NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit: Chapter 13 आरोग्य साधनानी
Review structured textbook solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 13 आरोग्य साधनानी. Built according to UP Board guidelines for the 2026 27 academic year, these downloadable answers support daily revision and problem-solving accuracy.
Practice Class 9 Sanskrit Solutions: Chapter 13 आरोग्य साधनानी
View or download the dedicated Chapter 13 आरोग्य साधनानी solution resource below. Engaging with these textbook answers under focused study conditions ensures continuous academic progress and mastery of the 2026 27 curriculum for Sanskrit.
UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 13 Aarogya – Sadhnani Question Answer (पद्म-पीयूषम्)
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 13 हिंदी अनुवाद आरोग्य-साधनानि के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड
परिचय-
भारतीय चिकित्सा विज्ञान के दो अमूल्य रत्न हैं-'चरक संहिता' और 'सुश्रुत-संहिता' । महर्षि चरक ने ईसा से 500 वर्ष पूर्व 'अग्निवेश-संहिता' नामक ग्रन्थ का प्रतिसंस्कार करके चरक-संहिता' की रचना की थी। इसके 200 वर्ष पश्चात् अर्थात् ईसा से लगभग 300 वर्ष पूर्व 'सुश्रुत-संहिता' नामक ग्रन्थ की रचना महर्षि सुश्रुत द्वारा की गयी। चरक-संहिता में काय-चिकित्सा को और सुश्रुत-संहिता में शल्य-चिकित्सा को प्रधानता दी गयी है। इन दोनों ग्रन्थों में रोगों की चिकित्सा के साथ-साथ वे उपाय भी बताये गये हैं, जिनका पालन करने से रोगों की उत्पत्ति ही नहीं होती ।
प्रस्तुत पाठ के सभी श्लोक 'चरक-संहिता' और 'सुश्रुत-संहिता' से संगृहीत किये गये हैं। इन । श्लोकों में आरोग्य की रक्षा के लिए व्यायाम आदि उपायों पर प्रकाश डाला गया है।
व्यायाम की परिभाषा-
जो शारीरिक चेष्टा स्थिरता के लिए बल को बढ़ाने वाली होती है, उसे . व्यायाम कहते हैं। व्यायाम की आवश्यकता-व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, कार्यक्षमता में स्थिरता, दुःखों को सहन करने की शक्ति, वात; पित्त; कफ आदि विकारों का विनाश और पाचन-क्रिया की शक्ति में वृद्धि होती है।
व्यायाम की मात्रा -
मनुष्य को सभी ऋतुओं में प्रतिदिन शारीरिक क्षमता की अर्द्ध मात्रा के अनुसार, व्यायाम करना चाहिए। जब मनुष्य के हृदय में उचित स्थान पर स्थित वायु मुख में पहुँचने लगती है तो उसे बलार्द्ध (शारीरिक क्षमता की अर्द्धमात्रा) कहते हैं। इससे अधिक व्यायाम करने से शारीरिक थकान हो जाती है, जिससे शारीरिक बल की क्षति होने की सम्भावना होती है। अधिक व्यायाम से हानियाँ-अधिक व्यायाम करने से शरीर और इन्द्रियों की थकान, रुधिर
आदि धातुओं का नाश, प्यास; रक्त-पित्त का दुःसाध्य रोग, सॉस की बीमारी, बुखार, उल्टी आदि हानियाँ होती हैं; अतः शारीरिक शक्ति से अधिक व्यायाम कभी भी नहीं करना चाहिए।
व्यायाम करने के बाद सावधानी -
व्यायाम करने के बाद शरीर को चारों ओर से धीरे-धीरे मलना चाहिए; अर्थात् शरीर की मालिश करनी चाहिए।
व्यायाम के लाभ-
व्यायाम करने से शरीर की वृद्धि, लावण्य, शरीर के अंगों की सुविभक्तता, पाचन-शक्ति का बढ़ना, आलस्यहीनता, स्थिरता, हल्कापन, स्वच्छता, शारीरिक थकान-इन्द्रियों की थकान-प्यास-ठण्ड-गर्मी आदि को सहने की शक्ति और श्रेष्ठ आरोग्य उत्पन्न होता है। व्यायाम करने से मोटापा घटता है और शत्रु भी व्यायाम करने वाले को पीड़ित नहीं करते हैं। उसे सहसा बुढ़ापा और बीमारियाँ भी नहीं आती हैं। व्यायाम रूपहीन को रूपवान बना देता है। वह स्निग्ध भोजन करने वाले बलशालियों के लिए हितकर है। वसन्त और शीत ऋतु में तो विशेष हितकारी है।
