते हैं। भगवान शिव का धैर्य कुछ क्षणों के लिए विचलित होता है, किंतु वे शीघ्र ही उसे नियंत्रित कर, चित्त-विकार के कारण रूपी कामदेव को भस्म कर देते हैं। परंतु यदि कामदेव न हों तो संसार के प्राणियों की उत्पत्ति-स्थिति आदि का क्रम बाधित हो जाएगा। अतः, सृष्टि के इस क्रम की निरंतरता के लिए शिव कामदेव को अंगरहित (शरीर रहित) रहकर प्राणी-मात्र के मन में उत्पन्न होने का वरदान देकर पुनर्जीवित करते हैं। इस प्रकार, कामदेव को मनोज तथा अनंग भी कहा जाता है। कामदेव का कार्य सृष्टि-क्रम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, शिव ने उन्हें पुनः जीवित किया।
In simple words: कामदेव का मुख्य कार्य शिव-पार्वती के विवाह को संभव बनाना था ताकि तारकासुर का वध हो सके और सृष्टि का क्रम चलता रहे। शिव द्वारा भस्म किए जाने के बाद, उन्हें सृष्टि की निरंतरता के लिए बिना शरीर के पुनर्जीवित किया गया, जिससे वे प्रेम और सृजन के प्रेरक बने रहें।

🎯 Exam Tip: कामदेव के कार्य के महत्व और उनके पुनर्जीवन के पीछे के कारणों को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है, साथ ही उनके 'मनोज' और 'अनंग' नाम का भी उल्लेख करना।

6. Write An Analytical Note On:

 

Question 1. अयुग्मनेत्र :
Answer:
'अयुग्मनेत्र' का अर्थ है शिव। यहाँ 'अयुग्म' शब्द का अर्थ विषम है। एक, तीन आदि विषम संख्याएं हैं, जबकि दो, चार, छह आदि सम संख्याएं हैं। भगवान शिव के तीन नेत्र हैं, और तीन एक विषम संख्या है, इसलिए उन्हें 'अयुग्मनेत्र' कहा जाता है। अतः शिव को 'त्रिनयन', 'त्रिलोचन' और 'त्रिनेत्र' भी कहते हैं।
In simple words: अयुग्मनेत्र का अर्थ है शिव, क्योंकि उनके तीन (विषम संख्या) नेत्र हैं, इसलिए उन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: 'अयुग्मनेत्र' शब्द की व्युत्पत्ति और उसके अर्थ को भगवान शिव से जोड़ना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. पुष्पधन्वा :
Answer:
पुष्प है धनुष जिसका उसे 'पुष्पधन्वा' अर्थात् कामदेव कहा जाता है। कामदेव के पास फूलों के पाँच बाण हैं। वे फूलों को धनुष बनाकर बाण छोड़ते हैं। कामदेव के पाँच बाण हैं – अरविन्द, अशोक, नवमल्लिका एवं नीलोत्पल। कामदेव इन पाँच पुष्पबाणों का प्रयोग करते हैं। फूलों के इन बाणों से आहत व्यक्ति का जीवन-यापन अत्यंत कठिन हो जाता है। कामदेव के पाँच बाणों के रूप में उन्मादन, तापन, शोषण, स्तंभन एवं संमोहन का भी वर्णन मिलता है। बाणों के नामकरण के अनुसार इन बाणों से आहत व्यक्ति की स्थिति भी तदनुसार ही होती है। उन्मादन नामक बाण से आहत व्यक्ति उन्मादी हो जाता है। तापन नामक बाण से शरीर तप्त हो जाता है। शोषण नामक बाण से घायल व्यक्ति सूखने लगता है। स्तंभन नामक बाण से व्यक्ति स्तब्ध हो जाता है और किंकर्तव्यविमूढ़ होकर विचरण करता है। संमोहन नामक बाण से आहत व्यक्ति मोहित हो जाता है। यहाँ कामदेव शिव का ध्यान पार्वती की ओर आकर्षित करने और उन्हें मोहित करने के लिए संमोहन नामक बाण का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार, फूलों का बाण होने के कारण कामदेव को 'पुष्पशर' भी कहा जाता है।
In simple words: पुष्पधन्वा कामदेव का एक नाम है क्योंकि उनके धनुष फूलों के बने होते हैं। उनके पाँच पुष्पबाण (अरविन्द, अशोक, नवमल्लिका, नीलोत्पल) हैं, जिनसे वे उन्मादन, तापन, शोषण, स्तंभन और संमोहन जैसे प्रभाव उत्पन्न करते हैं।

