Official GSEB Solutions for Class 11 Hindi: निबंध लेखन
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Chapter-wise Solutions for Hindi: निबंध लेखन
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GSEB Std 11 Hindi Rachana निबंध-लेखन
निम्नलिखित प्रत्येक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए:
Question 1. मेरे सपनों का भारत
Answer: [भारत की वर्तमान स्थिति – मेरे सपनों का भारत कैसा होगा? -कृषि और उद्योग – शिक्षा – संरक्षण – राष्ट्रीय एकता की आशा।]
आज़ादी मिलने के बाद, खेती, उद्योग, व्यवसाय, विज्ञान, पढ़ाई, सुरक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों में भारत ने तरक्की के संकेत दिखाए हैं। विश्व के विकासशील देशों में भारत सबसे आगे है। फिर भी, हमारा देश अपनी मूल समस्याओं से आज़ाद नहीं हो सका है। जब मैं अपने मुल्क की मौजूदा तस्वीर देखता हूँ, तो ऐसा लगता है कि यह मेरे सपनों का भारत नहीं है।
मेरे सपनों का भारत वह होगा जहाँ गांधीजी के रामराज्य का आदर्श पूरा होगा। वह ऐसा भारत होगा जिसके लिए हमारे देश के शहीदों ने अपनी अनमोल जानें कुर्बान कर दी थीं। मेरे सपनों के भारत में केवल 'स्वराज्य' नहीं, बल्कि "सराज्य' भी होगा।
मेरी कल्पना का भारत हर तरह से एक फलता-फूलता देश होगा। गाँवों में किसान अपनी भूमि के असली मालिक होंगे। उनके खेतों में हरियाली छाएगी और उनके जीवन में खुशहाली रहेगी। शहरों में कारखाने खूब चलेंगे और तरक्की करेंगे। मिलों-उद्योगों में खुशी से काम करते हुए मजदूर देश को समृद्ध बनाने में जुटे रहेंगे। देश में न किसी के सामने बेरोजगारी की समस्या होगी और न ही भूख किसी की मौत का कारण बनेगी। सबके तन पर कपड़ा होगा और हर किसी के दिल में खुशी भरी होगी।
मेरे सपनों के भारत में छोटे से छोटे गाँव में भी प्राथमिक स्कूल होंगे। बड़े गाँवों और कस्बों में कॉलेज ज्ञान और विज्ञान का प्रकाश फैलाएंगे। हर जगह पुस्तकालय और वाचनालय बनाए जाएंगे। उच्च शिक्षा के दरवाजे सबके लिए खुले रहेंगे। पढ़ाई में औद्योगिक और तकनीकी विषयों को खास महत्व दिया जाएगा। हमारे विद्यालय ज्ञान की देवी सरस्वती के सच्चे मंदिर बन जाएंगे।
मेरे सपनों के भारत में बीमारियों को लोगों के जीवन पर हावी नहीं होने दिया जाएगा। शहरी और ग्रामीण इलाकों में इलाज की उत्तम सुविधाएँ मिलेंगी। गाँव-गाँव में दवाखाने होंगे। गाँव का डॉक्टर किसी ग्रामीण को बेवक्त मरने नहीं देगा।
हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था शानदार होगी। हमारी सेनाएं दुश्मनों को हमारी सीमाओं पर बुरी नज़र डालने नहीं देंगी। देश में कानून का कड़ाई से पालन होगा। चोरों, डाकुओं, तस्करों और कालाबाजारी करने वालों को अपनी गलत कमाई के दरवाजे बंद करने पड़ेंगे। भ्रष्टाचारियों और देशद्रोहियों को कठोर सज़ाएँ देकर उन्हें अपने किए का फल भुगतना होगा।
मेरे सपनों के भारत में सभी देशवासी एकता के सूत्र में बंधे रहेंगे। उनमें प्रांतवाद, भाषावाद तथा धार्मिक संकीर्णता का ज़हर नहीं होगा। सब खुले दिल से देश को सुखी, समृद्ध और शक्तिशाली बनाने में लगे रहेंगे। समाज में ऊँच-नीच, जाति-पाति आदि की दरारें नहीं होंगी। दहेज जैसी खराब प्रथाओं का कहीं नामोनिशान नहीं होगा।
इस तरह मेरे सपनों का भारत एक महान और आदर्श राष्ट्र होगा। पूरा विश्व उससे सीख लेगा। काश! मैं अपने सपनों के भारत को अपनी आँखों से देख सकूँ।
In simple words: मेरा आदर्श भारत ऐसा होगा जहाँ हर कोई खुश और समृद्ध होगा, किसान अपनी जमीन के मालिक होंगे, उद्योग फले-फूलेंगे, और कोई भी भूखा या बेरोजगार नहीं रहेगा। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ सभी के लिए उपलब्ध होंगी, कानून का राज होगा, और लोग एकता से रहेंगे, सभी बुराइयों से मुक्त।
Exam Tip: निबंध लिखते समय, अपने विचारों को स्पष्ट और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें। हर खंड एक नए पहलू पर ध्यान केंद्रित करे, जैसे कि कृषि, शिक्षा, या राष्ट्रीय एकता, ताकि आपका निबंध सुव्यवस्थित लगे और आसानी से समझ में आए।
Question 2. भारत की एक विकट समस्या-जनसंख्या
Answer: [सारी समस्याओं की जड़- जनसंख्या वृद्धि के परिणाम – कारण -नियंत्रण जरूरी- संदेश ।]
भारत को 'स्वराज्य' भले ही मिल गया हो, पर 'सुराज' अब तक नहीं मिला। नौ पंचवर्षीय योजनाएँ लागू हो गईं, पर देश की गिनती आज भी दुनिया के पिछड़े देशों में ही होती है। इसका सबसे बड़ा कारण है – देश की लगातार बढ़ती हुई आबादी। जनसंख्या में हो रही यह बढ़ोत्तरी ही देश की सभी समस्याओं की असल जड़ है।
जनसंख्या की वृद्धि ने देश के विकास को कमजोर कर दिया है। विज्ञान की तरक्की से जो लाभ मिले, वे जनसंख्या की बाढ़ में बह गए। आज़ादी के बाद देश में बड़ी-बड़ी नदियों पर विशाल बाँध बने। सिंचाई की सुविधाओं से देश में हरित क्रांति आई। अनाज का उत्पादन बढ़ा। फिर भी यहाँ सबको भरपेट भोजन नहीं मिल पाता! हमारे बाजार कपड़ों से भरे पड़े हैं, पर सबको शरीर ढकने के लिए कपड़े नहीं मिलते।