स्नान करने के लाभ -
स्नान करने से पवित्रता, वीर्य और आयु की वृद्धि, थकान-पसीना और मैल का नाश, शारीरिक बल की वृद्धि और ओज उत्पन्न होता है।
सिर में तेल लगाना-
सिर में तेल लगाने से सिर का दर्द, गंजापन, बालों को पकना एवं झड़ना नहीं होता। सिर की अस्थियों का बल बढ़ता है और बाल काले, लम्बे और मजबूत जड़ों वाले हो जाते हैं।
भोजन के नियम-
प्रेम, रुचि या अज्ञान के कारण अधिक भोजन नहीं करना चाहिए। हितकर भोजन भी देखभाल कर करना चाहिए। विषम भोजन से रोगों और कष्टों का होना देखते हुए, बुद्धिमान पुरुष को हितकर, परिमित और समय पर भोजन करना चाहिए ।
पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या
(1)
शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलश्रद्ध
देहव्यायामसङ्ख्याता मात्रया तां समाचरेत् ॥
शब्दार्थ
शरीरचेष्टा = देह की क्रिया।
चेष्टा = क्रिया अथवा च - इष्टा = अभीष्ट, वांछित ।
स्थैयुर्था = स्थिरता के लिए।
बलवद्धिनी = बल को बढ़ाने के स्वभाव वाली।
इष्टा = अभीष्ट ।
देहव्यायामसङ्ख्याता = शारीरिक व्यायाम नाम वाली ।
मात्रया = थोड़ी मात्रा में, अवस्था के अनुसार ।
समाचरेत् = उचित मात्रा से करना चाहिए।
सन्दर्य
प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत पदा-पीयूषम्' के 'आरोग्य-साधनानि' शीर्षक पाठ से उद्धृत है।
[संकेत-इस पाठ के सभी श्लोकों के लिए सही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा ।]
प्रसंग
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में शारीरिक व्यायाम की आवश्यकता बतायी गयी है।।
अन्वय
स्थैर्यार्था बलवद्धिनी च या शरीरचेष्टा इष्टा (अस्ति) (सा) देहव्यायामसङ्ख्याता, तां | मात्रय समाचरेत्।।
व्याख्या
स्थिरता के लिए और बल को बढ़ाने वाली जो शरीर की क्रिया अभीष्ट है, वह शारीरिक व्यायाम के नाम वाली है। उसे अवस्था के अनुसार उचित मात्रा में करना चाहिए अर्थात् व्यायाम आयु और मात्रा के अनुसार ही किया जाना चाहिए ।|
(2)
लाघवं कर्मसामर्थ्य स्थैर्यं दुःखसहिष्णुता ।
दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ॥
शब्दार्थ
लाघवम् = हल्कापन। कर्मसामर्थ्य = कार्य करने की क्षमता। स्थैर्यम् = स्थिरता । दुःखसहिष्णुता = कष्टों को सहन करने की शक्ति । दोषक्षयः = प्रकोप को प्राप्त वात, पित्त, कफ आदि दोषों का विनाश । अग्निवृद्धिः = भोजन पचाने वाली अग्नि की वृद्धि । उपजायते = उत्पन्न होता है।
प्रसंग
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में व्यायाम से होने वाले लाभ बताये गये हैं। ।
अन्वय
व्यायामात् लाघवं, कर्मसामर्थ्य, स्थैर्य, दुःखसहिष्णुता, दोषक्षयः, अग्निवृद्धिः च उपजायते।।
व्याख्या
व्यायाम करने से शरीर में फुर्तीलापन (हल्कापन), कार्य करने की शक्ति, स्थिरता, दुःखों को सहन करने की शक्ति, वात-पित्त कफ़ आदि दोषों का विनाश और भोजन पचाने वाली अग्नि की वृद्धि उत्पन्न होती है। तात्पर्य यह है कि व्यायाम करने से शरीर की सर्वविध उन्नति होती है।
(3)
सर्वेष्वृतुष्वहरहः पुम्भिरात्महितैषिभिः ।
बलस्यार्धेन कर्त्तव्यो व्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा ॥
शब्दार्थ
सर्वेष्वृतुष्वहरहः (सर्वेषु - ऋतुषु - अहरहः) = सभी ऋतुओं में प्रतिदिन । पुम्भिः = पुरुषों के द्वारा । आत्महितैषिभिः = अपना हित चाहने वाले । बलस्य = बल के । अर्धेन = आधे द्वारा । कर्तव्यः = करना चाहिए। हन्ति = हानि पहुँचाता है। अतोऽन्यथा = इससे विपरीत करने से ।