🎯 Exam Tip: 'पुष्पधन्वा' नाम के अर्थ, कामदेव के पुष्पबाणों के नाम और उनके प्रभावों का विस्तृत वर्णन करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. संमोहन :
Answer:
संसार के सृष्टि-क्रम की निरंतरता के लिए कामदेव अपने पाँच पुष्प-बाणों का प्रयोग करते हैं। उन्मादन, तापन, शोषण, स्तंभन एवं संमोहन नामक पाँच बाणों से प्रभावित नर एवं मादा के संयोग से सृष्टि का क्रम अबाधित रूप से चलता रहता है। इन पाँच बाणों में से कामदेव अपने अचूक बाण 'संमोहन' का प्रयोग शिव के लिए करते हैं। इस बाण के प्रभाव से व्यक्ति मोहित हो जाता है। वही व्यक्ति अपने पास सब जगह होने की कल्पना में मग्न रहता है। इस बाण के प्रभाव से जिस व्यक्ति पर मोहित होता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न मानता है। उसमें कोई दोष नहीं दिखाई देता, यहाँ तक कि जिस पर मोहित होता है उसके दोष भी सद्गुण के रूप में दिखाई देते हैं। इस प्रकार, संमोहन नामक बाण से आहत व्यक्ति पूरी तरह से रूप-गुण में मंत्र-मुग्ध हो जाता है और अंधा होकर अपने प्रियतम के इशारों पर नट-वानर की तरह नृत्य करने लगता है। उसी रूप में खोकर, उसी रूप-रंग-गुण में अपने अस्तित्व की अनुभूति करते हुए, केवल उस प्रियजन की प्रसन्नता को ही अपने जीवन का परम लक्ष्य मान लेता है।
In simple words: संमोहन कामदेव के पाँच बाणों में से एक है, जिससे व्यक्ति मोहित हो जाता है और अपने प्रियजन के प्रति अंधभक्ति विकसित करता है, जिससे वह उसके सभी दोषों को सद्गुण मानने लगता है।

🎯 Exam Tip: संमोहन बाण के प्रभाव और मोहित व्यक्ति के व्यवहार पर उसके परिणामों का विश्लेषण करना आवश्यक है।

 

Question 4. उमा :
Answer:
पार्वती का एक नाम 'उमा' है। भगवती पार्वती के अनेक नाम हैं, और इन नामों का रहस्य जानना योग्य है। पर्वत की पुत्री होने के कारण पार्वती को 'गिरिजा', 'गिरिनन्दिनी', 'शैलजा', 'शैलपुत्री' और 'शैल-सुता' जैसे नाम भी प्राप्त हैं। पिता दक्ष के यज्ञ में वे सती हो गई थीं, अतः उन्हें 'सती' के नाम से भी संबोधित किया जाता है। भिन्न कारणों से पार्वती के विभिन्न नामों का उल्लेख मिलता है। पूर्व जन्म में दक्ष की पुत्री के रूप में जन्म लेने के पश्चात सती होकर, फिर पर्वत-पुत्री – पार्वती के रूप में यह नाम सुप्रसिद्ध हो गया। इसी प्रकार पार्वती का एक नाम 'उमा' है। महाकवि कालिदास द्वारा वर्णित कुमारसंभवम् महाकाव्य के अनुसार 'उमा' शब्द की व्याख्या इस प्रकार है: "
उमेति मात्रा तपसो निषिद्धा।
पश्चादुमाख्यां सुमुखी जगाम।।
" अर्थात्, 'हे पुत्री, मा' (अर्थात् 'नहीं', ऐसा कठिन तप न करो) यह कहकर तपस्या से उन्हें रोका गया, इसलिए पार्वती का नाम 'उमा' के रूप में प्रसिद्ध हो गया। इस प्रकार, संस्कृत भाषा में प्रत्येक शब्द की एक निश्चित व्युत्पत्ति है और प्रत्येक वर्ण एवं शब्द सार्थक है, जिसके पीछे कोई कारण निहित होता है।
In simple words: उमा पार्वती का एक नाम है, जो उन्हें तब मिला जब उनकी माँ ने उन्हें कठोर तपस्या करने से रोका ('उमा' का अर्थ 'ओह, नहीं तपस्या करो' है)। यह नाम उनकी पर्वत की पुत्री होने और सती के रूप में उनके पूर्व जन्म के संदर्भ में उनके विभिन्न नामों में से एक है।