शहरों में मकानों की बजाय झोंपड़ियाँ ही ज्यादा हो गई हैं। सड़कों पर चलने के लिए जगह नहीं मिलती। रेलगाड़ियों और बसों में लोग लटककर यात्रा करते हैं और दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं। जंगल खत्म हो रहे हैं।
गर्मियों में पीने के पानी का भारी संकट खड़ा हो जाता है। चोरी, गुंडागर्दी, तस्करी जैसे असामाजिक व्यवहारों का एक मुख्य कारण जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि ही है।
हमारे देश में जनसंख्या विस्फोट के कई कारण हैं। विज्ञान ने यदि हमें विनाश के उपकरण दिए हैं, तो जीवनरक्षक दवाएँ भी दी हैं। महामारियाँ और संक्रामक बीमारियों का अब पहले जैसा प्रभाव नहीं रहा है। अधिकांश रोगों पर पूरी तरह से काबू पा लिया गया है। जीवन की सुविधाएँ भी बढ़ी हैं और स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता भी आ गई है। आयुसीमा बढ़ने तथा मृत्युदर में कमी आने से भी आबादी में बढ़ोत्तरी होती है।
जनसंख्या पर नियंत्रण करना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। मालथूजियन थियरी के अनुसार प्रकृति स्वयं जनसंख्या का संतुलन करती है। युद्ध, दंगे, बीमारियाँ, बाढ़, भूकंप आदि के द्वारा वह बढ़ी हुई आबादी को कम कर देती है। फिर भी हम देशवासियों का कर्तव्य है कि हम जनसंख्या को बेकाबू न होने दें।
इसके लिए परिवार नियोजन के आदर्श को अपनाएं। हमें शादियाँ तय की गई उम्र या उसके बाद ही करानी चाहिए। देश में सुख, शांति और प्रगति के लिए जनसंख्या का सीमित रहना बहुत जरूरी है। पश्चिमी देशों की तरक्की का राज़ वहाँ जनसंख्या का कम होना है। उत्पादन और जनसंख्या में तालमेल रखकर ही हम बुद्धिमान और दूरदर्शी होने का दावा कर सकते हैं।
In simple words: भारत में जनसंख्या की लगातार बढ़ोत्तरी देश की सभी समस्याओं का मूल कारण है, जिससे विकास रुक गया है, अनाज और कपड़ों की कमी है, और पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। इसे नियंत्रित करना बेहद ज़रूरी है।
Exam Tip: जनसंख्या वृद्धि के कारणों और प्रभावों को स्पष्ट रूप से समझाएं। समाधान के रूप में परिवार नियोजन और संतुलित विकास पर ज़ोर दें।
Question 3. बल ही सबका बल
Answer: [पृथ्वी में जल-दुष्प्राप्ति के कारण - परिणाम - प्राप्ति के बाद संग्रह की व्यवस्था – जल ही जीवन -जल के बचाव में समुचित उपयोग - मानव - पशु-पक्षी - वृक्ष – पानी के लिए पर्यावरण सुरक्षा।]
पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसीलिए दयालु प्रकृति ने हमें पृथ्वीवासियों को जल के अनेक स्रोत दिए हैं। कुएं, तालाब, नदियाँ, झीलें, झरने, प्रपात आदि जल के आसानी से मिलने वाले स्रोत हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि जल का सबसे बड़ा स्रोत वर्षा ही है। अन्य सभी स्रोत वर्षा के पानी पर ही निर्भर करते हैं।
जब वर्षा नहीं होती तो जल के स्रोत सूखने लगते हैं। तालाब भी सूख जाते हैं। कुओं में पानी का स्तर कम हो जाता है। नदियाँ भी सूख जाती हैं। लगातार अकाल पड़ने पर पानी के लिए हाहाकार मच जाता है।
जल की कमी जीवन की सामान्य व्यवस्था को बिगाड़ देती है। वर्षा के बिना खरीफ की फसल नहीं हो पाती। सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध न होने से रबी की फसल भी नहीं हो पाती। फल तथा सब्जियाँ की पैदावार भी बहुत घट जाती है, अनाज, फल तथा सब्जियों के दाम बढ़ जाते हैं। पीने का पानी भी बड़ी कठिनाई से मिल पाता है। सरकार टैंकरों द्वारा गाँवों तथा शहरों में पानी की आपूर्ति करती है। पानी की कमी से जीवन बहुत परेशान करने लगता है। घास-चारे की कमी से पशु मर जाते हैं। दूध का दाम भी बहुत बढ़ जाता है।
बारिश न होने से पानी की कमी की बात तो समझ में आती है, परंतु कभी-कभी तो काफी वर्षा होने पर भी जल का अभाव देखा जाता है! इसका कारण है – वर्षा से प्राप्त जल का ठीक से जमाव न करना। हमारे यहाँ नदियों पर बाँधों की कमी है। बड़े और गहरे तालाब भी कम हैं। पानी की बर्बादी भी पानी की कमी पैदा करती है। यदि प्रकृति द्वारा दिए गए जल का उचित संग्रह किया जाए तो हर साल होने वाले जलसंकट को बहुत हद तक टाला जा सकता है।
एक बात तो स्पष्ट है कि जल ही जीवन है। जल के बिना न प्यास बुझ सकती है, न खाना बन सकता है, न नहाया और साफ किया जा सकता है और न अनाज का उत्पादन हो सकता है। जल न हो तो बिजली का उत्पादन भी नहीं हो सकता, यानी उद्योग-धंधे भी नहीं चल सकते। इसीलिए जल को 'जीवन' कहा गया है।
आज पर्यावरण की सुरक्षा पर बहुत जोर दिया जा रहा है। पर्यावरण स्वच्छ होना चाहिए। वह हरा-भरा और सुंदर होना चाहिए। क्या जल के बिना यह संभव है? "शेर और हाथी ताकतवर जानवर माने जाते हैं। इंसान भी खुद को कम शक्तिशाली नहीं समझता! क्या जल के बिना इनका बल कायम रह सकता है? जल से ही सबको शक्ति और साहस मिलता है। इसलिए जल ही सबका बल है। हमें इस जल का समझदारी से उपयोग करना चाहिए।