प्रसंग
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में अधिक व्यायाम करने से होने वाली हानि को बताया गया है।
अन्वय
आत्महितैषिभिः पुम्भिः सर्वेषु ऋतुषु अहरहः बलस्य अर्धेन व्यायामः कर्त्तव्यः । अतोऽन्यथा हन्ति ।।
व्याख्या
अपना हित चाहने वाले पुरुषों को सभी ऋतुओं में प्रतिदिन अपनी आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिए। इससे भिन्न करने से यह हानि पहुँचाता है। तात्पर्य यह है कि थकते हुए व्यायाम नहीं करना चाहिए और बहुत हल्का व्यायाम भी नहीं करना चाहिए ।
(4)
हृदि स्थानस्थितो वायुर्यदा वक्त्रं प्रपद्यते ।
व्यायामं कुर्वतो जन्तोस्तद् बलार्धस्य लक्षणम् ॥
शब्दार्थ
हृदि = हृदय में । स्थानस्थितः = उचित स्थान पर ठहरा हुआ। वक्त्रं प्रपद्यते = मुख में पहुंचने लगती है । कुर्वतः = करते हुए। जन्तोः = जन्तु का । बलार्धस्य = बल का आधा भाग।।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में आधे बल का लक्षण बताया गया है।
अन्वय
व्यायामं कुर्वतः जन्तोः हृदि स्थानस्थितः वायुः यदा वक्त्रं प्रपद्यते, तद् बलार्धस्य लक्षणम् (अस्ति)।।
व्याख्या
व्यायाम करने वाले प्राणी के हृदय पर अपने स्थान पर स्थित वायु जब मुख में पहुँचते लगती है, वह आधे बल का लक्षण है। तात्पर्य यह है कि जब व्यायाम करते-करते श्वाँस का आदान-प्रदान मुख के माध्यम से शुरू हो जाए; अर्थात् साँस फूलने लगे; तो इसे आधे बल का लक्षण समझना चाहिए।
(5)
श्रमः क्लमः क्षयस्तृष्णा रक्तपित्तं तामकः ।
अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छदिश्च जायते ॥
शब्दार्थ
श्रमः = थकावट । क्लमः = इन्द्रियों की थकान । क्षयः = रक्त आदि धातुओं की कमी । तृष्णा = प्यास। रक्तपित्तम् = एक दुःसाध्य रोग । प्रतामकः = श्वास सम्बन्धी रोग । कासः = खाँसी । छर्दिः = उल्टी । जायते = उत्पन्न हो जाते हैं।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में अति व्यायाम करने से होने वाली हानियाँ बतायी गयी हैं।
अन्वय
अतिव्यायामतः श्रमः, क्लमः, क्षयः, तृष्णा, रक्तपित्तम्, प्रतामकः, कासः, ज्वरः, छर्दिः च जायते ।
व्याख्या
अधिक व्यायाम करने से शारीरिक थकावट, इन्द्रियों की थकावट, रक्त आदि । धातुओं की कमी, प्यास, रक्तपित्त नामक दुःसाध्य रोग, श्वास सम्बन्धी रोग, खाँसी, बुखार और उल्टी आदि रोग हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि अत्यधिक व्यायाम करने से अनेकानेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
(6)
व्यायामहास्यभाष्याध्व ग्राम्यधर्म प्रजागरान् ।
नोचितानपि सेवेत बुद्धिमानतिमात्रया ॥ |
शब्दार्थ
हास्य = हास-परिहास । भाष्य = बोलना। अध्व = मार्ग-गमन । ग्राम्यधर्म = स्त्री-सहवास । प्रजागरान् = जागरण । उचितान् = उचित, अभ्यस्त। सेवेत = सेवन करना चाहिए। अतिमात्रया = अत्यधिक मात्रा में।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्यक्ति के लिए असेवनीय बातों के विषय में बताया गया है।
अन्वय
बुद्धिमान व्यायाम-हास्य-भाष्य-अध्व-ग्राम्यधर्म-प्रजागरान् उचित अपि अति मात्रया न सेवेत ।।
व्याख्या
बुद्धिमान् पुरुष को व्यायाम, हँसी-मजाक, बोलना, रास्ता तय करना, स्त्री-सहवास और जागरण का अभ्यस्त होने पर भी अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि बुद्धिमान पुरुष को सदैव किसी भी चीज के अति सेवन से बचना चाहिए । |
(7)
शरीरांयासजननं कर्म व्यायामसज्ञितम् ।
तत्कृत्वा तु सुखं देहं विमृदनीयात् समन्ततः ॥
शब्दार्थ
शरीरायसिजननं = शरीर में थकावट उत्पन्न करने वाला।
व्यायाम सञ्जितम् = व्यायाम नाम दिया गया है।