🎯 Exam Tip: 'उमा' नाम की व्युत्पत्ति और पार्वती के अन्य पर्यायवाची शब्दों को समझना महत्वपूर्ण है, जो उनके चरित्र और पौराणिक कथाओं को दर्शाते हैं।

भस्मावशेष मदनं चकार स्वाध्याय

1. अधोलिखितेभ्यः विकल्पेभ्यः समुचितम् उत्तरं चिनुत।

 

Question 1. गिरिशाय पुष्करबीजमालां कः उपनिन्ये ?
(क) मदनः
(ख) शिवः
(ग) गौरी
(घ) वाणी
Answer: (ग) गौरी
In simple words: गौरी ने ही भगवान शिव को कमल के बीजों की माला भेंट की।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न उस पात्र की पहचान करने से संबंधित है जिसने शिव को कमल गट्टे की माला अर्पित की थी।

 

Question 2. सम्मोहनम् नाम बाणम् कः समधत्त।
(क) शिवः
(ख) मदनः
(ग) अनलः
(घ) शैलसुता
Answer: (ख) मदनः
In simple words: कामदेव (मदन) ने सम्मोहन नामक बाण का प्रयोग किया।

🎯 Exam Tip: कामदेव द्वारा प्रयोग किए गए बाण का नाम याद रखना आवश्यक है।

 

Question 3. शिवः कं भस्मावशेषं चकार ?
(क) मदनम्
(ख) पार्वतीम्
(ग) अम्बुराशिम्
(घ) बह्निम्
Answer: (क) मदनम्
In simple words: भगवान शिव ने कामदेव को जलाकर राख कर दिया।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में शिव द्वारा भस्म किए गए पात्र की पहचान करना है।

 

Question 4. कस्याक्ष्णः कृशानुः निष्पपात ?
(क) मदनस्य
(ख) शिवस्य
(ग) पार्वत्याः
(घ) वरुणदेवस्य
Answer: (ख) शिवस्य
In simple words: शिव के नेत्र से अग्नि निकली।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न उस देवता की पहचान पर केंद्रित है जिसके नेत्र से अग्नि उत्पन्न हुई थी।

 

Question 5. उमामुखे विलोचनानि कः व्यापारयामास ?
(क) हरः
(ख) आत्मयोनिः
(ग) कृशानुः
(घ) शैलजा
Answer: (क) हरः
In simple words: हर (शिव) ने पार्वती के मुख पर दृष्टि डाली।

🎯 Exam Tip: उस पात्र की पहचान करें जिसने पार्वती के मुख पर अपनी दृष्टि केंद्रित की थी।

2. संस्कृतभाषया उत्तरत।

 

Question 1. गौरी कस्मै मन्दाकिनी पुष्करबीजमालाम् उपनिन्ये ?
Answer: गौरी ने गिरिशाय (भगवान शिव) को मंदाकिनी कमलबीज माला अर्पित की।
In simple words: गौरी ने शिव को मंदाकिनी के कमल के बीजों की माला भेंट की।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न प्राप्तकर्ता और भेंट की गई वस्तु को सही ढंग से जोड़ना सुनिश्चित करता है।

 

Question 2. कामदेवः कीदृशं बाणं समधत्त ?
Answer: कामदेव ने सम्मोहन नामक अचूक बाण का प्रयोग किया।
In simple words: कामदेव ने सम्मोहन नाम का अमोघ बाण चलाया।

🎯 Exam Tip: कामदेव द्वारा प्रयोग किए गए विशिष्ट बाण का नाम याद रखना आवश्यक है।

 