In simple words: पानी के बिना जीवन संभव नहीं है। बारिश की कमी, पानी की बर्बादी और सही संग्रह की कमी से जल संकट पैदा होता है, जिससे खेती और पशुधन पर बुरा असर पड़ता है। पानी का समझदारी से उपयोग और संरक्षण करना सभी के लिए ज़रूरी है।
Exam Tip: जल संरक्षण के महत्व को समझाते हुए उसके विभिन्न स्रोतों और दुष्परिणामों का उल्लेख करें। जल ही जीवन है - इस कथन पर आधारित तर्क दें।
Question 4. पुरुषार्थ ही प्रारब्ध है
Answer: [प्रारंभ-अर्थ – महत्त्व -पुरुषार्थरहित जीवन – पुरुषार्थ और भाग्य – उदाहरण – उपसंहार।]
पुरुषार्थ की महिमा को कौन नहीं जानता? जंगल में जानवरों के समान बर्बर जीवन बिताने वाला मनुष्य आज सभ्यता और संस्कृति के शिखर पर बैठकर अपने पुरुषार्थ का ही गुणगान कर रहा है।
पुरुषार्थ का अर्थ है बुद्धि द्वारा संचालित मेहनत या – उद्योगशीलता। पुरुषार्थी व्यक्ति बुद्धिमान, साहसी, आलस्यरहित और : कर्तव्यपरायण होता है। वह ऐसा कर्मयोगी होता है जिसमें सूझ-बूझ की कमी नहीं होती।
'तरक्की और विकास के इतिहास की रचना पुरुषार्थ द्वारा होती है। इस पूरे संसार में पुरुषार्थ का ही बोलबाला है। बिना पुरुषार्थ के कोई कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। शेर को भी अपने भोजन के लिए शिकार करना पड़ता है। हिरन अपने आप उसके मुंह में नहीं पहुँच जाता। पुरुषार्थ के पेड़ पर ही सफलता के फूल खिलते हैं।
पुरुषार्थरहित जीवन भी कोई जीवन है! कहते हैं कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है। जिसमें पुरुषार्थ का तेज नहीं, वह जिंदादिल कैसे हो सकता है। ऐसे आलसी, निष्क्रिय और काहिल व्यक्ति को न परिवार में कोई भाव पूछता है, न समाज में उसे कोई स्थान मिलता है। कोई भी कला और विद्या उसके पास नहीं फटक सकती। वह धरती पर भार के समान है।
पुरुषार्थ और भाग्य में कौन बड़ा है? पुरुषार्थवादी मानते हैं कि मनुष्य को सुख, संपत्ति और सत्ता पुरुषार्थ के बल पर ही मिलती है। उनका कहना है कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। मेहनती व्यक्ति के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। महान पुरुषार्थवादी नेपोलियन कहता था 'असंभव' शब्द उसके 'शब्दकोश' में ही नहीं है। इसके विपरीत भाग्यवादी मानते हैं कि मनुष्य की सफलता-असफलता सब भाग्य के अधीन है। भाग्य ही विजयश्री दिलाता है और वही हार का कारण भी बनता है। यदि किसी के भाग्य में समृद्धि का योग हो तो वह उसे बिना कोशिश के भी मिल सकती है।
संसार में भाग्य और पुरुषार्थ दोनों के उदाहरण मिलते हैं। लॉटरी लग जाने पर लाखों रुपये मिलना भाग्य का फल है। उत्तराधिकार में बहुत सारी संपत्ति की प्राप्ति भी भाग्य के बल को ही प्रभावित करती है। ऐसे उदाहरणों के बावजूद विश्व का इतिहास मानव के मजबूत पुरुषार्थ का इतिहास है। विज्ञान के अद्भुत आविष्कार मानवीय पुरुषार्थ के ही जीते-जागते चमत्कार हैं। राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, महात्मा गांधी आदि नामों की महिमा के पीछे उनके पुरुषार्थ की ही चमक है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पुरुषार्थ में ही जीवन का गौरव है। पुरुषार्थ वह पारसमणि है जिसके स्पर्श से सामान्य व्यक्ति का जीवन भी सोने के समान बहुत कीमती बन जाता है।
In simple words: पुरुषार्थ का अर्थ है मेहनत और उद्यम, जिससे व्यक्ति बुद्धिमान और साहसी बनता है। यह सफलता की जड़ है, और भाग्यवादी होने के बजाय, अपने कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना ज़रूरी है, क्योंकि पुरुषार्थ ही जीवन को गौरवपूर्ण बनाता है।
Exam Tip: पुरुषार्थ और भाग्य के संबंध को स्पष्ट करें, यह बताते हुए कि कैसे पुरुषार्थ व्यक्ति के जीवन में सफलता और सम्मान लाता है, और ऐतिहासिक उदाहरणों से इसे पुष्ट करें।
Question 5. गाय – भारतीय संस्कृति का प्रतीक
Answer: [प्रस्तावना -गाय के प्रति लोकभावना – गोदुग्ध की महिमा – धन-सम्पत्ति के रूप में गाय -कृषि-कार्य में गाय का महत्त्व – गाय की उपेक्षा उचित नहीं।]
बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है, परन्तु गाय भारतीय संस्कृति से जुड़ी हुई है। प्राचीन काल से ही भारतीय जीवन में गाय की महत्ता सभी मानते रहे हैं। वृक्षों में जो महिमा कल्पवृक्ष की है, गायों में वही कामधेनु की है।
भारतवासी गाय को माँ के समान पूज्य मानते हैं। प्रत्येक भारतीय किसान चाहता है कि उसके घर में गाय अवश्य रहे। गाय को घास खिलाना एक पुण्य-कार्य माना जाता है। एक समय था जब रसोई की पहली रोटी गाय के ग्रास के रूप में माँ को अर्पित की जाती थी। सौभाग्यशाली महिलाएँ गाय-पूजा करके अपने परिवार के कल्याण की कामना करती थीं। दरवाजे पर बंधी गाय आर्य सभ्यता की पहचान बन गई थी।
गाय न हो तो घर-परिवार सूना लगता था। गाय के दूध को माँ के दूध के समान ही महत्त्व दिया जाता है। वह जितना पौष्टिक होता है, पचने में उतना ही हल्का होता है। उसमें शरीर को पोषण देनेवाले सभी तत्व होते हैं। बच्चों के लिए तो वह अमृत के समान ही है। गोपाल श्रीकृष्ण गाय का ही दूध पीते थे और उसी का मक्खन खाते थे।