सुखम् = सुखपूर्वक ।
विमृद्भीयात् = मलना चाहिए, दबाना चाहिए।
समन्ततः = चारों ओर से।
प्रसंग
व्यायाम के बाद शरीर-मालिश की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
अन्वय
व्यायामसज्ञितम् शरीरायासजननं कर्म (अस्ति) तत् कृत्वा तु देहं समन्ततः सुखं विमृद्भीयात् ।।
व्याख्या
व्यायाम नाम वाला शरीर में थकावट उत्पन्न करने वाला कर्म है। उसे करने के बाद तो शरीर को चारों ओर से आराम से मसलना चाहिए। तात्पर्य यह है कि व्यायाम करने से शरीर में थकावट उत्पन्न होती है। इसके बाद शरीर की मालिश की जानी चाहिए।
(8-9)
शरीरोपचयः कान्तिर्गात्राणां सुविभक्तता ।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा ॥
श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता ।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजायते ॥
शब्दार्थ
शरीरोपचयः = शरीर की वृद्धि ।
कान्तिः = चमक, सलोनापन ।
गात्राणां = शरीर का ।
सुविभक्तता = अच्छी प्रकार से अलग-अलग विभक्त होना ।
दीप्ताग्नित्वम् = पेट की पाचनशक्ति का बढ़ना।
अनालस्यं = आलस्यहीनता, उत्साह ।
स्थिरत्वं = स्थिरता, दृढ़ता।
लाघवम् = हल्कापन ।
मृजा = स्वच्छता ।
श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां = शारीरिक थकाने, इन्द्रियों की थकान, प्यास, गर्मी, सर्दी आदि की।
सहिष्णुता = सहन करने की योग्यता।
आरोग्यम् = स्वास्थ्य।
उपजायते = उत्पन्न होता है।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक-युगल में व्यायाम के लाभ बताये गये हैं।
अन्वय
व्यायामात् शरीरोपचय, कान्तिः, गात्राणां सुविभक्तता, दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यं, स्थिरत्वं, लाघवं, मृजा, श्रम-क्लम-पिपासा-उष्ण-शीत आदीनां सहिष्णुता परमम् आरोग्यं च अपि उपजायते ।
व्याख्या
व्यायाम करने से शरीर की वृद्धि,सलोनापन, शरीर के अंगों को भली प्रकार से । अलग-अलग विभक्त होना; पाचन-क्रिया का बढ़ना; आलस्य का अभाव, स्थिरता, हल्काषन, स्वच्छता, शारीरिक थकावट, इन्द्रियों की थकावट, प्यास, गर्मी-सर्दी आदि को सहने की शक्ति और उत्तम आरोग्य भी उत्पन्न होता है। तात्पर्य यह है कि व्यायाम करने से शरीर सर्वविध पुष्ट होता है।
(10)
न चास्ति सदृशं तेन किञ्चित् स्थौल्यापैकर्षणम् ।
न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो भयात् ॥
शब्दार्थ
स्थौल्यार्पकर्षणम् = मोटापे (स्थूलता) को कम करने वाला। व्यायामिनम् = व्यायाम करने वाले को। मय॑म् = मनुष्य को। अर्दयन्ति = पीड़ित करते हैं।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्यायाम को मोटापा स्थूलकोयत्व कम करने के साधन के रूप्न में. निरूपित किया गया है।
अन्वय
तेन सदृशं च स्थौल्यापकर्षणं किञ्चित् न (अस्ति) । अरयः व्यायामिनं मर्त्य भयात् न अर्दयन्ति ।
व्याख्या
उस (व्यायाम) के समान मोटापे को कम करने वाला अन्य कोई साधन नहीं है। शत्रु लोग भी व्यायाम करने वाले पुरुष को अपने भय से पीड़ित नहीं करते हैं। तात्पर्य यह है कि व्यायाम स्थूलकाता को तो कम करता ही है, व्यक्ति को शत्रु भय से भी मुक्ति दिलाता है।
(11)
न चैनं सहसाक्रम्य जरा समधिरोहति ।।
स्थिरीभवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य हि ॥
शब्दार्थ
सहसाक्रम्य = अचानक आक्रमण करके । जरा = बुढ़ापा । समधिरोहति = सवार होता है। स्थिरीभवति = मजबूत हो जाता है। मांसं = मांसपेशियाँ। व्यायामाभिरतस्य (व्यायाम - अभिरतस्य) = व्यायाम में तत्पर ।
प्रसंग
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में व्यायाम के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।