Question 3. कः दिशाम उपान्तेषु दृष्टिं ससर्ज ?
Answer: अयुग्मनेत्रः शिवः (भगवान शिव, जिनके तीन नेत्र हैं) ने दिशाओं के अंतिम छोर तक दृष्टि डाली।
In simple words: शिव ने चारों दिशाओं के छोर तक अपनी आँखें घुमाईं।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में उस देवता की पहचान करनी है जिसने दिशाओं के अंतिम छोर तक अपनी दृष्टि डाली थी।

3. मातृभाषा में उत्तर दीजिए।

 

Question 1. कामदेव को देखने पर शिव ने क्या किया ?
Answer: तपस्या पर आक्रमण करने वाले कामदेव को देखकर शिव अत्यंत क्रोधित हो गए, उनकी भौंहें क्रोध से वक्र हो गईं, क्रोधाविष्ट मुख असह्य लग रहा था, और उनके तीसरे नेत्र से ऊँची उठती हुई ज्वालाओं से युक्त अग्नि उत्पन्न हुई।
In simple words: कामदेव को देखकर शिव बहुत क्रोधित हो गए, उनकी भौंहें तन गईं, उनका मुख विकृत हो गया, और उनके तीसरे नेत्र से आग की ज्वालाएं निकलीं।

🎯 Exam Tip: शिव की क्रोधपूर्ण प्रतिक्रिया और शारीरिक परिवर्तनों का विस्तृत वर्णन करना महत्वपूर्ण है।

भस्मावशेष मदनं चकार Summary In Hindi

भस्मावशेष मदनं चकार (कामदेव भस्मसात् हो गए)

सन्दर्भ : यह पाठ संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास द्वारा रचित कुमारसंभवम् से उद्धृत है। संस्कृत साहित्य के पाँच महाकाव्यों में से कुमारसंभवम् एक प्रसिद्ध महाकाव्य है। इस महाकाव्य के नायक-नायिका विश्व के माता-पिता भगवती पार्वती एवं भगवान शिव हैं।

भगवान शिव एवं पार्वती के विवाह का निरूपण इस महाकाव्य कुमारसंभवम् का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। प्रस्तुत पाठ में वर्णित आठ पद्य कुमारसंभवम् के तृतीय सर्ग से लिए गए हैं जिसमें मदन-दहन की सुप्रसिद्ध घटना का वर्णन किया गया है।

ताड़कासुर नामक दैत्य देवताओं को भयंकर त्रास देता था। इस दैत्य के त्रास से मुक्त होने के लिए देवगण ब्रह्माजी के पास गए और त्रास के निवारण का उपाय पूछा। ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा कि शिव एवं पार्वती का पुत्र सेनापति बनकर ताड़कासुर से युद्ध करे और उस युद्ध में ताड़कासुर का वध हो, तब ही उस असुर के त्रास से मुक्ति मिल सकती है।

इस कार्य की सिद्धि हेतु प्रथम तो शिव एवं पार्वती का विवाह हो यह आवश्यक था। अतः इस कार्य को सिद्ध करने का दायित्व देवताओं ने कामदेव को दिया।

भगवान शिव हिमालय पर तपस्या में लीन थे। पार्वती उनकी परिचर्या में संलग्न थीं। यहाँ कामदेव आते हैं तथा प्रदत्त कार्य को सिद्ध करने हेतु सन्नद्ध होते हैं। कामदेव के सहयोगार्थ वसंत ऋतु उपस्थित होती है। असमय वसंत-ऋतु का आगमन होता है। वसंत-ऋतु के प्रभावक वातावरण में पार्वती भगवान शिव को कमल गट्टे की माला पहनाती हैं। इस अवसर हेतु प्रतीक्षारत कामदेव सक्रिय होकर संमोहक नामक बाण को धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर साधते हैं। भगवान शिव किंचित् विचलित होते हैं। परंतु अनुक्षण संयम धारण कर लेते हैं। कामदेव की इस कुचेष्टा से भगवान शिव क्रोधित होते हैं तथा अपना तृतीय नेत्र को खोलकर क्षणभर में कामदेव को भस्मसात् कर देते हैं। कालिदासकृत कामदेव-दहन की घटना का सरस वर्णन निम्न आठ पद्यों में उपजाति छन्द में यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