प्राचीन काल में गाय को संपत्ति माना जाता था। गो-धन की बड़ी महिमा थी। ऋषियों के आश्रम में हजारों गायें रहती थीं। गुरुकुल की शिक्षा में विद्यार्थियों को गो-सेवा भी करनी पड़ती थी। वे गायों को जंगल में चराने ले जाते थे। राजा भी ऋषियों को गायों का दान करते थे। कन्या के विवाह में सोने से जड़े सींगों वाली गायें दहेज के रूप में दी जाती थीं।
भारत कृषि-प्रधान देश है। खेत जोतने के लिए यहाँ हजारों सालों से बैलों का ही उपयोग किया जाता था। बैलगाड़ी तो आज भी गाँवों का सस्ता और सुलभ साधन है। इस तरह गो-वंश हमेशा ही भारतीय जीवन का अभिन्न अंग रहा है।
आज हमारी संस्कृति का स्वरूप बाहर से भले ही बदल गया हो; पर भीतर से वह लगभग पहले जैसा ही है। गाय के प्रति हमारी आस्था आज भी बनी हुई है; परन्तु केवल आस्था ही पर्याप्त नहीं होती। गाय के प्रति जो जागरूकता और जिम्मेदारी होनी चाहिए, वह हम में दिखाई नहीं देती। भारत जैसे गोपालक देश में गाय की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।
In simple words: गाय भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है, जिसे माँ के समान पूजा जाता है और यह कृषि, धन, और पोषण का आधार रही है। इसकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके महत्व को समझना और संरक्षित करना चाहिए।
Exam Tip: गाय के सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व पर ध्यान केंद्रित करें, जिसमें उसके धार्मिक पहलू, कृषि उपयोगिता और दूध के पोषण मूल्य को शामिल किया जाए।
Question 6. यदि मैं शिक्षामंत्री होता
Answer: [शिक्षामंत्री बनना एक सौभाग्य – सस्ती और उपयोगी शिक्षा – उचित माध्यम – पाठ्यपुस्तक एवं परीक्षा-प्रणाली में सुधार -अन्य सुधार – मेरा आदर्श।]
मनुष्य के जीवन में शिक्षा का बहुत महत्त्व है। अच्छी शिक्षा प्रणाली पर ही समाज और देश की उन्नति का आधार है। शिक्षा विभाग की सारी जिम्मेदारी शिक्षामंत्री पर होती है। इसलिए यदि मैं शिक्षामंत्री होता तो स्वयं को, सचमुच, बड़ा भाग्यशाली मानता, क्योंकि इससे मुझे देशसेवा का एक बड़ा अवसर प्राप्त होता।
यदि मैं शिक्षामंत्री होता तो मेरा सबसे पहला कार्य होता – आज की शिक्षा को अधिक से अधिक उपयोगी और कम से कम महंगी बनाना। आजकल एम.ए. और एम.एससी. जैसी डिग्रियाँ प्राप्त करने के बाद भी विद्यार्थी नौकरी के लिए दर-दर भटकते रहते हैं या बेकार बैठे रहते हैं! कभी-कभी उन्हें अपनी आजीविका के लिए ऐसे काम भी करने पड़ते हैं, जिनसे उनकी शिक्षा का कोई संबंध नहीं होता।
इसके परिणामस्वरूप उनका ज्ञान धीरे-धीरे मिट्टी में मिल जाता है और कई सालों की तपस्या पर पानी फिर जाता है। मैं ऐसा कभी न होने देता। मैं तकनीकी, कंप्यूटर शिक्षण और औद्योगिक शिक्षा पर अधिक ध्यान देता। हस्तकला, चित्रकला, संगीत, फोटोग्राफी तथा बागवानी को भी मैं शिक्षा में उचित स्थान देता। गरीब प्रतिभाशाली छात्रों के लिए मैं छात्रवृत्तियों की व्यवस्था करता। मैं शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बनाने का आयोजन करता।
मैं शिक्षा के माध्यम के लिए मातृभाषा को ही सबसे उचित समझता हूँ। अतः यदि मैं शिक्षामंत्री होता तो सभी पाठ्यपुस्तकें मातृभाषा में ही तैयार करवाता। मैं विद्वानों द्वारा विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान तथा इंजीनियरिंग आदि की पुस्तकें मातृभाषा में लिखवाता अथवा दूसरी भाषाओं की पुस्तकों के सरल, सुबोध अनुवाद कराकर उन्हें प्रकाशित करवाता।
मातृभाषा के साथ ही मैं राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को तथा अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में अंग्रेजी को उचित स्थान देता। मैं पाठ्यपुस्तकों में ऐसे विषय रखवाता, जो ज्ञानप्रद, रोचक और राष्ट्रीय भावनाओं का विकास करनेवाले हों, जिनके अध्ययन से विद्यार्थी भारतीय संस्कृति को ठीक तरह से समझ सकें। पुस्तकों का मूल्य कम से कम रखता, जिससे गरीब से गरीब विद्यार्थी भी उन्हें आसानी से खरीद सकें। विद्यार्थी को परीक्षा में सफलता का प्रमाणपत्र उसकी वार्षिक प्रगति, स्वास्थ्य, चरित्र तथा सामान्य ज्ञान के आधार पर दिया जाता।
मैं स्कूलों की तरह कॉलेजों में भी गणवेश पहनना ज़रूरी कर देता। इससे न केवल बराबरी पैदा होती, किंतु आज की-सी फैशनपरस्ती पर भी रोक रहती। लड़कियों के पाठ्यक्रम में गृहविज्ञान, शिशुपालन तथा अन्य स्त्रियों के लिए उपयोगी विषयों को भी महत्त्व देता। स्कूलों में प्रवेश के लिए 'डिपॉज़िट' या 'डोनेशन' लेने की प्रथा को सख्ती से बंद करवाता।
इस प्रकार शिक्षामंत्री बनने पर मैं मौजूदा शिक्षा-प्रणाली को ऐसे रूप में ढालता, जिससे देश को अच्छे नागरिक, अच्छे अध्यापक, अच्छे नेता, कुशल डॉक्टर, चतुर गृहिणियाँ और सच्चे सपूत मिल सकें। क्या मैं अपने जीवन में इन इच्छाओं को पूरा कर पाऊँगा?