अन्वय
सहसा आक्रम्य एनं जरा न समधिरोहति । व्यायाम अभिरतस्य हि मांसं च स्थिरीभवति ।
व्याख्या
सहसा आक्रमण करके बुढ़ापा-इस पर (व्यायाम करने वाले पर) सवार नहीं होता है। व्यायाम में तत्पर मनुष्य का मांस भी मजबूत हो जाता है। तात्पर्य यह है कि व्यायाम करने वाला व्यक्ति शीघ्र बूढ़ा नहीं होता है। उसकी मांसपेशियाँ भी बहुत मजबूत हो जाती हैं।
(12)
व्यायामक्षुण्णगात्रस्य पद्भ्यामुवर्तितस्य च ।।
व्याधयो नोपसर्पन्ति सिंहं क्षुद्रमृगा इव ॥
शब्दार्थ
व्यायामक्षुण्णगात्रस्य = व्यायाम से कूटे गये शरीर वाले । पद्भ्यां = पैरों से । उद्वर्तितस्य = रौंदे गये । नउपसर्पन्ति= पास नहीं जाती हैं। क्षुद्रमृगाः इव = छोटे-छोटे पशुओं की तरह ।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्यायाम के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।
अन्वय
व्यायामक्षुण्णगात्रस्य पद्भ्याम् उर्वर्तितस्य च व्याधयः सिंहं क्षुद्रमृगाः इव न उपसर्पन्ति ।
व्याख्या
व्यायाम करने वाले व्यक्ति का शरीर इतना बलिष्ठ और मजबूत हो जाता है कि बीमारियाँ उसके समीप जाती हुई उसी प्रकार भय खाती हैं, जिस प्रकार से छोटे-छोटे जानवर सिंह के समीप नहीं आते हैं। तात्पर्य यह है कि निरन्तर व्यायाम करने से मजबूत शरीर वाला व्यक्ति सामान्य मनुष्यों की तुलना में अधिक बीमार नहीं पड़ता ।
(13)
वयोरूपगुणैहनमपि कुर्यात् सुदर्शनम् ।।
व्यायामो हि सदा पथ्यो बलिनां स्निग्धभोजिनाम् ।
स च शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः ॥
शब्दार्थ
वयोरूपगुणैः हीनम् = आयु, रूप तथा गुण से हीन (व्यक्ति) को। कुर्यात् = करना चाहिए । सुदर्शनम् = सुन्दर दिखाई पड़ने वाला। पथ्यः = हितकर । बलिनाम् = शक्तिशालियों का । स्निग्धभोजिनाम् = चिकनाई से युक्त भोजन करने वाले । पथ्यतमः = अत्यधिक हितकर ।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्यायाम के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।
अन्वय
व्यायामः हि वयोरूपगुणैः हीनम् अपि (पुरुष) सुदर्शनं कुर्यात् । सः स्निग्धभोजिनां बलिनां (कृते) सदा पथ्यः, किन्तु शीते वसन्ते च तेषां (कृते) पथ्यतमः स्मृतः ।
व्याख्या
निश्चय ही व्यायाम अवस्था, रूप और अन्य गुणों से रहित व्यक्ति को भी देखने में सुन्दर बना देता है। वह चिकनाई से युक्त भोजन करने वाले बलवान् पुरुषों के लिए सदा हितकारी है, किन्तु वसन्त और शीत ऋतु में वह अत्यन्त हितकारी माना गया है। तात्पर्य यह है कि व्यायाम सौन्दर्यरहित व्यक्ति को भी सौन्दर्यवान् बना देता है। वसन्त और शीत ऋतु में तो इसका किया जाना अत्यधिक हितकारी होता है।
(14)
पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम् ।।
शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम् ॥
शब्दार्थ
वृष्यम् = वीर्य की वृद्धि करने वाला। आयुष्यम् = आयु की वृद्धि करने वाला। श्रमस्वेद-मलापहम् = थकान, पसीने और मैल को दूर करने वाला। शरीरबलसन्धानम् = शरीर की शक्ति को बढ़ाने वाला। ओजस्करम् = कान्ति को बढ़ाने वाला ।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में स्नान के लाभ बताये गये हैं।
अन्वय
स्नानं पवित्रं, वृष्यम्, आयुष्यं, श्रम-स्वेद-मलापहं, शरीरबलसन्धानं, परम् ओजस्करं । च (मतम्) ।
व्याख्या
स्नान को पवित्रता लाने वाला, वीर्य की वृद्धि करने वाला, आयु को बढ़ाने वाला, थकान-पसीना और मैल को दूर करने वाला, शरीर की शक्ति को बढ़ाने वाला और अत्यन्त ओज । उत्पन्न करने वाला माना गया है। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के लिए स्नान बहुत ही लाभदायक है।