अन्वय, शब्दार्थ एवं अनुवाद

1. अन्वय : – अथ गौरी तपस्विने गिरिशाय ताम्ररुचा करेण भानुमतः मयूखैः विशोषितां मन्दाकिनी- पुष्कर-बीज-मालाम् उपनिन्ये।

शब्दार्थ : गौरी = पार्वती, शैलजा, उमा, शैलसुता, शैलपुत्री, गिरिजा, गिरिनन्दिनी आदि पार्वती के पर्याय शब्द हैं। गिरिशाय = शंकर के (शंकर के लिए)। पर्याय शब्द - शिवः, हरः, त्रिलोचनः, शङ्करः, भवः, रूद्रः आदि। ताम्ररुचा = ताँबे के समान कान्ति से युक्त, तांबे जैसी लालिमावाली, ताम्रस्य रुच् इव रुच् यस्य सः, तेन- बहुव्रीहि समास, ताम्ररुच् – पुं. तृतीया विभक्ति एकवचनम्। भानुमतः = सूर्य की। मयूखैः = किरणों से, पर्याय शब्द - अंशुः, रश्मिः, करः। विशोषिताम् = सुखी हुई। मन्दाकिनी – पुष्कर – बीज – मालाम् = मन्दाकिनी – गंगा नदी के कमलों के बीजों (कमलगट्टों) की माला को, मन्दाकिन्याः पुष्कराणि इति = षष्ठी तत्पुरुष समास, मन्दाकिन्याः पुष्कराणां बीजानि इति – षष्ठी तत्पुरुष समास, मन्दाकिनी-पुष्कर – बीजानाम् माला – इति मन्दाकिनीपुष्कर बीजमालाताम् षष्ठी तत्पुरुष समास। उपनिन्ये = अर्पण की, पहिनाई – उप-उपसर्ग + नी धातु, परस्मैपद, भूतकाल, अन्य पुरुष, एकवचन।

अनुवाद : गौरी ने तपस्वी शंकर को ताम्रसदृश कान्ति युक्त हाथ से सूर्य की किरणों से सूखे हुए मन्दाकिनी के कमलगट्टों की माला अर्पण की।

2. अन्वय : त्रिलोचनः प्रणयिप्रियत्वात् तां प्रतिग्रहीतुम् उपचक्रमे च। पुष्पधन्वा च धनुषि सम्मोहनं नाम अमोघं बाणं समधत्त।

शब्दार्थ : त्रिलोचनः = तीन नेत्रोंवाले – शंकर, त्रीणि लोचनानि यस्य सः – बहुव्रीहि समास। प्रणयिप्रियत्वात् = भक्तजन के प्रति प्रेमवश अथवा प्रिय व्यक्ति के प्रति प्रेम होने से। प्रतिग्रहीतुम् = स्वीकार करने हेतु – प्रति उपसर्ग + ग्रह धातु + तुमुन् – हेत्वर्थक कृदन्त। उपचक्रमे = आरंभ किया – उप – उपसर्ग + क्रम् धातु + परोक्ष भूतकाल, अन्य पुरुष, एकवचन। पुष्पधन्वा = कामदेव के द्वारा – पुष्पम् धनुः यस्य सः – बहुव्रीहि समास, (पुष्प है धनुष जिसका वह – कामदेव)। धनुषि = धनुष पर, धनुस् (नपु.) सप्तमी विभक्ति, एकवचनम्। सम्मोहनम् = सम्मोहन नामक कामदेव का बाण। अमोघम = कभी भी निष्फल न जानेवाले (बाण को या अस्त्र को), समधत्त = साधा, संधान किया, चढ़ाया – सम् उपसर्ग + धा धातु, ह्यस्तन भूतकाल, अन्य पुरुष, एकवचन।

अनुवाद : भक्तों के प्रति प्रेम होने के कारण (भगवान) शंकर ने (जैसे ही) उसे (माला को) स्वीकारना आरंभ किया (वैसे ही) कामदेव ने धनुष पर संमोहन नामक अमोघ बाण का संधान किया।