In simple words: अगर मैं शिक्षामंत्री होता, तो मेरा मुख्य लक्ष्य शिक्षा को सस्ता, उपयोगी और मातृभाषा में बनाना होता। मैं तकनीकी शिक्षा पर ज़ोर देता, गरीब छात्रों के लिए छात्रवृत्तियाँ सुनिश्चित करता और परीक्षा प्रणाली को बेहतर बनाता, जिससे हर बच्चा एक बेहतर नागरिक बन सके।
Exam Tip: अपने निबंध में शिक्षा प्रणाली के विभिन्न पहलुओं पर विचार करें, जैसे सस्ती शिक्षा, मातृभाषा का महत्व, तकनीकी शिक्षा, और परीक्षा प्रणाली में सुधार, ताकि आपका दृष्टिकोण समग्र और दूरदर्शी लगे।
Question 7. देश के प्रति युवकों का कर्तव्य
Answer: [प्रस्तावना – युवक ही देश के रक्षक - देश की प्रगति के आधार -राष्ट्र-निर्माण के अन्य कार्य – उपसंहार।]
युवक देश के प्राण होते हैं। देश को अपने युवकों से बहुत उम्मीदें होती हैं। इसलिए युवकों को देश के प्रति अपने कर्तव्यों का ज्ञान ज़रूर होना चाहिए। मातृभूमि की सुरक्षा की जिम्मेदारी युवकों पर ही होती है। इसलिए युवकों का कर्तव्य है कि वे अपनी पसंद के अनुसार थल, जल या वायुसेना में भर्ती हों। वे युद्ध-कौशल में निपुण बनें।
आजादी की लड़ाई में अनेक युवकों ने अपना बलिदान दिया था। भगतसिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ आदि शहीदों ने अपने साहस और देशप्रेम से भारतवासियों में आजादी की चाहत भर दी थी। अब देश के स्वाभिमान और गौरव की रक्षा के लिए भी युवकों को ही आगे आना होगा।
देश की प्रगति युवकों पर निर्भर है। विज्ञान, कला, पढ़ाई आदि क्षेत्रों में युवकों को ही देश की ज़रूरतें पूरी करनी पड़ेंगी। आज हमारे देश में खाद्यान्न की कमी है। देश के अनेक हिस्सों में पीने के पानी की समस्या है। सड़कों की ज़रूरत है। बिजली उत्पादन बढ़ाना है। इन सबके लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी का ज्ञान ज़रूरी है। यह जानकर हमारे युवक इस पिछड़े हुए देश को विकास की नई दिशाएँ दिखा सकते हैं। कृषि, उद्योग, व्यापार में आधुनिक तरीके अपनाकर वे देश में प्रगति का नया उजाला ला सकते हैं।
आज के जीवन में राजनीति बहुत महत्त्वपूर्ण बन गई है। देश के युवकों को राजनीति में भाग लेकर उसे साफ-सुथरा रूप देना चाहिए। आज हमारे यहाँ राजनीति और आर्थिक क्षेत्र में बहुत भ्रष्टाचार फैला हुआ है। प्रशासन में भ्रष्ट तत्व घुस गए हैं। चुनावों में भी गड़बड़ी होती है। देश से ये सारे बुरे काम युवक ही दूर कर सकते हैं। शासन को कल्याणकारी रूप देना युवकों के ही बस की बात है।
समाज भी अपनी समस्याओं के हल के लिए युवकों का ही मुँह ताकता है। आज ज़रूरत है ऐसे समझदार युवाओं की जो समाज को संकीर्णताओं से मुक्त करके उसे विशाल और व्यावहारिक सोच दें। वे जातिप्रथा को खत्म करें। समाज में ऊँच-नीच का भेदभाव दूर करें। वे बिना दहेज लिए विवाह करने का व्रत लें और इस प्रकार देश को दहेज के दानव से मुक्त करें। वे सिनेमा और दूरदर्शन के माध्यम से समाज को नई सोच दें। वे गाँवों में शिविरों का आयोजन करें और उनके द्वारा सामाजिक समस्याओं का समाधान करें।
इस प्रकार युवक चाहें तो अनेक तरीकों से देश की सेवा कर सकते हैं। वे जुआ, शराब, चोरी, बेईमानी से बचें और अपनी शक्तियों का देश के विकास में सदुपयोग करें। वे राम, कृष्ण, अर्जुन के समान वीर बनकर देश के बुरे तत्वों का नाश करें। वे बुद्ध और महावीर के समान देश को सही रास्ते पर ले चलें और गांधी के समान आत्मशक्ति से संपन्न बनें। वे अच्छे नेता, सेनापति, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर और कलाकार बनकर देश के विकास में अपना योगदान करें।
In simple words: युवक देश के रक्षक हैं और उनकी प्रगति के आधार हैं। उन्हें राष्ट्र की रक्षा, विकास, विज्ञान, कला, शिक्षा और राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्हें सामाजिक बुराइयों को दूर करने और देश के विकास में योगदान देने के लिए अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना चाहिए।
Exam Tip: निबंध में युवकों के विभिन्न कर्तव्यों को स्पष्ट करें, जैसे देश की रक्षा, सामाजिक सुधार, वैज्ञानिक प्रगति, और राजनीतिक भागीदारी। अपने बिंदुओं को सहायक उदाहरणों से पुष्ट करें।
Question 8. प्रदूषण-एक विकट समस्या
Answer: [चारों ओर प्रदूषण ही प्रदूषण – प्रदूषण के प्रकार – प्रदूषण के कारण – प्रदूषण के दुष्परिणाम – प्रदूषण कम करने के उपाय – संदेश।]
आज हम प्रदूषण की दुनिया में रह रहे हैं। जल, स्थल और आकाश पर प्रदूषण के दानव ने अपना अधिकार जमा लिया है। हर जगह प्रदूषण के कारण हमारा जीवन एक खतरनाक जाल में फंसकर रह गया है।
प्रदूषण एक बहुमुखी दानव है। वह वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण और ध्वनि-प्रदूषण के रूप में अपनी जीभें लपलपा रहा है। हम गंदे वायुमंडल में साँस ले रहे हैं। पीने के लिए लोगों को स्वच्छ, निर्मल पानी नहीं मिल रहा है। दूषित पानी और कीटनाशक दवाओं के कारण अनाज की फसलें भी दूषित हो रही हैं। आधुनिक यंत्रों का शोर हमारे कानों के पर्दे फाड़ रहा है। प्रदूषण के इन विविध रूपों ने इस सुंदर सृष्टि के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।
प्रदूषण की इस विकट समस्या के मूल में औद्योगिक क्रांति और बढ़ती हुई आबादी है। मिलों, कारखानों और वाहनों से निकलने वाला धुआँ वातावरण को जहरीला बना रहा है। गैस प्लांटों से गैस रिसने की दुर्घटनाएँ पर्यावरण को खतरनाक बना रही हैं। औद्योगिक संस्थानों से निकलने वाला रासायनिक कूड़ा-कचरा तथा शहर की गटरों का पानी नदियों, झीलों तथा समुद्रों के पानी में ज़हर घोल रहा है।