(15)
मेध्यं पवित्रमायुष्यमलक्ष्मीकलिनाशनम् ।
पादयोर्मलमार्गाणां शौचाधानमभीक्ष्णशः ॥
शब्दार्थ
मेध्यम् = बुद्धि (मेधा) की वृद्धि करने वाला ।
आयुष्यम् = आयुष्य की वृद्धि करने वाला ।
अलक्ष्मीकलिनाशनम् = दरिद्रता और पाप को नष्ट करने वाला। पादयोः पैरों की
मलमार्गाणां = मल बाहर निकलने के रास्ते।
शौचाधानम् = सफाई करना।
अभीक्ष्णशः = निरन्तर।।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में दोनों पैरों और मल-मार्गों की सफाई के लाभ बताये गये हैं।
अन्वय
पादयोः मलमार्गाणां (च) अभीक्ष्णशः शौचाधानं मेध्यं, पवित्रम्, आयुष्यम्, अलक्ष्मी-कलिनाशनं (च भवति) ।
व्याख्या
दोनों पैरों और (भीतरी) मल को निकालने के मार्गों गुदा आदि की निरन्तर सफाई बुद्धि को बढ़ाने वाली, पवित्रता करने वाली, आयु को बढ़ाने वाली और दरिद्रता और पाप को नष्ट करने वाली होती है। तात्पर्य यह है कि शरीर की स्वच्छता शरीर को पवित्र करने वाली और आयु को बढ़ाने वाली तो है ही, निर्धनता को भी नष्ट करती है।
(16)
नित्यं स्नेहार्दशिरसः शिरःशूलं न जायते ।
न खालित्यं ने पालित्यं न केशाः प्रपतन्ति च ॥
शब्दार्थ
नित्यम् = प्रतिदिन । स्नेहार्दशिरसः = तेल से गीले सिर वाले का । शिरःशूलम् = सिर का दर्द । खालित्यम् = गंजापन । पालित्यम् = बालों का पक जाना । प्रपतन्ति = झड़ते हैं, गिरते हैं।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में तेल लगाने के गुण बताये गये हैं।
अन्वय
नित्यं स्नेहार्दशिरसः (जनस्य) शिरः शुलं न जायते, न च खालित्यं न (च) पालित्यं (भवति), केशाः न प्रपतन्ति (च)।
व्याख्या
सदा तेल से भीगे सिर वाले व्यक्ति के सिर में दर्द नहीं होता है। उसके न गंजापन होता है, न केश पकते हैं और न बाल झड़ते हैं। तात्पर्य यह है कि सदैव सिर में तेल लगाने वाला व्यक्ति सिर के समस्त अन्तः-बाह्य विकारों से मुक्त रहता है।
(17)
बलं शिरःकपालानां विशेषेणाभिवर्धते ।
दृढमूलाश्च दीर्घाश्च कृष्णाः केशा भवन्ति च ॥
शब्दार्थ
शिरःकपालानां = सिर की अस्थियों का । विशेषण = विशेष रूप से । अभिवर्धते = बढ़ता है। दृढमूलाः = मजबूत जड़ों वाले । दीर्घाः = लम्बे । कृष्णाः = काले । भवन्ति = होते हैं।
प्रसंग
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में तेल लगाने के गुण बताये गये हैं।
अन्वय
(स्नेहार्द्रशिरसः जनस्य) शिर:कपालानां बलं विशेषेण अभिवर्धते, केशाः दृढमूलाः दीर्घाः, कृष्ण च भवन्ति ।
व्याख्या
(तेल से गीले सिर वाले पुरुष की) सिर की अस्थियों को बल विशेष रूप से बढ़ता है। बाल मजबूत जड़ों वाले, लम्बे और काले होते हैं। तात्पर्य यह है कि सदैव सिर में तेल लगाने वाला व्यक्ति सिर के समस्त अन्तः-बाह्य विकारों से मुक्त रहता है।
(18)
इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति सुत्वम् भवति चाननम् ।।
निद्रालाभः सुखं च स्यान्मूनि तैलनिषेवणात् ॥
शब्दार्थ
इन्द्रियाणि = इन्द्रियाँ । प्रसीदन्ति = प्रसन्न हो जाती हैं। सुत्वम् = सुन्दर त्वचा वाला । निद्रालाभः = नींद की प्राप्ति । मूर्टिन = सिर पर । तैलनिषेवणात् = तेल की मालिश करने से ।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में सिर पर तेल लगाने के गुण बताये गये हैं।
अन्वय
मूर्छिन तैलनिषेवणात् इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति, आननं च सुत्वक् भवति, निद्रालाभः च सुखं स्यात् ।।
व्याख्या
सिर पर तेल का सेवन करने से इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जाती हैं, मुखे सुन्दर त्वचा वाला हो जाती है और नींद की प्राप्ति सुखपूर्वक होती है। तात्पर्य यह है कि सिर पर तेल लगाने वाला व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से प्रसन्न रहता है।