3. अन्वय : चन्द्रोदयारम्भे अम्बुराशिः इव किञ्चित् परिलुप्त धैर्यः हरः तु बिम्बफलाधरोष्ठे उमामुख्ने विलोचनानि व्यापारयामास।

शब्दार्थ : चन्द्रोदयारम्भे = चन्द्र का उदय आरम्भ होने पर, चन्द्रस्य उदयः – षष्ठी तत्पुरुष समास, चन्द्रोदयस्य आरम्भः, तस्मिन् – षष्ठी – तत्पुरुष समास। अम्बुराशिः = समुद्र – अम्बूनाम् राशिः – षष्ठी तत्पुरुष समास। परिलुप्त धैर्यः = विलुप्त हो चुका है धैर्य जिसका वह भगवान शिव – परिलुप्तम् धैर्यम् यस्य सः – बहुव्रीहि समास। बिम्बफलाधरोष्ठे = बिम्ब-फल के समान अधरोष्ठवाली (पार्वती के मुख पर)। व्यापारयामास = घुमाई या डाली।

अनुवाद : चन्द्रोदय के आरम्भ पर समुद्र की भाँति कुछ क्षण के लिए धैर्य से विचलित शिव ने बिम्ब-फल के समान ओष्ठवाली पार्वती के मुखमंडल पर दृष्टि निक्षेप किया।

4. अन्वय : शैलसुता अपि स्फुरद्वाल – कदम्ब – कल्पैः अङ्गः भावं-विवृण्वती साचीकृता चारुतरेण पर्यस्त – विलोचनेन मुख्न तस्थौ ?

शब्दार्थ : स्फुरबालकदम्बकल्पैः = खिलते हुए सुकोमल कदम्ब के पुष्प के समान (रोमांचित) बालश्चासौ कदम्बः, बालकदम्बः – कर्मधारय समास, स्फुरन् चासौ बालकदम्बः – कर्मधारय समास, स्फुरद् बालकदम्ब + कल्प तद्धित प्रत्यय, कल्प – यह एक तद्धित प्रत्यय है तथा यह ........ उसके समान – अर्थ प्रकट करता है। यथा – पुत्रकल्प अर्थात् पुत्र के समान। विवृण्वती = वर्णन या प्रकट करती हुई – वि उपसर्ग + वृ धातु + शतृ प्रत्यय = अत् – स्त्रीलिंग (वर्तमान कृदन्त)। साचीकृता = एक ओर मुडी या घूमी हुई, चारुतरेण = और अधिक सौन्दर्य से। पर्यस्तविलोचनेन = चंचल नयनवाले (मुख) से – पर्यस्ते लोचने यस्य तत्, तेन – बहुव्रीहि समास। तस्थौ = खड़ी रही।

अनुवाद : पार्वती भी प्रस्फुटित होते हुए सुकुमार कदम्ब के सुमनों के समान (रोमांचित) अंगों से मनोभावों को प्रकट करते हुए एक ओर मुडी हुई और अधिक सौन्दर्यपूर्ण नेत्रोंवाले मुख से खड़ी रही।

5. अन्वय : अथ अयुग्मनेत्रः वशित्वात् इन्द्रियक्षोभं बलवत् निगृह्य स्वचेतोविकृतेः हेतुं दिदृक्षुः दिशाम् उपान्तेषु दृष्टिं ससर्ज ।

शब्दार्थ : अयुग्मनेत्रः = शिव - न युग्मम् - नञ् तत्पुरुष समास, अयुग्मं नेत्रं यस्य सः – बहुव्रीहि समास। अयुग्म अर्थात् विषम संख्या, अर्थात् तीन नेत्रोंवाले भगवान शिव। वशित्वात् = वश करनेवाला होने के कारण। इन्द्रियक्षोभं = इन्द्रियों के क्षोभ या चांचल्य को – इन्द्रियाणाम् क्षोभः, तम् – षष्ठी तत्पुरुष समास। बलवत् = बलपूर्वक – बलम् अस्य अस्ति इति बलवत्। निगृह्य = नियन्त्रित करके। नि उपसर्ग + गृह धातु + क्त्वा प्रत्यय – संबन्धक भूत कृदन्त। हेतुम् = कारण को। स्वचेतो विकृतेः = स्वयं के चित्त के विकार का। दिदृक्षुः = दृश् धातु + सन् – दिदृक्षा + उ = इच्छादर्शक विशेषण, देखने की इच्छा अर्थात् दिदृक्षा, दर्शनेच्छावाला – दिदृक्षुः । दिशाम् = दिशाओं के। उपान्तेषु = अंत भागों में। ससर्ज = उत्पन्न की, सृज् धातु, परोक्ष भूतकाल, अन्यपुरुष, एकवचन।