रेलगाड़ियों, विमानों, मोटरों के हॉर्न; रेडियो, दूरदर्शन तथा लाउड स्पीकरों से निकलने वाली आवाजें ध्वनि-प्रदूषण को बढ़ा रही हैं। खेल-कमेंट्रियाँ, पटाखे तथा बम-विस्फोट भी ध्वनि-प्रदूषण की वृद्धि में योगदान दे रहे हैं। शहरों की गंदी झोपड़पट्टियाँ, मशीनीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति और वनों तथा वृक्षों का अत्यधिक विनाश प्रदूषण के मुख्य कारण हैं।
हर तरह का प्रदूषण जीवन का शत्रु है। वायु प्रदूषण के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जा रही है। इससे पृथ्वी के पर्यावरण के ऊपर रहने वाला ओज़ोन गैस का सुरक्षा चक्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। पृथ्वी पर के तापमान के अनियमित होने से ऋतुओं का परिवर्तन-चक्र भी गड़बड़ा रहा है। वायु तथा जल के प्रदूषण से तरह-तरह के घातक रोग फैल रहे हैं। खेती की पैदावार नष्ट हो रही है। धरती का उपजाऊपन घट रहा है। ध्वनि प्रदूषण के कारण मानव बहरेपन, अनिद्रा, रक्तचाप तथा मानसिक रोगों का शिकार बन रहा है।
प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त होना संभव नहीं है, पर उसे कम किया जा सकता है। इसके लिए लोगों में जागरूकता पैदा करनी होगी। वनों के विनाश को रोकना होगा और वृक्षारोपण की प्रवृत्ति में तेजी लानी होगी। यदि हम समझदारी से काम लें, जनसंख्या की वृद्धि-दर कम कर सकें और यंत्रों के उपयोग पर अंकुश रखें तो प्रदूषण की समस्या से बहुत हद तक निपट सकते हैं। यदि मानवजाति सुख-शांति से जीना चाहती है, तो उसे प्रदूषण के जहरीले साँपों को पिटारी में बंद करना ही होगा।
In simple words: प्रदूषण एक गंभीर समस्या है जो वायु, जल और ध्वनि को प्रभावित करती है, जिससे हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान होता है। इसके मुख्य कारण औद्योगीकरण, बढ़ती जनसंख्या और वनों का विनाश हैं। इस समस्या को कम करने के लिए जागरूकता, वृक्षारोपण और यंत्रों के नियंत्रित उपयोग की ज़रूरत है।
Exam Tip: प्रदूषण के विभिन्न प्रकारों, उनके कारणों, प्रभावों और समाधानों को स्पष्ट रूप से लिखें। प्रदूषण कम करने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों पर ज़ोर दें।
Question 9. एक फटी पुस्तक की आत्मकथा
Answer: [परिचय – जन्म – जीवनयात्रा – कुछ अनुभव – अंतिम अभिलाषा।]
बहुत दिनों से मेरी इच्छा थी कि मैं किसी के आगे अपना मन खोलूँ। अच्छा हुआ, मैं आप जैसे दयालु व्यक्ति के हाथों में आई और मुझे अपने मन की दो बातें कहने का अवसर मिला।
मेरे जन्म की कहानी बड़ी दिलचस्प है। सबसे पहले एक लेखक ने बड़े परिश्रम से मुझे लिखा। इसके बाद मुझे एक बड़े प्रेस में भेजा गया। मशीनों की खट्खट् ने मेरे कान बहरे कर दिए। न जाने कितने अक्षरों को जोड़-जोड़कर मुझे नया रूप दिया गया। इसके बाद मुझे मशीनों के नीचे कुचला गया। उस समय की पीड़ा याद आते ही आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फिर तो मेरी देह में सुइयां लगाई गईं और मरहम-सी चीज़ से मुझ पर मालिश की गई। इसके बाद मेरे रूप का क्या कहना! फिर एक दुकान की अलमारी में मुझे रखा गया।
आखिर, एक दिन मैंने उस दुकान से विदा ली। मेरे मालिक ने मुझे बड़े जतन से रखा। वह मुझे बड़े ध्यान से पढ़ता और हर पन्ने पर कुछ निशान करता जाता था। कुछ दिन उसके यहाँ रहने पर मैं उसके एक दोस्त के पास चली गई। उसने तो मुझे अपना ही बना लिया। उसने अपनी पेन्सिल से उन जगहों पर निशान लगा दिए, जो उसे बहुत पसंद आए। मैंने भी सोचा, चलो कोई कद्र करने वाला तो मिला।
पर दुर्भाग्य से एक दिन वह मुझे बस में भूल गया। तब से मेरी खराब किस्मत का आरंभ हुआ। मैं एक बुरे व्यक्ति के पल्ले पड़ी। उसने मेरे दो-चार पन्ने पढ़े, पर जब कुछ मजा न आया तो उसने मुझे एक ओर पटक दिया। पर उसकी पत्नी शायद अधिक पढ़ी-लिखी और समझदार थी। कुछ पंक्तियों को पढ़ते ही उसने मुझे अपने दिल से लगा लिया। लेकिन अब दुर्भाग्य मेरे पीछे पड़ गया था। एक दिन मैं एक रद्दी वाले के यहाँ पहुँच गई। उसने मेरा सुंदर मुखपृष्ठ फाड़कर अलग कर दिया। हाय! कितना निर्दयी था वह! पर मेरी किस्मत अच्छी थी। आपने मुझे उस नरक से बचाकर मुझ पर बड़ा उपकार किया है।
दुनिया में रहकर मैंने सूखे और पत्थर जैसे कठोर दिल वाले लोग देखे हैं और उन लोगों का प्यार भी पाया है, जो फूलों की सुंदरता और चाँद की मधुरता को अपने दिल में बसाए रहते हैं। कहीं मुझे शीतल छाया के आनंद का अनुभव हुआ है, तो कहीं धूप की जलन का। आज मैं बहुत खुशनसीब हूँ, आपके पास आकर।
मैंने अपनी शक्ति के अनुसार मनुष्य की सेवा की, उसे आनंद और ज्ञान दिया है। आगे भी ऐसी ही सेवा करती रहूँगी। पर अब मेरी हड्डियाँ ढीली हो गई हैं। मेरे पन्ने-पन्ने पर स्याही के दाग, पेन्सिल की लकीरें और व्यक्तियों के नाम हैं। फिर भी यदि मेरे इस जीवन से आपका कुछ भला हो सका तो मैं अपने आपको धन्य समझूँगी।
In simple words: एक फटी पुस्तक अपनी कहानी सुनाती है, जिसमें उसका जन्म, एक लेखक के परिश्रम से, फिर प्रेस में दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना शामिल है। वह अलग-अलग मालिकों के पास रही, कुछ ने उसे संजोया तो कुछ ने उपेक्षित किया। अंत में, वह फटने के बावजूद अपनी उपयोगिता और ज्ञान देने के अनुभव पर गर्व करती है।