(19)
न रागान्नाप्यविज्ञानादाहारमुपयोजयेत् ।
परीक्ष्य हितमश्नीयाद् देहो स्याहारसम्भवः ॥
शब्दार्थ
रागात् = प्रेम या रुचि के कारण। अविज्ञानात् = बिना जाने हुए। उपयोजयेत् = उपयोग करना चाहिए। परीक्ष्य = अच्छी तरह देखभालकर। अश्नीयात् = खाना चाहिए। आहारसम्भवः = भोजन से बनने वाला अर्थात् आहार से सम्भव ।।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में भोजन करने के नियम बताये गये हैं।
अन्वय
(नरः) न रागात् न अपि अविज्ञानात्, आहारम् उपयोजयेत्। परीक्ष्य हितम् अश्नीयात् । हि देहः आहारसम्भवः ।
व्याख्या
मनुष्य को न प्रेम या रुचि के कारण और न ही अज्ञान के कारण भोजन का उपयोग करना चाहिए। अच्छी तरह देखभाल कर हितकारी भोजन करना चाहिए। निश्चय ही शरीर भोजन से बनने वाला होता है। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को देखभाल कर और स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन ही करना चाहिए। प्रेम और रुचि के कारण अधिक भोजन नहीं करना चाहिए।
(20)
हिताशी स्यान्मिताशी स्यात् कालभोजी जितेन्द्रियः ।
पश्यन् रोगान् बहून् कष्टान् बुद्धिमान् विषमशिनात् ॥
शब्दार्थ
हिताशी = हितकर भोजनं करने वाला। मिताशी = थोड़ा भोजन करने वाला। कालभोजी = समय पर भोजन करने वाला । जितेन्द्रियः = अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाला। पश्यन् = देखते हुए । बहून् = बहुत । विषमाशनात् = विषम (अंटसंट) भोजन करने से।।
प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में भोजन करने के नियम बताये गये हैं।
अन्वय
बुद्धिमान् विषमाशनात् बहून् रोगान् कष्टान् च पश्यन् हिताशी स्यात्, मिताशी स्यात्, कालभोजी, जितेन्द्रियः च स्यात् ।।
व्याख्या
बुद्धिमान् पुरुष को विषम भोजन करने से होने वाले बहुत-से रोगों और कष्टों को देखते हुए हितकर भोजन करने वाला, परिमित (थोड़ा) भोजन करने वाला, समय पर भोजन करने वाला और जितेन्द्रिय होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को सर्वविध सन्तुलित भोजन करने वाला होना चाहिए।
(21)
नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः ।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥
शब्दार्थ
हिताहार-विहारसेवी = हितकर भोजन और विहार (भ्रमण) का सेवन करने वाला। समीक्ष्यकारी = विचारकर काम करने वाला। विषयेष्वसक्तः = विषयों में आसक्ति न रखने वाला। दाता = दान देने वाला। समः = सभी जीवों में समान भाव रखने वाला। सत्यपरः = सत्य ही जिसके लिए सबसे उत्कृष्ट है; अर्थात् सत्य को सर्वोपरि मानने वाला । क्षमावान् = क्षमाभाव से युक्त । आप्तोपसेवी = विश्वसनीय व्यक्तियों का संसर्ग करने वाला । अरोगः = नीरोग।।
प्रसंग
प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में निरोग होने के उपाय बताये गये हैं।
अन्वय
हिताहार-विहारसेवी, समीक्ष्यकारी, विषयेषु असक्तः, दाता, समः, सत्येपरः, क्षमावान्, आप्तोपसेवी, च नरः अरोगः भवति ।
व्याख्या
हितकर भोजन और विहार (भ्रमण) करने वाला, विचारकर कार्य करने वाला, विषय-वासनाओं में आसक्ति न रखने वाला, दान देने वाला, सुख-दुःख को समान समझने वाला, सत्य बोलने वाला, क्षमा धारण करने वाला और विश्वसनीय-जनों की संगति करने वाला मनुष्य रोगरहित होता है।
सूक्तिपरक वाक्य की व्याख्या
(1)
व्याधयो नोपसर्पन्ति सिंहं क्षुद्रमृगा इव ।।
सन्दर्य
प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत पद्म-पीयूषम्' के 'आरोग्यसाधनानि' नामक पाठ से उद्धृत है। .