अनुवाद : (संमोहन नामक बाण के) वश से इन्द्रिय – क्षोभ को बलपूर्वक नियन्त्रित करके अपने चित्त की विकृत्ति के कारण को देखनेवाले शिव ने दिशाओं के अन्त भाग में देखा।।

6. अन्वय : सः दक्षिणापाङ्गनिविष्टमुष्टिं नतांसम् आकुञ्चितसव्यपादम् चक्रीकृत् – चारुचापम् आत्मयोनिम् प्रहर्तुम् अभ्युद्यतम् ददर्श।

शब्दार्थ : दक्षिणापाङ्गनिविष्टमुष्टिम् = दक्षिण (दाहिने) नेत्र के अन्त भाग (छोर) तक मुट्ठी बन्द किए हुए को दक्षिणापाङ्गं यावत् निविष्टा मुष्टिः येन, तम् – बहुव्रीहि समास। नतांसम् = झुके हुए कन्धेवाले को – नतः अंसः यस्य सः, तम् – बहुव्रीहि समास। आकुञ्चितसव्यपादम् = मुडे हुए (बाँए) वाम पैरवाले (कामदेव को) को – आकुञ्चितः सव्यः पादः यस्य सः – बहुव्रीहि समास। चक्रीकृत-चारुचापम् = सुन्दर धनुष को वृत्त रूप में (चक्रवत्) परिवर्तित करनेवाले (कामदेव को)। आत्मयोनिम् = कामदेव को – आत्मा एवं योनिः यस्य सः – बहुव्रीहि समास। प्रहर्तुम् = प्रहार करने के लिए। अभ्युद्यतम् = उद्यत (सज्ज) हो चुके (कामदेव) को। ददर्श = देखा – दृश् धातु – परोक्ष भूतकाल, अन्यपुरुष – एकवचनम्।

अनुवाद : उन्होंने दक्षिण (दाहिने) नेत्र के अन्तिम छोर तक मुट्ठी बाँधे हुए, झुके हुए स्कन्ध प्रदेशवाले, मुडे हुए वाम-पादवाले, सुन्दर धनुष को वृत्तमय करने वाले प्रहार करने हेतु उद्यत कामदेव को देखा।।

 

6. अन्वय : सः दक्षिणापाङ्गनिविष्टमुष्टिं नतांसम् आकुञ्चितसव्यपादम् चक्रीकृत्- चारुचापम् आत्मयोनिम् प्रहर्तुम् अभ्युद्यतम् ददर्श।
Answer: शब्दार्थ : दक्षिणापाङ्गनिविष्टमुष्टिम् = दक्षिण (दाहिने) नेत्र के अन्त भाग (छोर) तक मुट्ठी बन्द किए हुए को दक्षिणापाङ्गं यावत् निविष्टा मुष्टिः येन, तम्- बहुव्रीहि समास। नतांसम् = झुके हुए कन्धेवाले को- नतः अंस: यस्य सः, तम्- बहुव्रीहि समास। आकुञ्चितसव्यपादम् = मुडे हुए (बाँए) वाम पैरवाले (कामदेव को) को- आकुञ्चितः सव्यः पादः यस्य सः- बहुव्रीहि समास। चक्रीकृत-चारुचापम् = सुन्दर धनुष को वृत्त रूप में (चक्रवत्) परिवर्तित करनेवाले (कामदेव) को। आत्मयोनिम् = कामदेव को- आत्मा एवं योनिः यस्य सः- बहुव्रीहि समास। प्रहर्तुम् = प्रहार करने के लिए। अभ्युद्यतम् = उद्यत (सज्ज) हो चुके (कामदेव) को। ददर्श = देखा- दृश् धातु- परोक्ष भूतकाल, अन्यपुरुष- एकवचनम्। भगवान शिव ने कामदेव को देखा, जो अपने दाहिने नेत्र के सिरे तक मुट्ठी कसे हुए थे, उनके कंधे झुके हुए थे, बायां पैर मुड़ा हुआ था, और वे अपने सुंदर धनुष को गोलाकार करके प्रहार करने की मुद्रा में तैयार खड़े थे।
In simple words: शिव ने कामदेव को देखा जो धनुष ताने, प्रहार के लिए तैयार मुद्रा में खड़े थे।