Exam Tip: आत्मकथा लिखते समय, कहानी को प्रथम पुरुष में लिखें और पुस्तक के अनुभवों, भावनाओं और यात्रा का वर्णन जीवंत भाषा में करें। प्रमुख घटनाओं और उनके प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।
Question 10. मेरा प्रिय लेखक
Answer: [परिचय – साहित्य का रूप – कहानियाँ और उपन्यास – विशेषताएं – अन्य बातें – प्रिय होने का कारण – उपसंहार।]
हिन्दी में अनेक महान लेखक हैं। सबकी अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। उन्होंने उत्तम कोटि के साहित्य का निर्माण कर सारे संसार में नाम कमाया है, किंतु इन सबमें मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं हिन्दी कथा साहित्य के अमर सम्राट मुंशी प्रेमचंदजी।
प्रेमचंदजी लोकजीवन के कहानीकार हैं। किसानों, हरिजनों और वंचितों के जीवन पर उन्होंने अपनी कलम चलाई। किसानों के दुःख, उनके जीवन-संघर्ष, उन पर जमींदारों द्वारा होने वाले जुल्म आदि को स्वाभाविक ढंग से पढ़े-लिखे समाज के सामने रखा। साथ ही उन्होंने भारतीय किसानों के अंधविश्वास, अशिक्षा, करुणा, प्रेम और सहानुभूति के भी वास्तविक चित्र प्रस्तुत किए। इस प्रकार प्रेमचंदजी का साहित्य भारत के ग्रामीण जीवन का आइना है।
प्रेमचंदजी की कहानियाँ बहुत सरल, रसदार और मर्मस्पर्शी होती हैं। 'कफन', 'बोध', 'ईदगाह', 'सुजान भगत', 'नमक का दारोगा', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'बड़े घर की बेटी', 'दूध का दाम', 'पूस की रात' आदि अनेक कहानियों में प्रेमचंदजी की स्वाभाविक और रोचक शैली के दर्शन होते हैं। उनके उपन्यास भी लाजवाब हैं। 'गोदान' तो किसानों के जीवन का महाकाव्य ही है। 'गबन' में मध्यम वर्ग के समाज का मर्मस्पर्शी चित्र अंकित हुआ है। 'रंगभूमि', 'सेवासदन', 'निर्मला' आदि उपन्यासों ने प्रेमचंदजी और उनकी कला को अमर बना दिया है। सचमुच, प्रेमचंदजी के साहित्य को पढ़ने से सद्गुणों और अच्छे संस्कारों का विकास होता है।
प्रेमचंदजी का चरित्र-चित्रण अनोखा है। कथोपकथन भी बहुत स्वाभाविक और सुंदर हैं। चलती-फिरती मुहावरेदार भाषा उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। गांधीजी के विचारों का प्रेमचंदजी पर बड़ा भारी असर पड़ा है। सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन ने उनकी रचनाओं को काफी प्रभावित किया है।
प्रेमचंदजी के साहित्य में राष्ट्रीय जागरण का महान संदेश है, हमारे सामाजिक जीवन के आदर्शों का निरूपण है। देशप्रेम के आदर्शों की झलक है। गुलामी का विरोध और राष्ट्र को उन्नत बनाने की प्रेरणा है। उनकी कलम जाति-पाँति या ऊंच-नीच के भेदभाव तथा प्रांतीयता आदि सामाजिक बुराइयों को दूर करने की सदा कोशिश करती रही। साहित्य-सृजन द्वारा वे हिन्दू-मुस्लिम की एकता के लिए हमेशा प्रयास करते रहे। इस प्रकार साहित्यकार के साथ ही साथ वे बहुत बड़े समाज-सुधारक भी थे। स्वतंत्रता-आंदोलन के दिनों में उनकी कलम ने तलवार का काम किया।
लोकजीवन के ऐसे महान कहानीकार और सच्चे साहित्यकार प्रेमचंदजी यदि मेरे प्रिय लेखक हों तो इसमें आश्चर्य ही क्या।
In simple words: मुंशी प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक हैं क्योंकि उनकी कहानियाँ और उपन्यास ग्रामीण जीवन, किसानों और वंचितों की सच्चाई को दर्शाते हैं। उनकी सरल, मर्मस्पर्शी भाषा और राष्ट्रीय भावनाओं को जगाने की क्षमता उन्हें अद्वितीय बनाती है, साथ ही वे समाज सुधार के भी प्रबल समर्थक थे।
Exam Tip: अपने प्रिय लेखक के बारे में लिखते समय, उनकी रचनाओं, लेखन शैली, और समाज पर उनके प्रभाव का उल्लेख करें। उदाहरणों के साथ अपने बिंदुओं को समझाएं।
Question 11. राष्ट्रीय एकता के उपाय
अथवा
भारत की एकता की समस्या
Answer: [भारत में एकता का रूप - आज की स्थिति -एकता का महत्त्व – एकता न होने से हानि – राष्ट्रीय एकता कायम रखने के उपाय – देशवासियों की समझदारी।]
भारत विविधता में एकता प्रकट करने वाला अनोखा देश है। अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, संप्रदायों और जातियों के बावजूद भारत में सांस्कृतिक एकता का कभी अभाव नहीं रहा। भारत की भौगोलिक स्थिति भी इसे एक राष्ट्र बनाए रखने में बड़ी सहायक रही। आज तो भारत में एक लोकतांत्रिक शासन पद्धति है। हमारा एक राष्ट्र-ध्वज, एक राष्ट्र-गीत, एक मुद्रा और एक केंद्रीय सरकार है।
सारा संसार भारत को एक स्वतंत्र और सार्वभौम राष्ट्र मानता है। आज कुछ स्वार्थी तत्व देश की एकता को तोड़ना चाहते हैं। धर्म, भाषा या क्षेत्रीयता के नाम पर वे देश को बांटने का प्रयास कर रहे हैं। इन देशद्रोही लोगों ने बरसों तक कश्मीर में हमारे भाईचारे को हानि पहुंचाई। देश के पूर्वी प्रांतों में ये ही लोग देश के दुश्मन हैं। ये नहीं चाहते कि भारत आगे बढ़े और सुखी तथा समृद्ध देश बने।
एकता ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है। वह हमारी असली पूंजी है। वह राष्ट्र का प्राण है। एक होकर ही हम देश की योजनाओं को पूरा कर सकते हैं। देश की एकता ही कृषि, उद्योग तथा विज्ञान के क्षेत्र में हमारी प्रगति के द्वार खोल सकती है। हमारी एकता की शक्ति देखकर दुश्मन हम पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सकते।