प्रसंग
इस सूक्ति में व्यायाम की उपयोगिता को बताया गया है।
अर्थ
(व्यायाम करने वाले के) समीप बीमारियाँ उसी प्रकार नहीं जातीं, जिस प्रकार से सिंह के समीप छोटे प्राणी।।
व्याख्या
व्यायाम करने वाले व्यक्ति का शरीर इतना बलिष्ठ और मजबूत हो जाता है कि बीमारियाँ उसके समीप जाते हुए उसी प्रकार भय खाती हैं, जिस प्रकार से छोटे-छोटे जीव सिंह के समीप जाते हुए भय खाते हैं; अर्थात् व्यायाम करने वाला व्यक्ति नीरोगी होता है। अतः व्यक्ति को, नियमित व्यायाम द्वारा अपने शरीर को स्वस्थ रखना चाहिए।
(2)
शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम् ।।
सन्दर्य
पूर्ववत् ।
प्रसंग
स्नान के महत्त्व को प्रस्तुत सूक्ति में समझाया गया है।
अर्थ
स्नान शरीर की शक्ति तथा ओज को बहुत अधिक बढ़ाने वाला होता है।
व्याख्या
स्नान करने से शरीर का मैल और पसीना साफ हो जाता है, जिससे शरीर में रक्त को संचार बढ़ जाता है। रक्त-संचार के बढ़ जाने से व्यक्ति अपने शरीर में ऐसी स्फूर्ति का अनुभव करता है, मानो उसमें कहीं से अतिरिक्त शक्ति का समावेश हो गया हो। त्वचा के मैल इत्यादि के धुल जाने से त्वचा में चमक आ जाती है, जिससे व्यक्ति का चेहरा चमकने लगता है। इसीलिए स्नान को शक्ति तथा ओज को बढ़ाने वाला माना गया है।
Free study material for Sanskrit
UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 13 आरोग्य साधनानी
Accessing Chapter 13 आरोग्य साधनानी Solutions
Access structured UP Board textbook solutions for Chapter 13 आरोग्य साधनानी. Designed in alignment with the latest academic curriculum for Class 9 Sanskrit, these answers cover all end-of-chapter exercises to support daily learning and homework completion.
Concept-Driven Answers for Class 9 Sanskrit
Each solution includes detailed reasoning to foster genuine comprehension of Chapter 13 आरोग्य साधनानी concepts. Reviewing these step-by-step breakdowns allows learners to master both analytical and descriptive questions expected in school evaluations.
Maximizing Study Efficiency
Consistent practice with these solution guides cultivates faster problem-solving habits and clearer logical structuring. For a complete preparation experience, pair these textbook answers with our dedicated revision notes and sample papers for Class 9 Sanskrit.
FAQs
The complete and updated UP Board Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 13 आरोग्य साधनानी is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 9 Sanskrit are as per latest UP Board curriculum.
Yes, our experts have revised the UP Board Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 13 आरोग्य साधनानी as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Sanskrit concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.
Toppers recommend using UP Board language because UP Board marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our UP Board Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 13 आरोग्य साधनानी will help students to get full marks in the theory paper.
Yes, we provide bilingual support for Class 9 Sanskrit. You can access UP Board Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 13 आरोग्य साधनानी in both English and Hindi medium.
Yes, you can download the entire UP Board Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 13 आरोग्य साधनानी in printable PDF format for offline study on any device.