🎯 Exam Tip: यह वर्णन कामदेव के ध्यान भंग करने के प्रयास की मुद्रा को स्पष्ट करता है।

 

7. अन्वय : तपः परामर्शविवृद्धमन्योः भ्रूभङ्गदुष्प्रेक्ष्य मुखस्य तस्य तृतीयात् अक्ष्णः स्फुरन् उदर्चिः कृशानुः सहसा निष्पपात किल।
Answer: शब्दार्थ : तपः परामर्शविवृद्धमन्योः = तप पर किए गए आक्रमण से जिनका क्रोध अभिवर्धित हो चुका था वह भगवान शिव। तमसः परामर्शः = षष्ठी तत्पुरुष समास, तपः परामर्शेन विवृद्धः मन्युः यस्य सः- बहुव्रीहि समास। भूभङ्ग- दुष्प्रेक्ष्य-मुखस्य = भ्रू (भोंह) भंग के कारण जिनका मुख देखना असह्य हो गया था उन्हें (शिव को)। स्फुरन् = स्फुरित होते हुए। अक्ष्णः = नेत्र से। उदर्चिः = ऊँची उठती हुई ज्वालाओंवाली। कृशानुः = अग्नि। किल = वास्तव में निश्चित रूप से, निश्चयार्थक अव्यय। निष्पपात = निकला, प्रकट हुआ। तपश्चर्या पर किए गए इस आक्रमण के कारण अत्यंत क्रोधित हुए शिव के मुख को देखना कठिन था, उनकी भौंहें तन गई थीं। उनके तीसरे नेत्र से अचानक ऊँची उठती हुई अग्नि की ज्वालाएँ प्रकट हुईं।
In simple words: कामदेव द्वारा तपस्या भंग करने के प्रयास से शिव अत्यंत क्रोधित हुए और उनके तीसरे नेत्र से अग्नि की ज्वालाएँ निकलीं।

🎯 Exam Tip: यह घटना शिव के क्रोध और उनकी तीसरी आँख के प्रकट होने के महत्व को दर्शाती है।

 

8. अन्वय : हे प्रभो ! क्रोधं संहर संहर इति मरुतां गिरः खे यावत् चरन्ति, तावत् भवनेत्र- जन्मा सः वह्निः मदनं भस्मावशेष चकार।
Answer: शब्दार्थ : संहर = शमन करो, नष्ट करो। मरुताम् = देवताओं की। गिरः = वाणी, वाक्- गिर्- स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन। स्ने = आकाश में। चरन्ति = विचरण करने लगी, फैलने लगी। वह्निः = अग्निः, पावकः, अनल: आदि पर्याय- शब्द हैं। भवनेत्रजन्मा = भव अर्थात् शिव, शिव के नेत्र से जन्म लेनेवाली अग्नि। भस्मावशेष = भस्म ही जिसका एकमात्र अवशेष रह गया था अर्थात्- भस्मसात् या भस्मीभूत। चकार = कर दिया। जब तक आकाश में देवताओं की यह प्रार्थना गूँज रही थी- 'हे प्रभु, क्रोध शांत करें, क्रोध शांत करें' – तब तक भगवान शिव के तीसरे नेत्र से उत्पन्न अग्नि ने कामदेव को भस्म करके केवल राख में बदल दिया।
In simple words: देवताओं की प्रार्थना पूर्ण होने से पहले ही, शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि ने कामदेव को जलाकर राख कर दिया।

🎯 Exam Tip: यह प्रसंग देवताओं की प्रार्थना और शिव के त्वरित, विनाशकारी क्रोध की शक्ति को उजागर करता है।

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