एकता न होने पर भारत एक राष्ट्र होने के गौरव से वंचित हो जाएगा। एकता न होने के कारण हम सदियों तक विदेशियों की अधीनता में जीते रहे। शकों, मंगोलों, मुगलों, अंग्रेजों, फ्रांसीसियों आदि ने हमारी फूट का पूरा लाभ उठाया। उन्होंने यहाँ अपने राज्य स्थापित किए। फलस्वरूप देश कमजोर होता गया। भला हो उन देशभक्त क्रांतिकारियों और नेताओं का, जिन्होंने अनेक कष्ट सहकर तथा कुर्बानियाँ देकर इसे स्वतंत्रता दिलाई।
इतिहास के इस सबक को हम कभी नहीं भूल सकते। राष्ट्रीय एकता कायम रखने के लिए हमें छोटे-मोटे झगड़े भूलने होंगे। हमें क्षेत्रवाद की भावना छोड़नी होगी। क्षेत्रीय हितों को राष्ट्रीय हितों पर कुर्बान करना होगा। भाषावाद, संप्रदायवाद और जातिवाद को हमेशा के लिए दफना देना होगा। अखबार, रेडियो, दूरदर्शन, शिक्षा आदि राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में काफी सहयोग दे सकते हैं।
एकता तो राष्ट्र की रीढ़ है, भारतमाता की शान है। इसलिए हम मिल-जुलकर सहयोगपूर्वक रहें। हममें मतभेद भले हों, पर मनभेद कभी न हों। भारत के सभी राज्य अपने को देश रूपी शरीर का अंग मानें, तो राष्ट्रीय एकता का आदर्श सिद्ध हो सकता है।
In simple words: भारत की विविधता में एकता इसकी ताकत है, लेकिन स्वार्थी तत्व इसे तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। एकता ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है, जो प्रगति और सुरक्षा सुनिश्चित करती है। इसे बनाए रखने के लिए हमें क्षेत्रीयता, भाषावाद और संप्रदायवाद को छोड़कर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी होगी।
Exam Tip: राष्ट्रीय एकता के महत्व को स्पष्ट करें और उन कारकों पर ध्यान केंद्रित करें जो इसे कमजोर करते हैं। एकता बनाए रखने के लिए ठोस उपाय सुझाएं, जैसे कि संचार माध्यमों का उपयोग और स्वार्थी हितों को छोड़ना।
Question 12. वृक्ष ही जीवन है अथवा वृक्ष ही हमारे मित्र हैं
Answer: [वृक्ष – मनुष्य के लिए – वृक्षारोपण एक पुण्य कार्य -वृक्षारोपण के लाभ-वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टि से महत्त्व – उपसंहार।]
वृक्ष सदा से ही मनुष्य के दोस्त रहे हैं। वे प्रकृति की उपकार भावना को प्रकट करते हैं। उनसे मनुष्य को बहुत कुछ मिलता है। वे मानव-जीवन के आवश्यक अंग हैं। इसीलिए प्राचीन काल से हमारे यहाँ वृक्षारोपण की बड़ी महिमा रही है। देश में वृक्षों की अधिकता, देश के सुख, सौभाग्य और समृद्धि की निशानी है।
वृक्षारोपण को एक पुण्य कार्य माना गया है। एक वृक्ष लगाना और उसका संरक्षण करना उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना किसी संतान को गोद लेना और उसका पालन-पोषण तथा विकास करना। अग्निपुराण में तो कहा गया है कि जो व्यक्ति वृक्ष लगाता है, वह अपने तीस हजार पितरों का उद्धार करता है।
वृक्षारोपण से मनुष्य को अनेक लाभ मिलते हैं। वृक्षों के फलने-फूलने से सूने स्थान भी सुंदर बन जाते हैं। वृक्षों की हरियाली मन को प्रसन्न करती है। उनकी शीतल छाया गर्मी की दोपहर में सुख-शांति देती है। उनके फूल-फल तथा पत्ते-लकड़ी हमारे लिए बहुत उपयोगी होते हैं। वृक्षों से कागज, दियासलाई आदि बनाने की कच्ची सामग्री, गोंद, तरह-तरह की जड़ी-बूटियाँ और तेलों की प्राप्ति होती है।
वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टि से भी वृक्षारोपण बहुत महत्त्वपूर्ण है। वृक्षों से वायुमंडल शीतल और शुद्ध बनता है। शुद्ध हवा लोगों को स्वस्थ बनाती है। वृक्षों के आकर्षण से बादल वर्षा करते हैं और अकाल का भय दूर होता है। खेतों के चारों ओर वृक्ष लगाने से वर्षा में उनकी मिट्टी का संरक्षण होता है और अनाज का उत्पादन बढ़ता है। नदी के किनारे वृक्ष लगाने से उसके किनारों का कटाव रुकता है। सड़कों के किनारे वृक्ष लगाने से उनकी शोभा बढ़ती है और राहगीरों को छाया मिलती है।
सचमुच, वृक्षारोपण हमारा एक सामाजिक कर्तव्य है। वह जीवन को स्वस्थ, सुंदर और सुखी बनाने की एक योजना है। प्रति वर्ष वन महोत्सव मनाकर हमें इस योजना में ज़रूर सहयोग देना चाहिए। यह खुशी की बात है कि आज हम वृक्षारोपण के महत्त्व को समझने लगे हैं। आज शहरों में 'वृक्ष लगाओ' सप्ताह मनाए जाते हैं।
नगरपालिकाएँ भी वृक्षारोपण के कार्यक्रम को प्रोत्साहन दे रही हैं। स्व. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जन्मदिवस पर भी वृक्षारोपण करने की परंपरा चल पड़ी है और अधिकाधिक वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति या संस्था को 'वृक्ष-मित्र' पुरस्कार भी दिया जाता है। इसमें संदेह नहीं कि देश में हरे-भरे वृक्ष जितने अधिक होंगे, देश का जीवन भी उतना ही हरा-भरा होगा। इसलिए हमें वृक्षारोपण की प्रवृत्ति को उत्साहपूर्वक अपनाना चाहिए।
In simple words: वृक्ष हमारे मित्र हैं और जीवन के लिए आवश्यक हैं। वे पर्यावरण को शुद्ध करते हैं, वर्षा लाते हैं, मिट्टी का कटाव रोकते हैं, और हमें फल, लकड़ी, दवाएँ जैसी कई चीजें देते हैं। वृक्षारोपण एक पुण्य कार्य है और हमें इसे बढ़ावा देना चाहिए ताकि हमारा देश और जीवन हरा-भरा और स्वस्थ रहे।
Exam Tip: वृक्षारोपण के लाभों को वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टिकोण से समझाएं। वृक्षों के महत्व और उनके संरक्षण के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर ज़ोर दें।
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